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अंतिम दिनों के मसीह के कथन - संकलन

परमेश्वर सभी चीज़ों के लिए जीवन का स्रोत है (III)     भाग एक

इस समय अवधि के दौरान, हमने बहुत सी चीज़ों के बारे में बात की है जो परमेश्वर को जानने से सम्बन्धित है और हाल ही में हमने इस विषय पर किसी अति महत्वपूर्ण चीज़ के बारे में बात की थी: परमेश्वर सभी वस्तुओं के लिए जीवन का स्रोत है। पिछली बार हमने जीवित रहने के लिए वातावरण के कुछ पहलुओं के बारे में बात की थी जिसे परमेश्वर ने मानवजाति के लिए सृजा था, साथ ही साथ परमेश्वर सभी प्रकार के जीवन आधार को तैयार कर रहा है जो लोगों की ज़िन्दगियों के लिए आवश्यक हैं। वास्तव में, जो परमेश्वर करता है वह लोगों के जीवत रहने के लिए सिर्फ एक वातावरण तैयार करने के लिए नहीं है, न ही यह सिर्फ उनके दैनिक जीवन आधार को तैयार करने के लिए है, बल्कि यह लोगों के जीवित रहने और मानवजाति की ज़िन्दगियों के लिए बहुत सारे रहस्यमयी और आवश्यक कार्य के विभिन्न पहलुओं को पूरा करने के लिए है। ये सब परमेश्वर के कार्य हैं। परमेश्वर के द्वारा किए गए ये कार्य सिर्फ लोगों के जीवित रहने और उनके दैनिक जीवन आधार के लिए एक वातावरण की उसकी तैयारी तक ही सीमित नहीं हैं-उनके पास उसकी अपेक्षा एक अधिक व्यापक दायरा है। इन दो प्रकार के कार्यों के अलावा, वह जीवित रहने के लिए अनेक वातावरण और स्थितियां भी तैयार करता है जो मनुष्य की ज़िन्दगियों के लिए आवश्यक हैं। यह अन्य विषय है जिस पर हम आज चर्चा करने जा रहे हैं, जो परमेश्वर के कार्यों से सम्बन्धित भी है। अन्यथा, इसके बारे में यहां बात करना निरर्थक होगा। यदि लोग परमेश्वर को जानना चाहते हैं किन्तु उनके पास "परमेश्वर," उस शब्द, या जो परमेश्वर के पास है और जो वह है उसके सभी पहलुओं की सिर्फ शाब्दिक और सैद्धान्तिक समझ है, तो यह एक सच्ची समझ नहीं है। अतः परमेश्वर के ज्ञान का मार्ग क्या है? यह उसे जानना है, और उसके कार्यों के जरिए उसके सभी पहलुओं को जानना है। अतः, जब परमेश्वर ने सभी चीज़ों को बनाया तो हमें आगे उसके कार्यों पर सभा करनी होगी।

जब से परमेश्वर ने उन्हें सृजा, उन नियमों के आधार पर जिन्हें उसने निर्धारित किया था, तब से सभी चीज़ें नियमित रूप से संचालित हो रही हैं और निरन्तर विकसित हो रही हैं। उसकी टकटकी लगाती हुई निगाहों के अधीन, और उसके शासन के अधीन, सभी चीज़ें मनुष्यों के जीवित रहने के साथ-साथ नियमित रूप से विकसित हो रही हैं। कोई भी चीज़ इन विधियों को बदलने में सक्षम नहीं है, और न ही कोई भी चीज़ इन विधियों को नष्ट कर सकती है। यह परमेश्वर के शासन के कारण है कि सभी प्राणी बहुगुणित हो सकते हैं, और उसके शासन और प्रबंधन के कारण सभी प्राणी जीवित रह सकते हैं। कहने का तात्पर्य है कि परमेश्वर के शासन के अधीन, सभी प्राणी अस्तित्व में आते हैं, पनपते हैं, लुप्त हो जाते हैं, और एक सुव्यवस्थित विधि से फिर से शरीर में आते हैं। जब बसंत का आगमन होता है, हल्की-हल्की बारिश बसंत के उस एहसास को लेकर आती है और पृथ्वी को नम करती है। बर्फीली ज़मीन पिघलना प्रारम्भ कर देती है, घास अंकुरित होती है और मिट्टी में से ऊपर की ओर बढ़ती है और वृक्ष धीरे-धीरे हरे हो जाते हैं। ये सभी जीवित चीज़ें पृथ्वी पर नई जीवन शक्ति लेकर आती हैं। यह सभी प्राणियों के अस्तित्व में आने और फलने-फूलने का दृश्य है। सभी प्रकार के पशु भी बसंत की गर्माहट को महसूस करने के लिए अपनी मांदों से बाहर आ जाते हैं और एक नए वर्ष की शुरूआत करते हैं। सभी प्राणी ग्रीष्म ऋतु की गर्माहट के दौरान धूप सेंकते हैं और मौसम के द्वारा लाई गई तपन का मज़ा लेते हैं। वे तीव्रता से बढ़ते हैं; पेड़, घास, और सभी प्रकार के पौधे बहुत तेजी से बढ़ रहे हैं, फिर वे खिलते और फल उत्पन्न करते हैं। ग्रीष्म ऋतु के दौरान सभी प्राणी बहुत व्यस्त हैं, जिनमें मनुष्य भी शामिल हैं। वर्षा ऋतु में, बारिश शरद ऋतु की ठंडक को लेकर लाती है, और सब प्रकार के जीवित प्राणी फसलों की कटाई के मौसम का अनुभव लेना शुरू कर देते हैं। सभी प्राणी फल उत्पन्न करते हैं, और मनुष्य भी इन प्राणियों के वर्षा उत्पाद के कारण शीत ऋतु के लिए भोजन तैयार करने हेतु सब प्रकार की चीज़ों की फसल काटना शुरू कर देते हैं। शीत ऋतु में सभी प्राणी धीरे-धीरे ठंडक में आराम करना, एवं शांत होना प्रारम्भ कर देते हैं, और साथ ही लोग भी इस मौसम के दौरान विराम लेते हैं। बसंत ऋतु से ग्रीष्म ऋतु और ग्रीष्म ऋतु से वर्षा ऋतु और वर्षा ऋतु से शरद ऋतु के ये परिवर्तनकाल-ये सभी परिवर्तन परमेश्वर द्वारा स्थापित नियमों के अनुसार घटित होते हैं। वह इन नियमों का उपयोग करके सभी प्राणियों और मनुष्यों की अगुवाई करता है और उसने मानवजाति के लिए एक समृद्ध और रंग बिरंगा जीवन का मार्ग स्थापित किया है, जीवित रहने के लिए एक ऐसा वातावरण तैयार किया है जिसमें अलग अलग तापमान और अलग ऋतुएं होती हैं। जीवत रहने हेतु इन सुव्यवस्थित वातावरण के अंतर्गत, मनुष्य भी सुव्यवस्थित तरीके से जीवित रह सकता है और बहुगुणित हो सकता है। मनुष्य इन नियमों को नहीं बदल सकता है और न ही कोई व्यक्ति या प्राणी इन्हें तोड़ सकता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि दुनिया में क्या मूल परिवर्तन होते हैं, ये नियम लगातार अस्तित्व में बने रहते हैं और ये अस्तित्व में हैं क्योंकि परमेश्वर अस्तित्व में है। यह परमेश्वर के शासन और उसके प्रबंधन की वजह से है। इस प्रकार के सुव्यवस्थित, एवं कहीं बड़े वातावरण के साथ, इन नियमों और विधियों के अंतर्गत लोगों की ज़िन्दगियाँ आगे बढ़ती हैं। इन नियमों ने पीढ़ी दर पीढ़ी लोगों को विकसित किया था, और लोग पीढ़ी दर पीढ़ी इन नियमों के भीतर रहकर जीवित बचे हैं। लोगों ने जीवित रहने के लिए प्राणियों और इस सुव्यवस्थित वातावरण का आनन्द लिया है जिसे परमेश्वर के द्वारा पीढ़ी दर पीढ़ी मनुष्यों के लिए सृजा गया था। हालांकि लोगों को महसूस होता है कि इस प्रकार के नियम स्वाभविक हैं, यद्यपि वे उन्हें पूरी तरह से मन से अलग कर देते हैं, और भले ही वे महसूस नहीं कर सकते हैं कि परमेश्वर इन नियमों का आयोजन कर रहा है, कि परमेश्वर इन नियमों पर शासन कर रहा है, फिर भी चाहे कुछ भी हो, परमेश्वर इस अपरिवर्तनीय कार्य में हमेशा से लगा हुआ है। इस अपरिवर्तनीय कार्य में उसका उद्देश्य मानवता को जीवित रखने के लिए है, और इसलिए है कि मनुष्य निरन्तर बना रहे।

1.परमेश्वर समस्त मानवजाति का पालन पोषण करने हेतु सभी चीज़ों के लिये सीमाएं तय करता है।

आज मैं उस विषय के बारे में बात करने जा रहा हूँ कि कैसे इस प्रकार के नियम मानवजाति का पालन पोषण करते हैं जिन्हें परमेश्वर मानवजाति और समस्त जीवों के लिए लाता है। अतः यह विषय क्या है? यह ऐसा है कि इस प्रकार के नियम मनुष्य का पालन पोषण करते हैं जिन्हें परमेश्वर सभी प्राणियों के लिए लेकर आया है। यह एक बहुत बड़ा विषय है, अतः हम इसे कई हिस्सों में विभाजित कर सकते हैं और उन पर चर्चा कर सकते हैं एक समय में एक विषय पर ताकि उन्हें तुम लोगों के लिए स्पष्ट रूप से चित्रित किया जा सके। इस तरह से तुम लोगों के लिए आभास करना आसन हो जाएगा और तुम सब इसे धीरे-धीरे समझ सकते हो।

सबसे पहले, जब परमेश्वर ने सभी चीज़ों को बनाया, तो उसने पहाड़ों, मैदानों, रेगिस्तानों, पहाड़ियों, नदियों और झीलों के लिए सीमाएं बनाईं। पृथ्वी पर पर्वत, मैदान, मरूस्थल, पहाड़ियां और जल के विभिन्न स्रोत हैं-ये सभी क्या हैं? क्या ये विभिन्न भूभाग नहीं हैं? परमेश्वर ने इन सभी विभिन्न भूभागों के बीच में सीमाओं को खींचा था। जब हम सीमाएं बनाने की बात करते हैं, तो उसका क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि पर्वतों की अपनी सीमा रेखाएं हैं, मैदानों की अपनी स्वयं की सीमा रेखाएं हैं, मरुस्थलों का एक निश्चित दायरा है, पहाड़ों का अपना एक स्थायी क्षेत्रफल है। साथ ही जल के स्रोत की भी एक स्थिर मात्रा है जैसे नदियां और झीलें। अर्थात्, जब परमेश्वर ने सभी चीज़ों की सृष्टि की तब उसने हर चीज़ को बहुत स्पष्टता से बांट दिया था। परमेश्वर ने पहले से ही निर्धारित कर दिया है कि एक पहाड़ का अर्द्धव्यास कितने किलोमीटर का है, इसका दायरा क्या है। साथ ही उसने यह भी निर्धारित कर दिया है कि एक मैदान का अर्द्धव्यास कितने किलोमीटर का है, और इसका दायरा क्या है। सभी प्राणियों की रचना करते समय उसने मरुस्थल के दायरे और साथ ही साथ पहाड़ियों और उनके परिमाणों के दायरे, और वे जिसके द्वारा घिरे हुए हैं उन्हें भी निर्धारित किया था-उसने यह सब भी निर्धारित किया था। उसने नदियों और झीलों के दायरे को निर्धारित किया था जब वह उनकी रचना कर रहा था–उन सभी के पास उनकी सीमाएं हैं। तो जब हम "सीमाएं" कहते हैं तो इसका क्या अर्थ है? सभी प्राणियों के ऊपर परमेश्वर का शासन किस प्रकार सभी प्राणियों के लिए नियमों को स्थापित कर रहा है हमने बस अभी इसके विषय में बात की थी। उदाहरण के लिए, पहाड़ों के दायरे और सीमाएं पृथ्वी की परिक्रमा या समय के गुज़रने के कारण फैलेंगी या घटेंगी नहीं। यह स्थिर हैः यह "स्थिरता" परमेश्वर का नियम है। जहां तक मैदानों के क्षेत्रफल की बात है, उनका दायरा कितना है, वे किससे द्वारा सीमाबद्ध हैं, इसे परमेश्वर द्वारा स्थिर किया गया है। उनके पास एक सीमा है, और एक उभार मैदान के बीचोंबीच बस यों ही अपनी इच्छा से ऊपर नहीं आएगा। मैदान अचानक ही पर्वत में परिवर्तित नहीं होगा-ऐसा नहीं होगा। वे नियम और सीमाएं जिनके विषय में हमने बस अभी बात की थी इस ओर संकेत करते हैं। जहां तक मरुस्थल की बात है, हम यहां मरुस्थल या किसी अन्य भूभाग या भौगोलिक स्थिति की भूमिकाओं का जिक्र नहीं करेंगे, केवल इसकी सीमाओं का जिक्र करेंगे। परमेश्वर के शासन के अधीन मरुस्थल का भी दायरा नहीं बढ़ेगा। यह इसलिए है क्योंकि परमेश्वर ने इसे इसका नियम और उसका दायरा दिया है। इसका क्षेत्रफल कितना बड़ा है और इसकी भूमिका क्या है, वह किसके द्वारा घिरा हुआ है, और यह कहां पर स्थित है-इसे पहले से ही परमेश्वर द्वारा तय कर दिया गया है। वह अपने दायरे से आगे नहीं बढ़ेगा, न अपनी स्थिति को बदलेगा, और न ही मनमाने ढंग से अपना क्षेत्रफल बढ़ाएगा। हालांकि, जल के प्रवाह जैसे नदियां और झीलें सभी सुव्यवस्थित और निरन्तर बने हुए हैं, फिर भी वे कभी अपने दायरे से बाहर या अपनी सीमाओं के पार नहीं गए। वे सभी एक सुव्यवस्थित तरीके से एक दिशा में बहती हैं, और उस दिशा में बहती हैं जिसमें उन्हें बहना चाहिए। अतः परमेश्वर के शासन के नियमों के अंतर्गत, कोई भी नदी या झील स्वेच्छा से नहीं सूखेगी, या स्वेच्छा से अपनी दिशा या अपने बहाव की मात्रा को पृथ्वी की परिक्रमा या समय के गुज़रने के साथ नहीं बदलेगी। यह सब परमेश्वर की समझ के अंतर्गत, और उसके शासन के अंतर्गत है। दूसरे अर्थ में, परमेश्वर के द्वारा इस मानवजाति के मध्य सृजे गए सभी प्राणियों का अपना स्थायी स्थान, क्षेत्रफल और दायरे हैं। अर्थात्, जब परमेश्वर ने सभी प्राणियों की सृष्टि की, तब उनकी सीमाओं को स्थापित किया गया था और इन्हें स्वेच्छा से पलटा, नवीनीकृत, या बदला नहीं जा सकता है। "स्वेच्छा से" किस ओर संकेत करता है? इसका अर्थ है कि वे मौसम, तापमान, या पृथ्वी के घूमने की गति के कारण बेतरतीब ढंग से अपना स्थान नहीं बदलेंगे, और नहीं फैलेंगे, या अपने मूल रूप में परिवर्तन नहीं करेंगे। उदाहरण के लिए, एक पर्वत की एक निश्चित ऊंचाई है, इसका आधार एक निश्चित क्षेत्रफल का होता है, इसकी एक निश्चित ऊंचाई है, और इसके पास एक निश्चित मात्रा में पेड़-पौधे हैं। इन सब की योजना और गणना परमेश्वर के द्वारा की गई है और इसकी ऊंचाई या क्षेत्रफल को बस यों ही स्वेच्छा से बदला नहीं जाएगा। जहां तक मैदानों की बात है, अधिकांश मनुष्य मैदानों में निवास करते हैं, और मौसम में हुआ कोई परिवर्तन उनके क्षेत्र या उनके अस्तित्व के मूल्य को प्रभावित नहीं करेगा। यहां तक कि जो कुछ इन विभिन्न भूभागों और भौगोलिक वातावरण में समाविष्ट है जिन्हें परमेश्वर द्वारा रचा गया था उसे भी स्वेच्छा से बदला नहीं जाएगा। उदाहरण के लिए, मरुस्थल के जो संघटक अंश, और जो खनिज सम्पदाएँ भूमि के नीचे हैं, इसमें जितनी बालू है, और बालू का रंग, उसकी मोटाई-ये स्वेच्छा से नहीं बदलेंगे। ऐसा क्यों है कि वे स्वेच्छा से नहीं बदलेंगे? यह परमेश्वर के शासन और उसके प्रबंधन के कारण है। परमेश्वर द्वारा सृजे गए इन सभी विभिन्न भूभागों और भौगोलिक वातावरण के अंतर्गत, वह एक योजनाबद्ध और सुव्यवस्थित तरीके से हर चीज़ का प्रबंधन कर रहा है। अतः कई हज़ार वर्षों से, और परमेश्वर द्वारा सृजे जाने के पश्चात् दस हज़ार वर्षों से ये सभी भौगोलिक पर्यावरण अभी भी अस्तित्व में हैं। वे अभी भी अपनी अपनी भूमिकाओं को निभा रहे हैं। हालांकि निश्चित समय अवधियों के दौरान ज्वालामुखी फटते हैं, निश्चित समय अवधियों के दौरान भूकंप आते हैं, और बड़े पैमाने पर भूमि की स्थितियां बदलती हैं, फिर भी परमेश्वर किसी भी प्रकार के भू-भाग को अपने मूल कार्य को छोड़ने की अनुमति बिलकुल भी नहीं देगा। यह केवल परमेश्वर के द्वारा किए गए इस प्रबंधन, और इन नियमों के ऊपर उसके शासन और इन नियमों के प्रति उसकी समझ के कारण है, कि इस में से सब कुछ-इस में से सब कुछ का आनन्द मानवजाति के द्वारा लिया जाता है और उन्हें मानवजाति के द्वारा देखा जाता है-सुव्यवस्थित तरीके से पृथ्वी पर जीवित रह सकता है। अतः परमेश्वर क्यों इन सभी अलग अलग भूभागों का प्रबंध करता है जो इस तरह से पृथ्वी पर मौज़ूद हैं? इसका उद्देश्य है कि जीवित प्राणी जो विभिन्न भौगोलिक वातावरणों में जीवित रहते हैं उन सभी के पास एक स्थायी वातावरण होगा, और यह कि वे उस स्थायी वातावरण में निरन्तर जीने और बहुगुणित होने में सक्षम हों। ये सभी प्राणी-ऐसे प्राणी जो गतिशील हैं और वे जो गतिशील नहीं हैं, वे जो अपनी नथनों से सांस लेते हैं और वे जो नहीं लेते हैं-मानवजाति के जीवित रहने के लिए एक अद्वितीय वातावरण का निर्माण करते हैं। केवल इस प्रकार का वातावरण ही पीढ़ी दर पीढ़ी मनुष्यों का पालन पोषण करने में सक्षम है, और केवल इस प्रकार का वातावरण ही मनुष्यों को पीढ़ी दर पीढ़ी निरन्तर शांतिपूर्वक जीवित रहने की अनुमति दे सकता है।

मैंने जिसके विषय में बस अभी बात की है उसमें तुम लोगों ने क्या देखा है? यह कि सभी चीज़ों के ऊपर परमेश्वर के प्रभुत्व में उसके नियम बहुत महत्वपूर्ण हैं-बहुत महत्वपूर्ण हैं! इन नियमों के अंतर्गत सभी प्राणियों के बढ़ने के लिए पूर्व शर्त क्या है? यह परमेश्वर के नियम के कारण है। यह उसके नियम के कारण है कि सभी प्राणी उसके नियम के अंतर्गत ही अपने कार्यों को अंजाम देते हैं। उदाहरण के लिए, पहाड़ जंगलों का पोषण करते हैं, फिर जंगल उसके बदले में विभिन्न पक्षियों और पशुओं का पोषण और संरक्षण करते हैं जो उनके भीतर रहते हैं। मैदान एक मंच है जिसे मनुष्यों के लिए फसलों को लगाने के लिए साथ ही साथ विभिन्न पशु और पक्षियों के लिए तैयार किया गया है। वे मानवजाति के अधिकांश लोगों को समतल भूमि पर रहने की अनुमति देते हैं और लोगों के जीवन को सहूलियत प्रदान करते हैं। और मैदानों में घास के मैदान भी शामिल हैं-घास के मैदान की विशाल पट्टियां। घास के मैदान पृथ्वी की वनस्पतियां हैं। वे मिट्टी का संरक्षण करते हैं और मवेशी, भेड़ और घोड़ों का पालन पोषण करते हैं जो घास के मैदानों में रहते हैं। साथ ही मरुस्थल भी अपना कार्य करता है। यह मनुष्यों के रहने की जगह नहीं है; इसकी भूमिका है नम जलवायु को और अधिक शुष्क करना। नदियों और झीलों का बहाव लोगों के पेयजल के लिए और सभी प्राणियों की पानी की आवश्यकताओं के लिए सुविधाजनक हैं। जहां कहीं वे बहती हैं, लोगों के पास पीने के लिए जल होगा। ये वे सीमाएं हैं जिन्हें परमेश्वर के द्वारा विभिन्न भूभागों के लिए बनाया गया है। इन सीमाओं के कारण जिन्हें परमेश्वर ने बनाया है, विभिन्न भूभागों ने जीवित रहने के लिए अलग-अलग वातावरण को उत्पन्न किया है, और जीवित रहने के लिए ये वातावरण विभिन्न प्रकार के पक्षियों और पशुओं के लिए सुविधाजनक रहे हैं साथ ही साथ ये जीवित रहने के लिए एक स्थान भी ले कर आए हैं। इससे विभिन्न जीवित प्राणियों के जीवित रहने हेतु वातावरण के लिए सीमाओं को विकसित किया गया है। आगे हम बस इसी विषय पर बात करने जा रहे हैं।

दूसरा, किस प्रकार के वातावरण के भीतर पक्षी और पशु और कीड़े-मकोड़े रहते हैं? विभिन्न भौगोलिक वातावरण के लिए सीमाएं स्थापित करने के अलावा, उसने विभिन्न पक्षियों और पशुओं, मछलियों, कीड़े-मकोड़ों, और सभी पौधों के लिए सीमाएं खींची थीं। उसने नियमों को भी स्थापित किया था। विभिन्न भौगोलिक वातावरण के मध्य भिन्नताओं के कारण और विभिन्न भौगोलिक वातावरण की मौजूदगी के कारण, विभिन्न प्रकार के पक्षियों और पशुओं, मछलियों, कीड़े-मकोड़ों, और पौधों के पास जीवित रहने के लिए अलग अलग वातावरण हैं। पशु और पक्षी और कीड़े-मकोड़े विभिन्न पौधों के बीच में रहते हैं, मछलियां पानी में रहती हैं, और पौधे भूमि पर उगते हैं। भूमि में क्या शामिल है? विभिन्न क्षेत्र जैसे पर्वत, मैदान और पहाड़ियां। अतः, पक्षियों और पशुओं के पास उनके स्थायी निवासस्थान हैं और वे सभी जगहों पर नहीं घूमेंगे। उनके निवासस्थान जंगल और पहाड़ हैं। एक दिन यदि उनके निवासस्थान नष्ट हो जाते हैं, तो यह क्रम उथल-पुथल हो जाएगा। जैसे ही यह क्रम उथल-पुथल हो जाता है, तो परिणाम क्या हैं? वे कौन हैं जिन्हें सबसे पहले नुकसान पहुँचता? (मानवजाति।) यह मानवजाति है! इन नियमों और सीमाओं के अंतर्गत जिन्हें परमेश्वर ने स्थापित किया है, क्या तुम लोगों ने कोई अजीब सी घटना देखी है? उदाहरण के लिए, हाथी बस यों ही मरुस्थल में यहाँ वहाँ घूम रहे हैं। क्या तुम सबने यह देखा है? यदि ऐसा होता, तो यह एक बहुत ही अजीब सी घटना होती। यह इसलिए है क्योंकि वह वातावरण जिसमें हाथी रहते हैं वह जंगल है, और जंगल का वातावरण जीने के लिए है, और जीवत रहने के लिए है जिसे परमेश्वर ने उनके लिए बनाया था। जीवित रहने के लिए इसके पास इसका स्वयं का वातावरण और उसका अपना स्थायी घर है, अतः वह इधर-उधर क्यों भागता फिरेगा? क्या किसी ने शेरों या बाघों को महासागर के आस-पास घूमते हुए देखा है? शेरों और बाघों का निवासस्थान जंगल और पर्वत है। क्या किसी ने महासागर से व्हेल या शार्क मछलियों को मरुस्थल में बस यों ही टहलते हुए देखा है? व्हेल और शार्क मछलियां अपना घर महासागर में बनाती हैं और उनके पास ज़मीन पर रहने का कोई तरीका नहीं है। मनुष्य के जीने के वातावरण में, क्या ऐसे लोग हैं जो भूरे भालूओं के साथ रहते हैं? क्या ऐसे लोग हैं जो अपने घरों के भीतर या बाहर हमेशा मोर, या अन्य पक्षियों के द्वारा घिरे रहते हैं? क्या किसी ने पालतू मवेशियों और भेड़ों को जंगलों के भीतर देखा है? क्या किसी ने चीलों और जंगली कलहंसों को बन्दरों के साथ खेलते देखा है? यदि ऐसा होता है, तो ये सब बहुत ही अजीब घटना होती। यही वह कारण है कि मैं इन चीज़ों के विषय में बात करता हूँ जो तुम लोगों की नज़रों में अजीब सी घटनाएं हैं। यह तुम सबको समझाने के लिए है कि सभी प्राणियों को परमेश्वर के द्वारा सृजा गया था-इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वे एक ही स्थान में स्थायी हैं या उनमें श्वास है और वे चल सकते हैं-उन सब के पास जीवित रहने के लिए उनके नियम हैं। परमेश्वर ने इन प्राणियों को बनाया उससे बहुत पहले ही उसने उनके लिये उनके निवासस्थानों, और जीवित रहने के लिए उनका स्वयं का वातावरण बनाया था। इन जीवित प्राणियों के पास जीवित रहने के लिए उनके स्वयं के स्थायी वातावरण, उनका स्वयं का भोजन, उनके स्वयं के निवासस्थान, उनके जीवित रहने के लिए उपयुक्त उनके स्वयं के स्थायी स्थान, और उनके जीवित रहने के लिए उपयुक्त तापमानों से युक्त जगहें थीं। इस तरह वे इधर-उधर नहीं भटकते या मानवजाति की अतिजीविता को दुर्बल या नष्ट नहीं करते या उनके जीवन को प्रभावित नहीं करते। इस तरह से परमेश्वर सभी प्राणियों का प्रबंधन करता है। यह मानवजाति के जीवत रहने हेतु उत्तम वातावरण प्रदान करने के लिए है। सभी प्राणियों के अंतर्गत जीवित प्राणियों में से प्रत्येक के पास जीवित रहने हेतु उनके वातावरण के भीतर जीवन को बनाए रखने वाला भोजन है। उस भोजन के साथ, वे जीवत रहने के लिए अपने पैदाइशी वातावरण के अंतर्गत स्थिर हैं; वे उस वातावरण में स्थिर हैं। उस प्रकार के वातावरण में, वे उन नियमों के अनुसार अभी भी जीवित बचे हुए हैं, बहुगुणित हो रहे हैं, और निरन्तर बढ़ रहे हैं जिन्हें परमेश्वर ने उनके लिए स्थापित किया है। इस प्रकार के नियमों के कारण, और परमेश्वर के पूर्वनिर्धारण के कारण, सभी प्राणी मानवजाति के साथ एक स्वर में परस्पर व्यवहार करते हैं, और मानवजाति एवं सभी प्राणी एक दूसरे पर आश्रित हैं।

परमेश्वर ने सभी प्राणियों को सृजा और उनके लिए सीमाओं को स्थापित किया, और उनके मध्य सभी प्रकार के जीवित प्राणियों का पालन पोषण किया। जैसे सभी जीव सब प्रकार के जीवित प्राणियों का पोषण कर रहे थे, उसने मनुष्यों के लिए ज़िन्दा बचे रहने की विभिन्न पद्धतियों को भी तैयार किया, अतः तुम लोग देख सकते हो कि मनुष्यों के पास जीवित रहने के लिये बस एक ही तरीका नहीं है। साथ ही उनके पास जीवित रहने के लिए बस एक ही प्रकार का वातावरण नहीं है। हमने पहले ही परमेश्वर के द्वारा मनुष्यों के लिए विभिन्न प्रकार के आहार और जल स्रोतों को तैयार करने के विषय में बात की थी, यह कुछ ऐसा है जो मानवजाति के जीवन को देह में बने रहने की अनुमति देने के लिए अति महत्वपूर्ण है। फिर भी, इस मानवजाति के मध्य, सभी लोग अनाज पर ही नहीं जीते। भौगोलिक वातावरण और भूभागों की भिन्नताओं के कारण लोगों के पास ज़िन्दा रहने की अलग अलग पद्धतियाँ हैं। ज़िन्दा रहने की इन सभी पद्धतियों को परमेश्वर के द्वारा तैयार किया गया है। अतः सभी मनुष्य मुख्य तौर पर खेती में नहीं लगे हुए हैं। अर्थात्, सभी लोग फसल पैदा करके अपना भोजन प्राप्त नहीं करते हैं। यह तीसरा बिन्दु है जिसके बारे में हम बात करने जा रहे हैं: मानवजाति की विभिन्न जीवनशैलियों से सीमाओं को विकसित किया गया है। अतः मनुष्यों के पास अन्य प्रकार की कौन कौन सी जीवनशैलियां हैं? मनुष्यों के पास अन्य विभिन्न प्रकार के भोजन के स्रोत कौन कौन से हैं? कई मुख्य प्रकार हैं:

पहला है शिकार की जीवनशैली। हर कोई इसे जानता है। क्या तुम लोगों में से कोई अपनी जीविका के लिए शिकार करता है? तुम सभी आधुनिक लोग हो-तुम लोग नहीं जानते कि शिकार कैसे करते हैं, बंदूक को कैसे उठाते हैं। तुम सबके भोजन के स्रोत पृथ्वी से उत्पन्न होते हैं। ऐसे लोग जो शिकार करने के द्वारा ज़िन्दा रहते हैं वे क्या खाते हैं? (शिकार)। वे जंगल के पक्षियों और पशुओं को खाते हैं। "शिकार" एक आधुनिक शब्द है। शिकारी इसे शिकार के रूप में नहीं सोचते हैं; वे इसे भोजन के रूप में, और अपने दैनिक जीवन आहार के रूप में सोचते हैं। उदाहरण के लिए, यदि उन्हें एक हिरण मिल जाए तो वे खुश होंगे। "बहुत बढ़िया, यह हिरण पूरे परिवार के लिए कई दिनों के लिए पर्याप्त भोजन है।" जब उन्हें यह हिरण मिल जाता है तो यह बिलकुल ऐसा है जैसे किसी किसान को मिट्टी से फसलें मिल जाती हैं। एक किसान मिट्टी से फसल प्राप्त करता है, और जब वह अपनी फसल को देखता है वह खुश होता है और सुकून महसूस करता है। "अब कुछ तो खाने के लिए है; हमें भूखे रहने के विषय में डरने की आवश्यकता नहीं है।" खाने के लिए अनाज के होने से परिवार भूखा नहीं होगा। उसका हृदय सुकून से है और वह सन्तुष्ट महसूस करता है। और साथ ही एक शिकारी सुकून और संतुष्टि का एहसास करता है जब वह उसे देखता है जिसे उसने पकड़ा है क्योंकि उसे भोजन के विषय में अब कोई चिन्ता नहीं करनी है। अगली बार के भोजन के लिए कुछ तो है, भूखे रहने की ज़रूरत नहीं है। यह एक ऐसा व्यक्ति है जो जीने के लिए शिकार करता है। ऐसे लोग जो शिकार पर जीवन निर्वाह करते हैं वे सामान्यतः किस प्रकार के वातावरण में रहते हैं? वे पहाड़ी जंगलों में रहते हैं। क्योंकि उनमें से अधिकांश खेती नहीं करते या फसल नहीं उगाते हैं; वे पहाड़ी जंगलों में रहते हैं। क्या पहाड़ी जंगलों में कृषि योग्य भूमि है? कृषि योग्य भूमि पाना आसान नहीं है, अतः वे विभिन्न जीवित प्राणियों, और विभिन्न प्रकार के शिकार पर ज़िन्दा रहते हैं। यह पहली जीवनशैली है जो साधारण लोगों से अलग है।

दूसरे प्रकार की जीवनशैली चरवाही है। वे लोग जो जीविका के लिए मवेशियों को झुण्ड में चराते हैं खेती नहीं करते, अतः वे क्या करते हैं? केवल मवेशियों को झुण्ड में चराते हैं? यदि कोई यहां जातीय आधार पर मंगोलियाई है, तो तुम सब अपने खानाबदोश जीवनशैली के बारे में थोड़ा बहुत बात कर सकते हो। (अधिकांशतः, हम जीने के लिए मवेशियों और भेड़ों को झुण्ड में चराते हैं, कोई खेती नहीं करते हैं, और शीत ऋतु में हम अपने पालतू पशुओं को काटते हैं और खाते हैं। हमारा मुख्य भोजन गोमांस और मटन से बना होता है, हम दूध की चाय पीते हैं, हम भुना चावल और बहुत कम सब्जियां खाते हैं। आज कल सभी प्रकार के परिवहन सुविधाजनक हैं और हमारे पास हर प्रकार की सब्जियां और अनाज हैं। मंगोलियाई लोग दूध की चाय पीते हैं, और तिब्बती लोग मक्खन की चाय पीते हैं। हालांकि चरवाहे सभी चारों ऋतुओं में व्यस्त रहते हैं, वे अच्छी तरह खाते हैं। उन्हें दूध, दुग्ध उत्पादों या मांस की कोई कमी नहीं होती है। वे मोटे कपड़ों से बने बड़े गोलाकार तम्बुओं में (यर्ट्स) में रहा करते थे किन्तु आज कल उन सभी लोगों ने घर बना लिया है।) मंगोलियाई लोग मुख्य रूप से गोमांस और मटन खाते हैं, दूध पीते हैं, और अपने पशुओं को झुण्ड में चराने के लिए घुड़सवारी करते हैं। यह चरवाहे की जीवनशैली है। चरवाहे की जीवनशैली बुरी नहीं है-वे हवा में लहराते हुए अपने बालों, और सूर्य की रौशनी में चमचमाते हुए अपने चेहरों के साथ मैदान में बैलों और घोड़ों की सवारी करते हैं, और उनके पास आधुनिक जीवन का कोई तनाव नहीं है। पूरे दिन वे बस नीले आसमानों और घास के मैदानों के व्यापक विस्तार को देखते रहते हैं। ऐसे लोग जो जीने के लिए मवेशियों के झुण्ड की देखरेख करते हैं वे सब घास के मैदानों में रहते हैं और वे पीढ़ी दर पीढ़ी अपने खानाबदोश जीवनशैली को बरकरार रखने में सक्षम हैं। हालांकि घास के मैदानों पर जीवन थोड़ा एकाकी है, फिर भी यह एक बहुत खुशहाल जीवन भी है। यह एक बुरी जीवनशैली नहीं है!

तीसरे प्रकार की जीवनशैली मछली पकड़ने की है। मनुष्यों का एक छोटा सा भाग है जो महासागर के समीप या छोटे द्वीपों पर रहता है। वे चारों ओर पानी से घिरे हुए हैं, और वे समुद्र का सामना कर रहे हैं। इस प्रकार के लोग जीविका के लिए मछली पकड़ते हैं। ये लोग जो जीने के लिए मछली पकड़ते हैं वे भोजन के लिए किस पर भरोसा रखते हैं? उनके भोजन का स्रोत क्या है? यह सब प्रकार की मछलियां और समुद्री भोजन है। जब हांगकांग मछली पकड़नेवाला मात्र एक छोटा सा गांव था, तब ऐसे लोग जो वहां रहते थे वे अपनी जीविका के लिए मछली पकड़ना पसंद करते थे। वे खेती बाड़ी नहीं करते थे-वे प्रतिदिन मछली पकड़ने जाते थे। उनका मुख्य भोजन विभिन्न प्रकार की मछलियां, मांस और समुद्री भोजन था। साथ ही वे कभी कभार चावल, आटा और दैनिक ज़रूरतों के लिए मछली का व्यापार करना पसंद करते थे। ऐसे लोग जो मछली पकड़ने पर जीवन निर्वाह करते हैं वे सभी महासागर के समीप रहते हैं और कुछ लोग नाव पर रहते हैं। यह उन लोगों की एक अलग प्रकार की जीवनशैली है जो पानी के समीप रहते हैं। ऐसे लोग जो पानी के समीप रहते हैं वे मछली पकड़ने पर आश्रित हैं; यह उनके जीविका का स्रोत है साथ ही साथ उनके भोजन का भी स्रोत है।

उन लोगों से अलग जो जीने के लिए खेती बाड़ी करते हैं, मुख्य रूप से तीन अलग-अलग जीवनशैलियां हैं जिनका उल्लेख ऊपर किया गया था। उन लोगों से अलग जो मवेशियों को झुण्ड में चराने, मछली पकड़ने, और शिकार करने पर जीवन निर्वाह करते हैं, अधिकतर लोग जीविका के लिए खेती बाड़ी करते हैं। और ऐसे लोग जो जीविका के लिए खेती बाड़ी करते हैं उन्हें किसकी आवश्यकता है? उन्हें मिट्टी की आवश्यकता है। ऐसे लोग जो अपनी जीविका के लिए खेती बाड़ी पर आश्रित हैं वे मुख्य रूप से पीढ़ियों से फसल उगते हैं। वे अपना आहार पृथ्वी से प्राप्त करते हैं। चाहे वे सब्जियां, फल या अनाज उगाएं, किन्तु वे सभी पृथ्वी से अपनी दैनिक ज़रुरतों को प्राप्त करते हैं।

इन अलग अलग मानवीय जीवनशैलियों की मूल परिस्थितयां क्या हैं? क्या उन्हें जीवित रहने के लिए अपने वातावरण का मूलभूत संरक्षण करने की आवश्यकता नहीं होती है? दूसरे अर्थ में, यदि शिकारी को पहाड़ी जंगलों या पक्षियों और पशुओं को खोना पड़ता, तो उनके पास आगे से अपनी कोई जीविका नहीं होती। अतः वे लोग जो शिकार पर जीवन निर्वाह करते हैं यदि उन्होंने पहाड़ी जंगलों को खो दिया होता और आगे से उनके पास कोई पक्षी और पशु नहीं होता, तो उनके पास आगे से अपनी जीविका का कोई स्रोत नहीं होता। उस प्रकार का जातीय समूह किस दिशा में अग्रसर होता; उस किस्म के लोग कहां जाते? ज़िन्दा बचने या न बचने की क्षमता एक अज्ञात मात्रा है और वे बस लुप्त हो सकते हैं। और ऐसे लोग जो अपनी जीविका के लिए मवेशियों को झुण्ड में चराते हैं-वे घास के मैदानों पर आश्रित हैं। वास्तव में वे जिस पर निर्भर हैं वह उनके पालतू पशुओं का झुण्ड नहीं है, बल्कि वह वातावरण है, जिसमें उनके पालतू पशुओं का झुण्ड जीवित रहता है-घास के मैदान। यदि कहीं कोई घास के मैदान नहीं होते, तो वे अपने पालतू पशुओं के झुण्ड को कहां चराते? मवेशी और भेड़ क्या खाते? पालतू पशुओं के झुण्ड के बिना, खानाबदोश लोगों के पास कौन सी जीविका होती? उनके पास कोई जीविका नहीं होती। अपनी जीविका के स्रोत के बिना, लोग कहां जाते? लगातार ज़िन्दा बचे रहना बहुत ही कठिन हो जाता; उनके पास कोई भविष्य नहीं होता। पानी के स्रोतों के बिना, नदियां और झीलें सूख जातीं। क्या वे सभी मछलियां जो अपनी ज़िन्दगियों के लिए पानी पर निर्भर हैं तब भी जीवित रहतीं? वे मछलियां जीवित नहीं रहतीं। वे लोग जो अपनी जीविका के लिए उस जल और उन मछलियों पर आश्रित हैं क्या वे निरन्तर जीवित रह पाते? यदि उनके पास भोजन नही होता, यदि उनके पास अपनी जीविका का स्रोत नहीं होता, तो वे लोग निरन्तर जीवित रहने में सक्षम नहीं होते। जैसे ही उनकी जीविका या उनके जीवित रहने में कोई समस्या आती है, तो वे जातियां आगे से बनी नहीं रहतीं। वे जीवित रहने में सक्षम नहीं होतीं-वे लुप्त हो सकती हैं, वे पृथ्वी पर से मिट गई होतीं। और ऐसे लोग जो अपनी जीविका के लिए खेती बाड़ी करते हैं यदि वे अपनी मिट्‍टी खो देते हैं, तो अंजाम क्या होता? वे चीज़ों (फसलों) को लगाने में सक्षम नहीं होते, वे विभिन्न पौधों से अपने भोजन को प्राप्त करने में सक्षम नहीं होते। इसका परिणाम क्या होता? भोजन के बिना, क्या लोग भूख से मर नहीं जाते? यदि लोग भूख से मर जाते, तो क्या उस तरह के मानव का सफाया नहीं हो जाता? अतः विभिन्न पारिस्थितिक वातावरण को बनाए रखने के लिए यह परमेश्वर का उद्देश्य है। विभिन्न वातावरण और पारिस्थितिक तंत्र को बनाए रखने, और प्रत्येक वातावरण के अंतर्गत विभिन्न जीवित प्राणियों को बनाए रखने में परमेश्वर के पास सिर्फ एक ही उद्देश्य है-वह है सब प्रकार के लोगों का पालन पोषण करना, विभिन्न भौगोलिक वातावरण में जीवन के साथ लोगों का पालन पोषण करना।

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परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें
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