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अंतिम दिनों के मसीह के कथन - संकलन

परमेश्वर का अधिकार (I)     भाग पांच के क्रम में

क्या अब तुम लोगों के पास परमेश्वर के अधिकार का एक नया ज्ञान है? पहला, परमेश्वर का अधिकार जिसका अभी जिक्र किया गया, और मनुष्य की सामर्थ में एक अन्तर है। और वह अन्तर क्या है? कुछ लोग कहते हैं कि दोनों के बीच कोई तुलना नहीं की जा सकती है। यह सही है! यद्यपि लोग कहते हैं कि दोनों के बीच में कोई तुलना नहीं की जा सकती है, फिर भी मनुष्य के विचारों और धारणाओं में कई बार उन दोनों को अगल बगल रखकर तुलना करते हुए मनुष्य की सामर्थ अकसर अधिकार के साथ भ्रम में पड़ जाती है। यहाँ पर क्या हो रहा है? क्या लोग असावधानी से एक को दूसरे से बदलने की ग़लती नहीं कर रहे हैं? ये दोनों जुड़े हुए नहीं हैं, उनके बीच में कोई तुलना नहीं है, फिर भी लोग अपने आपकी सहायता नहीं कर सकते हैं। इस का समाधान कैसे किया जाना चाहिए? यदि तुम सचमुच में एक समाधान चाहते हो, तो उसका एकमात्र तरीका परमेश्वर के अधिकार को समझना और जानना है। सृष्टिकर्ता के अधिकार और सामर्थ को समझने और जानने के बाद, तुम एक ही साँस में मनुष्य की सामर्थ और परमेश्वर के अधिकार का जिक्र नहीं करोगे।

मनुष्य की सामर्थ किस की ओर संकेत करती है? सरल रीति से कहें, यह एक योग्यता या कुशलता है जो मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव, उसकी इच्छा और महत्वाकांक्षा को अति विशाल मात्रा में फैलाने या पूरा करने में सक्षम बनाती है। क्या इसे अधिकार के रूप में गिन सकते हैं? इसके बावजूद कि मनुष्य की महत्वाकांक्षाएँ और इच्छाएँ कितने फूले हुए या हितकारी हैं, उस व्यक्ति के विषय में यह नहीं कहा जा सकता है कि उसके पास अधिकार है; कम से कम, इस प्रकार का फूलना और सफलता मनुष्यों के बीच शैतान के हँसी ठट्ठे का महज एक प्रदर्शन है, कम से कम यह एक हँसी ठिठोली है जिसमें शैतान अपने स्वयं के पूर्वज के समान कार्य करता है जिससे परमेश्वर बनने की अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा कर सके।

अब तुम कितनी सटीकता से परमेश्वर के अधिकार को देखते हो? अब इन शब्दों पर सभा में विचार विमर्श किया जा चुका है, तुम्हारे पास में परमेश्वर के अधिकार का एक नया ज्ञान होना चाहिए। अतः मैं तुम लोगों से पूछता हूँ: परमेश्वर का अधिकार किस का प्रतीक है? क्या वह स्वयं परमेश्वर की पहचान का प्रतीक है? क्या वह स्वयं परमेश्वर की सामर्थ का प्रतीक है? क्या वह स्वयं परमेश्वर की अद्वितीय हैसियत का प्रतीक है? सभी चीज़ों के मध्य, तुमने किस में परमेश्वर के अधिकार को देखा है? तुमने उसे कैसे देखा है? मनुष्यों के द्वारा अनुभव किए गए चार ऋतुओं के सन्दर्भ में, क्या कोई बसंत ऋतु, ग्रीष्म ऋतु, शरद ऋतु, शीत ऋतु के मध्य आपस में परिवर्तन के नियमों को बदल सकता है? बसंत ऋतु में वृक्ष फूलते और फलते हैं; ग्रीष्म ऋतु में वे पत्तों से भर जाते हैं; शरद ऋतु में वे फल उत्पन्न करते हैं, और शीत ऋतु में पत्ते झड़ते हैं। क्या कोई इन नियमों को पलट सकता है? क्या यह परमेश्वर के एक पहलू को प्रतिबिम्बित करता है? "परमेश्वर ने कहा उजियाला हो," और उजियाला हो गया। क्या यह उजियाला अभी भी है? वह किस वजह से अस्तित्व में बना हुआ है? यह वास्तव में परमेश्वर के वचन के कारण, और परमेश्वर के अधिकार के कारण अस्तित्व में बना हुआ है। जिस वायु को परमेश्वर ने बनाया था क्या अब भी अस्तित्व में बनी हुई है? क्या वह वायु जिसमें मनुष्य साँस लेता है परमेश्वर से आयी है? क्या कोई उन चीज़ों को अलग कर सकता है जो परमेश्वर से आते हैं? क्या कोई उनकी हस्ती और कार्य को पलट सकता है? क्या कोई परमेश्वर के द्वारा नियुक्त रात और दिन को, और परमेश्वर के आदेशानुसार रात व दिन के नियम को भ्रमित कर सकता है? क्या शैतान ऐसा कुछ कर सकता है? भले ही तुम रात में न सोओ, और रात को दिन के समान लो, तौभी यह विचार करना एक दुःस्वप्न है; कि तुम्हारी दिनचर्या बदल सकती है, वरन तुम रात और दिन के बीच हुए आपस के परिवर्तन के नियम को बदलने में असमर्थ हो - और इस प्रमाणित सच्चाई को किसी भी व्यक्ति के द्वारा पलटा नहीं जा सकता है, क्या ऐसा नहीं है? क्या कोई बैल के समान शेर का उपयोग कर भूमि पर हल जोतने में सक्षम हो सकता है? क्या कोई एक हाथी को एक गधे में बदलने में सक्षम हो सकता है? क्या कोई एक मुर्गी को एक बाज के समान आकाश में हवा में लहराने में सक्षम हो सकता है? क्या कोई एक भेड़िऐ को एक भेड़ के समान घास खिलाने में सक्षम हो सकता है? क्या कोई जल की मछली को सूखी भूमि पर रहने के योग्य बनाने में सक्षम हो सकता है? और क्यों नहीं? क्योंकि परमेश्वर ने उन्हें पानी में रहने की आज्ञा दी है, और इस प्रकार वे पानी में रहते हैं। वे भूमि पर जीवित रहने में सक्षम नहीं हैं, और मर जाएँगीं; वे परमेश्वर की आज्ञाओं की सीमाओं का उल्लंघन करने में असमर्थ हैं। सभी चीज़ों के पास उनके अस्तित्व के लिए नियम और सीमा है, और उनमें हर एक के पास उनका स्वयं का अंतःज्ञान है। इन्हें सृष्टिकर्ता के द्वारा नियुक्त किया गया है, और किसी मनुष्य के द्वारा उन्हें पलटा और उनका अतिक्रमण नहीं किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, शेर हमेशा मनुष्य के समुदायों से दूर जंगल में ही रहेगा, और बैल के समान, जो मनुष्य के साथ रहता है और मनुष्य के लिए काम करता है, कभी भी पालतु और विश्वासयोग्य नहीं हो सकता है। यद्यपि हाथी और गधे दोनों जानवर हैं, और दोनों के पास चार पैर हैं, और ऐसे जीव हैं जो साँस लेते हैं, फिर भी वे अलग अलग प्रजातियाँ हैं, क्योंकि उन्हें दो प्रकार से बाँटा गया है, उनमें से प्रत्येक के पास उनका अपना सहज ज्ञान है, और इस प्रकार उन्हें कभी भी आपस में बदला नहीं जाएगा। यद्यपि मुर्गी के पास दो पैर है, और बाज के समान पंख भी हैं, फिर भी वह कभी हवा में उड़ नहीं पाएगी वह कम से कम एक पेड़ पर उड़ सकती है-और यह उसके सहज ज्ञान के द्वारा निर्धारित किया गया है। ऐसा कहने की आवश्यकता नहीं है, पर यह सब कुछ परमेश्वर के अधिकार और आज्ञाओं के कारण हुआ है।

आज के मानवजाति के विकास में, मानवजाति के विज्ञान को "प्रगतिशील" कहा जा सकता है, और मनुष्य के वैज्ञानिक अनुसन्धानों की उपलब्धियों को "प्रभावशील" कहा जा सकता है। मनुष्य की काबिलियत के बारे में ऐसा कहा जा सकता है कि वह हमेशा की तरह बढ़ रहा है, परन्तु एक अति महत्वपूर्ण उपलब्धि है जिसे मानवजाति हासिल करने में असमर्थ हैः मानवजाति ने हवाई जहाज़, मालवाहक विमान, और परमाणु बम बनाया है, मानवजाति अंतरिक्ष में जा चुका है, चन्द्रमा पर चल चुका है, इंटरनेट का अविष्कार किया है, और बहुत ही ऊँची जीवन शैली में जीवन बिताता है, फिर भी, मानवजाति एक साँस लेते हुए जीव को बनाने में असमर्थ है। प्रत्येक जीवित प्राणी का सहज ज्ञान और वे नियम जिन के द्वारा वे जीते हैं, और हर प्रकार के जीवित प्राणी के जीवन और मृत्यु का जीवन चक्र-यह सब कुछ मनुष्य के विज्ञान के द्वारा असम्भव और नियन्त्रण के बाहर है। इस बिन्दु पर, ऐसा कहना होगा कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मानवजाति ने कितनी ही ऊँचाईयों को क्यों न छू लिया हो, उसकी तुलना सृष्टिकर्ता के किसी भी विचार से नहीं की जा सकती है, और वे सृष्टिकर्ता की सृष्टि की अद्भुतता, और उसके अधिकार की शक्ति को परखने में असमर्थ हैं। पृथ्वी के ऊपर कितने सारे महासागर हैं, फिर भी उन्होंने कभी भी अपनी सीमाओं का उल्लंघन नहीं किया, और अपनी इच्छा से भूमि पर नहीं आए, और ऐसा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर ने उनमें से प्रत्येक के लिए सीमाओं को ठहरा दिया है; वे वहीं ठहर गए जहाँ उसने उन्हें ठहरने की आज्ञा दी थी, और बिना परमेश्वर की आज्ञा के वे यहाँ वहाँ स्वतन्त्रता से जा नहीं सकते हैं। बिना परमेश्वर की आज्ञा के, वे एक दूसरे की सरहदों पर अतिक्रमण नहीं सकते हैं, और तभी आगे बढ़ सकते हैं जब परमेश्वर ऐसा करने लिए कहता है, और वे कहाँ जाएँगे और कहाँ ठहरेंगे यह परमेश्वर के अधिकार के द्वारा निर्धारित होता है।

इसे साफ तौर पर कहें तो, "परमेश्वर के अधिकार" का अर्थ है कि यह परमेश्वर के ऊपर निर्भर है। परमेश्वर के पास यह निर्णय लेने का अधिकार है कि किसी कार्य को कैसे करें, और जैसा वह चाहता है उसे उसी रीति से किया जाता है। सभी चीज़ों के नियम परमेश्वर के ऊपर निर्भर है, और मनुष्य के ऊपर निर्भर नहीं है; और न ही उसे मनुष्य के द्वारा पलटा जा सकता है। उसे मनुष्य की इच्छा के द्वारा हटाया नहीं जा सकता है, परन्तु इसके बजाए उसे परमेश्वर के विचारों, और परमेश्वर की बुद्धि, और परमेश्वर के आदेशों द्वारा बदला जा सकता है, और यह प्रमाणित तथ्य है जिस का इनकार मनुष्य नहीं कर सकता है। स्वर्ग और पृथ्वी और सभी चीज़ें, विश्व, और सितारों से जगमगाता हुआ आसमान, साल की चार ऋतुएँ, वह जो मनुष्य के लिए दृश्य और अदृश्य है - वे सभी परमेश्वर की आधीनता में, परमेश्वर के आदेशों के अनुसार, परमेश्वर की आज्ञाओं के अनुसार, और सृष्टि की उत्पत्ति के नियमों के अनुसार बिना किसी ग़लती के अस्तित्व में बने रहते हैं, कार्य करते हैं, और परिवर्तित होते हैं। कोई व्यक्ति या तत्व उनके नियमों को नहीं बदल सकता, या उनके स्वाभाविक क्रम जिस के तहत वे कार्य करते हैं उन्हें बदल सकता है; वे परमेश्वर के अधिकार के कारण अस्तित्व में आए, और परमेश्वर के अधिकार के कारण नाश हो जाते हैं। यही है परमेश्वर का अधिकार। अब जबकि इतना सब कुछ कहा जा चुका है, क्या तुम महसूस कर सकते हो कि परमेश्वर का अधिकार परमेश्वर की पहचान और परमेश्वर की हैसियत का प्रतीक है? क्या किसी सृजे गए प्राणी या न सृजे गए प्राणी द्वारा परमेश्वर के अधिकार को धारण किया जा सकता है? क्या किसी व्यक्ति, वस्तु, या तत्व द्वारा उसका अनुकरण, रूप धारण, या परिवर्तन किया जा सकता है?

सृष्टिकर्ता की पहचान अद्वितीय है, और तुम्हें बहुईश्वरवाद के विचार को श्रेय नहीं देना चाहिए

यद्यपि मनुष्य की अपेक्षा शैतान की कुशलताएँ और योग्यताएँ कहीं बढ़कर हैं, यद्यपि वह ऐसी चीज़ें कर सकता है जिन्हें मनुष्य प्राप्त नहीं कर सकता है, फिर भी इसके बावजूद कि जो शैतान करता है उससे तुम ईर्ष्याकरते हो या उसकी आकांक्षा करते हो इसके बावजूद कि तुम उससे नफरत या घृणा करते हो, इसके बावजूद कि तुम उसे देखने में सक्षम हो या नहीं हो, और इसके बावजूद कि शैतान कितना हासिल कर सकता है, या वह कितने लोगों को उसकी आराधना करने में और उसे पवित्र मानने के लिए धोखा दे सकता है, और इसके बावजूद कि तुम इसे किस प्रकार परिभाषित करते हो, संभवतः तुम यह नहीं कह सकते हो कि उसके पास परमेश्वर का अधिकार और सामर्थ है। तुम्हें जानना चाहिए कि परमेश्वर ही परमेश्वर है, और सिर्फ एक ही परमेश्वर है, और इसके अतिरिक्त, तुम्हें यह जानना चाहिए कि सिर्फ परमेश्वर के पास ही अधिकार है, और सभी चीज़ों के ऊपर शासन करने और उन पर नियन्त्रण करने की सामर्थ है। सिर्फ इसलिए क्योंकि शैतान के पास लोगों को धोखा देने की क्षमता है, वह परमेश्वर का रूप धारण कर सकता है, परमेश्वर द्वारा किए गए चिन्हों और चमत्कारों की नकल कर सकता है, और उसने परमेश्वर के समान ही कुछ समानान्तर चीज़ों को किया है, तो तुम भूलवश विश्वास करने लग जाते हो कि परमेश्वर अद्वितीय नहीं है, यह कि बहुत सारे ईश्वर हैं, यह कि उनके पास महज कुछ कम या कुछ ज़्यादा कुशलताएँ हैं, और यह कि उस सामर्थ का विस्तार अलग अलग है जिसे वे काम में लाते हैं। उनके आगमन के क्रम, और उनके युग के अनुसार तुम उनकी महानता को आँकते हो, और तुम भूलवश यह विश्वास करते हो कि परमेश्वर से अलग कुछ अन्य देवता हैं, और यह सोचते हो कि परमेश्वर की सामर्थ और उसका अधिकार अद्वितीय नहीं है। यदि तुम्हारे पास ऐसे विचार हैं, यदि तुम परमेश्वर की अद्वितीयता को पहचान नहीं सकते हो, यह विश्वास नहीं करते हो कि सिर्फ परमेश्वर के पास ही ऐसा अधिकार है, और यदि तुम बहुईश्वरवाद को महत्व देते हो, तो मैं कहूँगा कि तुम जीवधारियों के मल हो, तुम शैतान का साकार रूप हो, और तुम निश्चित तौर पर एक बुरे इंसान हो! क्या तुम समझ रहे हो कि मैं इन शब्दों को कहने के द्वारा तुम्हें क्या सिखाने की कोशिश कर रहा हूँ? इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि समय, स्थान या तुम्हारी पृष्ठभूमि क्या है, तुम परमेश्वर को किसी अन्य व्यक्ति, वस्तु, या पदार्थ के साथ लेकर भ्रमित मत हो। इसके बावजूद कि तुम यह महसूस करो कि स्वयं परमेश्वर का अधिकार और परमेश्वर की हस्ती कितनी अज्ञात और अगम्य है, इसके बावजूद कि शैतान के कार्य और शब्द तुम्हारी अवधारणा और कल्पना से कितना मेल खाते हैं, इसके बावजूद कि वे तुम्हें कितनी संतुष्टि प्रदान करते हैं, मूर्ख न बनो, इन धारणाओं में भ्रमित मत हो, परमेश्वर के अस्तित्व का इनकार मत करो, परमेश्वर की पहचान और हैसियत का इनकार मत करो, परमेश्वर को दरवाज़े के बाहर मत धकेलो और "परमेश्वर" को हटाकर शैतान को अपना ईश्वर बनाने के लिए अपने हृदय के भीतर मत लाओ। मुझे कोई सन्देह नहीं है कि तुम ऐसा करने के परिणामों की कल्पना करने में समर्थ हो!

यद्यपि मानवजाति को भ्रष्ट किया जा चुका है, फिर भी वह सृष्टिकर्ता के अधिकार की संप्रभुता के अधीन रहता है

शैतान हज़ारों सालों से मानवजाति को भ्रष्ट करता आया है। उसने बेहिसाब मात्रा में बुराईयाँ की हैं, पीढ़ियों के बाद पीढ़ियों को धोखा दिया है, और संसार में जघन्य अपराध किए हैं। उसने मनुष्य का ग़लत इस्तेमाल किया है, मनुष्य को धोखा दिया है, परमेश्वर का विरोध करने के लिए मनुष्य को बहकाया है, और ऐसे ऐसे बुरे कार्य किए हैं जिन्होंने बार बार परमेश्वर की प्रबंधकीय योजना को भ्रमित और बाधित किया है। फिर भी, परमेश्वर के अधिकार के अधीन सभी चीज़ें और जीवित प्राणी परमेश्वर के द्वारा व्यवस्थित नियमों और व्यवस्थाओं के अनुसार निरन्तर बने हुए हैं। परमेश्वर के अधिकार की तुलना में, शैतान का बुरा स्वभाव और अनियन्त्रित विस्तार बहुत ही गन्दा है, बहुत ही घिनौना और नीच है, और बहुत ही छोटा और आसानी से प्रभावित होनेवाला है। यद्यपि शैतान उन सभी चीज़ों के बीच भ्रमण करता है जिन्हें परमेश्वर द्वारा बनाया गया था, फिर भी वह परमेश्वर की आज्ञा के द्वारा ठहराए गए लोगों, वस्तुओं, या पदार्थों में ज़रा सा भी परिवर्तन नहीं कर सकता है। कई हज़ार साल बीत गए हैं, और अभी भी मनुष्य परमेश्वर द्वारा प्रदान किए गए उजियाले और वायु का आनन्द उठाता है, स्वयं परमेश्वर के द्वारा फूँके गए श्वास के द्वारा साँस लेता है, अभी भी परमेश्वर के द्वारा सृजे गए फूलों, पक्षियों, मछलियों और कीड़े मकौड़ों का आनन्द उठाता है, और परमेश्वर के द्वारा प्रदान की गई सभी चीज़ों का मज़ा लेता है; दिन और रात अभी भी लगातार एक दूसरे का स्थान ले रहे हैं; चार ऋतुएँ हमेशा की तरह आपस में बदल रही हैं; आसमान में उड़नेवाले कालहँस इस शीत ऋतु मे उड़ जाएँगे, और अगले बसंत में फिर वापस भी आएँगे; जल की मछलियाँ नदियों और झीलों को - जो उनका घर है कभी भी नहीं छोड़ती हैं, ज़मीन के कीटपतिंगे (शलभ) गर्मी के दिनों में अपना दिल खोलकर गाते हैं; घास के झींगुर शरद ऋतु के दौरान हवा के साथ समय समय पर धीमे स्वर में गुनगुनाते हैं; कालहंस समूहों में इकट्ठे हो जाते हैं, जबकि बाज एकान्त में अकेले ही रहते हैं, शेरों के कुनबे शिकार करने के द्वारा अपने आपको बनाए रखते हैं; बत्तखें घास और फूलों से दूर नहीं जाते.....। सभी चीज़ों के मध्य हर प्रकार के जीवधारी चले जाते हैं फिर आते हैं, और फिर चले जाते हैं, पलक झपकते ही लाखों परिवर्तन होते हैं - परन्तु जो बदलता नहीं है वह है उनका सहज ज्ञान और जिन्दा रहने के नियम। वे परमेश्वर के प्रयोजन और परमेश्वर के पालन पोषण के अधीन जीते हैं, और कोई उनके सहज ज्ञान को बदल नहीं सकता है, और न ही कोई उनके ज़िन्दा रहने के नियमों में बाधा डाल सकता है। यद्यपि मानवजाति को, जो सभी चीज़ों के बीच में जीवन बिताता है, शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है, फिर भी मनुष्य परमेश्वर के द्वारा बनाए गए जल, परमेश्वर द्वारा बनाई गई वायु, परमेश्वर द्वारा बनाई गई सभी चीज़ों को ग्रहण न करने का निर्णय नहीं ले सकता है, और मनुष्य फिर भी जीवित रहता है और परमेश्वर द्वारा बनाए गए इस समयकाल में बढ़ता रहता है। मनुष्य का अन्तःज्ञान नहीं बदला है। मनुष्य अभी भी देखने के लिए आँखों पर, सुनने के लिए कानों पर, सोचने के लिए अपने मस्तिष्क पर, समझने के लिए अपने हृदय पर, चलने के लिए अपने पैरों पर, काम करने के लिए अपने हाथों, और इत्यादि पर निर्भर है; परमेश्वर ने सब प्रकार का सहज ज्ञान मनुष्य को दिया है जिससे वह इस बात को स्वीकार कर सके कि परमेश्वर का प्रयोजन अपरिवर्तनीय बना रहता है, वे योग्यताएँ जिनके द्वारा मनुष्य परमेश्वर के साथ सहयोग करता है कभी भी नहीं बदली हैं, एक सृजे गए प्राणी का कर्तव्य निभाने की मानवजाति की योयग्यता नहीं बदली है, सृष्टिकर्ता के द्वारा उद्धार पाने हेतु मानवजाति की लालसा नहीं बदली है। अपनी उत्पत्ति का पता लगाने की मानवजाति की इच्छा नहीं बदली है, सृष्टिकर्ता द्वारा बचाए जाने की मानवजाति की इच्छा नहीं बदली है। मनुष्य की वर्तमान परिस्थितियाँ ऐसी ही हैं, जो परमेश्वर के अधिकार के अधीन रहता है, और जिसने शैतान के द्वारा किए गए रक्तरंजित विध्वंस को सहा है। यद्यपि मानवजाति शैतान के अत्याचार की आधीनता में आ गयी थी, और वे अब सृष्टि के प्रारम्भ के आदम और हव्वा नहीं थे, और ऐसी चीज़ों से भरपूर होने के बावजूद भी जो परमेश्वर के विरूद्ध हैं, जैसे ज्ञान, कल्पनाएँ, विचार, और इत्यादि, और भ्रष्ट शैतानी स्वभाव से भरपूर होने के बावजूद भी, परमेश्वर की दृष्टि में मानवजाति अभी भी वही मानवजाति थी जिसे उसने सृजा था। परमेश्वर के द्वारा अभी भी मानवजाति पर शासन किया जाता है और जटिलता से उसका प्रबन्ध किया जाता है, और परमेश्वर के द्वारा व्यवस्थित पथक्रम के अनुसार वह अभी भी जीवन बिताती है, और इस प्रकार परमेश्वर की दृष्टि में, मानवजाति, जिसे शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया था, वह महज गड़गड़ाहट करनेवाले पेट के साथ, ऐसी प्रतिक्रियाओं के साथ जो थोड़ी धीमी हैं, और ऐसी यादों के साथ जो इतनी अच्छी नहीं हैं जितना वे हुआ करती थीं, और थोड़े अधिक उम्र के साथ तनाव में घिरी हुई है - परन्तु मनुष्य के सारे कार्य और सहज ज्ञान पूरी तरह सुरक्षित है। यह वह मानवजाति है जिसे परमेश्वर बचाने की इच्छा करता था। इस मानवजाति को और कुछ नहीं बस सृष्टिकर्ता की बुलाहट को सुनना है, और सृष्टिकर्ता की आवाज़ को सुनना है, और वह खड़ी होगी और इस आवाज़ की स्थिति के स्रोत का पता लगाने के लिए फुर्ती करेगी। इस मानवजाति को और कुछ नहीं बस सृष्टिकर्ता के रूप को देखना है और वह अन्य सभी चीज़ों की परवाह नहीं करेगी, और सब कुछ छोड़ देगी, जिस से अपने आप को परमेश्वर के प्रति समर्पित कर सके, और अपने जीवन को भी उसके लिए दे देगी। जब मानवजाति का हृदय सृष्टिकर्ता के हृदय में महसूस किए गए वचनों को समझेगा, तो मानवजाति शैतान को ठुकराकर और सृष्टिकर्ता की ओर आ जाएगी; जब मानवजाति अपने शरीर से गन्दगी को पूरी तरह धो देगी, और एक बार फिर से सृष्टिकर्ता के प्रयोजन और पालन पोषण को प्राप्त करेगी, तब मानवजाति की स्मरण शक्ति पुनः वापस आ जाएगी, और इस समय मानवजाति सचमुच में सृष्टिकर्ता के प्रभुत्व में वापस आ चुकी होगी।

21 अक्टूबर 2014

वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VII
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VIII
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IX
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X

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