स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I

परमेश्वर का अधिकार (I)    भाग एक

मेरी पिछली अनेक सभाएँ परमेश्वर के कार्य, परमेश्वर के स्वभाव, और स्वयं परमेश्वर के विषय में थीं। इन सभाओं को सुनने के बाद, क्या तुम लोगों को एहसास होता है कि तुम सबने परमेश्वर के स्वभाव की समझ और ज्ञान को प्राप्त किया है? कितनी बड़ी समझ और ज्ञान को प्राप्त किया है? क्या तुम लोग उसे एक संख्या दे सकते हो? क्या इन सभाओं ने तुम सभी को परमेश्वर की और गहरी समझ दी है? क्या ऐसा कहा जा सकता है कि यह समझ परमेश्वर का सच्चा ज्ञान है? क्या ऐसा कहा जा सकता है कि परमेश्वर का यह ज्ञान और समझ परमेश्वर के सम्पूर्ण सार-तत्व, और जो उसके पास है और जो वह है उसका ज्ञान है? नहीं, बिलकुल नहीं! यह इसलिए है क्योंकि ये सभाएँ केवल परमेश्वर के स्वभाव और स्वरूप के एक भाग की समझ प्रदान करती हैं—न कि इसके सब कुछ की, या उसकी सम्पूर्णता की। ये सभाएँ परमेश्वर के द्वारा किसी समय किए गए कार्य के एक भाग को समझने के लिए तुम लोगों को सक्षम करती हैं, जिसके द्वारा तुम सभी परमेश्वर के स्वभाव और उसके स्वरूप के, साथ ही साथ जो कुछ उसने किया है उस हर एक चीज़ के पीछे क्या पहुँच एवं सोच है, उसे देखते हो। परन्तु यह केवल परमेश्वर की शाब्दिक एवं मौखिक समझ है, और तुम सब अपने हृदय में अनिश्चित बने रहते हो कि इसका कितना भाग सच्चा है। वह कौन सी चीज़ है जो मुख्य रूप से यह निर्धारित करती है कि ऐसी चीज़ों के प्रति लोगों की समझ में कोई वास्तविकता है या नहीं? यह इससे निर्धारित होता है कि उन सबने अपने वास्तविक अनुभवों के दौरान परमेश्वर के वचनों और स्वभाव का वास्तव में कितना अनुभव किया है, और वे सभी इन वास्तविक अनुभवों के दौरा कितना उसे देख या समझ पाये हैं। "पिछली कई सभाओं ने हमें परमेश्वर के द्वारा की गई चीज़ों, परमेश्वर के विचारों, और इसके अतिरिक्त, मनुष्य के प्रति परमेश्वर की मनोवृत्ति, और उसके कार्यों के आधार, साथ ही उसके कार्यों के सिद्धांतों को समझने की अनुमति दी है। और इस प्रकार हमने परमेश्वर के स्वभाव को समझा है, और हम परमेश्वर की सम्पूर्णता को जान पाए हैं।" क्या कभी किसी ने ऐसे वचन कहे हैं? क्या ऐसा कहना सही है? ऐसा बिल्कुल नहीं है। और मैं क्यों कहता हूँ कि ऐसा नहीं है? परमेश्वर का स्वभाव, और जो उसके पास है और जो वह है, उन कार्यों के द्वारा जो उसने किए हैं और उन वचनों के द्वारा जो उसने कहे हैं, प्रगट होते हैं। मनुष्य परमेश्वर के द्वारा किये गये कार्यों व उसके द्वारा बोले गये वचनों के द्वारा, परमेश्वर के दर्शन कर सकता है, परन्तु इससे बस यही कहा जा सकता है कि उसके द्वारा किये गये कार्यों और उसके वचनों से मनुष्य परमेश्वर के स्वभाव व जो उसके पास है और जो वह है, उसके एक अंश को ही समझने में सक्षम हो सकता है। परमेश्वर के स्वभाव व जो उसके पास है और जो वह है, यदि मनुष्य परमेश्वर की और अधिक तथा और गहरी समझ प्राप्त करने की अभिलाषा करता है, तो मनुष्य को परमेश्वर के कार्य और वचनों का और गहनता से अनुभव करना होगा। यद्यपि जब मनुष्य परमेश्वर के वचनों और कार्य का आंशिक रूप से अनुभव करता है तो उसे परमेश्वर की समझ का एक आंशिक भाग ही प्राप्त होता है, क्या यह आंशिक समझ परमेश्वर के सच्चे स्वभाव को दर्शाती है? क्या यह परमेश्वर के सार-तत्व को दर्शाती है? हाँ, वास्तव में यह परमेश्वर के स्वभाव, और परमेश्वर के सार-तत्व को दर्शाता है, और इसमें कोई सन्देह नहीं है। समय या स्थान की परवाह किए बगैर, परमेश्वर किस रीति से अपना काम करता है, या किस रूप में मनुष्य के सामने प्रगट होता है, या किस रीति से अपनी इच्छा को प्रकट करता है, वह सब कुछ जो वह प्रकाशित एवं प्रगट करता है, वह स्वयं परमेश्वर, परमेश्वर के सार-तत्व और जो उस के पास है और जो वह है उसे दर्शाता है। यह बिलकुल सत्य है कि परमेश्वर अपनी विशेषताओं और अस्तित्व एवं अपनी सच्ची पहचान के साथ अपना कार्य करता है; फिर भी, आज, उसके वचनों के द्वारा, और उस प्रचार को सुनने के द्वारा जो वो सुनते हैं लोगों के पास परमेश्वर की केवल आंशिक समझ है, और इस प्रकार कुछ हद तक, इस समझ को केवल काल्पनिक ज्ञान कहा जा सकता है। अपनी वास्तविक स्थिति का ध्यान रखते हुए, तुम केवल परमेश्वर की समझ या ज्ञान को जिसे तुमने सुना, देखा, या जाना है, और अपने हृदय में समझा है, जाँच सकते हो, यदि तुम में से हर एक इस वास्तविक अनुभव से होकर गुज़रता है और इसे थोड़ा थोड़ा कर के जान पाता है। यदि मैं ने इन शब्दों के साथ तुम लोगों से सहभागिता में विचार विमर्श नहीं किया होता, तो क्या मात्र अपने अनुभवों से तुम सभी परमेश्वर के सच्चे ज्ञान को हासिल कर पाते? मैं डरता हूँ, क्योंकि ऐसा करना बहुत ही अधिक कठिन होता। क्योंकि यदि लोग परमेश्वर के अनुभव को पाना चाहते हैं तो उनके पास पहले परमेश्वर के वचन होने चाहिए। फिर भी लोग परमेश्वर के बहुत से वचनों को खाते हैं, ऐसे लोगों की संख्या है जो वास्तव में उन का अनुभव कर सकते हैं। परमेश्वर के वचन आगे की ओर पथ प्रदर्शन करते और मनुष्य को उसके अनुभव में मार्गदर्शन देते हैं। संक्षेप में, उनके लिए जिनके पास थोड़ा बहुत सच्चा अनुभव है, ये अनेक पिछली सभाएँ सत्य की गहरी समझ और परमेश्वर के और अधिक वास्तविक ज्ञान को हासिल करने में उनकी सहायता करेंगी। परन्तु उनके लिए जिनके पास कुछ भी वास्तविक अनुभव नहीं है, या वे जिन्होंने बस अभी अभी अपना अनुभव शुरू किया है, या बस अभी अभी वास्तविकता को स्पर्श करना प्रारम्भ किया है, यह एक बड़ी परीक्षा है।

पिछली अनेक सभाओं की मुख्य विषयवस्तु परमेश्वर के स्वभाव, परमेश्वर के कार्य, और स्वयं परमेश्वर से संबंधित थी। जो कुछ भी मैं ने कहा था तुम सबने उसके मुख्य और केन्द्रीय भाग में क्या देखा था? इन सभाओं के द्वारा, क्या तुम लोग यह पहचान सकते हो कि वह जिसने यह काम किया था, और इन स्वभावों को प्रगट किया था, वह स्वयं एक अद्वितीय परमेश्वर है, जो सभी चीज़ों के ऊपर संप्रभुता रखता है? यदि तुम सबका उत्तर हाँ है, तो किस बात ने तुम लोगों को ऐसे निष्कर्ष तक पहुँचाया? किस पहलू के द्वारा तुम सभी इस निष्कर्ष तक पहुँचे? क्या कोई मुझे बता सकता है? मैं जानता हूँ कि पिछली सहभागिता ने तुम सबको गहराई से प्रभावित किया था, और परमेश्वर को जानने के लिए तुम लोगों के हृदय में एक नई शुरूआत प्रदान की थी, जो महान है। यद्यपि तुम सबने पहले की तुलना में परमेश्वर को समझने के लिए एक बड़ी छलाँग लगाई है, परन्तु परमेश्वर की पहचान की तुम लोगों की परिभाषा को अभी भी यहोवा, व्यवस्था के युग के परमेश्वर, अनुग्रह के युग के प्रभु यीशु मसीह, और राज्य के युग के सर्वशक्तिमान परमेश्वर जैसे नामों से भी कहीं बढ़कर और अधिक उन्नत होना है। दूसरे शब्दों में, यद्यपि परमेश्वर के स्वभाव, परमेश्वर के कार्य, और स्वयं परमेश्वर के बारे में इन सभाओं ने तुम सबको परमेश्वर द्वारा किसी समय बोले गए कुछ वचनों, और परमेश्वर के द्वारा किसी समय किए गए कार्य, और परमेश्वर के द्वारा किसी समय प्रकाशित किए गए उसके अस्तित्व और व्यावहारिक गुणों की समझ दी है, तो भी तुम सभी "परमेश्वर" शब्द की सही परिभाषा और सटीक शुरूआती जानकारी प्रदान करने में असमर्थ हो। न ही तुम लोगों के पास स्वयं परमेश्वर की स्थिति एवं पहचान की, दूसरे शब्दों में तुम सबके पास सभी चीज़ों एवं सम्पूर्ण सृष्टि के मध्य परमेश्वर की हैसियत की सच्ची और सटीक शुरूआती जानकारी तथा ज्ञान नहीं है। यह इसलिए है, क्योंकि स्वयं परमेश्वर व परमेश्वर के स्वभाव के विषय में पिछली सभाओं में, सभी सन्दर्भ परमेश्वर के पूर्व प्रगटीकरण और प्रकाशन पर आधारित थे जो बाईबिल में लिखित हैं। फिर भी मनुष्य के लिए उसके अस्तित्व और उसके व्यावहारिक गुणों की खोज करना कठिन है, जिन्हें परमेश्वर द्वारा मानवजाति के प्रबन्ध और उद्धार के दौरान, या उसके बाहर, प्रकाशित और प्रगट किया गया है। अतः, भले ही तुम लोग परमेश्वर के अस्तित्व और उसके व्यावहारिक गुणों को समझते हो जो उस कार्य में प्रकाशित हुए थे जिसे उसने किसी समय किया था, फिर भी परमेश्वर की पहचान और स्थिति की तुम सबकी परिभाषा उस अद्वितीय परमेश्वर से अभी भी बहुत दूर है, जो सभी चीज़ों के ऊपर संप्रभुता रखता है, और उस रचयिता से कहीं अलग है। पिछली अनेक सभाओं ने सब को ठीक ऐसा ही महसूस करवाया था मनुष्य परमेश्वर के विचारों को कैसे जान सकता है? यदि कोई वास्तव में जाननेवाला था, तो वह शख्स निश्चित रूप से परमेश्वर ही होगा, क्योंकि केवल परमेश्वर ही अपने विचारों को जानता है, और केवल परमेश्वर ही अपने कार्यों को करने का तरीका व उसका आधार जानता है। इस रीति से परमेश्वर की पहचान को जानना तुम लोगों को उचित और तर्कसंगत लग सकता है, परन्तु परमेश्वर के स्वभाव और परमेश्वर के कार्य से कौन यह बता सकता है कि यह वास्तव में स्वयं परमेश्वर का कार्य है, और मनुष्य का कार्य नहीं है, ऐसा कार्य जो परमेश्वर के बदले मनुष्य द्वारा नहीं किया जा सकता है? कौन यह देख सकता है कि यह कार्य उसकी संप्रभुता में आता है जिसके पास परमेश्वर की हस्ती और सामर्थ है? दूसरे शब्दों में, किन विशेषताओं या हस्ती के जरिए तुम सब यह पहचानोंगे कि वह स्वयं परमेश्वर है, किसके पास परमेश्वर की पहचान है, और वो कौन है जो सब चीज़ों के ऊपर संप्रभुता रखता है? क्या तुम सबने इसके बारे में कभी सोचा है? यदि तुम लोगों ने नहीं सोचा है तो इससे एक बात साबित होती हैः कि पिछली अनेक सभाओं ने तुम लोगों को बस इतिहास के एक टुकड़े, और उस कार्य के दौरान परमेश्वर की पहुँच, उसके प्रकटीकरण, और उसके प्रकाशन की कुछ समझ दी है जिसमें परमेश्वर ने अपना काम किया था। हालाँकि ऐसी समझ सन्देह से परे तुम सभी में से हर एक को यह पहचान करवाती है कि वह जिसने कार्य के दोनों स्तरों को पूरा किया वह स्वयं परमेश्वर है जिसमें तुम लोग विश्वास करते हो और उसका अनुसरण करते हो, और जिसका तुम सबको हमेशा अनुसरण करना चाहिए, फिर भी तुम लोग अब भी यह पहचानने में असमर्थ हो कि यह वही परमेश्वर है जो सृष्टि के समय से अस्तित्व में है, और जो अनन्तकाल तक अस्तित्व में बना रहेगा, और तुम लोग यह भी पहचानने में समर्थ नहीं हो कि यह वही है जो तुम सबकी अगुवाई करता है और समूची मानवजाति में सर्वोच्च है। तुम लोगों ने निश्चित रूप से इस समस्या के बारे में कभी नहीं सोचा था। वह यहोवा हो या प्रभु यीशु, हस्ती और प्रकटीकरण के किन पहलुओं के द्वारा तुम यह पहचान सकते हो कि वह न केवल वो परमेश्वर है जिसका तुम्हें अनुसरण करना होगा, बल्कि वह है जो मानवजाति को आज्ञा देता है और मनुष्यों की नियति के ऊपर संप्रभुता रखता है, इसके अतिरिक्त कौन स्वयं अद्वितीय परमेश्वर है जो स्वर्ग और पृथ्वी और सभी चीज़ों के ऊपर संप्रभुता रखता है? किन माध्यमों से तुम यह विश्वास करोगे कि वह जिस में तुम विश्वास करते हो और जिसका अनुसरण करते हो वह स्वयं परमेश्वर है जो सब वस्तुओं के ऊपर संप्रभुता रखता है? किन माध्यमों से तुम लोग उस परमेश्वर को जिस पर तुम विश्वास करते हो उस परमेश्वर से जोड़ सकते हो जो मानवजाति की नियति के ऊपर संप्रभुता रखता है? ऐसी कौन सी बात है जो यह पहचानने में तुम लोगों को अनुमति देती है कि वह परमेश्वर जिस पर तुम विश्वास करते हो स्वयं अद्वितीय परमेश्वर है, जो स्वर्ग और पृथ्वी, और सब में है? यह वह समस्या है जिसका समाधान मैं अगले खंड में करूँगा।

ऐसी समस्याएँ जिनके बारे में तुम सबने कभी भी नहीं सोचा है और न ही उनके विषय में सोच सकते हो कि ख़ास तौर पर ऐसी समस्याएँ हो सकती हैं जो परमेश्वर को जानने में बहुत महत्वपूर्ण हैं, और इनमें उन सच्चाईयों को खोजा जा सकता है जिनकी गहराई मनुष्य नहीं नाप सकता। जब ये समस्याएँ तुम्हारे ऊपर आती हैं, और तुम लोगों को इनका सामना करना अवश्य है, और तुम्हें एक चुनाव करना होता है, यदि तुम सब अपनी मूर्खता और अज्ञानता के कारण पूरी तरह से उनका समाधान करने में असमर्थ हो, या इसलिए क्योंकि तुम्हारे अनुभव बिलकुल दिखावटी हैं और तुम लोगों में परमेश्वर के सच्चे ज्ञान की कमी है, तो परमेश्वर पर विश्वास करने की राह पर वे सबसे बड़े अवरोधक और सबसे बड़ी बाधा बन जाएँगे। और इस प्रकार मैं यह महसूस करता हूँ कि इस विषय के संबंध में तुम लोगों के साथ सभा में विचार विमर्श करना सबसे अधिक ज़रूरी है। क्या तुम सभी जानते हो कि अब तुम्हारी समस्या क्या है? क्या तुम लोग उन समस्याओं के विषय में स्पष्ट हो जिनके बारे में मैं बात करता हूँ? क्या ये वो समस्याएँ हैं जिनका तुम लोग सामना करोगे? क्या ये ऐसी समस्याएँ हैं जिन्हें तुम लोग नहीं समझते हो? क्या ऐसी समस्याएँ हैं जो तुम्हारे साथ कभी घटित नहीं हुई हैं? क्या ये समस्याएँ तुम लोगों के लिए महत्वपूर्ण हैं? क्या ये वास्तव में समस्याएँ हैं? यह मामला तुम लोगों के लिए भ्रमित होने का एक बड़ा स्रोत है, जो यह दिखाता है कि तुम्हारे पास उस परमेश्वर की सही समझ नहीं है जिस पर तुम सब विश्वास करते हो, और यह कि तुम लोग उसे गम्भीरतापूर्वक नहीं लेते हो। कुछ लोग कहते हैं, "मैं जानता हूँ कि वह परमेश्वर है, इसलिए मैं उसका अनुसरण करता हूँ, क्योंकि उसका वचन परमेश्वर का प्रकटीकरण है। बस इतना काफी है। और कितने सबूत की ज़रूरत है? निश्चित रूप से हमें परमेश्वर के बारे में सन्देह उत्पन्न करने की आवश्यकता नहीं है? निश्चित रूप से हमें परमेश्वर की परीक्षा नहीं करनी चाहिए? निश्चित रूप से हमें परमेश्वर की हस्ती और स्वयं परमेश्वर की पहचान पर प्रश्न नहीं करना चाहिए?" इसके बावजूद कि तुम लोग इस तरह से सोचते हो या नहीं, किन्तु परमेश्वर के बारे में तुम लोगों को और भ्रमित करने के लिए, या उसे परखने हेतु तुम सबको उकसाने के लिए, और परमेश्वर की पहचान और उसकी हस्ती के विषय में तुम्हारे भीतर सन्देह उत्पन्न करने के लिए मैं ऐसे प्रश्नों को तो बिलकुल भी आगे नहीं रखता हूँ। उसके बजाए, मैं ऐसा इसलिए करता हूँ ताकि मैं तुम लोगों को परमेश्वर की हस्ती के विषय में बड़ी समझ, और परमेश्वर की हैसियत के विषय में एक बड़ी निश्चितता व विश्वास के लिए उत्साहित कर सकूँ, जिससे वे सभी जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं परमेश्वर उन सभी के हृदय में निवास करने वाला एकमात्र परमेश्वर हो, और ताकि परमेश्वर की मूल पदस्थिति—सृष्टिकर्ता, सभी चीज़ों का शासक, स्वयं अद्वितीय परमेश्वर के रूप में—हर जीव के हृदय में पुनः वास करे। यह भी एक मुख्य विषय है जिसके बारे में मैं तुम लोगों से विचार विमर्श करनेवाला हूँ।

आओ हम बाईबिल से निम्नलिखित आयतों को पढ़ना प्रारम्भ करें।

1. परमेश्वर सभी चीज़ों की सृष्टि करने के लिए वचनों को उपयोग करता है

1) (उत्पत्ति 1:3-5) जब परमेश्‍वर ने कहा, "उजियाला हो," तो उजियाला हो गया। और परमेश्‍वर ने उजियाले को देखा कि अच्छा है; और परमेश्‍वर ने उजियाले को अन्धियारे से अलग किया। और परमेश्‍वर ने उजियाले को दिन और अन्धियारे को रात कहा। तथा साँझ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार पहला दिन हो गया।

2) (उत्पत्ति 1:6-7) फिर परमेश्‍वर ने कहा, "जल के बीच एक ऐसा अन्तर हो कि जल दो भाग हो जाए।" तब परमेश्‍वर ने एक अन्तर बनाकर उसके नीचे के जल और उसके ऊपर के जल को अलग अलग किया; और वैसा ही हो गया।

3) (उत्पत्ति 1:9-11) फिर परमेश्‍वर ने कहा, "आकाश के नीचे का जल एक स्थान में इकट्ठा हो जाए और सूखी भूमि दिखाई दे," और वैसा ही हो गया। परमेश्‍वर ने सूखी भूमि को पृथ्वी कहा, तथा जो जल इकट्ठा हुआ उसको उसने समुद्र कहा: और परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है। फिर परमेश्‍वर ने कहा, "पृथ्वी से हरी घास, तथा बीजवाले छोटे छोटे पेड़, और फलदाई वृक्ष भी जिनके बीज उन्हीं में एक एक की जाति के अनुसार हैं, पृथ्वी पर उगें," और वैसा ही हो गया।

4) (उत्पत्ति 1:14-15) फिर परमेश्‍वर ने कहा, "दिन को रात से अलग करने के लिये आकाश के अन्तर में ज्योतियाँ हों; और वे चिह्नों, और नियत समयों और दिनों, और वर्षों के कारण हों; और वे ज्योतियाँ आकाश के अन्तर में पृथ्वी पर प्रकाश देनेवाली भी ठहरें," और वैसा ही हो गया।

5) (उत्पत्ति 1:20-21) फिर परमेश्‍वर ने कहा, "जल जीवित प्राणियों से बहुत ही भर जाए, और पक्षी पृथ्वी के ऊपर आकाश के अन्तर में उड़ें।" इसलिये परमेश्‍वर ने जाति जाति के बड़े बड़े जल-जन्तुओं की, और उन सब जीवित प्राणियों की भी सृष्‍टि की जो चलते फिरते हैं जिन से जल बहुत ही भर गया, और एक एक जाति के उड़नेवाले पक्षियों की भी सृष्‍टि की: और परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है।

6) (उत्पत्ति 1:24-25) फिर परमेश्‍वर ने कहा, "पृथ्वी से एक एक जाति के जीवित प्राणी, अर्थात् घरेलू पशु, और रेंगनेवाले जन्तु, और पृथ्वी के वनपशु, जाति जाति के अनुसार उत्पन्न हों," और वैसा ही हो गया। इस प्रकार परमेश्‍वर ने पृथ्वी के जाति जाति के वन-पशुओं को, और जाति जाति के घरेलू पशुओं को, और जाति जाति के भूमि पर सब रेंगनेवाले जन्तुओं को बनाया: और परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है।

पहले दिन, परमेश्वर के अधिकार के कारण मानवजाति के दिन और रात उत्पन्न हुए और स्थिर बने हुए हैं

आओ हम पहले अंश को देखें: "जब परमेश्‍वर ने कहा, 'उजियाला हो,' तो उजियाला हो गया। और परमेश्‍वर ने उजियाले को देखा कि अच्छा है; और परमेश्‍वर ने उजियाले को अन्धियारे से अलग किया। और परमेश्‍वर ने उजियाले को दिन और अन्धियारे को रात कहा। तथा साँझ हुई फिर भोर हुआ। इस प्रकार पहला दिन हो गया" (उत्पत्ति 1:3-5)। यह अंश सृष्टि की शुरूआत में परमेश्वर के प्रथम कार्य का विवरण देता है, और पहला दिन जिसे परमेश्वर ने गुज़ारा जिसमें एक शाम और एक सुबह थी। परन्तु वह एक असाधारण दिन थाः परमेश्वर ने सभी चीज़ों के लिए उजियाले को तैयार किया, और इसके अतिरिक्त, उजियाले को अंधियारे से अलग किया। इस दिन, परमेश्वर ने बोलना शुरू किया, और उसके वचन और अधिकार अगल बगल अस्तित्व में थे। सभी चीज़ों के मध्य उसका अधिकार दिखाई देना शुरू हुआ, और उसके वचन के परिणामस्वरूप उसकी सामर्थ सभी चीज़ों में फैल गई। इस दिन के आगे से, परमेश्वर के वचन, परमेश्वर के अधिकार, और परमेश्वर की सामर्थ के कारण सभी चीजों को बनाया गया और वे स्थिर हो गए, और उन्होंने परमेश्वर के वचन, परमेश्वर के अधिकार, और परमेश्वर की सामर्थ की वज़ह से काम करना प्रारम्भ कर दिया। जब परमेश्वर ने वचनों को कहा "उजियाला हो," और उजियाला हो गया। परमेश्वर ने किसी जोखिम के काम का प्रारम्भ नहीं किया था; उसके वचनों के परिणामस्वरूप उजियाला प्रगट हुआ था। यह वो उजियाला था जिसे परमेश्वर ने दिन कहा, और जिस पर आज भी मनुष्य अपने अस्तित्व के लिए निर्भर रहता है। परमेश्वर की आज्ञाओं के द्वारा, उसकी हस्ती और मूल्य कभी भी नहीं बदले, और वे कभी भी ग़ायब नहीं हुए। उनकी उपस्थिति परमेश्वर के अधिकार और उसकी सामर्थ को दिखाते हैं, और सृष्टिकर्ता के अस्तित्व की घोषणा करते हैं, और बार बार सृष्टिकर्ता की हैसियत और पहचान को दृढ़ करते हैं। यह अस्पृश्य या माया नहीं है, लेकिन एक वास्तविक ज्योति है जिसे मनुष्य के द्वारा देखा जा सकता है। उस समय के उपरान्त, इस खाली संसार में जिसमें "पृथ्वी बेडौल और सुनसान पड़ी थी, और गहरे जल के ऊपर अन्धियारा था," पहली भौतिक वस्तु पैदा हुई। यह वस्तु परमेश्वर के मुँह के वचनों से आई, और परमेश्वर के अधिकार और उच्चारण के कारण सभी वस्तुओं की सृष्टि के प्रथम कार्य के रूप में प्रगट हुई। उसके तुरन्त बाद, परमेश्वर ने उजियाले और अंधियारे को अलग अलग होने की आज्ञा दी...। परमेश्वर के वचन के कारण हर चीज़ बदल गई और पूर्ण हो गई...। परमेश्वर ने इस उजियाले को "दिन" कहा और अंधियारे को उसने "रात" कहा। उस समय से, संसार में पहली शाम और पहली सुबह हुई जिन्हें परमेश्वर उत्पन्न करना चाहता था, और परमेश्वर ने कहा कि यह पहला दिन था। सृष्टिकर्ता के द्वारा सभी वस्तुओं की सृष्टि का यह पहला दिन था, और सभी वस्तुओं की सृष्टि का प्रारम्भ था, और यह पहली बार था जब सृष्टिकर्ता का अधिकार और सामर्थ इस संसार में जिसे उसने सृजा था प्रकट हुआ था।

इन वचनों के द्वारा, मनुष्य परमेश्वर के अधिकार, और परमेश्वर के वचनों का अधिकार, और परमेश्वर की सामर्थ को देखने के योग्य हुआ। क्योंकि परमेश्वर ही ऐसी सामर्थ धारण करता है, और इस प्रकार केवल परमेश्वर के पास ही ऐसा अधिकार है, और क्योंकि परमेश्वर ऐसे अधिकार को धारण करता है, और इस प्रकार केवल परमेश्वर के पास ही ऐसी सामर्थ है। क्या कोई मनुष्य या पदार्थ ऐसा अधिकार और सामर्थ धारण करता है? क्या तुम लोगों के दिल में कोई उत्तर है? परमेश्वर को छोड़, क्या कोई सृजा गया और न सृजा गया प्राणी ऐसा अधिकार धारण करता है? क्या तुम सबने किसी पुस्तक या पुस्तकों के प्रकाशन में कभी किसी ऐसी चीज़ का उदाहरण देखा है? क्या कोई लेखा जोखा है कि किसी ने आकाश और पृथ्वी और सभी चीज़ों की सृष्टि की थी? यह किसी अन्य पुस्तक या लेखे में पाया नहीं जाता हैः ये वास्तव में केवल परमेश्वर के महिमामय संसार की सृष्टि के विषय में अधिकारयुक्त और सामर्थी वचन हैं, जो बाईबिल में दर्ज हैं, और ये वचन परमेश्वर के अद्वितीय अधिकार, और परमेश्वर की अद्वितीय पहचान के विषय में बोलते हैं। क्या ऐसे अधिकार और सामर्थ के बारे में कहा जा सकता है कि वे परमेश्वर की अद्वितीय पहचान के प्रतीक हैं? क्या ऐसा कहा जा सकता है कि परमेश्वर, और सिर्फ परमेश्वर ही उनको धारण किए हुए है? बिना किसी सन्देह के, सिर्फ परमेश्वर ही ऐसा अधिकार और सामर्थ धारण करता है! इस अधिकार और सामर्थ को किसी सृजे गए या न सृजे गए प्राणी के द्वारा धारण नहीं किया जा सकता है और न बदला जा सकता है! क्या यह स्वयं अद्वितीय परमेश्वर के गुणों में से एक है? क्या तुम सब इसके साक्षी बने हो? ये वचन शीघ्रता और स्पष्टता से लोगों को सत्य को समझने की अनुमति देते हैं कि परमेश्वर अद्वितीय अधिकार, और अद्वितीय सामर्थ धारण करता है, और वह सर्वोच्च पहचान और हैसियत धारण किए हुए है। उपर्युक्त बातों की सहभागिता से, क्या तुम लोग कह सकते हो कि वह परमेश्वर जिस पर तुम सब विश्वास करते हो वह अद्वितीय परमेश्वर है?

दूसरे दिन, परमेश्वर के अधिकार ने मनुष्य के जीवित रहने के लिए जल का प्रबन्ध किया, और आसमान, और अंतरीक्ष को बनाया

आओ हम बाइबल के दूसरे अंश को पढ़ें: "फिर परमेश्‍वर ने कहा, 'जल के बीच एक ऐसा अन्तर हो कि जल दो भाग हो जाए।' तब परमेश्‍वर ने एक अन्तर बनाकर उसके नीचे के जल और उसके ऊपर के जल को अलग अलग किया; और वैसा ही हो गया" (उत्पत्ति 1:6-7)। कौन सा परिवर्तन हुआ जब परमेश्वर ने कहा "जल के बीच एक ऐसा अन्तर हो कि जल दो भाग हो जाए"? पवित्र शास्त्र में कहा गया हैः "तब परमेश्‍वर ने एक अन्तर बनाकर उसके नीचे के जल और उसके ऊपर के जल को अलग अलग किया।" जब परमेश्वर ने ऐसा कहा और ऐसा किया तो परिणाम क्या हुआ? इसका उत्तर अंश के आखिरी भाग में हैं: "और वैसा ही हो गया।"

इन दोनों छोटे वाक्यों में एक शोभायमान घटना दर्ज है, और एक बेहतरीन दृश्य का चित्रण करता है—एक भयंकर प्रारम्भ जिसमें परमेश्वर ने जल को नियन्त्रित किया, और एक अन्तर को बनाया जिसमें मनुष्य अस्तित्व में रह सकता है ...

इस तस्वीर में, आकाश का जल परमेश्वर की आँखों के सामने एकदम से प्रगट होता है, और वे परमेश्वर के वचनों के अधिकार के द्वारा विभाजित हो जाते हैं, और परमेश्वर के द्वारा निर्धारित रीति के अनुसार ऊपर के और नीचे के जल के रूप में अलग हो जाते हैं। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर के द्वारा बनाए गए आकाश ने न केवल नीचे के जल को ढँका बल्कि ऊपर के जल को भी सँभाला...। इस में, मनुष्य बस टकटकी लगाकर देखने, भौंचक्का होने, और उस दृश्य के वैभव की तारीफ में आह भरने के सिवाए कुछ नहीं कर सकता है, जिसमें सृष्टिकर्ता ने जल को रूपान्तरित किया, और अपने अधिकार की सामर्थ से जल को आज्ञा दी, और आकाश को बनाया। परमेश्वर के वचनों, और परमेश्वर की सामर्थ, और परमेश्वर के अधिकार के द्वारा परमेश्वर ने एक और महान आश्चर्यकर्म को अंजाम दिया। क्या यह सृष्टिकर्ता की सामर्थ नहीं है? आओ हम परमेश्वर के कामों का बखान करने के लिए पवित्र शास्त्र का उपयोग करें: परमेश्वर ने अपने वचनों को कहा, और परमेश्वर के इन वचनों के द्वारा जल के मध्य में आकाश बन गया। उसी समय, परमेश्वर के इन वचनों के द्वारा आकाश के अन्तर में एक भयंकर परिवर्तन हुआ, और यह सामान्य रूप से परिवर्तित नहीं हुआ, बल्कि एक प्रकार का प्रतिस्थापन था जिसमें कुछ नहीं से कुछ बन गया। यह सृष्टिकर्ता के विचारों से उत्पन्न हुआ था, और सृष्टिकर्ता के बोले गए वचनो के द्वारा कुछ नहीं से कुछ बन गया, और, इसके अतिरिक्त, इस बिन्दु से आगे यह अस्तित्व में रहेगा और स्थिर बना रहेगा, और सृष्टिकर्ता के विचारों के मेल के अनुसार, यह सृष्टिकर्ता के लिए बदल जाएगा, और परिवर्तित होगा, और नया हो जाएगा। यह अंश सम्पूर्ण संसार की सृष्टि में सृष्टिकर्ता के दूसरे कार्य का उल्लेख करता है। यह सृष्टिकर्ता के अधिकार और सामर्थ का एक और प्रदर्शन था, और सृष्टिकर्ता के एक और पहले कदम की शुरूआत थी। यह दिन जगत की नींव डालने के समय से लेकर दूसरा दिन था जिसे सृष्टिकर्ता ने बिताया था, और वह उसके लिए एक और बेहतरीन दिन थाः वह उजियाले के बीच में चला, आकाश को लाया, उसने जल का प्रबन्ध किया, और उसके कार्य, उसका अधिकार, और उसकी सामर्थ उस नए दिन में काम करने के लिए एक हो गए थे ...

परमेश्वर के द्वारा इन वचनों को कहने से पहले क्या आकाश जल के मध्य में था? बिलकुल नहीं! और परमेश्वर के ऐसा कहने के बाद क्या हुआ "जल के बीच एक अन्तर हो जाए"? परमेश्वर के द्वारा इच्छित चीज़ें प्रगट हो गई थीं; जल के मध्य में आकाश था, और जल विभाजित हो गया क्योंकि परमेश्वर ने कहा था "इस अंतर के कारण जल दो भाग हो जाए।" इस तरह से, परमेश्वर के वचनों का अनुसरण करके, परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ के परिणामस्वरूप दो नए पदार्थ, नई जन्मीं दो चीज़ें सब वस्तुओं के मध्य प्रगट हुईं। और इन दो नई चीज़ों के प्रकटीकरण से तुम लोग कैसा महसूस करते हो? क्या तुम सब सृष्टिकर्ता की सामर्थ की महानता का एहसास करते हो? क्या तुम सब सृष्टिकर्ता के अद्वितीय और असाधारण बल का एहसास करते हो? ऐसे बल और सामर्थ की महानता परमेश्वर के अधिकार के कारण है, और यह अधिकार स्वयं परमेश्वर का प्रदर्शन है और स्वयं परमेश्वर का एक अद्वितीय गुण है।

क्या यह अंश तुम लोगों को परमेश्वर की अद्वितीयता का एक और गहरा एहसास देता है? परन्तु यह पर्याप्तता से कहीं बढ़कर है; सृष्टिकर्ता का अधिकार और सामर्थ इससे कहीं दूर तक जाता है। उसकी अद्वितीयता मात्र इसलिए नहीं है क्योंकि वह किसी अन्य जीव से अलग हस्ती धारण किए हुए है, परन्तु क्योंकि उसका अधिकार और सामर्थ असाधारण है, साथ ही असीमित, सबसे बढ़कर, और चमत्कार करने वाला है, और, उससे भी बढ़कर, उसका अधिकार और जो उसके पास है और उसका अस्तित्व जीवन की सृष्टि कर सकता है और चमत्कारों को बना सकता है, और वह प्रत्येक और हर एक कौतुहलपूर्ण और असाधारण मिनट और सैकण्ड की सृष्टि कर सकता है, और उसी समय में, वह उस जीवन पर शासन करने में सक्षम है जिसकी वह सृष्टि करता है, और चमत्कारों और हर मिनट और सैकण्ड जिसे उसने बनाया उसके ऊपर संप्रभुता रखता है।

तीसरे दिन, परमेश्वर के वचनों ने पृथ्वी और समुद्रों की उत्पत्ति की, और परमेश्वर के अधिकार ने संसार को जीवन से लबालब भर दिया

आगे आईए हम उत्पत्ति 1:9-11 के पहले वाक्य को पढ़ें: "फिर परमेश्वर ने कहा, 'आकाश के नीचे का जल एक स्थान में इकट्ठा हो जाए और सूखी भूमि दिखाई दे।'" जब परमेश्वर ने साधारण रूप से कहा तो क्या परिवर्तन हुआ, "फिर परमेश्वर ने कहा, आकाश के नीचे का जल एक स्थान में इकट्ठा हो जाए और सूखी भूमि दिखाई दे।" और इस अन्तर में उजियाले और आकाश के अलावा क्या था? पवित्र शास्त्र में ऐसा लिखा हैः "परमेश्‍वर ने सूखी भूमि को पृथ्वी कहा, तथा जो जल इकट्ठा हुआ उसको उसने समुद्र कहा: और परमेश्‍वर ने देखा कि अच्छा है।" दूसरे शब्दों में, अब इस अन्तर में भूमि और समुद्र थे, और भूमि और समुद्र विभाजित हो गए थे। इन दो नई चीज़ों के प्रकटीकरण ने परमेश्वर की मुँह की आज्ञा का पालन किया, "और वैसा ही हो गया।" क्या पवित्र शास्त्र इस प्रकार वर्णन करता है कि जब परमेश्वर यह सब कर रहा था तब बहुत व्यस्त था? क्या यह ऐसा वर्णन करता है कि परमेश्वर शारीरिक परिश्रम में लगा हुआ था? तब, परमेश्वर के द्वारा सब कुछ कैसे किया गया था? परमेश्वर ने इन नई वस्तुओं को उत्पन्न कैसे किया? स्वतः प्रगट है, परमेश्वर ने इन सब को पूरा करने के लिए, और इसकी सम्पूर्णता की सृष्टि करने के लिए वचनों का उपयोग किया।

उपर्युक्त तीन अंशों में, हम ने तीन बड़ी घटनाओं के घटित होने के बारे में सीखा। ये तीन घटनाएँ प्रगट हुईं, और उन्हें परमेश्वर के वचनों के द्वारा अस्तित्व में लाया गया, और ऐसा एक के बाद एक उसके वचनों के द्वारा हुआ, जो परमेश्वर की आँखों के सामने प्रगट हुए थे। इस प्रकार ऐसा कहा जा सकता है कि "परमेश्वर कहेगा, और वह पूरा हो जाएगा; वह आज्ञा देगा, और वह बना रहेगा" और वे खोखले वचन नहीं हैं। परमेश्वर की यह हस्ती उसी पल दृढ़ हो गई थी जब उसने विचार धारण किया था, और उसकी हस्ती पूर्णतया प्रतिबिम्बित हो गई थी जब परमेश्वर ने बोलने के लिए अपना मुँह खोला था।

आओ हम इस अंश के अन्तिम वाक्य में आगे बढ़ें: "फिर परमेश्‍वर ने कहा, 'पृथ्वी से हरी घास, तथा बीजवाले छोटे छोटे पेड़, और फलदाई वृक्ष भी जिनके बीज उन्हीं में एक एक की जाति के अनुसार हैं, पृथ्वी पर उगें,' और वैसा ही हो गया।" जब परमेश्वर बोल रहा था, परमेश्वर के विचारों का अनुसरण करते हुए ये सभी चीज़ें अस्तित्व में आ गईं, और एक क्षण में ही, अलग अलग प्रकार की छोटी छोटी नाज़ुक ज़िन्दगियाँ बेतरतीब ढंग से मिट्टी से बाहर आने के लिए अपने सिरों को ऊपर उठाने लगीं, और इससे पहले कि वे अपने शरीरों से थोड़ी सी धूल भी झाड़ पातीं वे उत्सुकता से एक दूसरे का अभिनन्दन करते हुए यहाँ वहाँ मँडराने, सिर हिला हिलाकर संकेत देने और इस संसार पर मुस्कुराने लगीं थीं। उन्होंने सृष्टिकर्ता को उस जीवन के लिए धन्यवाद दिया जो उसने उन्हें दिया था, और संसार को यह घोषित किया कि वे भी इस संसार की सभी चीज़ों के एक भाग हैं, और उन में से प्रत्येक सृष्टिकर्ता के अधिकार को दर्शाने के लिए अपना जीवन समर्पित करेगा। जैसे ही परमेश्वर के वचन कहे गए, भूमि रसीली और हरीभरी हो गई, सब प्रकार के सागपात जिनका मनुष्यों के द्वारा आनन्द लिया जा सकता था अँकुरित हो गए, और भूमि को भेदकर बाहर निकले, और पर्वत और तराईयाँ वृक्षों एवं जंगलों से बहुतायत से भर गए...। इस बंजर संसार में, जिसमें जीवन का कोई निशान नहीं था, शीघ्रता से घास, सागपात, और वृक्षों एवं उमड़ती हुई हरीयाली की बहुतायत से भर गए...। घास की महक और मिट्टी की सौंधी सौंधी खुशबू हवा में फैल गई, और सुसज्जित पौधों की कतारें हवा के चक्र के साथ एक साथ साँस लेने लगीं, और बढ़ने की प्रक्रिया शुरू हो गई। उसी समय, परमेश्वर के वचन के कारण और परमेश्वर के विचारों का अनुसरण करके, सभी पौधों ने अपनी सनातन जीवन यात्रा शुरू कर दी जिसमें वे बढ़ने, खिलने, फल उत्पन्न करने, और बहुगुणित होने लगे। वे अपने अपने जीवन पथों से कड़ाई से चिपके रहे, और सभी चीज़ों में अपनी अपनी भूमिकाओं को अदा करना शुरू कर दिया...। वे सभी सृष्टिकर्ता के वचनों के कारण उत्पन्न हुए, और जीवन बिताया। वे सृष्टिकर्ता के कभी न खत्म होनेवाली भोजन सामग्री और पोषण को प्राप्त करेंगे, और परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ को दर्शाने के लिए भूमि के किसी भी कोने में दृढ़संकल्प के साथ ज़िन्दा रहेंगे, और वे हमेशा उस जीवन शक्ति को दर्शाते रहेंगे जो सृष्टिकर्ता के द्वारा उन्हें दिया गया है ...

सृष्टिकर्ता का जीवन असाधारण है, उसके विचार असाधारण हैं, और उसका अधिकार असाधारण है, और इस प्रकार, जब उसके वचन उच्चारित किए गए थे, तो उसका अन्तिम परिणाम था "और वैसा ही हो गया।" स्पष्ट रूप से, जब परमेश्वर कार्य करता है तो उसे अपने हाथों से काम करने की आवश्यकता नहीं होती है; वह बस आज्ञा देने के लिए अपने विचारों का और आदेश देने के लिए अपने वचनों का उपयोग करता है, और इस रीति से कार्यों को पूरा किया जाता है। इस दिन, परमेश्वर ने जल को एक साथ एक जगह पर इक्ट्ठा किया, और सूखी भूमि दिखाई दी, उसके बाद परमेश्वर ने भूमि से घास को उगाया, और छोटे छोटे पौधे जो बीज उत्पन्न करते थे, और पेड़ जो फल उत्पन्न करते थे उग आए, और परमेश्वर ने प्रजाति के अनुसार उनका वर्गीकरण किया, और हर एक में उसका स्वयं का बीज दिया। यह सब कुछ परमेश्वर के विचारों और परमेश्वर के वचनों की आज्ञाओं के अनुसार वास्तविक हुआ है और इस नए संसार में हर चीज़ एक के बाद एक प्रगट होती है।

जब वह अपना काम शुरू करनेवाला था, परमेश्वर के पास पहले से ही एक तस्वीर थी जिसे वह अपने मस्तिष्क में पूर्ण करना चाहता था, और जब परमेश्वर ने इन चीज़ों को पूर्ण करना प्रारम्भ किया, ऐसा तब भी हुआ जब परमेश्वर ने इस तस्वीर की विषयवस्तु के बारे में बोलने के लिए अपना मुँह खोला था, तो परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ के कारण सभी चीज़ों में बदलाव होना प्रारम्भ हो गया था। इस पर ध्यान न देते हुए कि परमेश्वर ने इसे कैसे किया, या किस प्रकार अपने अधिकार का इस्तेमाल किया, सब कुछ कदम दर कदम परमेश्वर की योजना के अनुसार और परमेश्वर के वचन के कारण पूरा किया गया था, और परमेश्वर के वचनों और उसके अधिकार के कारण कदम दर कदम आकाश और पृथ्वी के बीच में परिवर्तन होने लगा था। ये सभी परिवर्तन और घटनाएँ परमेश्वर के अधिकार, और सृष्टिकर्ता के जीवन की असाधारणता और सामर्थ की महानता को दर्शाते हैं। उसके विचार सामान्य युक्तियाँ नहीं हैं, या खाली तस्वीर नहीं है, परन्तु अधिकार हैं जो जीवनशक्ति और असाधारण ऊर्जा से भरे हुए हैं, और वे ऐसी सामर्थ हैं जो सभी चीज़ों को परिवर्तित कर सकते हैं, पुनः सुधार कर सकते हैं, फिर से नया बना सकते हैं, और नष्ट कर सकते हैं। और इसकी वजह से, उसके विचारों के कारण सभी चीज़ें कार्य करती हैं, और, उसके मुँह के वचनों के कारण, उसी समय, पूर्ण होते हैं ...

सभी वस्तुओं के प्रकट होने से पहले, परमेश्वर के विचारों में एक सम्पूर्ण योजना बहुत पहले से ही बन चुकी थी, और एक नया संसार बहुत पहले ही आकार ले चुका था। यद्यपि तीसरे दिन भूमि पर हर प्रकार के पौधे प्रकट हुए, किन्तु परमेश्वर के पास इस संसार की सृष्टि के कदमों को रोकने का कोई कारण नहीं था; उसने लगातार अपने शब्दों को बोलना चाहा ताकि हर नई चीज़ की सृष्टि को निरन्तर पूरा कर सके। वह बोलेगा, और अपनी आज्ञाओं को देगा, और अपने अधिकार का इस्तेमाल करेगा और अपनी सामर्थ को दिखाएगा, और उसने सभी चीज़ों और मानवजाति के लिए वह सब कुछ बनाया जिन्हें बनाने की उसने योजना बनाई थी और उनकी सृष्टि करने की अभिलाषा की थी ...

सभी विश्वासी यीशु मसीह की वापसी के लिए तरस रहे हैं। क्या आप उनमें से एक हैं? हमारी ऑनलाइन सहभागिता में शामिल हों और आपको परमेश्वर से फिर से मिलने का अवसर मिलेगा।

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