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वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

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अंतिम दिनों के मसीह के कथन - संकलन

परमेश्वर का अधिकार (I)     भाग एक

मेरी पिछली अनेक सभाएँ परमेश्वर के कार्य, परमेश्वर के स्वभाव, और स्वयं परमेश्वर के विषय में थीं। इन सभाओं को सुनने के बाद, क्या तुम लोगों को एहसास होता है कि तुम सबने परमेश्वर के स्वभाव की समझ और ज्ञान को प्राप्त किया है? कितनी बड़ी समझ और ज्ञान को प्राप्त किया है? क्या तुम लोग उसे एक संख्या दे सकते हो? क्या इन सभाओं ने तुम सभी को परमेश्वर की और गहरी समझ दी है? क्या ऐसा कहा जा सकता है कि यह समझ परमेश्वर का सच्चा ज्ञान है? क्या ऐसा कहा जा सकता है कि परमेश्वर का यह ज्ञान और समझ परमेश्वर के सम्पूर्ण सार-तत्व, और जो उसके पास है और जो वह है उसका ज्ञान है? नहीं, बिलकुल नहीं! यह इसलिए है क्योंकि ये सभाएँ केवल परमेश्वर के स्वभाव और स्वरूप के एक भाग की समझ प्रदान करती हैं - न कि इसके सब कुछ की, या उसकी सम्पूर्णता की। ये सभाएँ परमेश्वर के द्वारा किसी समय किए गए कार्य के एक भाग को समझने के लिए तुम लोगों को सक्षम करती हैं, जिसके द्वारा तुम सभी परमेश्वर के स्वभाव और उसके स्वरूप के, साथ ही साथ जो कुछ उसने किया है उस हर एक चीज़ के पीछे क्या पहुँच एवं सोच है, उसे देखते हो। परन्तु यह केवल परमेश्वर की शाब्दिक एवं मौखिक समझ है, और तुम सब अपने हृदय में अनिश्चित बने रहते हो कि इसका कितना भाग सच्चा है। वह कौन सी चीज़ है जो मुख्य रूप से यह निर्धारित करती है कि ऐसी चीज़ों के प्रति लोगों की समझ में कोई वास्तविकता है या नहीं? यह इससे निर्धारित होता है कि उन सबने अपने वास्तविक अनुभवों के दौरान परमेश्वर के वचनों और स्वभाव का वास्तव में कितना अनुभव किया है, और वे सभी इन वास्तविक अनुभवों के दौरा कितना उसे देख या समझ पाये हैं। "पिछली कई सभाओं ने हमें परमेश्वर के द्वारा की गई चीज़ों, परमेश्वर के विचारों, और इसके अतिरिक्त, मनुष्य के प्रति परमेश्वर की मनोवृत्ति, और उसके कार्यों के आधार, साथ ही उसके कार्यों के सिद्धांतों को समझने की अनुमति दी है। और इस प्रकार हमने परमेश्वर के स्वभाव को समझा है, और हम परमेश्वर की सम्पूर्णता को जान पाए हैं।" क्या कभी किसी ने ऐसे वचन कहे हैं? क्या ऐसा कहना सही है? ऐसा बिल्कुल नहीं है। और मैं क्यों कहता हूँ कि ऐसा नहीं है? परमेश्वर का स्वभाव, और जो उसके पास है और जो वह है, उन कार्यों के द्वारा जो उसने किए हैं और उन वचनों के द्वारा जो उसने कहे हैं, प्रगट होते हैं। मनुष्य परमेश्वर के द्वारा किये गये कार्यों व उसके द्वारा बोले गये वचनों के द्वारा, परमेश्वर के दर्शन कर सकता है, परन्तु इससे बस यही कहा जा सकता है कि उसके द्वारा किये गये कार्यों और उसके वचनों से मनुष्य परमेश्वर के स्वभाव व जो उसके पास है और जो वह है, उसके एक अंश को ही समझने में सक्षम हो सकता है। परमेश्वर के स्वभाव व जो उसके पास है और जो वह है, यदि मनुष्य परमेश्वर की और अधिक तथा और गहरी समझ प्राप्त करने की अभिलाषा करता है, तो मनुष्य को परमेश्वर के कार्य और वचनों का और गहनता से अनुभव करना होगा। यद्यपि जब मनुष्य परमेश्वर के वचनों और कार्य का आंशिक रूप से अनुभव करता है तो उसे परमेश्वर की समझ का एक आंशिक भाग ही प्राप्त होता है, क्या यह आंशिक समझ परमेश्वर के सच्चे स्वभाव को दर्शाती है? क्या यह परमेश्वर के सार-तत्व को दर्शाती है? हाँ, वास्तव में यह परमेश्वर के स्वभाव, और परमेश्वर के सार-तत्व को दर्शाता है, और इसमें कोई सन्देह नहीं है। समय या स्थान की परवाह किए बगैर, परमेश्वर किस रीति से अपना काम करता है, या किस रूप में मनुष्य के सामने प्रगट होता है, या किस रीति से अपनी इच्छा को प्रकट करता है, वह सब कुछ जो वह प्रकाशित एवं प्रगट करता है, वह स्वयं परमेश्वर, परमेश्वर के सार-तत्व और जो उस के पास है और जो वह है उसे दर्शाता है। यह बिलकुल सत्य है कि परमेश्वर अपनी विशेषताओं और अस्तित्व एवं अपनी सच्ची पहचान के साथ अपना कार्य करता है; फिर भी, आज, उसके वचनों के द्वारा, और उस प्रचार को सुनने के द्वारा जो वो सुनते हैं लोगों के पास परमेश्वर की केवल आंशिक समझ है, और इस प्रकार कुछ हद तक, इस समझ को केवल काल्पनिक ज्ञान कहा जा सकता है। अपनी वास्तविक स्थिति का ध्यान रखते हुए, तुम केवल परमेश्वर की समझ या ज्ञान को जिसे तुमने सुना, देखा, या जाना है, और अपने हृदय में समझा है, जाँच सकते हो, यदि तुम में से हर एक इस वास्तविक अनुभव से होकर गुज़रता है और इसे थोड़ा थोड़ा कर के जान पाता है। यदि मैं ने इन शब्दों के साथ तुम लोगों से सहभागिता में विचार विमर्श नहीं किया होता, तो क्या मात्र अपने अनुभवों से तुम सभी परमेश्वर के सच्चे ज्ञान को हासिल कर पाते? मैं डरता हूँ, क्योंकि ऐसा करना बहुत ही अधिक कठिन होता। क्योंकि यदि लोग परमेश्वर के अनुभव को पाना चाहते हैं तो उनके पास पहले परमेश्वर के वचन होने चाहिए। फिर भी लोग परमेश्वर के बहुत से वचनों को खाते हैं, ऐसे लोगों की संख्या है जो वास्तव में उन का अनुभव कर सकते हैं। परमेश्वर के वचन आगे की ओर पथ प्रदर्शन करते और मनुष्य को उसके अनुभव में मार्गदर्शन देते हैं। संक्षेप में, उनके लिए जिनके पास थोड़ा बहुत सच्चा अनुभव है, ये अनेक पिछली सभाएँ सत्य की गहरी समझ और परमेश्वर के और अधिक वास्तविक ज्ञान को हासिल करने में उनकी सहायता करेंगी। परन्तु उनके लिए जिनके पास कुछ भी वास्तविक अनुभव नहीं है, या वे जिन्होंने बस अभी अभी अपना अनुभव शुरू किया है, या बस अभी अभी वास्तविकता को स्पर्श करना प्रारम्भ किया है, यह एक बड़ी परीक्षा है।

पिछली अनेक सभाओं की मुख्य विषयवस्तु परमेश्वर के स्वभाव, परमेश्वर के कार्य, और स्वयं परमेश्वर से संबंधित थी। जो कुछ भी मैं ने कहा था तुम सबने उसके मुख्य और केन्द्रीय भाग में क्या देखा था? इन सभाओं के द्वारा, क्या तुम लोग यह पहचान सकते हो कि वह जिसने यह काम किया था, और इन स्वभावों को प्रगट किया था, वह स्वयं एक अद्वितीय परमेश्वर है, जो सभी चीज़ों के ऊपर संप्रभुता रखता है? यदि तुम सबका उत्तर हाँ है, तो किस बात ने तुम लोगों को ऐसे निष्कर्ष तक पहुँचाया? किस पहलू के द्वारा तुम सभी इस निष्कर्ष तक पहुँचे? क्या कोई मुझे बता सकता है? मैं जानता हूँ कि पिछली सहभागिता ने तुम सबको गहराई से प्रभावित किया था, और परमेश्वर को जानने के लिए तुम लोगों के हृदय में एक नई शुरूआत प्रदान की थी, जो महान है। यद्यपि तुम सबने पहले की तुलना में परमेश्वर को समझने के लिए एक बड़ी छलाँग लगाई है, परन्तु परमेश्वर की पहचान की तुम लोगों की परिभाषा को अभी भी यहोवा, व्यवस्था के युग के परमेश्वर, अनुग्रह के युग के प्रभु यीशु मसीह, और राज्य के युग के सर्वशक्तिमान परमेश्वर जैसे नामों से भी कहीं बढ़कर और अधिक उन्नत होना है। दूसरे शब्दों में, यद्यपि परमेश्वर के स्वभाव, परमेश्वर के कार्य, और स्वयं परमेश्वर के बारे में इन सभाओं ने तुम सबको परमेश्वर द्वारा किसी समय बोले गए कुछ वचनों, और परमेश्वर के द्वारा किसी समय किए गए कार्य, और परमेश्वर के द्वारा किसी समय प्रकाशित किए गए उसके अस्तित्व और व्यावहारिक गुणों की समझ दी है, तो भी तुम सभी "परमेश्वर" शब्द की सही परिभाषा और सटीक शुरूआती जानकारी प्रदान करने में असमर्थ हो। न ही तुम लोगों के पास स्वयं परमेश्वर की स्थिति एवं पहचान की, दूसरे शब्दों में तुम सबके पास सभी चीज़ों एवं सम्पूर्ण सृष्टि के मध्य परमेश्वर की हैसियत की सच्ची और सटीक शुरूआती जानकारी तथा ज्ञान नहीं है। यह इसलिए है, क्योंकि स्वयं परमेश्वर व परमेश्वर के स्वभाव के विषय में पिछली सभाओं में, सभी सन्दर्भ परमेश्वर के पूर्व प्रगटीकरण और प्रकाशन पर आधारित थे जो बाईबिल में लिखित हैं। फिर भी मनुष्य के लिए उसके अस्तित्व और उसके व्यावहारिक गुणों की खोज करना कठिन है, जिन्हें परमेश्वर द्वारा मानवजाति के प्रबन्ध और उद्धार के दौरान, या उसके बाहर, प्रकाशित और प्रगट किया गया है। अतः, भले ही तुम लोग परमेश्वर के अस्तित्व और उसके व्यावहारिक गुणों को समझते हो जो उस कार्य में प्रकाशित हुए थे जिसे उसने किसी समय किया था, फिर भी परमेश्वर की पहचान और स्थिति की तुम सबकी परिभाषा उस अद्वितीय परमेश्वर से अभी भी बहुत दूर है, जो सभी चीज़ों के ऊपर संप्रभुता रखता है, और उस रचयिता से कहीं अलग है। पिछली अनेक सभाओं ने सब को ठीक ऐसा ही महसूस करवाया था मनुष्य परमेश्वर के विचारों को कैसे जान सकता है? यदि कोई वास्तव में जाननेवाला था, तो वह शख्स निश्चित रूप से परमेश्वर ही होगा, क्योंकि केवल परमेश्वर ही अपने विचारों को जानता है, और केवल परमेश्वर ही अपने कार्यों को करने का तरीका व उसका आधार जानता है। इस रीति से परमेश्वर की पहचान को जानना तुम लोगों को उचित और तर्कसंगत लग सकता है, परन्तु परमेश्वर के स्वभाव और परमेश्वर के कार्य से कौन यह बता सकता है कि यह वास्तव में स्वयं परमेश्वर का कार्य है, और मनुष्य का कार्य नहीं है, ऐसा कार्य जो परमेश्वर के बदले मनुष्य द्वारा नहीं किया जा सकता है? कौन यह देख सकता है कि यह कार्य उसकी संप्रभुता में आता है जिसके पास परमेश्वर की हस्ती और सामर्थ है? दूसरे शब्दों में, किन विशेषताओं या हस्ती के जरिए तुम सब यह पहचानोंगे कि वह स्वयं परमेश्वर है, किसके पास परमेश्वर की पहचान है, और वो कौन है जो सब चीज़ों के ऊपर संप्रभुता रखता है? क्या तुम सबने इसके बारे में कभी सोचा है? यदि तुम लोगों ने नहीं सोचा है तो इससे एक बात साबित होती हैः कि पिछली अनेक सभाओं ने तुम लोगों को बस इतिहास के एक टुकड़े, और उस कार्य के दौरान परमेश्वर की पहुँच, उसके प्रकटीकरण, और उसके प्रकाशन की कुछ समझ दी है जिसमें परमेश्वर ने अपना काम किया था। हालाँकि ऐसी समझ सन्देह से परे तुम सभी में से हर एक को यह पहचान करवाती है कि वह जिसने कार्य के दोनों स्तरों को पूरा किया वह स्वयं परमेश्वर है जिसमें तुम लोग विश्वास करते हो और उसका अनुसरण करते हो, और जिसका तुम सबको हमेशा अनुसरण करना चाहिए, फिर भी तुम लोग अब भी यह पहचानने में असमर्थ हो कि यह वही परमेश्वर है जो सृष्टि के समय से अस्तित्व में है, और जो अनन्तकाल तक अस्तित्व में बना रहेगा, और तुम लोग यह भी पहचानने में समर्थ नहीं हो कि यह वही है जो तुम सबकी अगुवाई करता है और समूची मानवजाति में सर्वोच्च है। तुम लोगों ने निश्चित रूप से इस समस्या के बारे में कभी नहीं सोचा था। वह यहोवा हो या प्रभु यीशु, हस्ती और प्रकटीकरण के किन पहलुओं के द्वारा तुम यह पहचान सकते हो कि वह न केवल वो परमेश्वर है जिसका तुम्हें अनुसरण करना होगा, बल्कि वह है जो मानवजाति को आज्ञा देता है और मनुष्यों की नियति के ऊपर संप्रभुता रखता है, इसके अतिरिक्त कौन स्वयं अद्वितीय परमेश्वर है जो स्वर्ग और पृथ्वी और सभी चीज़ों के ऊपर संप्रभुता रखता है? किन माध्यमों से तुम यह विश्वास करोगे कि वह जिस में तुम विश्वास करते हो और जिसका अनुसरण करते हो वह स्वयं परमेश्वर है जो सब वस्तुओं के ऊपर संप्रभुता रखता है? किन माध्यमों से तुम लोग उस परमेश्वर को जिस पर तुम विश्वास करते हो उस परमेश्वर से जोड़ सकते हो जो मानवजाति की नियति के ऊपर संप्रभुता रखता है? ऐसी कौन सी बात है जो यह पहचानने में तुम लोगों को अनुमति देती है कि वह परमेश्वर जिस पर तुम विश्वास करते हो स्वयं अद्वितीय परमेश्वर है, जो स्वर्ग और पृथ्वी, और सब में है? यह वह समस्या है जिसका समाधान मैं अगले खंड में करूँगा।

ऐसी समस्याएँ जिनके बारे में तुम सबने कभी भी नहीं सोचा है और न ही उनके विषय में सोच सकते हो कि ख़ास तौर पर ऐसी समस्याएँ हो सकती हैं जो परमेश्वर को जानने में बहुत महत्वपूर्ण हैं, और इनमें उन सच्चाईयों को खोजा जा सकता है जिनकी गहराई मनुष्य नहीं नाप सकता। जब ये समस्याएँ तुम्हारे ऊपर आती हैं, और तुम लोगों को इनका सामना करना अवश्य है, और तुम्हें एक चुनाव करना होता है, यदि तुम सब अपनी मूर्खता और अज्ञानता के कारण पूरी तरह से उनका समाधान करने में असमर्थ हो, या इसलिए क्योंकि तुम्हारे अनुभव बिलकुल दिखावटी हैं और तुम लोगों में परमेश्वर के सच्चे ज्ञान की कमी है, तो परमेश्वर पर विश्वास करने की राह पर वे सबसे बड़े अवरोधक और सबसे बड़ी बाधा बन जाएँगे। और इस प्रकार मैं यह महसूस करता हूँ कि इस विषय के संबंध में तुम लोगों के साथ सभा में विचार विमर्श करना सबसे अधिक ज़रूरी है। क्या तुम सभी जानते हो कि अब तुम्हारी समस्या क्या है? क्या तुम लोग उन समस्याओं के विषय में स्पष्ट हो जिनके बारे में मैं बात करता हूँ? क्या ये वो समस्याएँ हैं जिनका तुम लोग सामना करोगे? क्या ये ऐसी समस्याएँ हैं जिन्हें तुम लोग नहीं समझते हो? क्या ऐसी समस्याएँ हैं जो तुम्हारे साथ कभी घटित नहीं हुई हैं? क्या ये समस्याएँ तुम लोगों के लिए महत्वपूर्ण हैं? क्या ये वास्तव में समस्याएँ हैं? यह मामला तुम लोगों के लिए भ्रमित होने का एक बड़ा स्रोत है, जो यह दिखाता है कि तुम्हारे पास उस परमेश्वर की सही समझ नहीं है जिस पर तुम सब विश्वास करते हो, और यह कि तुम लोग उसे गम्भीरतापूर्वक नहीं लेते हो। कुछ लोग कहते हैं, "मैं जानता हूँ कि वह परमेश्वर है, इसलिए मैं उसका अनुसरण करता हूँ, क्योंकि उसका वचन परमेश्वर का प्रकटीकरण है। बस इतना काफी है। और कितने सबूत की ज़रूरत है? निश्चित रूप से हमें परमेश्वर के बारे में सन्देह उत्पन्न करने की आवश्यकता नहीं है? निश्चित रूप से हमें परमेश्वर की परीक्षा नहीं करनी चाहिए? निश्चित रूप से हमें परमेश्वर की हस्ती और स्वयं परमेश्वर की पहचान पर प्रश्न नहीं करना चाहिए?" इसके बावजूद कि तुम लोग इस तरह से सोचते हो या नहीं, किन्तु परमेश्वर के बारे में तुम लोगों को और भ्रमित करने के लिए, या उसे परखने हेतु तुम सबको उकसाने के लिए, और परमेश्वर की पहचान और उसकी हस्ती के विषय में तुम्हारे भीतर सन्देह उत्पन्न करने के लिए मैं ऐसे प्रश्नों को तो बिलकुल भी आगे नहीं रखता हूँ। उसके बजाए, मैं ऐसा इसलिए करता हूँ ताकि मैं तुम लोगों को परमेश्वर की हस्ती के विषय में बड़ी समझ, और परमेश्वर की हैसियत के विषय में एक बड़ी निश्चितता व विश्वास के लिए उत्साहित कर सकूँ, जिससे वे सभी जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं परमेश्वर उन सभी के हृदय में निवास करने वाला एकमात्र परमेश्वर हो, और ताकि परमेश्वर की मूल पदस्थिति - सृष्टिकर्ता, सभी चीज़ों का शासक, स्वयं अद्वितीय परमेश्वर के रूप में - हर जीव के हृदय में पुनः वास करे। यह भी एक मुख्य विषय है जिसके बारे में मैं तुम लोगों से विचार विमर्श करनेवाला हूँ।

वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VII
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VIII
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IX
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X

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