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वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

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वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

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अंतिम दिनों के मसीह के कथन - संकलन

इन अनेक सभाओं ने प्रत्येक व्यक्ति पर एक बड़ा प्रभाव डाला है। अब तक तो, लोग वास्तव में परमेश्वर के सच्चे अस्तित्व का एहसास कर पाये होंगे और यह कि परमेश्वर वास्तव में उन के अति निकट है। यद्यपि लोगों ने बहुत सालों से परमेश्वर पर विश्वास किया है, फिर भी उन्होंने उसके विचारों और युक्तियों को सचमुच में कभी भी वैसा नहीं समझा है जैसा वे अब समझते हैं, और ना ही उन्होंने उसके व्यावहारिक कार्यों को सचमुच में वैसा अनुभव किया है जैसा वे अब करते हैं। चाहे उस का ज्ञान हो या वास्तविक अभ्यास, अधिकतर लोगों ने कुछ नया सीखा है और एक ऊँची समझ को प्राप्त किया है, और भूतकाल में जो कुछ वे स्वयं कर रहे थे उसमें हुई ग़लती को महसूस किया है, अपने अनुभव के छिछलेपन का एहसास किया है और यह कि किसी चीज़ की अधिकता परमेश्वर के इच्छानुसार नहीं होता है, और यह महसूस किया कि जिस बात की मनुष्य में सब से ज़्यादा कमी है वह है परमेश्वर के स्वभाव का ज्ञान। लोगों के लिए ऐसा ज्ञान एक प्रकार का भावनात्मक ज्ञान है; ताकि तर्कसंगत ज्ञान के स्तर तक ऊँचा उठ सकें जिसे अपने अनुभवों के द्वारा धीरे धीरे गहरा और मज़बूत होने की जरूरत है। मनुष्य के द्वारा सचमुच में परमेश्वर को समझने से पहले, आत्म चेतना के सम्बंध में ऐसा कहा जा सकता है कि वे अपने हृदय में परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास करते हैं, परन्तु उन के पास विशेष प्रश्नों की वास्तविक समझ नहीं है जैसे वह वास्तव में किस प्रकार का परमेश्वर है, उस की इच्छा क्या है, उस का स्वभाव क्या है, और मानवजाति के प्रति उसकी वास्तविक प्रवृत्ति क्या है। यह बृहद् रूप से लोगों के परमेश्वर पर विश्वास के साथ समझौता करता है—उन का विश्वास साधारण तौर पर शुद्धता और सिद्धता हासिल नहीं कर सकता है। भले ही तुम परमेश्वर के वचन के आमने सामने हो, या यह महसूस करो कि तुमने अपने अनुभवों के द्वारा परमेश्वर का सामना किया है, फिर भी यह कहा नहीं जा सकता है कि तुमने पूर्णत: उसे समझा है। क्योंकि तुम परमेश्वर के विचारों को नहीं जानते हो, या वह किस से प्रेम करता है और और क्या नफरत करता है, उसे क्या क्रोधित करता है और किससे उसे आनन्द मिलता है, तुम्हारे पास उस की सही समझ नहीं है। तुम्हारा विश्वास धुँधलाहट और कल्पना की नींव पर बना हुआ है और तुम्हारी आत्म चेतना सम्बंधी इच्छाओं पर आधारित है। यह अभी भी एक प्रमाणिक विश्वास से दूर है, और तुम अभी भी एक सच्चे अनुयायी बनने से दूर हो। बाइबल की इन कहानियों के उदाहरणों की व्याख्याओं ने मनुष्यों को परमेश्वर के दिल को जानने में मदद की है, कि अपने कार्य के हर कदम पर वह क्या सोच रहा था और उसने इस कार्य को क्यों किया, और जब उसने ऐसा किया तो उसकी मूल इच्छा और योजना क्या थी, उसने अपने विचारों को कैसे प्राप्त किया, और उसने अपनी योजना को कैसे तैयार किया और उसे कैसे विकसित किया। इन कहानियों के द्वारा, हम परमेश्वर के छः हज़ार सालों के प्रबंधन कार्य के दौरान उसकी प्रत्येक विशिष्ट इच्छा और प्रत्येक वास्तविक विचार, और विभिन्न समयों और विभिन्न युगों में। मनुष्यों के प्रति उसकी प्रवृत्ति की एक विस्तृत और विशिष्ट समझ प्राप्त कर सकते हैं। परमेश्वर क्या सोच रहा था, उसकी प्रवृत्ति क्या थी, और वह स्वभाव क्या था जिसे उसने प्रकट किया जब उसने हर एक परिस्थिति का सामना किया, इसे समझने से हर एक व्यक्ति को उसके सच्चे अस्तित्व को और गहराई से महसूस करने में मदद मिल सकती है, और वह उस की यथार्थता और प्रमाणिकता का और गहराई से एहसास कर सकता है। इन कहानियों को बताने का मेरा उद्देश्य यह नहीं है कि लोग बाइबल के इतिहास को समझ सकें, और ना ही यह है कि लोगों को बाइबल की पुस्तकों से या उस में दिए गए लोगों से परिचित होने में सहायता मिले, और यह विशिष्ट रूप से इसलिए भी नहीं है कि लोगों को बाइबल की पृष्ठभूमि को समझने में मदद मिल सके कि परमेश्वर ने व्यवस्था के युग के दौरान क्या किया था। यह इसलिए है ताकि परमेश्वर की इच्छा, उसके स्वभाव, और उसके छोटे से छोटे भाग को समझने में लोगों को मदद मिल सके, और परमेश्वर के और अधिक प्रमाणिक और अधिक सटीक समझ और ज्ञान को प्राप्त कर सकें। इस रीति से लोगों का हृदय थोड़ा थोड़ा करके परमेश्वर के लिए खुल जाता है, और वे परमेश्वर के करीब आ जाते हैं और वे बेहतर रीति से उसे, उसके स्वभाव, उसके सार को समझ सकते हैं, और स्वयं सच्चे परमेश्वर को अच्छे से जान सकते हैं।

परमेश्वर के स्वभाव और जो उसके पास है और जो वह है उसके ज्ञान का मनुष्यों के ऊपर एक सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। इस से उन्हें परमेश्वर पर और अधिक विश्वास करने में मदद मिल सकती है, और उसके प्रति सच्ची आज्ञाकारिता और भय प्राप्त करने में उनकी मदद कर सकता है। तब, वे आगे से अन्धे अनुयायी नहीं होंगे, या अँधेपन से उसकी आराधना नहीं करेंगे। परमेश्वर मूर्खों को या उन्हें नहीं चाहता है जो अँधेपन से भीड़ का अनुसरण करते हैं, परन्तु लोगों का एक समूह जिनके हृदय में परमेश्वर के स्वभाव की एक स्पष्ट समझ और ज्ञान है और जो परमेश्वर के गवाह के रूप में कार्य कर सकते हैं, ऐसे लोग जो परमेश्वर के प्रेमीपन के कारण, और जो उसके पास है और जो वह है उसके कारण, और उसके धर्मी स्वभाव के कारण परमेश्वर को कभी भी नहीं त्यागेंगे। परमेश्वर के अनुयायी होते हुए, यदि तुम्हारे हृदय में अभी भी स्पष्टता की कमी है, या परमेश्वर के सच्चे अस्तित्व, उसके स्वभाव, जो उसके पास है और जो वह है, और मानव जाति के उद्धार की उसकी योजना के बारे में अनिश्चितता या भ्रम है, तो तुम्हारे विश्वास ने परमेश्वर की प्रशंसा को प्राप्त नहीं किया है। परमेश्वर नहीं चाहता कि इस प्रकार के लोग उसका अनुसरण करें, और परमेश्वर यह भी पसंद नहीं करता है कि इस प्रकार के लोग उसके सामने आएँ। क्योंकि इस प्रकार का व्यक्ति परमेश्वर को नहीं समझता है, वे अपना हृदय परमेश्वर को नहीं दे सकते हैं—उनका हृदय उसके लिए बंद है, इस प्रकार परमेश्वर के प्रति उनका विश्वास अशुद्धता से भरा हुआ है। उनके द्वारा परमेश्वर का अनुसरण किए जाने को केवल अंधापन ही कहा जा सकता है। लोग केवल तभी सच्चा विश्वास प्राप्त कर सकते हैं और सच्चे अनुयायी बन सकते हैं यदि उनके पास परमेश्वर की सच्ची समझ और ज्ञान हो, जो उसकी सच्ची आज्ञाकारिता और उसके भय को उत्पन्न करता है। केवल इसी रीति से वे अपना हृदय परमेश्वर को दे सकते हैं, और उसके लिए अपना हृदय खोल सकते हैं। यही है जो परमेश्वर चाहता है, क्योंकि वे जो कुछ करते हैं और सोचते हैं उससे वे परमेश्वर की परीक्षा में खड़े रह सकते हैं, और परमेश्वर के लिए गवाही दे सकते है। परमेश्वर के स्वभाव, या जो उसके पास है और जो वह है, या जो कुछ वह करता है हर चीज़ में उसकी इच्छा और उसके विचारों के सम्बंध में सब कुछ जो मैंने तुमसे कहा है, और मैंने चाहे किसी भी नज़रिए से, या चाहे किसी भी कोण से इस के बारे में बात की है, यह सब कुछ तुम्हारी मदद के लिए है ताकि तुम परमेश्वर के सच्चे अस्तित्व को लेकर और अधिक निश्चित हो जाओ, और मानवजाति के लिए उसके प्रेम को सचमुच में और अधिक समझो और सराहो, और मनुष्यों के लिए परमेश्वर की चिंता और मानवजाति को बचाने और उसके प्रबंध के लिए उस की निष्कपट इच्छा को सचमुच में और अधिक समझो और उसकी तारीफ करो।

आज हम सब से पहले परमेश्वर के विचारों, युक्तियों, और मनुष्यों की सृष्टि के समय से लेकर अब तक के प्रत्येक कार्य को संक्षिप्त करने जा रहे हैं, और उसने संसार की रचना से लेकर अनुग्रह के युग के आधिकारिक प्रारम्भ तक क्या कार्य किया था उस पर एक नज़र डालने जा रहे हैं। तब हम परमेश्वर के उन विचारों और युक्तियों की खोज करेंगे जो मनुष्यों के लिए अन्जान हैं, और वहाँ से हम प्रबन्धन के लिए परमेश्वर की योजना के क्रम को स्पष्ट कर सकते हैं, और उस सन्दर्भ को विस्तारपूर्वक समझ सकते हैं जिसके तहत परमेश्वर ने अपने प्रबन्धन के कार्य, उसके स्रोत और विकास की प्रक्रिया को बनाया था, और विस्तारपूर्वक समझ सकते हैं कि वह अपने प्रबन्धन कार्य से किस प्रकार के परिणामों को चाहता है—अर्थात्, उसके प्रबन्धन के कार्य का केन्द्र एवं उद्देश्य। इन चीज़ों को समझने के लिए हमें सुदूर, खामोश और शांत समय में जाने की आवश्यकता है जब कोई मनुष्य नहीं था...

जब परमेश्वर अपने सेज से उठा, पहला विचार जो उसके मन में आया वह यह थाः एक जीवित, वास्तविक और जीवित मनुष्य को बनाए—ऐसा कोई जिसके साथ वह रहे और उसका निरन्तर साथी बने। वह व्यक्ति उसे सुन सके, और परमेश्वर उस पर भरोसा कर सके और उसके साथ बात कर सके। तब, पहली बार, परमेश्वर ने एक मुट्ठी धूल लिया और सबसे पहला जीवित व्यक्ति बनाने के लिए उसका प्रयोग किया जिसकी उस ने कल्पना की थी, और तब उस जीवित प्राणी को एक नाम दिया—आदम। एक बार जब परमेश्वर ने इस जीवित और साँस लेते हुए प्राणी को प्राप्त कर लिया था, तो उसने कैसा महसूस किया था? पहली बार, उसे किसी प्रेम करनेवाले, एक साथी को पाने का आनन्द प्राप्त हुआ। उसने पहली बार एक पिता होने के उत्तरदायित्व का भी एहसास किया और उस चिन्ता का भी जो उसके साथ आयी थी। यह साँस लेता हुआ प्राणी परमेश्वर के लिए प्रसन्नता और आनन्द लेकर आया; उस ने पहली बार सन्तुष्टि का अनुभव किया। यह वह पहली चीज़ थी जिसे परमेश्वर ने बनाया था जिसे परमेश्वर ने अपने विचारों या वचनों से नहीं बनाया था, किन्तु स्वयं अपने दोनों हाथों से बनाया था। जब इस प्रकार की हस्ती—एक जीवित और साँस लेता व्यक्ति—परमेश्वर के सामने खड़ा हो गया, माँस और लहू से बना हुआ, शरीर और आकार के साथ, और परमेश्वर से बातचीत करने में सक्षम था, उसने एक प्रकार का आनन्द महसूस किया जिसे उसने कभी भी महसूस नहीं किया था। उसने सचमुच में अपने उत्तरदायित्व का एहसास किया और यह जीवित प्राणी ना केवल उसके हृदय से जुड़ गया था, बल्कि उसकी हर एक छोटी सी हलचल ने उसे छू भी लिया और उसके हृदय को गर्मजोशी से भर दिया था। इस प्रकार जब यह जीवित प्राणी परमेश्वर के सामने खड़ा हुआ तब पहली बार उसने यह विचार किया कि इस तरह के और लोगों को प्राप्त किया जाए। यह घटनाओं का सिलसिला था जो उस पहले विचार के साथ प्रारम्भ हुआ जो परमेश्वर के पास था। परमेश्वर के लिए, यह सभी घटनाएँ पहली बार घटित हो रही थीं, परन्तु इन पहली घटनाओं में, इस से फर्क नहीं पड़ता कि उसने उस समय कैसा महसूस किया था—आनन्द, उत्तरदायित्व, चिन्ता—वहाँ उसके पास कोई नहीं था जिससे वह उन्हें बाँट सके। उस पल के प्रारम्भ से ही, परमेश्वर ने सचमुच में अकेलेपन और उदासी का एहसास किया जिसे उसने पहले कभी भी महसूस नहीं किया था। उसे लगा कि मानव जाति उसके प्रेम और चिन्ता, और मानव जाति के लिए उसकी इच्छा को स्वीकार या समझ नहीं सकती है, इसलिए उसने अपने हृदय में दुःख और दर्द का अनुभव किया। यद्यपि उसने इन चीज़ों को मनुष्य के लिए बनाया था, फिर भी मनुष्य इस के प्रति जागरूक नहीं था और उसे नहीं समझा। प्रसन्नता के अलावा, वह आनन्द और संतुष्टि जिसे मनुष्य उस के लिए लेकर आया था वह शीघ्रता से उसके लिए उदासी और अकेलेपन के प्रथम एहसास को भी साथ लेकर आया। ये उस समय परमेश्वर के विचार और एहसास थे। जब परमेश्वर यह सब कुछ कर रहा था, वह अपने हृदय में आनन्द से दुःख की ओर और दुःख से दर्द की ओर चला गया, सब कुछ तनाव में घुल मिल गया। वो बस यही सब चाहता था कि जितना जल्दी हो सके यह व्यक्ति, यह मानव जाति जो कुछ उसके हृदय में था उसे जान ले और उसकी इच्छाओं को शीघ्रता से समझ ले। तब, वे उसके अनुयायी बन सकते हैं और उसके साथ एक मेल में हो सकते हैं। वे आगे से परमेश्वर को बोलते हुए नहीं सुनेंगे लेकिन खामोश बने रहेंगे; वे आगे से अनजान नहीं होंगे कि कैसे परमेश्वर के साथ उसके कार्य में जुड़ें; सबसे बढ़कर, वे आगे से परमेश्वर की आवश्यकताओं को लेकर उदासीन लोग नहीं होंगे। यह पहली चीज़ें जिन्हें परमेश्वर ने पूर्ण किया बहुत ही अर्थपूर्ण हैं और उसकी प्रबंधन की योजना के लिए और आज मनुष्यों के लिए बड़ा मूल्य रखती हैं।

सभी चीज़ों और मनुष्यों की सृष्टि करने के बाद, परमेश्वर ने आराम नहीं किया। अपने प्रबन्धन को पूरा करने के लिए वह इन्तज़ार ना कर सका, और ना ही वह ऐसे लोगों को हासिल करने का इन्तज़ार कर सका जिन्हें उस ने मनुष्यों में से सब से ज़्यादा प्यार किया था।

आगे, परमेश्वर के द्वारा मनुष्यों को रचने के कुछ ही समय बाद, हम बाइबल में देखते हैं कि पूरे संसार में एक बड़ा जल प्रलय आया था। जल प्रलय के लेखे में नूह का जिक्र है, और ऐसा कहा जा सकता है कि नूह वह पहला व्यक्ति था जिसने परमेश्वर के एक कार्य को पूर्ण करने हेतु उसके साथ काम करने के लिए परमेश्वर की बुलाहट को ग्रहण किया था। हाँ वास्तव में, यह पहली बार ही था जब परमेश्वर ने पृथ्वी पर से एक इंसान को अपनी आज्ञानुसार कुछ करने के लिए बुलाया था। जब नूह ने जहाज़ बना लिया था, परमेश्वर ने पहली बार पृथ्वी पर जल प्रलय भेजा। जब परमेश्वर ने पृथ्वी को जल प्रलय से नष्ट कर दिया था, तो यह उसकी सृष्टि की रचना के समय से लेकर अब तक पहली बार हुआ था कि उसने अपने आप को मानव जाति के प्रति घृणा से भरा हुआ महसूस किया था; यह वही बात है जिस ने परमेश्वर को इस मानव जाति को जल प्रलय के द्वारा नष्ट करने हेतु दर्दनाक निर्णय लेने के लिए मजबूर किया था। जल प्रलय के द्वारा पृथ्वी को नष्ट करने के बाद, परमेश्वर ने मनुष्यों के साथ अपनी पहली वाचा बाँधी कि वह ऐसा फिर कभी भी नहीं करेगा। उस वाचा का चिन्ह एक इंद्रधनुष था। यह मानव जाति के साथ परमेश्वर की पहली वाचा थी, इस प्रकार वह इंद्रधनुष परमेश्वर के द्वारा दी गई वाचा का पहला चिन्ह था; यह इंद्रधनुष एक वास्तविक, और भौतिक चीज़ है जो अस्तित्व में बना रहता है। यह इस धनुष का ही अस्तित्व है जिसके कारण परमेश्वर पिछली मानव जाति के लिए, जिसे उसने खो दिया था, अक्सर उदास हो जाता है, और निरंतर उसे स्मरण दिलाने वाली चीज़ के रूप में काम करता है कि उनके साथ क्या हुआ था ... परमेश्वर अपने पैरों की गति को धीमा नहीं करेगा—वह अपने प्रबन्धन में अगला कदम उठाने का इन्तज़ार नहीं कर सकता है। तत्पश्चात्, परमेश्वर ने सम्पूर्ण इस्राएल में अपने कार्य को करने के लिए अपने प्रथम चुनाव के रूप में इब्राहीम को नियुक्त किया था। यह पहली बार था जब परमेश्वर ने ऐसे एक उम्मीदवार को चुना था। परमेश्वर ने निर्णय लिया कि इस व्यक्ति के द्वारा मानव जाति को बचाने के लिए अपने कार्य को किया जाए, और लगातार उसकी पीढ़ियों के साथ अपने कार्य को करता जाए। हम बाइबल में देख सकते हैं कि यह वही है जो परमेश्वर ने इब्राहीम के साथ किया था। तब सर्वप्रथम परमेश्वर ने इस्राएल को अपनी चुनी हुई भूमि बनाया, और अपने चुने हुए लोगों, इस्राएलियों के द्वारा व्यवस्था के युग के अपने कार्य को प्रारम्भ किया। एक बार फिर, परमेश्वर ने इस्रालियों को पहली बार स्पष्ट नियम और व्यवस्थाएँ प्रदान की थीं जिन का अनुसरण मानव जाति को करना था, और उन्हें विस्तार से समझाया था। यह पहली बार था जब परमेश्वर ने मनुष्यों को ऐसे विशिष्ट, ऊँचे स्तर के नियम प्रदान किए थे कि उन्हें किस प्रकार बलिदान करना चाहिए, उन्हें किस प्रकार जीना है, उन्हें क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए, उन्हें किन त्योहारों और दिनों को मानना है, और वह हर चीज़ जो वे करते हैं उस में किन सिद्धांतों का अनुसरण करना है। यह पहली बार था जब परमेश्वर ने मानव जाति को उन के जीवन के लिए ऐसे विस्तृत, ऊँचे स्तर के विधि विधान और सिद्धांत दिए थे।

जब मैं कहता हूँ "पहली बार," तो इसका मतलब है कि परमेश्वर ने इस तरह का कार्य पहले कभी पूर्ण नहीं किया था। यह कुछ ऐसा है जो पहले अस्तित्व में नहीं था, और यद्यपि परमेश्वर ने मानव जाति को सृजा था और उसने सब प्रकार के जीवों और जीवित प्राणियों को सृजा था, फिर भी उसने उस प्रकार का कार्य कभी पूर्ण नहीं किया था। इन सभी कार्यों में परमेश्वर के द्वारा मनुष्यों का प्रबन्ध शामिल था; इन सभों का मनुष्यों, परमेश्वर के उद्धार, और मनुष्यों के प्रबन्धन के साथ व्यवहार करना था। इब्राहीम के बाद, परमेश्वर ने एक बार फिर एक चुनाव किया—उस ने अय्यूब को चुना जो व्यवस्था के अधीन था जो निरन्तर परमेश्वर का भय मानते हुए और बुराई से दूर रहते हुए और खड़े होकर उस की गवाही देते हुए शैतान की परीक्षाओं का सामना कर सकता था। यह पहली बार ही था जब परमेश्वर ने शैतान को एक इंसान की परीक्षा लेने के लिए अनुमति दी थी, और पहली बार उस ने शैतान के साथ शर्त लगाई थी। अंत में, पहली बार, परमेश्वर ने किसी ऐसे को प्राप्त किया जो शैतान का सामना करते हुए खड़े रहकर गवाही देने में सक्षम था—एक व्यक्ति जो उसके लिए गवाही दे सके और पूर्णत: शैतान को शर्मिन्दा कर सके। जब से परमेश्वर ने मानव जाति को बनाया था, यह वह पहला व्यक्ति था जिसे उस ने हासिल किया था जो उसके लिए गवाही देने में सक्षम था। एक बार जब उसने उस व्यक्ति को प्राप्त कर लिया, तो परमेश्वर अपने प्रबन्धन को आगे बढ़ाने और अपने अगले चुनाव और अपने कार्य स्थल की तैयारी करते हुए, अपने कार्य के अगले चरण को करने के लिए और भी अधिक उत्सुक हो गया था।

इन सबके बारे में संगति के बाद, क्या तुम लोगों के पास परमेश्वर की इच्छा की सही समझ है? परमेश्वर मानव जाति के प्रबन्धन, और मनुष्यों के उद्धार की इस घटना को देखता है, जैसे कि यह किसी भी दूसरी चीज़ से कहीं ज़्यादा महत्पूर्ण है। वह इन चीज़ों को केवल अपने मस्तिष्क से नहीं करता है, और ना ही उसे अपने शब्दों से करता है, और विशेष रूप से इन चीज़ों को अकस्मात् ही नहीं करता है—वह यह सब कुछ एक योजना के साथ, एक उद्देश्य के साथ, एक ऊँचे स्तर के साथ, और अपनी इच्छा के साथ करता है। यह साफ है कि मानव जाति को बचाने का यह कार्य परमेश्वर और मनुष्य दोनों के लिए बड़ा महत्व रखता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह कार्य कितना ही कठिन है, इस से कोई फर्क नहीं पड़ता कि बाधाएँ कितनी ही बड़ी हैं, इस से कोई फर्क नहीं पड़ता कि मनुष्य कितने ही कमज़ोर हैं, या मानव जाति का विद्रोही स्वभाव कितना ही गहरा है, इसमें से कुछ भी परमेश्वर के लिए कठिन नहीं हैं। जिस कार्य को वह स्वयं करना चाहता है उसके लिए परीश्रमी प्रयास और प्रबन्ध करते हुए परमेश्वर अपने आप को व्यस्त रखता है। वह सभी चीज़ों को व्यवस्थित भी कर रहा है, और सभी लोगों और वह कार्य जिसे वह पूर्ण करना चाहता है उस पर अपना नियन्त्रण कर रहा है—इसमें से कुछ भी पहले नहीं किया गया था। यह पहली बार था जब परमेश्वर ने इन पद्धतियों को प्रयोग किया था और मानव जाति को बचाने और उस का प्रबन्ध करने की मुख्य परियोजना में एक बड़ी कीमत अदा की थी। जब परमेश्वर इन कार्यों को कर रहा था, वह थोड़ा थोड़ा करके बिना रूके मनुष्यों के सामने अपने कठिन कार्य, जो उसके पास है और जो वह है, उसकी बुद्धि और सर्वसामर्थता, और अपने स्वभाव के हर एक पहलू को प्रदर्शित कर रहा था। उसने अंश अंश करके इन सब को मानव जाति के सामने खुलकर प्रकाशित किया, और उसने इन चीज़ों को ऐसा प्रकाशित और प्रकट किया जैसा कि उसने पहले कभी भी नहीं किया था। अतः, पूरे विश्व में, लोगों के अलावा जिन्हें परमेश्वर बचाने और उन का प्रबन्ध करने का उद्देश्य रखता है, कोई भी ऐसा जीवधारी नहीं था जो परमेश्वर के इतने करीब था, जिस का उस के साथ इतना गहरा रिश्ता हो। अपने हृदय में, वह मानव जाति जिस का वह प्रबन्ध और उद्धार करना चाहता है, सब से महत्वपूर्ण है, और वह सब से बढ़कर इस मानव जाति को मूल्य देता है; और भले ही उसने उनके लिए एक बड़ी कीमत चुकाई है, और भले ही उनके द्वारा उसे लगातार चोट पहुंचाई जाती है और उस की अनाज्ञाकारिता की जाती है, फिर भी वह उन्हें कभी भी नहीं छोड़ता है और लगातार बिना थके बिना कोई शिकवा या शिकायत के अपने कार्य में लगा रहता है। यह इसलिए है क्योंकि वह जानता है कि बहुत जल्द या देर से ही मनुष्य एक ना एक दिन उस की बुलाहट के प्रति जागरूक हो जाएँगे और उस के वचनों से अभिभूत हो जाएँगे, और यह पहचानेंगे कि वह सृष्टि का प्रभु है, और उस के पक्ष में वापस आ जायेंगे ...।

आज यह सब कुछ सुनने के बाद, तुम लोगों को लगेगा कि हर चीज़ जो परमेश्वर करता है वह बिल्कुल सामान्य है। ऐसा प्रतीत होता है कि मनुष्यों ने हमेशा से उनके लिए परमेश्वर के वचनों से, और उसके कार्यों से उसकी इच्छा का कुछ कुछ एहसास किया है, लेकिन उनके एहसासों या उनके ज्ञान और जो परमेश्वर सोच रहा है उन दोनों के बीच हमेशा से एक निश्चित दूरी रही है। इस प्रकार, मैं सोचता हूँ कि सब लोगों के साथ यह वार्तालाप करना जरूरी है कि परमेश्वर ने क्यों मानव जाति को बनाया था, और लोगों को हासिल करने हेतु उस की इच्छा के पीछे की पृष्ठभूमि क्या थी जिन की उसने आशा की थी। इसे हर किसी के साथ बाँटना जरूरी है, ताकि हर एक को अपने हृदय में स्पष्ट हो जाए। क्योंकि परमेश्वर का हर एक विचार और युक्ति, और उसके कार्य का हर एक पहलू और हर एक समयकाल उसके सम्पूर्ण प्रबन्धन कार्य से बँधा, और करीब से जुड़ा हुआ है। जब तुम परमेश्वर के सोच, विचारों और उसके कार्य के हर कदम में उसकी इच्छा को समझते हो, उसकी प्रबन्धन योजना के कार्य के स्रोत को समझते हो। इसी बुनियाद पर परमेश्वर के विषय में तुम्हारी समझ गहरी होती जाती है। यद्यपि वह सब कुछ जो परमेश्वर ने किया जब उसने पहली बार संसार को बनाया था जिस का जिक्र मैंने पहले किया था वह लोगों के लिए अब मात्र कुछ जानकारी है और सच्चाई का अनुसरण करने में असम्बद्ध दिखाई देता है, फिर भी तुम्हारे अनुभव के पथक्रम में एक ऐसा दिन आएगा जब तुम नहीं सोचोगे कि यह जानकारी के कुछ टुकड़ों के समान इतना साधारण है और ना ही यह कुछ रहस्यों के समान इतना सरल है। जिस प्रकार तुम्हारा जीवन प्रगति करता है और जब परमेश्वर को तुम्हारे हृदय में थोड़ी सी जगह मिल जाती है, या जब तुम पूर्णत: या गहराई से उस की इच्छा को समझ जाते हो, तब तुम जिसके विषय में मैं आज कह रहा हूँ उसके महत्व और आवश्यकता को सचमुच में समझ पाओगे। इस से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि तुम लोगों ने किस हद तक इसे स्वीकार किया है; यह जरूरी है कि तुम लोग इन चीज़ों को समझो और जानो। जब परमेश्वर कुछ करता है, जब वह अपने कार्य को अन्जाम देता है, इस से कोई फर्क नहीं पड़ता कि यह उसका विचार है या स्वयं उसके हाथ, इस से कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसने इसे पहली बार किया है या अन्तिम बार—अंततः, परमेश्वर के पास एक योजना है, और जो कुछ वह करता है उस में उसके उद्देश्य और उसके विचार हैं। ये उद्देश्य और विचार परमेश्वर के स्वभाव को दर्शाते हैं, और वह जो उसके पास है तथा जो वह है उसे प्रकट करते हैं। ये दोनों चीज़ें—परमेश्वर का स्वभाव और जो उसके पास है तथा जो वह है इसे प्रत्येक इंसान के द्वारा अवश्य ही समझा जाना चाहिए। एक बार जब एक इंसान उसके स्वभाव और जो उसके पास है तथा जो वह है उसे समझ जाता है, तब वे धीरे धीरे समझते हैं कि परमेश्वर जो करता है वह क्यों करता है और जो वह कहता है क्यों कहता है। उससे, तब उनके पास परमेश्वर का अनुसरण करने के लिए, सच्चाई का पीछा करने के लिए, और स्वभाव में एक परिवर्तन को जारी रखने के लिए और अधिक विश्वास होगा। तो ऐसा कहना चाहिए, कि परमेश्वर के विषय में मनुष्य की समझ और परमेश्वर में उसके विश्वास को अलग अलग नहीं किया जा सकता है।

भले ही लोग जो सुनते हैं या समझ प्राप्त करते हैं वह परमेश्वर के स्वभाव, वह जो उसके पास है तथा जो वह है उसके बारे में है जो वे प्राप्त करते हैं वो वह जीवन है जो परमेश्वर से आता है। एक बार जब यह जीवन तुम्हारे भीतर डाल दिया जाता है, तो परमेश्वर के प्रति तुम्हारा भय बड़ा और बड़ा होता जाएगा, और इस फसल को काटना बहुत ही स्वाभाविक होता है। यदि तुम परमेश्वर के स्वभाव और उसके सार के बारे में समझना और जानना नहीं चाहते हो, और यदि तुम इन चीज़ों के ऊपर मनन करना और ध्यान केन्द्रित करना भी नहीं चाहते हो, तो मैं निश्चित रूप से तुम्हें बता सकता हूँ कि जिस तरह से तुम वर्तमान में परमेश्वर के प्रति अपने विश्वास का अनुसरण कर रहे हो यह तुम्हें उसकी इच्छा को संतुष्ट करने और उसकी तारीफ़ को प्राप्त करने की अनुमति कभी नहीं दे सकता है। उससे अधिक, तुम कभी भी सचमुच में उद्धार तक नहीं पहुँचोगे—ये अन्तिम परिणाम हैं। जब लोग परमेश्वर को नहीं समझते हैं और उसके स्वभाव को नहीं जानते हैं, तो उनका हृदय कभी भी परमेश्वर के लिए नहीं खुलेगा। एक बार जब वे परमेश्वर को समझ जाते हैं, वे रूचि और विश्वास के साथ जो कुछ परमेश्वर के हृदय में है उस को समझना और उसका स्वाद लेना प्रारम्भ कर देंगे। जब तुम जो परमेश्वर के दिल में है उसे समझने और उसका स्वाद लेने लग जाते हो, तुम्हारा हृदय धीर-धीरे, थोड़ा-थोड़ा करके उसके लिए खुलता जाता है। जब तुम्हारा हृदय उसके लिए खुल जाता है, तब तुम्हें महसूस होगा कि परमेश्वर के प्रति तुम्हारा बर्ताव, परमेश्वर से तुम्हारी माँगें, और तुम्हारी बेकार की अभिलाषाएँ कितनी शर्मनाक और घृणित थी। जब तुम्हारा हृदय सचमुच में परमेश्वर के लिए खुल जाता है, तब तुम देखोगे कि उसका हृदय एक असीमित संसार के जैसा है, और तुम एक ऐसे क्षेत्र में प्रवेश करोगे जिसे तुमने पहले कभी भी अनुभव नहीं किया होगा। इस क्षेत्र में कोई धोखेबाज़ी नहीं है, कोई धूर्तता नहीं है, कोई अंधकार नहीं है, और कोई बुराई भी नहीं है। वहाँ केवल ईमानदारी और विश्वास्यता है; केवल ज्योति और सदाचार है; केवल धार्मिकता और कृपालुता है। यह प्रेम और देखरेख से भरा हुआ है, तरस और सहिष्णुता से भरा हुआ है, और उसके द्वारा तुम जिन्दा रहने की प्रसन्नता और आनन्द को महसूस करोगे। ये वो चीज़ें हैं जिन्हें वह तुम्हारे लिए प्रकाशित करेगा जब तुम अपने हृदय को उसके लिए खोलोगे। यह असीमित संसार परमेश्वर की बुद्धि, और उसकी सर्वसामर्थता से भरा हुआ है; वह उसके प्रेम और अधिकार से भी भरा हुआ है। यहाँ तुम परमेश्वर के स्वरूप, वह जो उसके पास है तथा जो वह है, और वह किस बात से आनन्दित होता है, वह चिन्ता क्यों करता है और वह उदास क्यों हो जाता है, और वह क्यों क्रोधित हो जाता है उसके हर एक पहलू को देख सकते हो।... यह वही है जिसे प्रत्येक इंसान देख सकता है जो अपने हृदय को खोलता है और परमेश्वर को भीतर आने की अनुमति देता है। परमेश्वर तभी तुम्हारे हृदय के भीतर आ सकता है जब तुम उसके लिए उसे खोल देते हो। यदि वह तुम्हारे हृदय के भीतर आ गया है केवल तभी तुम परमेश्वर के स्वरूप को देख सकते है, केवल तभी तुम अपने लिए उसकी इच्छा को देख सकते हो। उस समय, तुम्हें यह पता चलेगा कि परमेश्वर के बारे में हर चीज़ कितनी बहुमूल्य है, अर्थात् जो उसका स्वरूप है वह सँभाल कर रखने के कितना योग्य है। उसकी तुलना में, वे लोग जो तुम्हें घेरे रहते हैं, तुम्हारे जीवन की घटनाएँ और व्यक्ति, और यहाँ तक कि तुम्हारे प्रियजन, तुम्हारा जीवनसाथी, और ऐसी चीज़ें जिन से तुम प्रेम करते हो, वे मुश्किल से जिक्र करने के योग्य भी नहीं हैं। वे इतने छोटे हैं, और इतने निम्न हैं; तुम महसूस करोगे कि कोई भौतिक पदार्थ फिर से तुम्हें उसमें खींचने में कभी भी सक्षम नहीं होगा, और तुम्हें फिर से उनके लिए कोई कीमत चुकानी नहीं पड़ेगी। परमेश्वर की दीनता में तुम उसकी महानता, और उसकी सर्वोच्चता को देखोगे; इसके अतिरिक्त, यदि उसने कुछ किया था जिसके विषय में तुम यह विश्वास करते थे कि वह काफी छोटा था, तो तुम उसकी असीमित बुद्धि और उसकी सहिष्णुता को देखोगे, और उसके धीरज, उसकी सहनशीलता, और तुम्हारे प्रति उसकी समझ को देखोगे। यह तुममें उसके लिए एक प्रेम उत्पन्न करेगा। उस दिन, तुम्हें लगेगा कि मानवजाति कितने दूषित संसार में रह रही है, यह कि वे लोग जो तुम्हारे आस-पास रह रहें हैं और वे चीज़ें जो तुम्हारे जीवन में घटित हो रही हैं, और यहाँ तक कि जिनसे तुम प्रेम करते हो, तुम्हारे लिए उनका प्रेम, और उनकी तथाकथित सुरक्षा या तुम्हारे लिए उनकी चिन्ता इस योग्य नहीं हैं कि उनका जिक्र भी किया जाए—केवल परमेश्वर ही तुम्हारा प्रिय है, और तुम केवल उसी को सब से ज़्यादा सहेज कर रख सकते हो। जब वह दिन आता है, तो मैं विश्वास करता हूँ कि वहाँ कुछ लोग होंगे जो कहेंगेः परमेश्वर का प्रेम कितना महान है, और उसका सार कितना पवित्र है—परमेश्वर में कोई धूर्तता नहीं है, कोई बुराई नहीं है, कोई कपट नहीं है, और कोई कलह नहीं है, परन्तु केवल धार्मिकता और प्रमाणिकता है, और मनुष्यों को सब कुछ जो परमेश्वर के पास है, और सब कुछ जो वह है उस की लालसा करनी चाहिए। मनुष्यों को उसके लिए प्रयास करना चाहिए और उसकी आकांक्षा करना चाहिए। इसे किस मानवीय योग्यता के आधार पर निर्मित किया जाता है? यह मनुष्यों के द्वारा परमेश्वर के स्वभाव की समझ, और उनके द्वारा परमेश्वर के सार की समझ के आधार पर निर्मित होता है। इस प्रकार परमेश्वर के स्वभाव और जो उसके पास है तथा जो वह है उसे समझना, प्रत्येक इंसान के लिए जीवन पर्यन्त शिक्षा है, और यह एक जीवन पर्यन्त उद्देश्य है जिस का अनुसरण प्रत्येक इंसान के द्वारा किया जाना है जो अपने स्वभाव को बदलना चाहते हैं, और परमेश्वर को जानने के लिए संघर्ष करते हैं।

वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VII
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IX
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VIII

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