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अंतिम दिनों के मसीह के कथन - संकलन

परमेश्वर के स्वभाव एवं स्वयं परमेश्वर को समझने के लिए तुम्हें बहुत थोड़े से ही आरम्भ करना होगा। लेकिन किसके थोड़े से तुम क्या आरम्भ करोगे? सबसे पहले, मैंने बाइबल के कुछ अध्यायों को पढ़कर जानकारी एकत्र की है। नीचे दी गई जानकारी में बाइबल के वचन सम्मिलित हैं, उनमें से सब परमेश्वर के कार्य, परमेश्वर के स्वभाव एवं स्वयं परमेश्वर के विषय से सम्बन्धित हैं। मैंने विशेष रूप से इन अंशों को सन्दर्भ की सामग्रियों के रूप में खोजा है ताकि परमेश्वर के कार्य, परमेश्वर के स्वभाव, एवं स्वयं परमेश्वर को समझने में तुम लोगों की सहायता करूं। यहाँ मैं यह देखने के लिए उन्हें तुम लोगों के साथ बाटूंगा कि परमेश्वर ने अपने अतीत के कार्य के जरिए किस प्रकार के स्वभाव एवं सार को प्रकट किया है किन्तु लोग उसके बारे में नहीं जानते हैं। हो सकता है कि ये अध्याय पुराने हों, लेकिन वह विषय जिसके बारे में हम बातचीत कर रहें है वह कुछ नया है जो लोगों के पास नहीं है और जिसके बारे में उन्होंने कभी नहीं सुना है। हो सकता है कि तुम लोगों में से कुछ को यह अकल्पनीय लगे—क्या यह आदम और हव्वा की चर्चा करना और नूह के पास वापस जाकर उन्हीं चरणों को फिर से दोहराना नहीं है? इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता है कि तुम लोग क्या सोचते हो, ये अध्याय इस विषय पर बातचीत करने के लिए अत्यंत लाभकारी है और आज की संगति के लिए ये शिक्षा देने के पाठों या प्रत्यक्ष सामग्रियों के रूप में कार्य कर सकते हैं। जिस समय तक मैं इस संगति को समाप्त करूंगा तुम लोग इन भागों को चुनने के पीछे के मेरे उद्देश्य को समझ जाओगे। ऐसे लोग जिन्होंने पहले से बाइबल पढ़ी है शायद उन्होंने इन कुछ वचनों को देखा हो, लेकिन शायद उन्होंने इन्हें सचमुच में समझा नहीं है। आइए हम एक सरसरी निगाह डालें इससे पहले कि एक एक करके अधिक विस्तार से उनसे होकर जाएँ।

आदम और हव्वा मानवजाति के पूर्वज हैं। यदि हमें बाइबल से पात्रों का उल्लेख करना पड़े, तब हमें उन दोनों से शुरू करना होगा। इसके आगे है नूह, मानवजाति का दूसरा पूर्वज। क्या तुम लोग उसे देखते हो? तीसरा पात्र कौन है? (इब्राहीम।) क्या तुम सब लोग इब्राहीम की कहानी के बारे में जानते हो? हो सकता है कि तुम लोगों में से कुछ जानते हों, लेकिन दूसरों के लिए शायद यह ज़्यादा स्पष्ट न हो। चौथा पात्र कौन है? सदोम के विनाश की कहानी में किसका उल्लेख किया गया है? (लूत।) लेकिन यहाँ लूत का सन्दर्भ नहीं दिया गया है। यह किसकी ओर संकेत करता है? (इब्राहीम।) जो कुछ यहोवा परमेश्वर ने कहा था वह इब्राहीम की कहानी में उल्लिखित मुख्य बात है। क्या तुम लोग सब इसे देखते हो? पांचवां पात्र कौन है? (अय्यूब।) क्या परमेश्वर ने अपने कार्य के इस चरण के दौरान अय्यूब की कहानी के बारे बहुत कुछ उल्लेख नहीं किया है? तो क्या तुम लोग इस कहानी के बारे में बहुत अधिक ध्यान देते हो? यदि तुम लोग वास्तव में बहुत अधिक ध्यान देते हो, तो क्या तुम लोगों ने सावधानी से बाइबल में अय्यूब की कहानी को पढ़ा है? क्या तुम लोगों को पता है कि अय्यूब ने कौन सी बातें कहीं, उसने कौन सी चीज़ें कीं? वे लोग जिन्होंने इसे सबसे अधिक पढ़ा है, तुम लोगों ने इसे कितनी बार पढ़ा है? क्या तुम लोग इसे अकसर पढ़ते हो? हौंग कौंग की बहनों, कृपया हमें बताओ। (इससे पहले जब हम अनुग्रह के युग में थे तब मैंने इसे कई बार पढ़ा था।) तुम लोगों ने तब से इसे दोबारा नहीं पढ़ा है? यदि ऐसा है, तो यह बड़ी शर्म की बात है। मुझे तुम लोगों को बताने दो: परमेश्वर के कार्य के इस चरण के दौरान उसने कई बार अय्यूब का उल्लेख किया, जो उसके इरादों का एक प्रतिबिम्ब है। यह कि उसने कई बार अय्यूब का उल्लेख किया लेकिन तुम लोगों के ध्यान को जागृत नहीं किया यह इस तथ्य का एक प्रमाण है: तुम लोगों की ऐसे लोग बनने में कोई रूचि नहीं है जो अच्छे हैं और ऐसे जो परमेश्वर का भय मानते और बुराई से दूर रहते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि तुम लोग बस इस बात से संतुष्ट हो कि तुम्हारे पास परमेश्वर के द्वारा उद्धरण दिए गए अय्यूब की कहानी के विषय में एक अनुमानित विचार हैं। तुम लोग स्वयं कहानी को मात्र समझने से ही संतुष्ट हो, लेकिन तुम लोग उन विवरणों की परवाह नहीं करते हो या समझने की कोशिश नहीं करते हो कि अय्यूब कौन है और परमेश्वर किस लिए विविध अवसरों पर अय्यूब की ओर संकेत करता है उसके पीछे के उद्देश्य को समझने की कोशिश नहीं करते हो। यदि तुम लोगों को एक ऐसे व्यक्ति में रूचि भी नहीं है जिसकी परमेश्वर ने प्रशंसा की है, तो तुम लोग वास्तव में किस बात पर ध्यान दे रहे हो? यदि तुम लोग परवाह नहीं करते हो और एक ऐसे महत्वपूर्ण व्यक्ति को समझने की कोशिश नहीं करते हो जिसका परमेश्वर ने उल्लेख किया है, तो परमेश्वर के वचन के प्रति तुम लोगों की मनोवृत्ति के विषय में वह क्या कहता है? क्या यह एक दुखद बात नहीं है? क्या इससे यह साबित नहीं होता है कि तुम लोगों में से अधिकतर लोग व्यावहारिक चीज़ों में शामिल नहीं हैं और तुम सभी सत्य की निरन्तर खोज में नहीं हो? यदि तुम सत्य को खोजते हो, तो तुम उन लोगों पर जिन्हें परमेश्वर स्वीकार करता है और उन पात्रों की कहानियों पर आवश्यक ध्यान दोगे जिनके बारे में परमेश्वर बोलता है। इसकी परवाह किए बगैर कि तुम इसकी सराहना कर सकते हो या इसे महसूस कर सकते हो, तुम जल्दी से जाओगे और इसे पढ़ोगे, इसे समझने की कोशिश करोगे, इसके उदाहरण का अनुसरण करने के तरीकों को ढूँढोगे, और वह करोगे जिसे तुम अपनी बेहतरीन योग्यता के साथ कर सकते हो। यह किसी व्यक्ति का व्यवहार है जो सत्य की लालसा करता है। लेकिन सच्चाई यह है कि तुम लोगों में से अधिकांश लोग जो यहाँ बैठे हैं उन्होंने अय्यूब की कहानी को कभी नहीं पढ़ा है। यह सचमुच में कुछ बताता है।

आओ हम उस विषय पर वापस जाएँ जिस पर मैं अभी अभी बात कर रहा था। पवित्र शास्त्रों का यह भाग जो पुराना नियम व्यवस्था के युग से व्यवहार करता है वह मुख्य रूप से पात्रों की कहानियाँ हैं जिन्हें मैंने अंशों के रूप में लिया था। ये वे कहानियाँ हैं जिनसे बहुत सारे लोग परिचित हैं जिन्होंने बाइबल को पढ़ा है। ये पात्र बहुत ही प्रतिनिधिक हैं। ऐसे लोग जिन्होंने उनकी कहानियाँ पढ़ीं हैं वे यह महसूस करने के योग्य होंगे कि वह कार्य जिसे परमेश्वर ने उन पर किया है और वे वचन जिन्हें परमेश्वर ने उनसे कहा है वे आज के लोगों के लिए स्पर्शगम्य एवं सुगम हैं। जब तुम बाइबल से इन कहानियों और लेखों को पढ़ते हो, तो तुम यह बेहतर ढंग से समझने के योग्य होगे कि किस प्रकार परमेश्वर ने अपना कार्य किया और उस समय लोगों के साथ कैसा व्यवहार किया। लेकिन आज इन अध्यायों को खोजने का मेरा उद्देश्य यह नहीं है कि तुम इन कहानियों और उनके पात्रों को समझने की कोशिश कर सको। इसके बजाए यह इसलिए है ताकि तुम इन पात्रों की कहानियों के द्वारा परमेश्वर के कार्यों और उसके स्वभाव को देख सको, इस प्रकार परमेश्वर को जानना एवं समझना, उसके वास्तविक पहलू को देखना, अपनी कल्पनाओं को विराम देना, उसके विषय में अपनी अवधारणाओं को रोकना, और अस्पष्टता के मध्य तुम्हारे विश्वास को समाप्त करना आसान बन जाये। बिना किसी आधार के परमेश्वर के स्वभाव का अर्थ निकालना और स्वयं परमेश्वर को जानने की कोशिश करना अकसर तुम्हें असहाय, एवं दुर्बल महसूस करा सकता है, और तुम अनिश्चित होते हो कि कहाँ से शुरूआत करें। इसीलिए मैंने एक ऐसे तरीके एवं पहुँच का उपयोग करने के उपाय के विषय में सोचा था कि तुम्हें बेहतर ढंग से परमेश्वर को समझने, और अधिक प्रमाणिक रूप से परमेश्वर की इच्छा की सराहना करने और परमेश्वर के स्वभाव एवं स्वयं परमेश्वर को जानने की अनुमति दूँ, और सचमुच में तुम्हें परमेश्वर के अस्तित्व को महसूस करने और मानवजाति के प्रति उसकी इच्छा की सराहना करने की अनुमति दूँ। क्या यह तुम लोगों के लाभ के लिए नहीं है? अब तुम लोग अपने हृदयों के भीतर क्या महसूस करते हो जब तुम सब इन कहानियों और पवित्र वचनों को दोबारा देखते हो? क्या तुम लोग सोचते हो कि पवित्र शास्त्र के अंश जिन्हें मैंने चुना है वे ज़रूरत से ज़्यादा हैं? जो कुछ मैंने तुम लोगों को अभी अभी बताया था मुझे उस पर दोबारा ज़ोर देना चाहिए: इन पात्रों की कहानियों को तुम लोगों से पढ़वाने का लक्ष्य है कि यह समझने में तुम लोगों की सहायता की जाए कि कैसे परमेश्वर लोगों पर अपना कार्य करता है और मानवजाति के प्रति उसकी मनोवृत्ति कैसी है। तुम लोग इसे किस माध्यम से समझ सकते हो? उस कार्य के जरिए जिसे परमेश्वर ने अतीत में किया है और उसे उस कार्य के साथ मिलाया है जिसे परमेश्वर अपने विषय में विभिन्न चीज़ों को समझने में तुम लोगों की सहायता करने के लिए इस समय कर रहा है। ये विभिन्न चीज़ें वास्तविक हैं, और इन्हें उन लोगों के द्वारा जाना और सराहा जाना चाहिए जो परमेश्वर को जानने की इच्छा करते हैं।

अब हम आदम और हव्वा की कहानी से शुरू करेंगे। पहले, आओ हम पवित्र शास्त्र के अंशों को पढ़ें।

क. आदम और हव्वा

1. आदम के लिए परमेश्वर की आज्ञा

(उत्पत्ति 2:15-17) तब यहोवा परमेश्वर ने आदम को लेकर अदन की वाटिका में रख दिया, कि वह उस में काम करे और उसकी रक्षा करे। और यहोवा परमेश्वर ने आदम को यह आज्ञा दी, "तू वाटिका के सब वृक्षों का फल बिना खटके खा सकता है: पर भले या बुरे के ज्ञान का जो वृक्ष है, उसका फल तू कभी न खाना: क्योंकि जिस दिन तू उसका फल खाएगा उसी दिन अवश्य मर जाएगा।"

क्या तुम लोगों को इन वचनों से कुछ मिला था? पवित्र शास्त्र का यह भाग तुम लोगों को कैसा महसूस कराता है? पवित्र शास्त्र से "आदम के लिए परमेश्वर की आज्ञा" के उद्धरण को क्यों लिया गया था? क्या अब तुम लोगों में से प्रत्येक के पास अपने-अपने मन में परमेश्वर और आदम की एक तस्वीर है? तुम लोग कल्पना करने की कोशिश कर सकते हो: यदि तुम लोग उस दृश्य में एक पात्र होते, तो तुम लोगों के हृदय में परमेश्वर किस के समान होगा? यह तस्वीर तुम लोगों को कौन सी भावनाओं का एहसास कराती है? यह एक द्रवित करनेवाली और दिल को छू लेनेवाली तस्वीर है। यद्यपि इसमें केवल परमेश्वर एवं मनुष्य ही है, फिर भी उनके बीच की घनिष्ठता ईर्ष्या के कितने योग्य है: परमेश्वर के प्रचुर प्रेम को मनुष्य को मुफ्त में प्रदान किया गया है, यह मनुष्य को घेरे रहता है; मनुष्य भोला भाला एवं निर्दोष, भारमुक्त एवं लापरवाह है, वह आनन्दपूर्वक परमेश्वर की दृष्टि के अधीन जीवन बिताता है; परमेश्वर मनुष्य के लिए चिंता करता है, जबकि मनुष्य परमेश्वर की सुरक्षा एवं आशीष के अधीन जीवन बिताता है; हर एक चीज़ जिसे मनुष्य करता एवं कहता है वह परमेश्वर से घनिष्ठता से जुड़ा हुआ होता है और उससे अविभाज्य है।

तुम लोग कह सकते हो कि यह पहली आज्ञा है जिसे परमेश्वर ने मनुष्य को दिया था जब उसने उसे बनाया था। यह आज्ञा क्या उठाए हुए है? यह परमेश्वर की इच्छा को उठाए हुए है, परन्तु साथ ही यह मानवजाति के लिए उसकी चिंताओं को भी उठाए हुए है। यह परमेश्वर की पहली आज्ञा है, और साथ ही यह पहली बार भी है जब परमेश्वर मनुष्य के विषय में चिंता करता है। कहने का तात्पर्य है, जब से परमेश्वर ने मनुष्य को बनाया उस घड़ी से उसके पास उसके प्रति एक ज़िम्मेदारी है। उसकी ज़िम्मेदारी क्या है? उसे मनुष्य की सुरक्षा करनी है, और मनुष्य की देखभाल करनी है। वह आशा करता है कि मनुष्य भरोसा कर सकता है और उसके वचनों का पालन कर सकता है। यह मनुष्य से परमेश्वर की पहली अपेक्षा भी है। इसी अपेक्षा के साथ परमेश्वर निम्नलिखित वचन कहता है: "तू वाटिका के सब वृक्षों का फल बिना खटके खा सकता है: पर भले या बुरे के ज्ञान का जो वृक्ष है, उसका फल तू कभी न खाना: क्योंकि जिस दिन तू उसका फल खाएगा उसी दिन अवश्य मर जाएगा।" ये साधारण वचन परमेश्वर की इच्छा को दर्शाते हैं। वे यह भी प्रकट करते हैं कि परमेश्वर के हृदय ने पहले से ही मनुष्य के लिए चिंता प्रकट करना शुरू कर दिया है। सब चीज़ों के मध्य, केवल आदम को ही परमेश्वर के स्वरुप में बनाया गया था; आदम ही एकमात्र जीवित प्राणी था जिसके पास परमेश्वर के जीवन की श्वास है; वह परमेश्वर के साथ चल सकता था, परमेश्वर के साथ बात कर सकता था। इसी लिए परमेश्वर ने उसे एक ऐसी आज्ञा दी थी। परमेश्वर ने इस आज्ञा में बिलकुल साफ कर दिया था कि वह क्या कर सकता है, साथ ही साथ वह क्या नहीं कर सकता है।

इन कुछ साधारण वचनों में, हम परमेश्वर के हृदय को देखते हैं। लेकिन हम किस प्रकार का हृदय देखते हैं? क्या परमेश्वर के हृदय में प्रेम है? क्या इसके पास कोई चिंता है? इन वचनों में परमेश्वर के प्रेम एवं चिंता को न केवल लोगों के द्वारा सराहा जा सकता है, लेकिन इसे भली भांति एवं सचमुच में महसूस भी किया जा सकता है। क्या यह ऐसा ही नहीं है? अब जब मैंने इन बातों को कह दिया है, क्या तुम लोग अब भी सोचते हो कि ये बस कुछ साधारण वचन हैं? इतने साधारण नहीं हैं, ठीक है? क्या तुम लोग इसे पहले से देख सकते थे? यदि परमेश्वर ने व्यक्तिगत रूप से तुम्हें इन थोड़े से साधारण वचनों को कहा होता, तो तुम भीतर से कैसा महसूस करते? यदि तुम एक दयालु व्यक्ति नहीं हो, यदि तुम्हारा हृदय बर्फ के समान ठण्डा पड़ गया है, तो तुम कुछ भी महसूस नहीं करोगे, तुम परमेश्वर के प्रेम की सराहना नहीं करोगे, और तुम परमेश्वर के हृदय को समझने की कोशिश नहीं करोगे। लेकिन यदि तुम ऐसे व्यक्ति हो जिसके पास विवेक है, एवं मानवता है, तो तुम कुछ अलग महसूस करोगे। तुम सुखद महसूस करोगे, तुम महसूस करोगे कि तुम्हारी परवाह की जाती है और तुम्हें प्रेम किया जाता है, और तुम खुशी महसूस करोगे। क्या यह सही नहीं है? जब तुम इन चीज़ों को महसूस करते हो, तो तुम परमेश्वर के प्रति किस प्रकार कार्य करोगे? क्या तुम परमेश्वर से जुड़ा हुआ महसूस करोगे? क्या तुम अपने हृदय की गहराई से परमेश्वर से प्रेम और सम्मान करोगे? क्या तुम्हारा हृदय परमेश्वर के और करीब जाएगा? तुम इससे देख सकते हो कि मनुष्य के लिए परमेश्वर का प्रेम कितना महत्वपूर्ण है। लेकिन जो और भी अधिक महत्वपूर्ण है वह परमेश्वर के प्रेम के विषय में मनुष्य की सराहना एवं समझ है। वास्तव में, क्या परमेश्वर ने अपने कार्य के इस चरण के दौरान ऐसी बहुत सी चीज़ों को नहीं कहा था? लेकिन क्या आज के लोग परमेश्वर के हृदय की सराहना करते हैं? क्या तुम लोग परमेश्वर की इच्छा का आभास कर सकते हो जिसके बारे में मैंने बस अभी-अभी कहा था? तुम लोग परमेश्वर की इच्छा को भी परख नहीं सकते हो जब यह इतना ठोस, स्पर्शगम्य, एवं यथार्थवादी है। इसीलिए मैं कहता हूँ कि तुम लोगों के पास परमेश्वर के विषय में वास्तविक ज्ञान एवं समझ नहीं है। क्या यह सत्य नहीं है? हम इस भाग में बस इतनी ही चर्चा करेंगे।

वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II
परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VII
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VIII
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IX
स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X

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