परमेश्वर के दैनिक वचन | "विजय के कार्यों का आंतरिक सत्य (4)" | अंश 203

पूर्ण बनाए जाने का क्या अर्थ है? जीत लिए जाने का क्या अर्थ है? जीत लिए जाने हेतु लोगों को किन मानदंडों पर खरा उतरना अनिवार्य है? और पूर्ण बनाए जाने के लिए उन्हें किन मानदंडों पर खरा उतरना अनिवार्य है? जीत लिया जाना और पूर्ण किया जाना दोनों मनुष्य को संपूर्ण बनाने के लिए हैं, ताकि उसे उसके वास्तविक रूप में लौटाया जा सके और उसे उसके भ्रष्ट शैतानी स्वभाव और शैतान के प्रभाव से मुक्त किया जा सके। यह जीत लिया जाना मनुष्य में कार्य किए जाने की प्रक्रिया में सबसे पहले आता है; निस्संदेह यह कार्य का पहला कदम है। पूर्ण किया जाना दूसरा कदम है, और वह समापन-कार्य है। प्रत्येक मनुष्य को जीत लिए जाने की प्रक्रिया से होकर गुजरना आवश्यक है। यदि वे ऐसा नहीं करते, तो उनके पास परमेश्वर को जानने का कोई तरीका नहीं होगा, न ही वे यह जानेंगे कि परमेश्वर है, अर्थात उनके लिए परमेश्वर को स्वीकार करना असंभव होगा। और यदि व्यक्ति परमेश्वर को स्वीकार नहीं करता, तो परमेश्वर द्वारा उसे संपूर्ण किया जाना भी असंभव होगा, क्योंकि वह इस संपूर्णता के मानदंड पर खरा नहीं उतरता। यदि तुम परमेश्वर को स्वीकार ही नहीं करते, तो तुम उसे जान कैसे सकते हो? तुम उसकी खोज कैसे कर सकते हो? तुम उसके लिए गवाही देने के भी अयोग्य होगे, उसे संतुष्ट करने के लिए विश्वास रखने की तो बात ही अलग है। अतः जो भी व्यक्ति संपूर्ण किया जाना चाहता है, उसके लिए पहला कदम जीत लिए जाने के कार्य से होकर गुज़रना है। यह पहली शर्त है। परंतु जीत लिया जाना और पूर्ण किया जाना, दोनों का उद्देश्य लोगों में कार्य करना और उन्हें परिवर्तित करना है, और दोनों में से प्रत्येक, मनुष्य के प्रबंधन के कार्य का अंग है। किसी व्यक्ति को संपूर्ण बनाने के लिए ये दोनों अपेक्षित हैं; इनमें से किसी की भी उपेक्षा नहीं की जा सकती। यह सच है कि "जीत लिया जाना" सुनने में ज्यादा अच्छा नहीं लगता, परंतु वास्तव में, किसी को जीत लिए जाने की प्रक्रिया ही उसे परिवर्तित किए जाने की प्रक्रिया है। एक बार जब तुम्हें जीत लिया जाता है, तो तुम्हारा भ्रष्ट स्वभाव पूरी तरह से मिट भले ही न सकता हो, पर तुम उसे जान चुके होगे। विजय के कार्य के माध्यम से तुम अपनी निम्न मानवता को और साथ ही अपनी अवज्ञा को भी अच्छी तरह जान चुके होगे। यद्यपि तुम विजय के कार्य की छोटी अवधि में उन्हें त्याग देने या बदल देने में असमर्थ होगे, पर तुम उन्हें जान चुके होगे, और यह तुम्हारी पूर्णता की नींव रखेगा। इस तरह जीता जाना और पूर्ण किया जाना दोनों ही लोगों को बदलने के लिए, उन्हें उनके भ्रष्ट शैतानी स्वभावों से छुटकारा दिलाने के लिए किए जाते हैं, ताकि वे स्वयं को पूरी तरह से परमेश्वर को दे सकें। जीत लिया जाना लोगों के स्वभाव बदलने में केवल पहला कदम है, और साथ ही यह लोगों द्वारा परमेश्वर को पूरी तरह से दिए जाने का भी पहला कदम है, और यह पूर्ण किए जाने के कदम से निम्न है। एक जीत लिए गए व्यक्ति के जीवन का स्वभाव एक पूर्ण किए गए व्यक्ति के स्वभाव की तुलना में बहुत कम बदलता है। जीत लिया जाना और पूर्ण किया जाना वैचारिक रूप से एक-दूसरे से भिन्न हैं, क्योंकि वे कार्य के भिन्न-भिन्न चरण हैं और लोगों को भिन्न स्तरों पर रखते हैं; जीत लिया जाना उन्हें निम्न स्तर पर और पूर्ण किया जाना उच्च स्तर पर रखता है। पूर्ण किए गए लोग धार्मिक लोग हैं, ऐसे लोग, जिन्हें पवित्र और शुद्ध बनाया गया है; वे मानवता के प्रबंधन के कार्य के स्फटिक रूप या अंतिम उत्पाद हैं। यद्यपि वे पूर्ण मानव नहीं हैं, फिर भी वे ऐसे लोग हैं, जो अर्थपूर्ण जीवन जीना चाहते हैं। जबकि जीते गए लोग परमेश्वर के अस्तित्व को मात्र शाब्दिक रूप से स्वीकार करते हैं; वे स्वीकार करते हैं कि परमेश्वर ने देहधारण किया है, कि वचन देह में प्रकट हुआ है, और परमेश्वर पृथ्वी पर न्याय और ताड़ना का कार्य करने के लिए आया है। वे यह भी स्वीकार करते हैं कि परमेश्वर का न्याय, ताड़ना, प्रहार और शुद्धिकरण, सब मनुष्य के लिए लाभप्रद हैं। उन्होंने अभी हाल ही में मनुष्य जैसा होना आरंभ किया है। उनके पास जीवन की कुछ अंतर्दृष्टियाँ अवश्य हैं, परंतु अभी भी वह उनके लिए अस्पष्ट बना हुआ है। दूसरे शब्दों में, वे अभी मानवता को धारण करना आरंभ कर ही रहे हैं। ये जीत लिए जाने के परिणाम हैं। जब लोग पूर्णता के मार्ग पर कदम रखते हैं, तो उनका पुराना स्वभाव बदलना संभव हो जाता है। इसके अतरिक्त, उनके जीवन निरंतर विकसित होते रहते हैं, और वे धीरे-धीरे सत्य में और गहरे प्रवेश करते जाते हैं। वे संसार से और उन सभी से घृणा करने में सक्षम होते हैं, जो सत्य का अनुसरण नहीं करते। वे विशेष रूप से स्वयं से घृणा करते हैं, परंतु उससे अधिक, वे स्वयं को स्पष्ट रूप से जानते हैं। वे सत्य के द्वारा जीने के इच्छुक होते हैं और वे सत्य के अनुसरण को अपना लक्ष्य बनाते हैं। वे अपने मस्तिष्क द्वारा उत्पन्न विचारों के भीतर जीवन जीने के लिए तैयार नहीं हैं और वे मनुष्य के पाखंड, दंभ और आत्म-संतोष से घृणा महसूस करते हैं। वे औचित्य की सशक्त भावना के साथ बोलते हैं, चीज़ों को विवेक और बुद्धि से सँभालते हैं, और परमेश्वर के प्रति निष्ठावान एवं आज्ञाकारी होते हैं। यदि वे ताड़ना और न्याय की किसी घटना का अनुभव करते हैं, तो न केवल वे निष्क्रिय और दुर्बल नहीं बनते, बल्कि वे परमेश्वर की इस ताड़ना और न्याय के प्रति आभारी होते हैं। वे विश्वास करते हैं कि वे परमेश्वर की ताड़ना और न्याय के बिना नहीं रह सकते; कि वे उसकी रक्षा करते हैं। वे लोग शांति और आनंद प्राप्त करने और क्षुधा तृप्त करने के लिए विश्वास का अनुसरण नहीं करते, न ही वे अस्थायी दैहिक आनंद के पीछे भागते हैं। पूर्ण किए गए लोगों के साथ ऐसा ही होता है। जीत लिए जाने के पश्चात लोग स्वीकार करते हैं कि परमेश्वर है, परंतु परमेश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करने के पश्चात जो उनमें अभिव्यक्त होता है, उसकी सीमाएँ हैं‍। वचन के देह में प्रकट होने का वास्तव में क्या अर्थ है? देहधारण का क्या अर्थ है? देहधारी परमेश्वर ने क्या किया है? उसके कार्य का लक्ष्य और मायने क्या हैं? उसके कार्य को इतना अधिक अनुभव करने के पश्चात, देह में उसके कर्मों को अनुभव करने के पश्चात, तुमने क्या प्राप्त किया है? इन सब चीज़ों को समझने के बाद ही तुम जीते जाओगे‍। यदि तुम मात्र यही कहते हो मैं स्वीकार करता हूँ कि परमेश्वर है, परंतु उस चीज़ का त्याग नहीं करते जिसका त्याग तुम्हें करना चाहिए, और तुम वे दैहिक आनंद छोड़ने में असफल रहते हो जिन्हें तुम्हें छोड़ना चाहिए, बल्कि हमेशा की तरह तुम दैहिक सुख-सुविधाओं की लालसा करते रहते हो, और यदि तुम भाइयों और बहनों के प्रति पूर्वाग्रहों का त्याग करने में असमर्थ हो, और अनेक सरल अभ्यास करने में किसी कीमत का भुगतान नहीं करते, तो यह प्रमाणित करता है कि तुम्हें अभी भी जीता जाना बाक़ी है। उस मामले में, चाहे तुम बहुत अधिक समझते भी हो, तो भी यह सब व्यर्थ होगा‍। जीते गए लोग वे हैं, जिन्होंने कुछ आरंभिक बदलाव और आरंभिक प्रवेश प्राप्त कर लिया है‍। परमेश्वर के न्याय और ताड़ना का अनुभव लोगों को परमेश्वर के प्रारंभिक ज्ञान और सत्य की प्रारंभिक समझ देता है‍। तुम अधिक गहन, अधिक विस्तृत सत्यों की वास्तविकता में पूर्णतः प्रवेश करने में अक्षम हो सकते हो, परंतु अपने वास्तविक जीवन में तुम अनेक आधारभूत सत्यों का अभ्यास करने में सक्षम होते हो, जैसे कि तुम्हारे दैहिक आनंद या तुम्हारी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा से संबंधित सत्य‍। यह सब जीते जाने की प्रक्रिया के दौरान लोगों में प्राप्त होने वाला प्रभाव है‍। विजितों के स्वभाव में परिवर्तन देखे जा सकते हैं; उदाहरण के लिए, जिस तरह वे पहनते-ओढ़ते और स्वयं को प्रस्तुत करते हैं, और जिस तरह वे जीते हैं—ये सब बदल सकते हैं। परमेश्वर में विश्वास का उनका दृष्टिकोण बदल जाता है, वे अपनी खोज के लक्ष्य में स्पष्ट होते हैं, और उनकी आकांक्षाएँ ऊँची हो जाती हैं। विजय के कार्य के दौरान उनके जीवन-स्वभाव में अनुरूपी बदलाव भी होते हैं, लेकिन वे उथले, प्राथमिक और उन बदलावों से हीन होते हैं, जो जीते गए लोगों के स्वभाव और खोज के लक्ष्यों में होते हैं। यदि जीते जाने के दौरान व्यक्ति का स्वभाव बिलकुल नहीं बदलता और वह कोई सत्य प्राप्त नहीं करता, तो यह व्यक्ति कचरा और पूर्णतः अनुपयोगी है! जो लोग जीते नहीं गए हैं, वे पूर्ण नहीं बनाए जा सकते! यदि कोई व्यक्ति मात्र जीता जाना चाहता है, तो उसे पूरी तरह से पूर्ण नहीं बनाया जा सकता, भले ही उसके स्वभाव ने विजय के कार्य के दौरान कुछ अनुरूपी बदलाव दिखाए हों। वह स्वयं को प्राप्त प्रारंभिक सत्य भी खो देगा। जीते गए और पूर्ण किए गए लोगों के स्वभावों में होने वाले बदलाव की मात्रा में बहुत अंतर होता है। परंतु जीत लिया जाना बदलाव में पहला कदम है; यह नींव है। इस आरंभिक बदलाव की कमी इस बात का प्रमाण है कि व्यक्ति वास्तव में परमेश्वर को बिलकुल नहीं जानता, क्योंकि यह ज्ञान न्याय से आता है, और यह न्याय विजय के कार्य का मुख्य अंग है। इस प्रकार, पूर्ण किए गए सभी लोगों को पहले जीते जाने से होकर गुज़रना चाहिए, अन्यथा उनके लिए पूर्ण किए जाने का कोई मार्ग नहीं है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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