परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य" | अंश 178

पवित्र आत्मा का सारा कार्य लोगों को लाभ पहुँचाने के लिए किया जाता है। यह पूर्ण रूप से लोगों को शिक्षित करने के बारे में है; ऐसा कोई कार्य नहीं है जो लोगों को लाभान्वित न करता हो। चाहे सत्य गहरा हो या उथला, चाहे सत्य को स्वीकार करने वाले लोगों की क्षमता कैसी भी क्यों न हो, जो कुछ भी पवित्र आत्मा करता है, यह सब लोगों के लिए लाभदायक है। परन्तु पवित्र आत्मा का कार्य सीधे तौर पर नहीं किया जा सकता; इसे पवित्र आत्मा के साथ सहयोग करने वाले लोगों के ज़रिए व्यक्त किया जाना चाहिए। तभी पवित्र आत्मा के कार्य के परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं। निस्संदेह, जब पवित्र आत्मा प्रत्यक्ष तौर पर कार्य करता है, तो उसमें कोई मिलावट नहीं होती; परन्तु जब पवित्र आत्मा मनुष्य के माध्यम से कार्य करता है, तो यह कलुषित हो जाता है और पवित्र आत्मा का मूल कार्य नहीं रह जाता। इस तरह से, सत्य विभिन्न अंशों तक बदल जाता है। अनुयायी पवित्र आत्मा के मूल इरादे को न पा कर, पवित्र आत्मा के कार्य और मनुष्य के अनुभव एवं ज्ञान के संयोजन को प्राप्त करते हैं। अनुयायियों के द्वारा जो प्राप्त किया जाता है उसका जो भाग पवित्र आत्मा का कार्य है, सही होता है, जबकि उनके द्वारा प्राप्त मनुष्य का अनुभव और ज्ञान भिन्न-भिन्न होते हैं क्योंकि कर्मी भिन्न-भिन्न होते हैं। जिन कर्मियों को पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता और मार्गदर्शन प्राप्त हो जाता है, वे प्रबुद्धता और मार्गदर्शन के आधार पर अनुभव पाते जाएँगे। इन अनुभवों में मनुष्य का मन और अनुभव, और साथ ही मानवता का अस्तित्व मिला हुआ होता है, उसके बाद वे वह ज्ञान या अंतर्दृष्टि प्राप्त करते हैं जो उनमें होनी चाहिए। सत्य का अनुभव कर लेने पर, यह मनुष्य के अभ्यास का मार्ग होता है। अभ्यास का यह मार्ग हमेशा वही नहीं रहता क्योंकि लोगों के अनुभव भिन्न-भिन्न होते हैं और जिन चीज़ों का लोग अनुभव करते हैं, वे भी भिन्न-भिन्न होती हैं। इस तरह, पवित्र आत्मा की वही प्रबुद्धता भिन्न-भिन्न ज्ञान और अभ्यास में परिणत होती है, क्योंकि प्रबुद्धता प्राप्त करने वाले लोग भिन्न-भिन्न होते हैं। कुछ लोग अभ्यास के दौरान मामूली गलतियाँ करते हैं जबकि कुछ लोग बड़ी गलतियाँ करते हैं, और कुछ लोग तो सिर्फ गलतियाँ ही करते हैं। क्योंकि लोगों की समझने की क्षमता भिन्न होती हैं और उनकी अंतर्निहित क्षमता भी भिन्न होती है। कुछ लोग किसी सन्देश को सुनकर उसे एक तरह से समझते हैं, जबकि कुछ लोग किसी सत्य को सुनकर उसे दूसरी तरह से समझते हैं। कुछ लोग जरा-सा भटक जाते हैं; जबकि कुछ लोग सत्य के अर्थ को बिल्कुल भी नहीं समझते। इसलिए, इंसान की समझ ही तय करती है कि वह दूसरों की अगुवाई कैसे करेगा; यह बिल्कुल सत्य है, क्योंकि इंसान का कार्य उसके अस्तित्व की अभिव्यक्ति ही है। जो लोग सत्य की समझ रखने वाले लोगों की अगुवाई में होते हैं, उनकी भी सत्य की समझ सही होगी। अगर ऐसे लोग हैं भी जिनकी समझ में त्रुटियाँ हैं, तो भी ऐसे लोग बहुत कम हैं, और सभी में त्रुटियाँ नहीं होंगी। यदि किसी की सत्य की समझ में त्रुटियाँ हैं, तो निस्संदेह उनमें भी त्रुटियाँ होंगी जो उसका अनुसरण करते हैं। ऐसे लोग हर तरह से गलत होंगे। अनुयायियों की सत्य की समझ की मात्रा मुख्य रूप से कर्मियों पर निर्भर करती है। निस्संदेह, परमेश्वर से आया सत्य सही और त्रुटिहीन है, और इसमें कोई संदेह नहीं है। परन्तु, कर्मी पूरी तरह से सही नहीं होते और उन्हें पूरी तरह से विश्वसनीय नहीं कहा जा सकता। यदि कर्मियों के पास सत्य का अभ्यास करने का बहुत व्यावहारिक तरीका है, तो अनुयायियों के पास भी अभ्यास का तरीका होगा। यदि कर्मियों के पास सत्य का अभ्यास करने का कोई तरीका न होकर, केवल सिद्धांत है, तो अनुयायियों में कोई वास्तविकता नहीं होगी। अनुयायियों की क्षमता और स्वभाव जन्म से ही निर्धारित होते हैं और वे कार्यकर्ताओं के साथ संबद्ध नहीं होते, परन्तु अनुयायियों के सत्य को समझने और परमेश्वर को जानने की सीमा कर्मियों पर निर्भर करती है (यह बात केवल कुछ लोगों पर ही लागू होती है)। जैसा कर्मी होगा, वैसे ही उसके अनुयायी होंगे जिनकी वह अगुवाई करता है। कर्मी पूरी तरह से अपने ही अस्तित्व को व्यक्त करता है। वह जिन चीज़ों की अपेक्षा अपने अनुयायियों से करता है, उन्हीं चीज़ों को वह स्वयं प्राप्त करना चाहता है या प्राप्त करने में समर्थ होता है। अधिकांश कर्मी जो कुछ स्वयं करते हैं, उसी के आधार पर अपने अनुयायियों से अपेक्षाएँ करते हैं, इसके बावजूद कि उनके अनुयायी बहुत-सी चीज़ों को बिल्कुल भी प्राप्त नहीं कर पाते—और जिस चीज़ को इंसान प्राप्त नहीं कर पाता, वह उसके प्रवेश में बाधा बन जाती है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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