परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य" | अंश 174

मनुष्य का कार्य उसके अनुभव एवं उसकी मानवता का प्रतिनिधित्व करता है। जो कुछ मनुष्य प्रदान करता है और वह कार्य जिसे मनुष्य करता है वह उसका प्रतिनिधित्व करता है। मनुष्य का देखना, मनुष्य का तर्क, मनुष्य की वैचारिक शक्ति और उसकी समृद्ध कल्पना सभी उसके कार्य में सम्मिलित होते हैं। विशेष रूप में, मनुष्य का अनुभव उसके कार्य का प्रतिनिधित्व करने के लिए और भी अधिक योग्य है, और जो कुछ किसी व्यक्ति ने अनुभव किया है वे उसके कार्य के घटक होंगे। मनुष्य के काम उसके अनुभव को अभिव्यक्त कर सकते हैं। जब कुछ लोग निष्क्रिय अवस्था में अनुभव करते हैं, तो उनकी अधिकांश सहभागिता में नकारात्मक तत्व शामिल होते हैं। यदि उनका अनुभव सकारात्मक है और उनके पास विशेष रूप से ऐसा मार्ग है जो सकारात्मक पक्ष की ओर है, तो जिसकी वे संगति करते हैं वह अत्यंत प्रोत्साहन देनेवाला है, और लोग उनसे सकारात्मकता आपूर्ति को प्राप्त करने के योग्य होंगे। यदि इस समय कोई कार्यकर्ता निष्क्रिय हो जाता है, तो उसकी संगति हमेशा नकारात्मक तत्वों वहन करेगी। इस प्रकार की संगति निराशाजनक होती है, और अन्य लोग उसकी संगति का अनुसरण करके अवचेतन रूप से निराश हो जाएंगे। उस अगुवे के आधार पर अनुयायियों की दशा बदल जाती है। एक कार्यकर्ता भीतर से वैसा होता है जैसा वह अभिव्यक्त करता है, और पवित्र आत्मा का कार्य अकसर मनुष्य की दशा के साथ बदल जाता है। वह मनुष्य के अनुभव के आधार पर कार्य करता है और उसे मजबूर नहीं करता परन्तु उसके अनुभव के सामान्य जीवनक्रम के अनुसार मनुष्य से मांग करता है। कहने का तात्पर्य है कि मनुष्य की सहभागिता परमेश्वर के वचन से भिन्न होती है। जो कुछ मनुष्य सहभागिता में विचार विमर्श करता है वह उनके व्यक्तिगत अवलोकन एवं अनुभव को सूचित करता है, और परमेश्वर के कार्य के आधार पर जो कुछ उन्होंने देखा एवं अनुभव किया है उन्हें अभिव्यक्त करता है। परमेश्वर के कार्य करने या बोलने के पश्चात् उनकी ज़िम्मेदारी यह पता लगाना है कि उन्हें किसका अभ्यास करना चाहिए, या किसमें प्रवेश करना चाहिए, और तब इसे अनुयायियों को प्रदान करें। इसलिए, मनुष्य का काम उसके प्रवेश एवं अभ्यास का प्रतिनिधित्व करते हैं। हाँ वास्तव में, ऐसा कार्य मानवीय शिक्षाओं एवं अनुभव या कुछ मानवीय विचारों के साथ मिश्रित होता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि पवित्र आत्मा किस प्रकार कार्य करता है, चाहे वह मनुष्यों में कार्य करे या देहधारी परमेश्वर में, यह हमेशा कार्यकर्ता ही होते हैं जो अभिव्यक्त करते हैं कि वे क्या हैं। हालाँकि यह पवित्र आत्मा ही है जो कार्य करता है, फिर भी मनुष्य स्वभाविक तौर पर जैसा है कार्य उस पर आधारित होता है, क्योंकि पवित्र आत्मा बिना आधार के कार्य नहीं करता है। दूसरे शब्दों में, कार्य को शून्य से नहीं किया जाता है, परन्तु यह हमेशा वास्तविक परिस्थितियों एवं वास्तविक स्थितियों के अनुसार ही होता है। यह केवल इसी रीति से होता है कि मनुष्य के स्वभाव को रूपान्तरित किया जा सकता है, यह कि उसकी पुरानी धारणाओं एवं पुराने विचारों को बदला जा सकता है। जो कुछ मनुष्य देखता, अनुभव करता, और कल्पना कर सकता है उसे वह अभिव्यक्त करता है। भले ही ये सिद्धान्त या धारणाएं हों, इन सभी तक मनुष्य की सोच पहुंच सकती है। मनुष्य के कार्य के आकार की परवाह किए बगैर, यह मनुष्य के अनुभव के दायरे, जो मनुष्य देखता है, या जिसकी मनुष्य कल्पना या जिसका विचार कर सकता है उनसे बढ़कर नहीं हो सकता है। जो कुछ परमेश्वर प्रगट करता है परमेश्वर स्वयं वही है, और यह मनुष्य की पहुंच से परे है, और यह मनुष्य की सोच से परे है। वह सम्पूर्ण मानवजाति की अगुवाई करने के अपने कार्य को अभिव्यक्त करता है, और यह मानवजाति के अनुभव के विवरणों के विषय से सम्बद्ध नहीं है, परन्तु इसके बजाए यह उसके अपने प्रबंधन से सम्बन्धित है। मनुष्य अपने अनुभव को अभिव्यक्त करता है, जबकि परमेश्वर अपने अस्तित्व को अभिव्यक्त करता है—यह अस्तित्व उसका अंतर्निहित स्वभाव है और यह मनुष्य की पहुंच से परे है। मनुष्य का अनुभव उसका अवलोकन एवं उसका ज्ञान है जिसे परमेश्वर के अस्तित्व की उसकी अभिव्यक्ति के आधार पर हासिल किया जाता है। ऐसे अवलोकन एवं ज्ञान को मनुष्य का अस्तित्व कहा जाता है। इन्हें मनुष्य का अंतर्निहित स्वभाव एवं उसकी वास्तविक क्षमता के आधार पर अभिव्यक्त किया जाता है; इस प्रकार उन्हें मनुष्य का अस्तित्व भी कहा जाता है। जो कुछ मनुष्य देखता एवं अनुभव करता है वह उसकी सहभागिता करने में सक्षम है। जो उसने अनुभव नहीं किया है या जिसे नहीं देखा है या जिस तक उसका मस्तिष्क पहुंच नहीं सकता है, अर्थात्, ऐसी चीज़ें जो उसके भीतर नहीं हैं, वह उसकी संगति करने के असमर्थ है। जो कुछ मनुष्य अभिव्यक्त करता है यदि वह उसका अनुभव नहीं है, तो यह उसकी कल्पना या सिद्धान्त है। एक कथन में, उसके शब्दों में कोई वास्तविकता नहीं है। यदि आप समाज के कार्यों के सम्पर्क में कभी नहीं आए हैं, तो आप समाज के जटिल सम्बन्धों से स्पष्टता से सहभागिता करने के योग्य नहीं होंगे। यदि आपके पास कोई परिवार नहीं है परन्तु अन्य लोग परिवार के मुद्दों के विषय में बात कर रहे हैं, तो जो कुछ वे कह रहे हैं आप उनकी अधिकांश बातों को समझ नहीं पाएंगे। अतः, जो कुछ मनुष्य सहभागिता में विचार विमर्श करता है और वह कार्य जिसे वह करता है वह उसके भीतरी अस्तित्व का प्रतिनिधित्व नहीं करता है। यदि कोई ताड़ना एवं न्याय के विषय में अपनी समझ के बारे में सहभागिता में विचार विमर्श करता है, परन्तु आपके पास उसका कोई अनुभव नहीं है, तो आप उसके ज्ञान का इन्कार करने की हिम्मत नहीं करते हैं, और यह हिम्मत तो बिलकुल भी नहीं करते हैं कि आप उसके विषय में सौ प्रतिशत निश्चित हैं। यह इसलिए है क्योंकि जिसके विषय में वह सहभागिता में विचार विमर्श करता है वह ऐसी चीज़ है जिसका आपने कभी अनुभव नहीं किया है, ऐसी चीज़ जिसको आपने कभी नहीं जाना है, और आपका मस्तिष्क इसकी कल्पना नहीं कर सकता है। आप केवल उसके अनुभव से भविष्य का एक मार्ग ले सकते हैं जो ताड़ना एवं न्याय से सम्बन्धित है। परन्तु यह मार्ग केवल समझ के रूप में ही कार्य कर सकता है जो सिद्धान्त पर आधारित होता है और आपकी स्वयं की समझ का स्थान नहीं ले सकता है, और आपके अनुभव का स्थान तो बिलकुल भी नहीं ले सकता है। कदाचित् आप सोचें कि जो कुछ वह कहता है वह सही है, परन्तु जब आप अनुभव करते हैं, तो आप पाते हैं कि यह अनेक बातों में अव्यावहारिक है। कदाचित् आप महसूस करें कोई ज्ञान जिसे आप सुनते हैं वह पूरी तरह से अव्यावहारिक है; आप इस समय इसके विषय में धारणाओं को आश्रय देते हैं, और हालाँकि आप इसे स्वीकार करते हैं, फिर भी आप केवल अनिच्छा से ही ऐसा करते हैं। परन्तु जब आप अनुभव करते हैं, तो वह ज्ञान जो आपको धारणाएं देता है वह आपके अभ्यास का मार्ग बन जाता है। और जितना अधिक आप अभ्यास करते हैं, उतना ही अधिक आप उसके शब्दों के सही मूल्य एवं अर्थ को समझते हैं। अनुभव प्राप्त करने के पश्चात्, तब आप उस ज्ञान के विषय में बातचीत कर सकते हैं जो आपके पास उन चीज़ों के विषय में होनी चाहिए जिनका आपने अनुभव किया है। इसके साथ ही, आप ऐसे लोगों के बीच अन्तर कर सकते हैं जिनका ज्ञान वास्तविक एवं व्यावहारिक है और ऐसे लोग जिनका ज्ञान सिद्धान्त पर आधारित होता है और यह बेकार है। अतः, चाहे वह ज्ञान जिसकी आप चर्चा कर रहे हैं वह सत्य के साथ मेल खाता है या नहीं यह वृहद रूप से इस बात पर आधरित होता है कि आपके पास व्यावहारिक अनुभव है या नहीं। जहाँ आपके अनुभवों में सच्चाई है, वहाँ आपका ज्ञान व्यावहारिक एवं मूल्यवान होगा। आपके अनुभव के माध्यम से, आप परख एवं अंतर्दृष्टि भी प्राप्त कर सकते हैं, अपने ज्ञान को और गहरा कर सकते हैं, और अपने आपको को व्यवस्थित करने में आप अपनी बुद्धि एवं सूझ-बूझ को बढ़ा सकते हैं। ऐसा ज्ञान जिसे लोगों के द्वारा बोला जाता है जो सत्य को धारण नहीं करता है वह सिद्धान्त है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वह कितना ऊँचा है। जब देह के विषयों की बात आती है तो हो सकता है कि इस प्रकार का व्यक्ति बहुत ही ज्ञानवान हो परन्तु जब आत्मिक विषयों की बात आती है तो वह स्पष्ट अन्तर नहीं कर सकता है। यह इसलिए है क्योंकि ऐसे लोगों के पास आत्मिक मामलों में बिलकुल भी अनुभव नहीं होता है। ये ऐसे लोग हैं जिन्हें आत्मिक मामलों में प्रकाशित नहीं किया गया है और वे आत्मा को नहीं समझते हैं। इसकी परवाह किया बगैर कि आप ज्ञान के किस पहलु के विषय में बातचीत करते हैं, जब तक यह आपका अस्तित्व है, तो यह आपका व्यक्तिगत अनुभव है, और आपका वास्तविक ज्ञान है। ऐसे लोगों के विषय में क्या कहें जो केवल सिद्धान्त की ही बात करते हैं, अर्थात्, ऐसे लोग जो सत्य या वास्तविकता को धारण नहीं करते हैं, ऐसे लोग जो इसके विषय में बात करते हैं उन्हें यह भी कहा जा सकता है कि वे अपने अस्तित्व में ही रहें, क्योंकि उनका सिद्धान्त गहरे चिंतन से सिर्फ बाहर आया है और यह उनके मन का परिणाम है जो गहराई से मनन करता है, परन्तु यह केवल सिद्धान्त ही है, यह कल्पना से अधिक और कुछ भी नहीं है!

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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