परमेश्वर के दैनिक वचन | "पदवियों और पहचान के सम्बन्ध में" | अंश 163

यशायाह, यहेजकेल, मूसा, दाऊद, इब्राहीम एवं दानिय्येल इस्राएल के चुने हुए लोगों के मध्य अगुवे या भविष्यवक्ता थे। उन्हें परमेश्वर क्यों नहीं कहा गया था? क्यों पवित्र आत्मा ने उनकी गवाही नहीं दी थी? जैसे ही यीशु ने अपना कार्य प्रारम्भ किया तो क्यों पवित्र आत्मा ने यीशु की गवाही दी और उसके वचनों को बोलना शुरू किया? और क्यों पवित्र आत्मा ने औरों की गवाही नहीं दी? ऐसे मनुष्यों को जो हाड़-मांस के थे, उन्हें, "प्रभु" कहकर पुकारा जाता था। इसकी परवाह किये बिना कि उन्हें क्या कहकर पुकारा जाता था, उनके कार्य उनके अस्तित्व एवं मूल-तत्व को दर्शाते हैं, और उनका अस्तित्व एवं मूल-तत्व उनकी पहचान को दर्शाता है। उनका मूल-तत्व उनके पद नामों से सम्बंधित नहीं है; जो कुछ वे अभिव्यक्त करते थे, और जैसा जीवन वे जीते थे उसके द्वारा इसे दर्शाया जाता है। पुराने नियम में, प्रभु कहकर पुकारा जाना सामान्य बात से बढ़कर और कुछ नहीं था, और किसी व्यक्ति को किसी भी तरह से पुकारा जा सकता था, परन्तु उसका मूल-तत्व एवं अंतर्निहित पहचान अपरिवर्तनीय था। उन झूठे मसीहाओं, झूठे भविष्यवक्ताओं और धोखेबाजों के मध्य, क्या ऐसे लोग भी नहीं हैं जिन्हें परमेश्वर कहा जाता है? और क्यों वे परमेश्वर नहीं हैं? क्योंकि वे परमेश्वर का कार्य करने में असमर्थ हैं। मूल में वे मनुष्य ही हैं, लोगों को धोखा देने वाले हैं, न कि परमेश्वर; और इस प्रकार उनके पास परमेश्वर की पहचान नहीं है। क्या बारह गोत्रों के मध्य दाऊद को भी प्रभु कहकर नहीं पुकारा गया था? यीशु को भी प्रभु कहकर पुकारा गया था; क्यों सिर्फ यीशु को ही देहधारी परमेश्वर कहकर पुकारा गया था? क्या यिर्मयाह को भी मनुष्य के पुत्र के रूप में नहीं जाना गया था? और क्या यीशु को मनुष्य के पुत्र के रूप में नहीं जाना गया था? क्यों यीशु को परमेश्वर के स्थान पर क्रूस पर चढ़ाया गया था? क्या यह इसलिए नहीं है क्योंकि उसका मूल-तत्व भिन्न था? क्या यह इसलिए नहीं है क्योंकि वह कार्य जो उसने किया वह भिन्न था? क्या पद नाम से फर्क पड़ता है? हालाँकि यीशु को मनुष्य का पुत्र भी कहा जाता था, फिर भी वह परमेश्वर का पहला देहधारण था, वह सामर्थ ग्रहण करने, एवं छुटकारे के कार्य को पूरा करने के लिए आया था। यह साबित करता है कि यीशु की पहचान एवं मूल-तत्व दूसरों से भिन्न थी जिन्हें भी मनुष्य का पुत्र कहा गया था। आज, आप लोगों में से कौन यह कहने की हिम्मत कर सकता है कि सभी वचन जिन्हें उन लोगों के द्वारा कहा गया था जिन्हें पवित्र आत्मा के द्वारा उपयोग किया था वे पवित्र आत्मा से आये थे? क्या किसी में ऐसी चीज़ें कहने की हिम्मत है? यदि आप ऐसी चीज़ें कहते हैं, तो फिर क्यों एज्रा की भविष्यवाणी की पुस्तक को अलग छोड़ दिया गया था, और क्यों यही चीज़ उन प्राचीन संतों एवं भविष्यवक्ताओं की पुस्तकों के साथ किया गया था? यदि वे सब पवित्र आत्मा से आये थे, तो आप लोगों ने क्यों ऐसे मनमाने ढंग से चुनाव करने की हिम्मत की है? क्या आप पवित्र आत्मा के कार्य को चुनने के योग्य हैं? इस्राएल की बहुत सारी कहानियों को भी अलग छोड़ दिया गया था। और यदि आप मानते हैं कि भूतकाल के ये लेख सब पवित्र आत्मा ही से आये थे, तो फिर क्यों कुछ पुस्तकों को अलग छोड़ दिया गया था? यदि वे सब पवित्र आत्मा से आये थे, तो उन सब को सुरक्षित रखना चाहिए, और पढ़ने के लिए कलीसियाओं के भाइयों एवं बहनों को भेजा जाना चाहिए। उन्हें मानवीय इच्छा के द्वारा चुना या अलग नहीं छोड़ा जाना चाहिए; ऐसा करना गलत है। यह कहना कि पौलुस एवं यूहन्ना के अनुभव उनके व्यक्तिगत अवलोकन के साथ घुल-मिल गए थे इसका यह मतलब नहीं है कि उनके अनुभव एवं ज्ञान शैतान से आये थे, परन्तु बात केवल यह है कि उनके पास ऐसी चीज़ें थीं जो उनके व्यक्तिगत अनुभवों एवं अवलोकन से आई थीं। उनका ज्ञान उस समय के वास्तविक अनुभवों की पृष्ठभूमि के अनुसार था, और कौन आत्म विश्वास के साथ कह सकता था कि यह सब पवित्र आत्मा ही से आया था। यदि चारों सुसमाचार पवित्र आत्मा से आये थे, तो ऐसा क्यों था कि मत्ती, मरकुस, लूका और यूहन्ना प्रत्येक ने यीशु के कार्य के बारे कुछ अलग कहा था? यदि आप लोग यह नहीं मानते हैं, तो फिर आप बाईबिल के लेखों में देखिये कि किस प्रकार पतरस ने यीशु का तीन बार इन्कार किया था: वे सब भिन्न हैं, और उनमें से प्रत्येक के पास उनकी अपनी विशेषताएं हैं। बहुत से लोग जो अनजान हैं वे कहते हैं, देहधारी परमेश्वर भी एक मनुष्य ही था, अतः क्या वे वचन जो उसने कहा था पवित्र आत्मा से आ सकते थे? यदि पौलुस एवं यूहन्ना के वचन मानवीय इच्छा के साथ घुल-मिल गए थे, तो क्या वे वचन जिन्हें देहधारी परमेश्वर ने कहा था वे वास्तव में मानवीय इच्छा के साथ नहीं घुले-मिले थे? ऐसे लोग जो ऐसी बातें करते हैं वे अन्धे एवं अनजान हैं! चारों सुसमाचारों को ध्यानपूर्वक पढ़ें; पढ़िए कि उन्होंने उन कार्यों के विषय में क्या दर्ज किया है जिन्हें यीशु ने किया था, और उन वचनों को पढ़िए जिन्हें उसने कहा था। प्रत्येक विवरण, एकदम सरल रूप में, अलग था, और प्रत्येक का अपना ही यथार्थ दृष्टिकोण था। यदि इन पुस्तकों के लेखकों के द्वारा जो कुछ लिखा गया था वह सब पवित्र आत्मा से आया होता, तो यह सब एक समान एवं सुसंगत होता। तो फिर क्यों इसमें भिन्नताएं हैं? क्या मनुष्य अत्यंत मूर्ख नहीं है, एवं इसे देखने में असमर्थ नहीं है? यदि आपको परमेश्वर की गवाही देने के लिए कहा जाता, तो आप किस प्रकार की गवाही प्रदान कर सकते हैं? क्या परमेश्वर को जानने का ऐसा तरीका उसकी गवाही दे सकता है? यदि अन्य लोग आपसे पूछें, "यदि यूहन्ना एवं लूका के लेख मानवीय इच्छा के साथ मिश्रित हो जाते, तो क्या आपके परमेश्वर के द्वारा कहे गए वचन मानवीय इच्छा से मिश्रित नहीं हो जाते?" क्या आप एक स्पष्ट उत्तर दे सकते हैं? लूका और मत्ती ने यीशु के वचनों को सुना, और यीशु के कार्यों को देखा उसके पश्चात्, उन्होंने यीशु के द्वारा किये गए कुछ तथ्यों के संस्मरणों का विवरण देने की रीति से अपने स्वयं के ज्ञान के विषय में कहा था। क्या आप कह सकते हैं कि उनके ज्ञान को पूरी तरह से पवित्र आत्मा के द्वारा प्रगट किया गया था? बाईबिल के बाहर, कई प्रसिद्ध आत्मिक व्यक्ति थे जिनके पास उनसे भी अधिक ज्ञान था; आनेवाली पीढ़ियों के द्वारा उनके वचनों को क्यों नहीं लिया गया था? क्या उनको भी पवित्र आत्मा के द्वारा उपयोग नहीं किया गया था? यह जानिए कि आज के कार्य में, मैं यीशु के कार्य की नींव के आधार पर अपने स्वयं के अवलोकन के विषय में नहीं बोल रहा हूँ, और न ही मैं यीशु के कार्य की पृष्ठभूमि के विरोध में अपने स्वयं के ज्ञान के विषय में बोल रहा हूँ। उस समय यीशु ने कौन सा कार्य किया था? और आज मैं कौन सा कार्य कर रहा हूँ? जो मैं करता और कहता हूँ उसकी कोई मिसाल नहीं है। वह पथ जिस पर मैं आज चलता हूँ उस पर इससे पहले कभी कदम नहीं रखा गया था, इस पर युगों युगों से लोगों और भूतकाल की पीढ़ियों के द्वारा कभी नहीं चला गया था। आज, इसे खोल दिया गया है, और क्या यह आत्मा का कार्य नहीं है? यद्यपि यह पवित्र आत्मा का कार्य था, फिर भी भूतकाल के सभी अगुवों ने अपने कार्य को औरों की नींव पर सम्पन्न किया था। परन्तु स्वयं परमेश्वर का कार्य भिन्न है, जैसे यीशु के कार्य का चरण था: उसने एक नया मार्ग खोला था। जब वह आया तब उसने स्वर्ग के राज्य का सुसमाचार प्रचार किया, एवं कहा कि मनुष्य को पश्चाताप, एवं अंगीकार करना चाहिए। जब यीशु ने अपना कार्य पूरा किया उसके बाद, पतरस एवं पौलुस और दूसरों ने यीशु के कार्य को करना प्रारम्भ किया था। जब यीशु को क्रूस पर चढ़ाया गया और उसे स्वर्ग में उठाया गया उसके बाद, उन्हें क्रूस के मार्ग का प्रचार करने के लिए आत्मा के द्वारा भेजा गया था। यद्यपि पौलुस के वचनों को ऊँचा उठाया गया था, फिर भी वे उस नींव पर भी आधारित थे जिसे यीशु ने डाला था, जैसे कि धीरज, प्रेम, कष्ट, सिर ढंकना, बपतिस्मा, या अन्य सिद्धान्त ताकि उनका पालन किया जाये। यह सब यीशु के वचनों की नींव पर था। वे एक नया मार्ग खोलने में असमर्थ थे, क्योंकि वे सब मनुष्य ही थे जिन्हें परमेश्वर के द्वारा उपयोग किया गया था।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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