परमेश्वर के दैनिक वचन | "उपाधियों और पहचान के सम्बन्ध में" | अंश 162

कुछ लोग पूछेंगे, "देहधारी परमेश्वर के द्वारा किये गए कार्य और बीते समयों में भविष्यवक्ताओं एवं प्रेरितों के द्वारा किये गए कार्य में क्या अन्तर है?" दाऊद को भी प्रभु कहकर पुकारा गया था, और इस प्रकार यीशु को भी; हालाँकि वह कार्य भिन्न था जो उन्होंने किया था, फिर भी उन्हें उसी नाम से पुकारा गया था। आप क्यों कहते हैं कि उनकी पहचान एक समान नहीं थी? जिसकी यूहन्ना ने गवाही दी थी वह एक दर्शन था, ऐसा दर्शन जो पवित्र आत्मा से आया था, और वह उन वचनों को कह सकता था जिसे पवित्र आत्मा ने कहने का इरादा किया था; तो यूहन्ना की पहचान यीशु की अपेक्षा भिन्न क्यों है? यीशु के द्वारा कहे गए वचन पूरी तरह से परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने में सक्षम थे, और पूरी तरह से परमेश्वर के कार्य का प्रतिनिधित्व किया था। जो यूहन्ना ने देखा वह एक दर्शन था, और वह परमेश्वर के कार्य का पूरी तरह से प्रतिनिधित्व करने में असमर्थ था। ऐसा क्यों है कि यूहन्ना, पतरस, और पौलुस ने बहुत सारे वचन कहे थे—जैसा यीशु ने कहा था—फिर भी उनके पास यीशु के समान पहचान नहीं थी? मुख्य रूप से ऐसा इसलिए है क्योंकि वह कार्य जो उन्होंने किया वह भिन्न था। यीशु ने परमेश्वर के आत्मा का प्रतिनिधित्व किया था, और वह परमेश्वर का आत्मा था जो सीधे तौर पर कार्य कर रहा था। उसने नये युग का कार्य किया था, ऐसा कार्य जिसे पहले कभी किसी ने नहीं किया था। उसने एक नया मार्ग खोला था, उसने यहोवा का प्रतिनिधित्व किया था, और उसने स्वयं परमेश्वर का प्रतिनिधित्व किया था। जबकि पतरस, पौलुस और दाऊद, इसके बावजूद कि उन्हें क्या कहकर पुकारा जाता था, उन्होंने केवल परमेश्वर के एक प्राणी की पहचान का प्रतिनिधित्व किया था, या उन्हें सिर्फ यीशु या यहोवा के द्वारा भेजा गया था। अतः इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि उन्होंने कितना अधिक कार्य किया था, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि उन्होंने कितने बड़े बड़े चमत्कार किये थे, क्योंकि वे अभी भी बस परमेश्वर के प्राणी ही थे, और परमेश्वर के आत्मा का प्रतिनिधित्व करने में असमर्थ थे। उन्होंने परमेश्वर के नाम में या परमेश्वर के द्वारा भेजे जाने के बाद ही कार्य किया था; इससे बढ़कर, उन्होंने उन युगों में कार्य किया था जिन्हें यीशु या यहोवा के द्वारा शुरू किया गया था, और वह कार्य अलग नहीं था जो उन्होंने किया था। आख़िरकार, वे महज परमेश्वर के प्राणी ही थे। पुराने नियम में, बहुत सारे भविष्यवक्ताओं ने भविष्यवाणियाँ की थीं, या भविष्यवाणी की पुस्तकें लिखी थीं। किसी ने भी नहीं कहा था कि वे परमेश्वर थे, परन्तु जैसे ही यीशु प्रगट हुआ, इससे पहले कि उसने कोई वचन कहा, परमेश्वर के आत्मा ने उसकी गवाही दी कि वह परमेश्वर है। ऐसा क्यों है? इस बिन्दु पर आपको पहले से ही जान लेना चाहिए! इससे पहले, प्रेरितों और भविष्यवक्ताओं ने विभिन्न पत्रियाँ लिखीं, और बहुत सारी भविष्यवाणियां कीं। बाद में, लोगों ने बाईबिल में रखने के लिए उनमें से कुछ को चुन लिया, और कुछ खो गई थीं। जबकि ऐसे लोग हैं जो कहते हैं कि जो कुछ भी उनके द्वारा बोला गया था वह पवित्र आत्मा से आया था, तो ऐसा क्यों है कि इसमें से कुछ को अच्छा माना गया है, और इसमें से कुछ को खराब माना गया है? और क्यों कुछ को चुना गया था, और बाकियों को नहीं? यदि वे वाकई में पवित्र आत्मा के द्वारा कहे गए वचन थे, तो क्या यह लोगों के लिए ज़रूरी होता कि उनका चुनाव करते? क्यों यीशु के द्वारा बोले गए वचनों और उस कार्य का लेखा जोखा चारों सुसमाचारों में से प्रत्येक में अलग अलग है? क्या यह उन लोगों की गलती नहीं हैं जिन्होंने इसे दर्ज किया था? कुछ लोग पूछेंगे, "चूँकि नए नियम की पत्रियां जिन्हें पौलुस एवं नए नियम के अन्य लेखकों के द्वारा लिखा गया था और वह कार्य जिसे उन्होंने किया था वे कुछ कुछ मनुष्य की इच्छा से आये थे, और उन्हें मनुष्य की धारणाओं से मिश्रित कर दिया गया था, तो क्या उन वचनों में कोई मानवीय अशुद्धता नहीं है जिन्हें आज आप (परमेश्वर) बोलते हैं, क्या उनमें वास्तव में कोई भी मानवीय धारणा शामिल नहीं है?" कार्य का यह चारण जिसे परमेश्वर के द्वारा किया गया है वह पौलुस और अनेक प्रेरितों एवं भविष्यवक्ताओं के द्वारा किये गए कार्य से पूरी तरह से अलग है। न केवल पहचान में अन्तर है, बल्कि, मुख्य रूप से, उस कार्य में भी अन्तर है जिसे सम्पन्न किया गया था। जब पौलुस को नीचे गिराया गया और वह प्रभु के सामने गिर पड़ा उसके पश्चात्, कार्य करने के लिए पवित्र आत्मा के द्वारा उसकी अगुवाई की गई थी, और वह भेजा हुआ प्रेरित बन गया था। और इस प्रकार उसने कलीसियाओं को पत्रियाँ लिखीं, और ये सभी पत्रियों यीशु की शिक्षाओं का अनुसरण करती हैं। पौलुस को प्रभु यीशु के नाम में कार्य करने के लिए प्रभु के द्वारा भेजा गया था, परन्तु जब स्वयं परमेश्वर आया, तो उसने किसी नाम में कार्य नहीं किया, तथा अपने कार्य में किसी और का नहीं सिर्फ परमेश्वर के आत्मा का प्रतिनिधित्व किया। परमेश्वर अपने कार्य को सीधे तौर पर करने के लिए आया था: उसे मनुष्य के द्वारा सिद्ध नहीं किया गया था, और उसके कार्य को किसी मनुष्य की शिक्षाओं के आधार पर सम्पन्न नहीं किया गया था। कार्य के इस चरण में परमेश्वर अपने व्यक्तिगत अनुभवों के बारे में बातचीत करने के द्वारा अगुवाई नहीं करता है, बल्कि इसके बजाए जो कुछ उसके पास है उसके अनुसार अपने कार्य को सीधे तौर पर क्रियान्वित करता है। उदाहरण के लिए, वह सेवा करनेवालों का कार्य, ताड़ना के समयों का कार्य, मृत्यु का कार्य, एवं परमेश्वर से प्रेम करने का कार्य करता है...। यह वह समस्त कार्य है जिसे पहले कभी नहीं किया गया है, और यह मनुष्य के अनुभवों की अपेक्षा ऐसा कार्य जो वर्तमान युग का है। उन वचनों में जिन्हें मैं ने कहा है, मनुष्य के अनुभव कौन कौन से हैं? क्या वे सब सीधे तौर पर आत्मा से नहीं आते हैं, क्या वे आत्मा के द्वारा जारी नहीं किये जाते हैं? यह तो बस ऐसा है कि आपकी योग्यता बहुत ही कम है कि आप सच्चाई के आर-पार देखने में असमर्थ हैं! जीवन का वह व्यावहारिक तरीका जिसके विषय में मैं ने कहा है वह उस पथ की अगुवाई के लिए है, और इसे किसी के द्वारा पहले कभी नहीं कहा गया है, न ही कभी किसी ने इस पथ का अनुभव किया है, या इस सच्चाई को जाना है। मैं ने इन वचनों को कहा उससे पहले, किसी ने कभी उन्हें नहीं कहा था। किसी ने कभी ऐसे अनुभवों की बात नहीं की थी, न ही उन्होंने कभी ऐसे विवरणों को कहा था, और, इसके अतिरिक्त, किसी ने भी इन चीज़ों को प्रगट करने के लिए ऐसे कथनों की ओर कभी संकेत नहीं किया था। किसी ने कभी भी उस पथ की अगुवाई नहीं की जिसकी अगुवाई आज मैं करता हूँ, और यदि इसकी अगुवाई मनुष्य के द्वारा की जाती, तो यह एक नया मार्ग नहीं होता। उदाहरण के लिए, पौलुस एवं पतरस को ही लीजिए। उनके पास उस पथ पर चलने के पहले जिसकी अगुवाई यीशु के द्वारा की गई थी अपने स्वयं के कोई व्यक्तिगत अनुभव नहीं थे। जब यीशु ने उस पथ की अगुवाई की केवल उसके बाद ही उन्होंने उन वचनों का अनुभव किया जिन्हें यीशु के द्वारा कहा गया था, और उस पथ का अनुभव किया था जिसकी अगुवाई उसके द्वारा की गई थी; इससे उन्होंने अनेक अनुभवों को अर्जित किया, और पत्रियों को लिखा था। और इस प्रकार, मनुष्य के अनुभव उसके समान नहीं हैं जैसा परमेश्वर का कार्य है, और परमेश्वर का कार्य उस ज्ञान के समान नहीं है जैसा मनुष्य की धारणाओं एवं अनुभवों के द्वारा वर्णन किया जाता है। मैं बार बार कह चुका हूँ, कि मैं एक नए पथ की अगुवाई कर रहा हूँ, एवं नया कार्य कर रहा हूँ, और मेरा कार्य एवं मेरे कथन यूहन्ना एवं अन्य सभी भविष्यवक्ताओं से अलग हैं। न तो मैं कभी पहले अनुभवों को प्राप्त करता हूँ और फिर उन्हें आप लोगों से कहता हूँ—ऐसा तो बिल्कुल भी नहीं है। यदि ऐसा होता, तो क्या इससे आप लोगों को बहुत पहले ही देर न हो जाती? भूतकाल में, वह ज्ञान जिसके विषय में बहुतों ने बात की थी उसे भी ऊँचा उठाया गया था, परन्तु उनके सभी वचनों को केवल उन जाने माने प्रसिद्ध आत्मिक व्यक्तियों के आधार पर बोला गया था। उन्होंने मार्ग का मार्गदर्शन नहीं किया था, परन्तु उनके अनुभवों से आये थे, जो कुछ उन्होंने देखा था उससे आये थे, और उनके ज्ञान से आये थे। कुछ तो उनकी धारणाएं थीं, और कुछ तो अनुभव थे जिनका उन्होंने संक्षेपण किया था। आज, मेरे कार्य का स्वभाव उनसे पूरी तरह से अलग है। मैं ने औरों के द्वारा अगुवाई किये जाने का अनुभव नहीं किया है, न ही मैं ने औरों के द्वारा सिद्ध किये जाने को स्वीकार किया है। इसके अतिरिक्त, वह सब जिसे मैं ने कहा है और संगति में विचार विमर्श किया है वह किसी अन्य के समान नहीं है, और किसी अन्य के द्वारा कभी बोला नहीं गया है। आज, इसके बावजूद कि आप कौन हैं, आप लोगों के कार्य को उन वचनों के आधार पर क्रियान्वित किया जाता है जिन्हें मैं कहता हूँ। इन कथनों एवं कार्य के बिना, कौन इन चीज़ों को अनुभव करने में सक्षम होता (सेवा करनेवालों की जाँच, ताड़ना के समय...), और कौन ऐसे ज्ञान को कहने के योग्य होगा? क्या आप सचमुच में इसे देखने में असमर्थ हैं? इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि कार्य का कौन सा चरण है, क्योंकि जैसे ही मेरे वचन कहे जाते हैं, आप लोग मेरे वचनों के अनुसार संगति करना शुरू कर देते हैं, और उनके अनुसार काम करते हैं, और यह ऐसा मार्ग नहीं है जिसके बारे में आप लोगों में से किसी ने सोचा है। इतनी दूर तक आने के बाद, क्या आप ऐसे स्पष्ट एवं सरल प्रश्न को देखने में असमर्थ हैं? यह कोई ऐसा मार्ग नहीं है जिसे किसी ने सोचा है, न ही यह किसी प्रसिद्ध आत्मिक व्यक्ति पर आधारित है। यह एक नया पथ है, और यहाँ तक कि बहुत सारे वचन भी जिन्हें किसी समय यीशु के द्वारा कहा गया था वे आगे से लागू नहीं होते हैं। जो मैं कहता हूँ वह एक नये युग को शुरू करने का कार्य है, और यह ऐसा कार्य है जो स्वतन्त्र रुप से कार्य करता है; वह कार्य जिसे मैं करता हूँ, और वे वचन जिन्हें मैं कहता हूँ, वे सब नए हैं। क्या यह आज का नया कार्य नहीं है? यीशु का कार्य भी इसके जैसा ही था। उसका कार्य भी मन्दिर के लोगों से अलग था, और इस प्रकार यह फरीसियों के कार्य से भी भिन्न था, और न ही यह उन कार्यों के सदृश्य था जिन्हें इस्राएल के सभी लोगों के द्वारा किया गया था। इसकी गवाही देने के बाद, लोग अपने मनों को नहीं बना सके: क्या इसे सचमुच में परमेश्वर के द्वारा किया गया था? यीशु ने यहोवा की व्यवस्था को नहीं थामा था; जब वह मनुष्य को सिखाने आया, तो वह सब जो उसने कहा था वह उससे नया एवं अलग था जिन्हें प्राचीन संतों एवं पुराने नियम के भविष्यवक्ताओं के द्वारा कहा गया था, और इस कारण से, लोग अनिश्चित बने रहे। यह वह बात है जिससे मनुष्य के साथ व्यवहार करना बहुत ही कठिन हो जाता है। कार्य के इस नये चरण को स्वीकार करने से पहले, वह पथ जिस पर आप में से अधिकतर लोग चलते थे वह उन प्रसिद्ध आत्मिक व्यक्तियों की उस नींव का अभ्यास करने एवं उसमें प्रवेश करने के लिए था। परन्तु आज, वह कार्य जिसे मैं करता हूँ वह बहुत ही अलग है, और इसलिए आप लोग यह निर्णय लेने में असमर्थ हैं कि यह सही है या नहीं। मैं परवाह नहीं करता हूँ कि पहले आप किस पथ पर चलते थे, न ही मैं इसमें रुचि लेता हूँ कि आपने किसका भोजन खाया था, या किसे आपने अपने "पिता" के रूप में माना था। चूँकि मैं आ गया हूँ और मनुष्य का मार्गदर्शन करने के लिए नया कार्य लाया हूँ, तो वे सभी जो मेरा अनुसरण करते हैं उन्हें जो कुछ मैं कहता हूँ उसके अनुसार कार्य करना होगा। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वह परिवार कितना सामर्थी है जहाँ से आप हाथ दिखाते हैं, आपको मेरा अनुसरण करना ही होगा, आपको अपने पुराने रीति व्यवहारों के अनुसार काम नहीं करना होगा, आपके "पालक पिता" को पीछे हटना चाहिए, और अपने न्यायोचित भाग को खोजने के लिए आपको अपने परमेश्वर के सामने आना चाहिए। आपकी सम्पूर्णता मेरे ही हाथों में है, और आपको अपने पालक पिता के प्रति बहुत अधिक अंध विश्वास नहीं दिखाना चाहिए; वह पूरी तरह से आपको नियन्त्रित नहीं कर सकता है। आज का कार्य स्वतन्त्र रूप से काम करता है। वह सब जो मैं आज कहता हूँ वह स्पष्ट रुप से भूतकाल की किसी नींव पर आधारित नहीं है; यह एक नई शुरुआत है, और यदि आप कहें कि इसे मनुष्य के हाथ से सृजा गया है, तो आप ऐसे व्यक्ति हैं जिसके लिए ऐसा कुछ भी नहीं है जो आपके अंधेपन का उपचार कर सकता है!

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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