परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IX" | अंश 179

जब से परमेश्वर ने सभी चीज़ों को बनाया है, वे व्यवस्थित रूप से उसके बनाए नियमों के अनुसार संचालित और निरन्तर विकसित हो रही हैं। उसकी निगाहों और शासन के अधीन, मानवजाति का अस्तित्व बरकरार है और सभी चीज़ें नियमित रूप से विकसित हो रही हैं। कोई भी चीज़ इन नियमों को बदलने या नष्ट करने में सक्षम नहीं है। परमेश्वर के शासन के कारण ही सभी प्राणी वंश-वृद्धि कर सकते हैं, और उसके शासन और प्रबंधन के कारण सभी प्राणी जीवित रह सकते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि परमेश्वर के शासन के अधीन, सभी प्राणी जन्म लेते हैं, फलते-फूलते हैं, गायब हो जाते हैं, और एक सुव्यवस्थित विधि से पुनः शरीर धारण करते हैं। जब बसंत का आगमन होता है, हल्की-हल्की बारिश ताज़े मौसम का एहसास लेकर आती है और पृथ्वी को नम कर देती है। ज़मीन नर्म पड़ने लगती है, मिट्टी के भीतर से घास निकल आती है और अंकुरित होना शुरू करती है, और वृक्ष धीरे-धीरे हरे हो जाते हैं। ये सभी जीवित चीज़ें पृथ्वी पर नई जीवन-शक्ति लेकर आती हैं। यही सभी प्राणियों के अस्तित्व में आने और फलने-फूलने का दृश्य है। सभी प्रकार के पशु बसंत की गर्माहट को महसूस करने के लिए अपनी मांदों से बाहर निकल आते हैं और एक नए वर्ष की शुरुआत करते हैं। सभी प्राणी गर्मियों की धूप सेंकते हैं और मौसम के द्वारा लाई गई गर्माहट का आनंद लेते हैं। वे तीव्रता से बढ़ते हैं। पेड़, घास, और सभी प्रकार के पौधे खिलने और फल धारण करने तक बहुत तेजी से बढ़ते हैं। ग्रीष्म ऋतु के दौरान मनुष्य समेत सभी प्राणी बहुत व्यस्त रहते हैं। पतझड़ में, बारिश शरद ऋतु की ठंडक लेकर आती है, और सभी प्रकार के जीव फसलों की कटाई के मौसम के आगमन को महसूस करने लगते हैं। सभी जीव फल उत्पन्न करते हैं, और मनुष्य शीत ऋतु की तैयारी में भोजन की व्यवस्था करने के लिए विभिन्न प्रकार के फल इकट्ठा करना शुरू कर देते हैं। शीत ऋतु में ठंड के आने के साथ सभी जीव धीरे-धीरे आराम करना एवं शांत होना प्रारंभ कर देते हैं, और साथ ही लोग भी इस मौसम के दौरान विराम ले लेते हैं। बसंत का ग्रीष्म में, ग्रीष्म का शरद, फिर शरद का शीत में बदलना—ऋतुओं के ये सभी परिवर्तन परमेश्वर द्वारा स्थापित नियमों के अनुसार होते हैं। वह इन नियमों का उपयोग करके सभी चीज़ों और मानवजाति की अगुवाई करता है और उसने मानवजाति के लिए एक समृद्ध और खुशनुमा जीवन-शैली निर्मित की है, जीवित रहने के लिए एक ऐसा वातावरण तैयार किया है जिसमें अलग-अलग तापमान और ऋतुएँ हैं। जीवित रहने हेतु इन सुव्यवस्थित वातावरण के अंतर्गत, मनुष्य भी सुव्यवस्थित तरीके से जीवित रह सकता है और वंश-वृद्धि कर सकता है। मनुष्य इन नियमों को नहीं बदल सकता और न ही कोई व्यक्ति या प्राणी इन्हें तोड़ सकता है। यद्यपि असंख्य परिवर्तन हो चुके हैं—समुद्र खेत बन गए हैं, जबकि खेत समुद्र बन गए हैं—फिर भी ये नियम लगातार अस्तित्व में बने हुए हैं। ये अस्तित्व में हैं क्योंकि परमेश्वर अस्तित्व में है। यह परमेश्वर के शासन और उसके प्रबंधन की वजह से है। इस प्रकार के सुव्यवस्थित, एवं बड़े पैमाने के वातावरण के साथ, इन नियमों और विधियों के अंतर्गत लोगों की ज़िन्दगी आगे बढ़ती है। इन नियमों के अंतर्गत पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोग विकसित हुए, और लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी इन नियमों के भीतर जीवित रहे हैं। लोगों ने जीवित बचे रहने के लिए इस सुव्यवस्थित वातावरण का और साथ ही परमेश्वर के द्वारा सृजित बहुत सारी चीज़ों का पीढ़ी-दर-पीढ़ी आनन्द लिया है। भले ही लोगों को महसूस होता है कि इस प्रकार के नियम स्वाभाविक हैं, और वे उनका सम्मान न करते हुए उनका मोल नहीं समझते हैं, और भले ही उन्हें महसूस न हो कि परमेश्वर इन नियमों का आयोजन कर रहा है, इन पर शासन कर रहा है, फिर भी हर परिस्थिति में, परमेश्वर इस अपरिवर्तनीय कार्य में हमेशा से लगा हुआ है। इस अपरिवर्तनीय कार्य में उसका उद्देश्य मानवजाति को अस्तित्व में बनाए रखना है, ताकि वह निरन्तर जीवित रहे।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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