परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI" | अंश 159

जब कभी शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करता है या बेलगाम क्षति में संलग्न हो जाता है, तो परमेश्वर आलस्य से किनारे खड़ा नहीं रहता है, न तो वह एक तरफ हट जाता है या न ही अपने चुने हुओं को अनदेखा करता है जिन्हें उसने चुना है। वह सब जो शैतान करता है वह बिलकुल स्पष्ट है और उसे परमेश्वर के द्वारा समझा जाता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि शैतान क्या करता है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वह किस प्रवृत्ति (प्रचलन) को उत्पन्न करता है, क्योंकि परमेश्वर वह सब जानता है जिसे शैतान करने का प्रयास कर रहा है, और परमेश्वर उन लोगों को नहीं छोड़ता है जिन्हें उसने चुना है। इसके बजाए, परमेश्वर कोई ध्यान आकर्षित किए बिना, गुप्त रीति से, शांति से, सब कुछ करता है जो आवश्यक है। जब वह किसी पर कार्य करना प्रारम्भ करता है, जब वह किसी को चुनता है, तो वह इसकी घोषणा किसी पर नहीं करता है, न ही वह इसकी घोषणा शैतान पर करता है, कोई भव्य भाव प्रदर्शन तो बिलकुल भी नहीं करता है। वह बस बहुत शान्ति से, बहुत स्वभाविक रीति से जो ज़रूरी है उसे करता है। पहले, वह तुम्हारे लिए एक परिवार चुनता है; उस परिवार की पृष्ठभूमि किस प्रकार की है, तुम्हारे माता पिता कौन हैं, तुम्हारे पूर्वज कौन हैं—यह सब पहले से ही परमेश्वर के द्वारा निर्धारित किया गया था। दूसरे शब्दों में, ये उस पल के फैसलों की प्रेरणा नहीं थे जिन्हें उसके द्वारा लिया गया था, परन्तु इसके बजाए यह ऐसा कार्य था जिसे लम्बे समय पहले शुरू किया था। जब एक बार परमेश्वर तुम्हारे लिए किसी परिवार का चुनाव करता है, तो वह उस तिथि को भी चुनता है जिसमें तुम्हारा जन्म होता है। वर्तमान में, जब तुम रोते हुए इस संसार में जन्म लेते हो तो परमेश्वर देखता है, तुम्हारे जन्म को देखता है, तुम्हें देखता है जब तुम अपने पहले वचनों को बोलते हो, तुम्हें देखता है जब तुम लड़खड़ाते हो और अपने पहले कदमों को उठाते हो, और सीखते हो कि कैसे चलना है। पहले तुम एक कदम लेते हो फिर दूसरा कदम लेते हो ... अब तुम दौड़ सकते हो, अब तुम कूद सकते हो, अब तुम बातचीत कर सकते हो, अब तुम अपनी भावनाओं को व्यक्त कर सकते हो। इस समय के दौरान, जब मनुष्य बड़ा होने लगता है, शैतान की नज़रें उनमें से प्रत्येक पर जम जाती हैं, जैसे कोई बाघ अपने शिकार को देख रहा हो। परन्तु अपने कार्य को करने में, परमेश्वर कभी भी मनुष्य, घटनाओं या चीज़ों, अन्तराल या समय की सीमाओं से पीड़ित नहीं हुआ है; वह उसे करता है जिसे उसे करना चाहिए और उसे करता जिसे उसे आवश्य करना चाहिए। बड़े होने की प्रक्रिया में, हो सकता है कि तुम कई चीज़ों का सामना करो जो तुम्हें पसन्द न आएँ, और बीमारियों एवं तनावों का सामना करो। परन्तु जैसे-जैसे तुम इस मार्ग पर चलते हो तुम्हारा जीवन एवं तुम्हारा भविष्य सख्ती से परमेश्वर की देखरेख के अधीन होता है। तुम्हारे सम्पूर्ण जीवन में बने रहने के लिए परमेश्वर तुम्हें एक विशुद्ध गारंटी देता है, क्योंकि वह बिलकुल तुम्हारे बगल में ही है, तुम्हारी रक्षा करता है और तुम्हारी देखभाल करता है। इस बात से अनजान, तुम बढ़ते जाते हो। तुम नई नई बातों के सम्पर्क में आने लगते हो और इस संसार को और इस मानवजाति को जानना प्रारम्भ करते हो। तुम्हारे लिए हर एक चीज़ ताज़ा एवं नया होता है। तुम अपने कार्य को करना पसन्द करते हो और तुम उसे करना पसन्द करते हो जो तुमको अच्छा लगता है। तुम अपनी स्वयं की मानवता के भीतर रहते हो, तुम अपने स्वयं के जीवन के दायरे में भीतर जीते हो, और तुम्हारे पास परमेश्वर के अस्तित्व के विषय में जरा सी भी अनुभूति नहीं होती है। परन्तु जैसे जैसे तुम बड़े होते जाते हैं परमेश्वर मार्ग के हर कदम पर तुम्हें देखता है, और तुम्हें देखता है जब तुम आगे की ओर हर कदम उठाते हो। यहाँ तक कि जब तुम ज्ञान अर्जित करते हो, या विज्ञान की पढ़ाई करते हो, किसी भी कदम पर परमेश्वर ने तुम्हें कभी अकेला नहीं छोड़ा है। इस मामले में तुम भी अन्य लोगों के ही समान हो, इस संसार को जानने और उसके साथ सम्पर्क में आने के पथक्रम में, तुमने अपने स्वयं के आदर्शों को स्थापित कर लिया है, तुम्हारे पास तुम्हारे स्वयं के शौक, तुम्हारी स्वयं की रूचियाँ हैं, और साथ ही तुम ऊँची महत्वाकांक्षाओं को भी आश्रय देते हो। तुम अकसर अपने स्वयं के भविष्य पर विचार करते हो, अकसर रूपरेखा खींचते हो कि तुम्हारे भविष्य को कैसा दिखना चाहिए। परन्तु इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि मार्ग पर क्या होता है, क्योंकि परमेश्वर साफ आँखों से सब कुछ देखता है। हो सकता है कि तुम अपने स्वयं के अतीत को भूल गए हो, परन्तु परमेश्वर के लिए, ऐसा कोई नहीं है जो उससे बेहतर तुम्हें समझ सकता है। तुम परमेश्वर की दृष्टि में जीवन बिताते हो, बढ़ते हो, और परिपक्व होते हो। इस समय अवधि के दौरान, परमेश्वर का सबसे महत्वपूर्ण कार्य कुछ ऐसा है जिसका एहसास कोई कभी नहीं करता है, कुछ ऐसा है जिसे कोई नहीं जानता है। परमेश्वर ने निश्चय ही तुम्हें इसके बारे में नहीं बताया है। अतः यह सबसे महत्वपूर्ण चीज़ क्या है? कोई व्यक्ति कह सकता है कि इस बात की गारंटी है कि परमेश्वर किसी व्यक्ति को बचाएगा। इसका अर्थ है कि परमेश्वर इस व्यक्ति को बचाना चाहता है, अतः उसे इसे करना ही होगा, और यह कार्य मनुष्य एवं परमेश्वर दोनों के लिए आवश्यक रूप से महत्वपूर्ण है। क्या तुम लोग इसे जानते हो? ऐसा लगता है कि तुम लोगों के पास इसके विषय में कोई एहसास नहीं है, या इसके विषय में कोई धारणा नहीं है, अतः मैं तुम्हें बताऊँगा। जब तुम्हारा जन्म हुआ उस समय से लेकर अब तक, परमेश्वर ने तुम में बहुत सारे कार्यों को सम्पन्न किया है, परन्तु हर बार जब भी उसने कुछ किया तो उसने तुम्हें नहीं बताया। तुम्हें नहीं जानना था, अतः तुम्हें नहीं बताया गया था, ठीक है? (हाँ।) मनुष्य के लिए, हर चीज़ जो परमेश्वर करता है वह महत्वपूर्ण है। परमेश्वर के लिए, यह ऐसी चीज़ है जिसे उसे करना ही होगा। परन्तु उसके हृदय में कोई महत्वपूर्ण चीज़ है जिसे उसे करने की आवश्यकता है जो इन चीज़ों से कहीं बढ़कर है। वह क्या है? अर्थात्, जब मनुष्य पैदा हुआ था उस समय से लेकर अब तक, परमेश्वर को उनमें से प्रत्येक की सुरक्षा की गारंटी देनी होगी। हो सकता है कि तुम लोग ऐसा महसूस करो मानो तुम लोगों ने पूरी तरह से नहीं समझा है, यह कहते हुए, "क्या यह सुरक्षा इतनी महत्वपूर्ण है?" अतः "सुरक्षा" का शाब्दिक अर्थ क्या है? हो सकता है कि तुम लोग इसे इस अभिप्राय से समझते हो कि यह शांति है या हो सकता है कि तुम लोग इसे इस अभिप्राय से समझते हो कि कभी विपत्ति या आपदा का अनुभव न करना, अच्छे से जीवन बिताना, एक सामान्य जीवन बिताना। परन्तु अपने हृदय में तुम लोगों को जानना होगा कि यह उतना आसान नहीं है। अतः पृथ्वी पर यह क्या चीज़ है जिसके विषय में मैं बात करता रहा हूँ, जिसे परमेश्वर को करना है? परमेश्वर के लिए इसका क्या अर्थ है? क्या यह वास्तव में तुम्हारी सुरक्षा की गारंटी है? ठीक इसी वक्त के समान? नहीं। अतः वह क्या है जो परमेश्वर करता है? इस सुरक्षा का अर्थ यह है कि तुम्हें शैतान के द्वारा फाड़ कर खाया नहीं जा रहा है। क्या यह महत्वपूर्ण है? तुम्हें शैतान के द्वारा फाड़ कर खाया नहीं जा रहा है, अतः क्या यह तुमकी सुरक्षा से सम्बन्धित है, या नहीं? यह वास्तव में तुम्हारी व्यक्तिगत सुरक्षा से सम्बन्धित है, और इससे अधिक महत्वपूर्ण और कुछ भी नहीं हो सकता है। जब एक बार तुम्हें शैतान के द्वारा फाड़ खाया (नष्ट किया) जाता है, तब न तो तुम्हारी आत्मा और न ही तुम्हारा शरीर आगे से परमेश्वर का है। परमेश्वर तुम्हें अब आगे से नहीं बचाएगा। परमेश्वर ऐसी आत्माओं को छोड़ देता है और ऐसे लोगों को छोड़ देता है। अतः मैं कहता हूँ कि सबसे महत्वपूर्ण कार्य जिसे परमेश्वर को करना है वह तुम्हारी सुरक्षा की गारंटी देना है, यह गारंटी देना कि तुम्हें शैतान के द्वारा फाड़ कर खाया नहीं जाएगा। यह अति महत्वपूर्ण है, है कि नहीं? अतः तुम लोग उत्तर क्यों नहीं दे सकते हो? ऐसा प्रतीत होता है कि तुम लोग परमेश्वर की महान दया को महसूस नहीं कर सकते हो!

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

क्या आप जानना चाहते हैं कि सच्चा प्रायश्चित करके परमेश्वर की सुरक्षा कैसे प्राप्त करनी है? इसका तरीका खोजने के लिए हमारे ऑनलाइन समूह में शामिल हों।
WhatsApp पर हमसे संपर्क करें
Messenger पर हमसे संपर्क करें

संबंधित सामग्री

परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II" | अंश 32

परमेश्वर अब्राहम से एक पुत्र देने की प्रतिज्ञा करता है (उत्पत्ति 17:15-17) फिर परमेश्‍वर ने अब्राहम से कहा, "तेरी जो पत्नी सारै है, उसको तू...

परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VIII" | अंश 170

हमने इस वाक्यांश "परमेश्वर सभी चीज़ों के लिए जीवन का स्रोत है" के सम्बन्ध में बहुत सारे विषयों एवं सार पर बातचीत की है, परन्तु क्या तुम लोग...

परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV" | अंश 139

शैतान और यहोवा परमेश्वर के मध्य वार्तालाप (अय्यूब 1:6-11) एक दिन यहोवा परमेश्‍वर के पुत्र उसके सामने उपस्थित हुए, और उनके बीच शैतान भी आया।...

परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI" | अंश 161

अब अंत के दिनों में परमेश्वर के कार्य के साथ, वह मनुष्य को सिर्फ अनुग्रह एवं आशीषें ही नहीं देता है जैसा उसने शुरुआत में किया था, न ही वह...