परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI" | अंश 155

मनुष्य के द्वारा ज्ञान सीखने की प्रक्रिया के दौरान, शैतान किसी भी तरीके का उपयोग कर सकता है जिससे लोग अपनी स्वयं की वासनाओं को संतुष्ट कर सकें और अपने स्वयं के आदर्शों को साकार कर सकें। क्या तुम स्पष्ट हो कि शैतान तुमको वास्तव में किस मार्ग पर ले जाना चाहता है? इसे नम्रतापूर्वक कहें, तो लोग सोचते हैं कि ज्ञान को सीखने में कुछ भी गलत नहीं है, यह तो सामान्य बात है। वे सोचते हैं कि ऊँचे विचारों को बढ़ावा देने और महत्वाकांक्षाओं के होने को महज आकांक्षाओं को रखना ही कहा जाता है, और यह कि लोगों के लिए इसे ही सही मार्ग होना चाहिए कि वे उसका अनुसरण करें। यदि लोग अपने स्वयं के आदर्शों को साकार कर सकते, या जीवन में कोई जीवन वृत्ति (कैरियर) बना लेते—तो क्या उस तरह से जीवन बिताना और भी अधिक गौरवशाली नहीं होता? उस प्रकार से न केवल किसी व्यक्ति के पूर्वजों का सम्मान करना बल्कि इतिहास पर उसकी छाप छोड़ देना—क्या यह एक अच्छी बात नहीं है? यह सांसारिक लोगों की दृष्टि में एक अच्छी एवं उचित बात है। फिर भी, क्या शैतान अपने भयावह इरादों के साथ, लोगों को इस प्रकार के मार्ग पर ले चलता है और तब निर्णय लेता है कि यह पूरा हो गया है? कदापि नहीं। वास्तव में, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि मनुष्य के आदर्श कितने ऊँचे हैं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि मनुष्य की इच्छाएँ कितनी वास्तविक हैं या वे कितनी उचित हो सकती हैं, क्योंकि वह सब जो मनुष्य हासिल करना चाहता है, और वह सब जिसे मनुष्य खोजता है वह गहन रूप से दो शब्दों से जुड़ा हुआ है। दो शब्द प्रत्येक व्यक्ति के जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, और ये ऐसी चीज़ें हैं जिन्हें शैतान मनुष्य के भीतर डालने का इरादा करता है। ये दो शब्द कौन से हैं? एक "प्रसिद्धि" है और दूसरा "लाभ" है: ये प्रसिद्धि और लाभ हैं। शैतान बहुत ही धूर्त किस्म का मार्ग चुनता है, ऐसा मार्ग जो मनुष्य की धारणाओं के साथ बहुत अधिक मिलता जुलता है; यह किसी प्रकार का चरम मार्ग नहीं है। अनभिज्ञता के मध्य, लोग शैतान के जीवन जीने के तरीके, जीवन जीने के उसके नियमों को स्वीकार करने लगते हैं, जीवन के लक्ष्यों और जीवन में अपनी दिशा को स्थापित करते हैं, और ऐसा करने से वे अनजाने में ही जीवन में आदर्शों को प्राप्त करने लगते हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि जीवन में ये आदर्श कितने ऊँचे प्रतीत होते हैं, क्योंकि वह केवल एक बहाना है जो प्रसिद्धि और लाभ से गहन रूप से जुड़ा हुआ है। कोई भी महान या प्रसिद्ध व्यक्ति, और वास्तव में सभी लोग, जिस किसी चीज़ का वे जीवन में अनुसरण करते हैं वह केवल इन दो शब्दों से ही जुड़ा होता हैः "प्रसिद्धि" एवं "लाभ"। क्या ऐसा ही नहीं है? (हाँ।) लोग सोचते हैं कि जब एक बार उनके पास प्रसिद्धि एवं लाभ आ जाता है, तो वे ऊँचे रुतबे एवं अपार धन-सम्पत्ति का आनन्द लेने के लिए, और जीवन का आनन्द लेने के लिए उनका लाभ उठा सकते हैं। जब एक बार उनके पास प्रसिद्धि एवं लाभ आ जाता है, तो वे देह के सुख विलास की अपनी खोज में और अनैतिक आनन्द में उनका लाभ उठा सकते हैं। लोग स्वेच्छा से, यद्यपि अनजाने में, अपने शरीरों, मनों, वह सब जो उनके पास है, अपने भविष्य एवं अपनी नियति को शैतान के हाथों में दे देते हैं जिससे उस प्रसिद्धि एवं लाभ को अर्जित कर सकें जिनकी उन्होंने लालसा की है। लोग इसे एक पल की हिचकिचाहट के बगैर सदैव करते हैं, और उस आवश्यकता के प्रति सदैव अनजान होकर ऐसा करते हैं कि उन्हें सब कुछ पुनः प्राप्त करना है। क्या लोगों के पास अभी भी स्वयं पर कोई नियन्त्रण हो सकता है जब एक बार वे शैतान की ओर इस प्रकार से चले जाते हैं और उसके प्रति वफादार हो जाते हैं। कदापि नहीं। उन्हें पूरी तरह से और सम्पूर्ण रीति से शैतान के द्वारा नियन्त्रित किया जाता है। साथ ही वे पूरी तरह से और सम्पूर्ण रीति से अपने आप को उस दलदल से आज़ाद कराने में असमर्थ हो जिसके भीतर वे धँस गए हैं। जब एक बार कोई प्रसिद्धि एवं लाभ के दलदल में फँस जाता है, तो वे आगे से उसकी खोज नहीं करते हैं जो उजला है, जो धर्मी है या उन चीज़ों को जो खूबसूरत एवं अच्छी हैं। यह इसलिए है क्योंकि वह मोहक शक्ति जो प्रसिद्धि एवं लाभ लोगों के ऊपर रखता है वह बहुत बड़ा है, और वे लोगों के लिए ऐसी चीज़ें बन जाती हैं कि शुरूआत से लेकर अन्त तक और यहाँ तक कि बिना रुके पूरे अनंतकाल तक उनका अनुसरण किया जाता है। क्या यह सत्य नहीं है? कुछ लोग कहेंगे कि ज्ञान को सीखना तो कुछ पुस्तकों को पढ़ने या कुछ चीज़ों को सीखने से बढ़कर और कुछ भी नहीं है जिन्हें वे पहले से नहीं जानते हैं, यह कहते हैं कि वे ऐसा इसलिए करते हैं ताकि समय से पीछे न हों जाएँ या संसार के द्वारा पीछे न छोड़ दिए जाएँ। वे कहेंगे कि ज्ञान को सिर्फ इसलिए सीखा जाता है ताकि वे अपने स्वयं के भविष्य के लिए या मूलभूत आवश्यकताओं के लिए मेज़ पर भोजन रख सकें। अब क्या तुम मुझे बता सकते हो कि क्या कोई ऐसा व्यक्ति है जो मात्र मूलभूत आवश्यकताओं के लिए, और मात्र भोजन के मुद्दे का समाधान करने के लिए एक दशक के कठिन अध्ययन को सहेगा? (नहीं, ऐसा नहीं है।) इस प्रकार के कोई लोग नहीं हैं! अतः वह क्या है कि उसके लिए उसने इन सारे वर्षों में इन कठिनाईयों एवं कष्टों को सहन किया है? यह प्रसिद्धि और लाभ के लिए है: प्रसिद्धि एवं लाभ उसके आगे उसका इंतज़ार कर रहे हैं, उसे बुला रहे हैं, और वह विश्वास करता है कि केवल उसके स्वयं के परिश्रम, कठिनाईयों और संघर्ष के माध्यम से ही वह उस मार्ग का अनुसरण कर सकता है और इसके द्वारा प्रसिद्धि एवं लाभ प्राप्त कर सकता है। उसे अपने स्वयं के भविष्य के पथ के लिए, अपने भविष्य के आनन्द और एक बेहतर ज़िन्दगी के लिए इन कठिनाईयों को सहना ही होगा। क्या तुम लोग मुझे बता सकते हो कि इस पृथ्वी पर इस तथाकथित ज्ञान को क्या कहा जाता है? क्या यह जीवन जीने के नियम और जीवन के आर पार एक मार्ग नहीं है जिसे शैतान के द्वारा लोगों के भीतर डाला गया है, जिसे उनके ज्ञान सीखने के पथक्रम में शैतान के द्वारा सिखाया गया है? क्या यह जीवन के ऊँचे आदर्श नहीं हैं जिन्हें शैतान के द्वारा मनुष्य के भीतर डाला गया था? उदाहरण के लिए, महान लोगों के आदर्शों, प्रसिद्ध लोगों की खराई या प्रख्यात लोगों की बहादुरी के जज़्बे को लीजिए, या नायकों के शौर्य एवं उदारता और युद्ध कला के उपन्यासों में तलवारबाज़ों को लीजिए; ये विचार एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी पर अपना प्रभाव डाल रहे हैं, और प्रत्येक पीढ़ी को लाया जाता है ताकि इन विचारों को स्वीकार करे, इन विचारों के लिए जीए और बिना रुके इनका अनुसरण करे। यह वह मार्ग है, वह माध्यम है, जिसके अंतर्गत शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए ज्ञान का उपयोग करता है। अतः जब शैतान ने प्रसिद्धि एवं लाभ के मार्ग पर लोगों की अगुवाई की उसके पश्चात्, क्या तब भी उनके लिए परमेश्वर पर विश्वास करना, एवं उसकी आराधना करना सम्भव है? (नहीं, यह सम्भव नहीं है।) क्या जीवन जीने के ज्ञान एवं नियम जिन्हें शैतान के द्वारा मनुष्य के भीतर डाला गया उनमें परमेश्वर की आराधना का कोई विचार है? क्या वे कोई विचार रखते हैं जो सत्य से सम्बन्धित है? (नहीं, वे नहीं रखते हैं।) क्या वे परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने से कोई वास्तविकता रखते हैं? (नहीं, वे नहीं रखते हैं।) तुम लोग थोड़ी अनिश्चितता की बातें करते हुए प्रतीत होते हो, परन्तु कोई फर्क नहीं पड़ता है। सभी बातों में सत्य को खोजो और तुम सब सही उत्तरों को प्राप्त करोगे; सिर्फ सही उत्तरों से तुम लोग सही मार्ग पर चल सकते हो।

आइए हम संक्षेप में फिर से दोहराएँ: शैतान मनुष्य को घेरे रखने और नियन्त्रण में रखने के लिए किस का इस्तेमाल करता है? (प्रसिद्धि एवं लाभ।) अतः शैतान तब तक मनुष्य के विचारों को नियन्त्रित करने के लिए प्रसिद्धि एवं लाभ का इस्तेमाल करता है जब तक वे पूरी तरह से यह नहीं सोच सकते हैं कि यह प्रसिद्धि एवं लाभ है। वे प्रसिद्धि एवं लाभ के लिए संघर्ष करते हैं, प्रसिद्धि एवं लाभ के लिए कठिनाईयों को सहते हैं, प्रसिद्धि एवं लाभ के लिए अपमान सहते हैं, प्रसिद्धि एवं लाभ के लिए जो कुछ उनके पास है उसका बलिदान करते हैं, और प्रसिद्धि एवं लाभ दोनों को बरकरार रखने एवं अर्जित करने के लिए वे किसी भी प्रकार का आंकलन करेंगे या कोई भी निर्णय लेंगे। इस रीति से, शैतान मनुष्य को अदृश्य बन्धनों से बाँध देता है। इन बन्धनों को लोगों की देहों पर डाला जाता है, और उनके पास इन्हें उतार फेंकने की न तो सामर्थ होती है न ही साहस होता है। अतः लोग अनजाने में ही इन बन्धनों को सहते हुए बड़ी कठिनाई में भारी कदमों से नित्य आगे बढ़ते रहते हैं। इस प्रसिद्धि एवं लाभ की खातिर, मनुष्य परमेश्वर से दूर हो जाता है और उसे धोखा देता है। हर गुज़रती हुई पीढ़ी के साथ, मानवजाति और भी अधिक दुष्ट बनती जाती है, और भी अधिक अंधकार में पड़ती जाती है, और इस रीति से एक के बाद दूसरी पीढ़ी को शैतान के द्वारा नष्ट कर दिया जाता है। अब शैतान के कार्यों को देखने पर, उसके भयावह इरादे वास्तव में क्या हैं? अब यह स्पष्ट है, है कि नहीं? क्या शैतान घृणित नहीं है? (हाँ!) हो सकता है कि आज तुम लोग शैतान के भयानक इरादों के आर पार नहीं देख सकते हो क्योंकि तुम सब सोचते हो कि प्रसिद्धि एवं लाभ के बगैर कोई जीवन नहीं है। तुम लोग सोचते हो कि, यदि लोग प्रसिद्धि एवं लाभ को पीछे छोड़ देते हैं, तो वे आगे से सामने के मार्ग को देखने में सक्षम नहीं होंगे, आगे से अपने लक्ष्यों को देखने में सक्षम नहीं होंगे, उनका भविष्य अंधकार, धुंधला एवं उदास हो जाता है। परन्तु, धीरे धीरे तुम सभी यह पहचानोगे कि प्रसिद्धि एवं लाभ ऐसे भयानक बन्धन हैं जिनका इस्तेमाल शैतान मनुष्य को बाँधने के लिए करता है। उस दिन तक जब तुम इस पहचान जाते हो, तब तुम पूरी तरह से शैतान के नियन्त्रण का विरोध करोगे और उन बन्धनों का पूरी तरह से विरोध करोगे जिन्हें शैतान तुम्हें बाँधने के लिए लाता है। जब तुम्हारे लिए वह समय आता कि तुम इन सभी चीज़ों को फेंकने की इच्छा करते हो जिन्हें शैतान ने तुम्हारे भीतर डाला है, तब तुम शैतान से अपने आपको पूरी तरह से अलग कर लोगे और साथ ही सचमुच में उन सब से घृणा करोगे जिन्हें शैतान तुम्हारे लिए लेकर आता है। केवल तभी तुम्हारे पास परमेश्वर के लिए सच्चा प्रेम एवं लालसा होगी।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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