परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV" | अंश 148

मनुष्य को भ्रष्ट करने में शैतान विज्ञान का कैसे उपयोग करता है

विज्ञान क्या है? क्या विज्ञान ने प्रत्येक के दिमाग में बड़ी प्रतिष्ठा और गहरा प्रभाव नहीं डाल रखा है? (हां, ऐसा है।) जब विज्ञान की चर्चा की जाये तो क्या लोग महसूस नहीं करते, "यह कुछ ऐसी बात है जो आमतौर पर लोग नहीं ग्रहण कर पाते, यह एक ऐसा विषय है जिसे केवल कुछ वैज्ञानिक शोधकर्ता या माहिर ही छू सकते हैं, इसका सामान्य जनता से कोई सम्बन्ध नहीं है?" क्या इनका कोई सम्बन्ध है भी? (हां।) शैतान लोगों को दूषित करने के लिये किस प्रकार विज्ञान को उपयोग में लाता है? हम अन्य चीजों के विषय में बात नहीं करेंगे केवल उन बातों की चर्चा करेंगे लोग अपने जीवन में लगातार जिनका सामना करते रहते हैं। क्या आपने वंशाणुओं की उत्पत्ति के विषय में सुना है? (हां।) आप सब इस शब्द से परिचित हैं, सही? क्या वंशाणु विज्ञान द्वारा खोजे गए थे? वास्तव में वंशाणु लोगों के लिए क्या मायने रखते हैं? क्या यह लोगों को यह महसूस नहीं कराता कि शरीर एक रहस्यमयी वस्तु है? जब लोगों को इस विषय से परिचित कराया जाता है, तो क्या वहां ऐसे लोग न होंगे—विशेषकर जिज्ञासु, जो और अधिक जानना चाहते हैं या और विवरण चाहते हैं? जिज्ञासु लोग अपनी शक्ति इस विषय पर लगाएंगे और जब वे फुरसत में होंगे, वे और अधिक जानकारी के लिये पुस्तकें और इंटरनेट खोजेंगे। विज्ञान क्या है? स्पष्ट भाषा में, विज्ञान उस चीज़ों के विचार और सिद्धांत हैं जिनके विषय में मनुष्य जिज्ञासु है, बातें जो अज्ञात हैं, और परमेश्वर द्वारा उन्हें नहीं बताई गईं हैं; विज्ञान उन रहस्यों को जिन्हें मनुष्य खोजना चाहता है, का विचार और सिद्धांत है। आपको क्या लगता है, विज्ञान का दायरा कितना है? आप यह कह सकते हैं कि विज्ञान सब चीज़ों को संक्षेप में संग्रहित करता है, परन्तु मनुष्य कैसे विज्ञान का कार्य करता है? क्या यह शोध के द्वारा होता है? इसमें इन बातों का विवरण और नियमों पर शोध शामिल है और तब इन संदिग्ध, अनिश्चित सिद्धांतों को एकत्रित करके लाना कि प्रत्येक उनके बारे में क्या सोचते हैं, "ये वैज्ञानिक सचमुच कमाल के होते हैं। वे इन चीज़ों के बारे में बहुत जानते और समझते हैं!" उन लोगों के लिए उनके पास काफी सराहना होती है, सही? जो लोग विज्ञान की खोज करते हैं, वे किस प्रकार का दृष्टिकोण रखते हैं? क्या वे ब्रह्माण्ड पर शोध नहीं करना चाहते, अपनी रूचि के क्षेत्र में रहस्यमयी बातों पर शोध नहीं करना चाह्ते? और अंत में इसका परिणाम क्या आता है? कुछ विज्ञानों में लोगों ने अनुमान के आधार पर अपना निष्कर्ष निकाला, अन्य विज्ञानों में लोगों ने अपने अनुभवों को ध्यान में रखते हुए निष्कर्ष निकाले; और विज्ञान के दूसरे क्षेत्रों में लोगों ने अपने निष्कर्ष अनुभव या इतिहास और उनकी पृष्ठभूमि के अवलोकनों के आधार पर अपने निष्कर्ष निकाले। क्या यह सही है? (हां।) तो विज्ञान लोगों के लिए क्या करता है? विज्ञान यह करता है कि वह मनुष्यों को इस भौतिक जगत में चीजों को देखने और मनुष्य की उत्कंठा मात्र को सन्तुष्ट करता है; वह मनुष्य को उन नियमों को जिनके द्वारा परमेश्वर सब चीज़ों पर प्रभुता करता है, देखने की अनुमति नहीं देता। मनुष्य विज्ञान के द्वारा उत्तर पाने की चेष्टा करता प्रतीत होता है, परन्तु ये उत्तर उलझन और अस्थायी संतुष्टि देते हैं, एक ऐसी संतुष्टि जो मनुष्य के मन को केवल इस भौतिक संसार में सीमित रखती है। मनुष्य सोचता है कि विज्ञान ने हर चीज़ का उत्तर पहले ही दे दिया है, तो जो भी मामला उठ खड़ा हो वे उसे मानने या अस्वीकृत करने के लिये अपने वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर ही अटल विश्वास रखते हैं। मनुष्य का हृदय इस हद तक विज्ञान का गुलाम हो जाता है कि उसकी मानसिक स्थिति ऐसी रहती ही नहीं कि वह परमेश्वर को जानें, उसकी उपासना करे, और यह विश्वास करे कि सब वस्तुएं परमेश्वर की ही ओर से आती हैं, और उसी से उत्तर पाने के लिए उसकी ओर निहारें। क्या यह सच नहीं है? आप देख सकते हैं कि मनुष्य जितना विज्ञान में विश्वास करते हैं, उतना ही वे विवेकशून्य हो जाते हैं और यह विश्वास करते हैं कि हर एक बात का एक वैज्ञानिक हल है, और शोध हर बात को हल कर सकती है। वे परमेश्वर को नहीं खोजते और यह भी विश्वास नहीं करते कि उसका अस्तित्व है, यहां तक कि कुछ लोग जो कई सालों से परमेश्वर को मान रहे थे, सनक में आकर बैक्टीरिया की खोज में लग जाएंगे या उत्तर पाने के लिए जानकारी की खोजबीन करेंगे। ऐसे लोग चीज़ों को सच्चाई के नज़रिये से नहीं देखते और अधिकांश मामलों में ये वैज्ञानिक दृष्टिकोण और ज्ञान के भरोसे या वैज्ञानिक उत्तर से समस्या का हल पाना चाहते हैं। परन्तु वे न तो परमेश्वर पर भरोसा करते हैं, न परमेश्वर की खोज करते हैं। क्या ऐसे लोगों के हृदय में परमेश्वर होता है? (नहीं।) कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो परमेश्वर पर उसी तरह से शोध करना चाहते हैं जैसे वे विज्ञान का अध्ययन करते हैं। उदाहरण के लिए, कई धर्म विशेषज्ञ उस स्थान पर गए जहां प्रलय के बाद जहाज़ टिका था। उन्होंने जहाज़ को देखा, परन्तु जहाज के दिखाई देने में उन्होंने परमेश्वर के अस्तित्व को नहीं देखा। उन्होंने केवल कहानियों और इतिहास पर विश्वास किया। यह उनके वैज्ञानिक शोध और भौतिक संसार के अध्ययन का परिणाम है। यदि आप भौतिक वस्तु पर ही शोध करेंगे तो चाहे वे सूक्ष्म जीव विज्ञान हो, खगोलशास्त्र या भूगोल हो, आप कभी भी वह परिणाम नहीं पाएंगे जो कहता हो कि परमेश्वर का अस्तित्व है या वह सब वस्तुओं पर प्रभुता रखता है। क्या यह सही है? (हां।) इसलिए विज्ञान मनुष्य के लिए क्या करता है? क्या वह मनुष्य को परमेश्वर से दूर नहीं करता है? क्या यह लोगों को परमेश्वर का अध्ययन करने की अनुमति नहीं देता है? क्या यह लोगों को परमेश्वर के अस्तित्व में संदेह पैदा नहीं करता है? (हां।) तो शैतान मनुष्य को दूषित करने के लिये किस प्रकार विज्ञान का उपयोग करता है? क्या शैतान लोगों को धोखा देने और संज्ञाशून्य कर देने के लिये वैज्ञानिक निष्कर्षों का उपयोग करता है? शैतान लोगों के दिलों पर आधिपत्य करने के लिये भ्रामक उत्तरों का उपयोग करता है ताकि वे परमेश्वर के अस्तित्व की खोज न करें। इस प्रकार वे प्रभु के विषय में संदेह करते रहेंगे, उससे इंकार करते रहेंगे और उससे दूरी बना लेंगे। इसलिए हम कहते हैं कि यह उन तरीकों में से एक है जिससे शैतान लोगों को भ्रष्ट करता है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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