परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV" | अंश 145

(मत्ती 4:5-7) तब इब्लीस उसे पवित्र नगर में ले गया और मन्दिर के कंगूरे पर खड़ा किया, और उससे कहा, "यदि तू परमेश्वर का पुत्र है, तो अपने आप को नीचे गिरा दे; क्योंकि लिखा है: 'वह तेरे विषय में अपने स्वर्गदूतों को आज्ञा देगा, और वे तुझे हाथों-हाथ उठा लेंगे; कहीं ऐसा न हो कि तेरे पाँवों में पत्थर से ठेस लगे।'" यीशु ने उससे कहा, "यह भी लिखा है: 'तू प्रभु अपने परमेश्वर की परीक्षा न कर।'"

आइए, पहले हम शैतान के इस वाक्यांश पर चर्चा करें। उसने कहा, "यदि तू परमेश्वर का पुत्र है, तो अपने आप को नीचे गिरा दे," और तब उसने पवित्रशास्त्र का उल्लेख किया, "वह तेरे विषय में अपने स्वर्गदूतों को आज्ञा देगा, और वे तुझे हाथों-हाथ उठा लेंगे; कहीं ऐसा न हो कि तेरे पाँवों में पत्थर से ठेस लगे।" जब आप शैतान के शब्दों को सुनते हैं तब आप कैसा महसूस करते हैं? क्या वे बहुत बचकाने नहीं हैं? वे बचकाने हैं, निरर्थक और घृणास्पद हैं। मैं यह क्यों कहूंगा? शैतान हमेशा कुछ मूर्खतापूर्ण कार्य के पीछे रहता है, वह स्वयं को बहुत ही चतुर समझता है, और अक्सर पवित्रशास्त्र का उल्लेख करता है—यहां तक कि परमेश्वर के प्रत्येक शब्द का—वह उन शब्दों का उपयोग परमेश्वर की परीक्षा लेने और उस पर हमला करने के लिए इस्तेमाल करता है। ऐसा करने में उसका उद्देश्य परमेश्वर के काम की योजना को बर्बाद करना होता है। फिर भी शैतान ने जो कहा क्या उस पर आपने ध्यान दिया? (उसमें पापमय भावना है।) शैतान हमेशा से प्रलोभन देने वाला रहा है; वह सीधे तौर पर नहीं बोलता, वह गोल-मटोल तरीके से प्रलोभन देने, दोष लगाने और गिराने के लिए बोलता है। शैतान परमेश्वर और मनुष्य दोनों को एक समान प्रलोभन देता है। वह सोचता है कि परमेश्वर और मनुष्य दोनों अनजान, मूर्ख और चीजों को स्पष्टता से पहचानने लायक नहीं हैं। शैतान सोचता है कि परमेश्वर और मनुष्य दोनों उसके तत्व को नहीं देख सकेंगे और यह कि परमेश्वर और मनुष्य उसकी चालाकी और पापमय नीयत को नहीं देख सकेंगे। क्या यहां शैतान की मूर्खता नहीं दिखती? (हां।) आगे, शैतान खुल्लम-खुल्ला पवित्रशास्त्र को पेश करता है; ऐसा करने से वह सोचता है कि उसे विश्वसनीयता प्राप्त होगी और आप उसकी गलती को नहीं पकड़ पाएंगे और इस तरह मूर्ख बनाए जाने को नज़रअंदाज़ करेंगे। क्या यह शैतान की बेतुकी और बचकानी हरकत नहीं है? (हां।) यह ठीक वैसा ही है जैसा जब कोई सुसमाचार सुनाता और परमेश्वर की गवाही देता है, तो क्या नास्तिक भी वैसा ही नहीं कहते जैसा शैतान ने कहा था? क्या आपने लोगों को वैसा ही कहते हुए सुना है? (हां।) जब आप इस तरह की बातें सुनते हैं तो क्या घृणा महसूस करते हैं? (हां।) जब आप घृणा से भर जाते हैं तो क्या आप नफरत और विद्रोह भी महसूस करते हैं? (हां।) जब आप यह अनुभव करते हैं तो क्या आप यह पहचान सकने के योग्य होते हैं कि शैतान मनुष्यों में जो काम करता है वह दूषित व्यवस्था और दुष्टता है। क्या कभी आपने अपने मन में ऐसा महसूस किया है, "परमेश्वर कभी ऐसा नहीं कहता। शैतान के शब्द हमला और प्रलोभन लाते हैं, उसके शब्द बेतुके, हास्यप्रद, बचकाने और घृणा उत्पन्न करने वाले हैं। फिर भी परमेश्वर अपने कथन में और काम में, ऐसी विधि का प्रयोग नहीं करेगा या अपना काम करेगा और न कभी उसने ऐसा किया है?" बेशक, इस परिस्थिति में लोगों के पास किंचितमात्रा में आगे बढ़ने की भावना रहती है और उन्हें परमेश्वर की पवित्रता का अहसास नहीं होता; वे केवल इतना स्वीकार कर सकते हैं कि परमेश्वर का वचन सत्य है। पर वे यह नहीं जानते कि सच्चाई स्वयं ही पवित्रता है। आप अपनी वर्तमान स्थिति के अनुसार केवल इतना महसूस करते हैं: "हर बात जो परमेश्वर कहते हैं वह सच है, हमारे लिए लाभकारी है और हमें उसे ग्रहण करना चाहिए," चाहे आप उसे ग्रहण करने के योग्य हों या ना भी हों, बिना अपेक्षा के आप कहते हैं कि परमेश्वर का वचन सत्य है और परमेश्वर सत्य है, परन्तु आप यह नहीं जानते कि सत्य स्वयं में पवित्र है और यह कि परमेश्वर पवित्र है।

इसलिए यीशु मसीह का प्रत्युत्तर शैतान के शब्दों के प्रति क्या था? "यीशु ने उससे कहा, यह भी लिखा है: 'तू प्रभु अपने परमेश्वर की परीक्षा न कर।'" यीशु ने जो वाक्यांश कहा क्या उसमें सच्चाई है? (हां।) उसमें सत्य है। ऊपरी तौर पर यह लगता है कि यह लोगों को मानने के लिए एक आदेश है, यह बहुत सरल वाक्यांश हैं, परन्तु यही एक है जिसका मनुष्य और शैतान ने बहुधा उल्लंघन किया है, इसलिए प्रभु यीशु ने उससे कहा, "तू प्रभु अपने परमेश्वर की परीक्षा न कर," क्योंकि शैतान ने बहुधा यही किया और ऐसा करने के लिए पूरा प्रयास भी किया, आप यहां तक कह सकते हैं कि शैतान ने बेशर्मी से ऐसा किया। यह शैतान का स्वभाव ही है कि वह परमेश्वर से न तो डरता है और न उसके मन में परमेश्वर की श्रद्धा ही है। इसलिए जब शैतान परमेश्वर के बाजू में था और उसे देख सकता था, शैतान अपने आप को परमेश्वर को प्रलोभन देने से रोक न सका। इसलिए प्रभु यीशु ने शैतान से कहा, "तू प्रभु अपने परमेश्वर की परीक्षा न कर।" यह एक ऐसा वाक्यांश है जो परमेश्वर ने शैतान से अक्सर कहा है। क्या यह उपयुक्त नहीं कि आज भी यह वाक्यांश कहा जाए? (हां।) क्यों? (क्योंकि हम भी अक्सर परमेश्वर को प्रलोभन देते हैं, उसकी परीक्षा लेते हैं।) लोग अक्सर परमेश्वर की परीक्षा लेते हैं, परन्तु बहुधा लोग ऐसा क्यों करते हैं? क्या यह ऐसा इसलिए है क्योंकि लोग शैतान के दूषित स्वभाव से भरे हुए हैं? (हां।) इसलिए जैसा शैतान ने ऊपर कहा कुछ वैसा ही लोग अक्सर कहते हैं? (हां।) किन परिस्थितियों में? कोई यह कह सकता है कि लोग ऐसा कह रहे हैं और स्वभाविक तौर पर कर रहे हैं, जिसमें समय और स्थान की कोई परवाह नहीं है। यह सिद्ध करता है कि लोगों का स्वभाव ठीक वैसा ही है जैसा शैतान का दूषित स्वभाव। प्रभु यीशु ने एक सरल वाक्यांश कहा, एक वह जो सत्य का प्रतिनिधित्व करता और जिसकी लोगों को आवश्यकता है। हालांकि इस परिस्थिति में क्या प्रभु यीशु शैतान से बहस कर रहा था? क्या जो बात उसने शैतान से कही उसमें कुछ विरोधाभास था? (नहीं।) कैसे प्रभु यीशु ने शैतान के प्रलोभन को अपने मन में देखा? क्या वह खीजा और विद्रोही हुआ? (हां।) प्रभु यीशु खीज से भर गया और विद्रोही भी हुआ, परन्तु उसने शैतान से वाद-विवाद नहीं किया, बल्कि किसी महान सिद्धांत के विषय में तो बात ही नहीं की, क्या यह सही नहीं है? (हां।) ऐसा क्यों है? (प्रभु यीशु शैतान को मान्यता नहीं देना चाह रहे थे।) वह शैतान को मान्यता क्यों नहीं देना चाह रहे थे? (क्योंकि शैतान हमेशा से ऐसा ही है, वह कभी नहीं बदल सकता।) क्या हम यह कह सकते हैं, कि शैतान हठी है? (हां, हम कह सकते हैं।) क्या शैतान मान सकता है कि परमेश्वर सत्य है? शैतान कभी नहीं मानेगा कि परमेश्वर सत्य है और न कभी स्वीकार करेगा कि परमेश्वर सत्य है; यह उसका स्वभाव है। इसके अलावा, शैतान के स्वभाव में कुछ और भी ऐसा है जो लोगों के लिए घृणास्पद है, यह क्या है? उसके प्रभु यीशु को परखने के प्रयास में, उसके मन में और क्या था? हालांकि उसने परमेश्वर को प्रलोभन देने का प्रयास किया लेकिन सफल नहीं हुआ, फिर भी शैतान ने प्रयास तो किया ही। हालांकि उसे दण्डित होना पड़ा, उसने किसी भी तरह ऐसा किया। हालांकि ऐसा करने पर उसे कुछ भी अच्छा प्राप्त नहीं हुआ, लेकिन उसने ऐसा किया, और अड़ा रहा और अंत तक परमेश्वर के विरुद्ध खड़ा रहा। यह किस तरह का स्वभाव है? क्या यह बुरा नहीं है? (हां।) जो लोग परमेश्वर का नाम सुनकर क्रोधित हो जाते हैं, क्या उन्होंने परमेश्वर को देखा है? जो लोग परमेश्वर का नाम सुनकर गुस्से में आ जाते हैं, क्या वे परमेश्वर को जानते हैं? वह नहीं जानते कि परमेश्वर कौन है, उस पर विश्वास नहीं करते और परमेश्वर ने उनसे बात नहीं की है। परमेश्वर ने उन्हें कभी परेशान नहीं किया तो फिर वे गुस्सा क्यों होते हैं? क्या हम कह सकते हैं कि यह व्यक्ति बुरा है? (हां।) क्या ऐसा व्यक्ति बुरे स्वभाव वाला होगा? संसार में चाहे जो कुछ भी हो रहा है, चाहे वह मनोरंजन, भोजन, प्रसिद्ध लोग, सुन्दर लोग, इन में से कोई भी चीज़ उन्हें परेशान नहीं करेगी, लेकिन "परमेश्वर" शब्द सुनकर वे विचलित हो जाते हैं; क्या यह बुरे स्वभाव का एक उदाहरण नहीं होगा? यह मनुष्य के बुरे स्वभाव को बताने के लिए संतोषजनक सबूत है? अब आपके स्वयं के लिए बात करते हैं, क्या कभी ऐसा हुआ है कि सत्य का उल्लेख किया गया है, या जब मनुष्य जाति के लिए परमेश्वर की परख का समय आता है, या जब मनुष्य के विरुद्ध परमेश्वर के न्याय, की बात की जाती है, और आप चिढ़, हठ महसूस करते और आप इसे नहीं सुनना चाहते? आप मन में सोचते है कि यह कैसा सच है? क्या सब लोगों ने नहीं कहा, परमेश्वर सत्य है? यह सच नहीं है, यह स्पष्ट रूप से मनुष्य के लिए परमेश्वर का दण्डात्मक शब्द है, कुछ लोग अपने मनों में चिढ़ महसूस कर सकते हैं, यह हर दिन होता है, उसके न्याय की तरह हर दिन हमारे लिए उसकी परख का उल्लेख होता है; इन सब का अंत कब होगा? हम अच्छा लक्ष्य कब पाएंगे? यह नहीं पता कि यह अनुचित क्रोध आता कहां से है। यह किस प्रकार का स्वभाव है? (बुरा स्वभाव।) यह शैतान के बुरे स्वभाव से प्रेरित है। जहां तक परमेश्वर का सम्बन्ध है, वह शैतान के बुरे स्वभाव और मनुष्य के दूषित स्वभाव के विषय में, वह कभी मनुष्य से विवाद या झगड़ा नहीं करता, और वह कभी भी गुस्सा नहीं होता जब मनुष्य अज्ञानता में काम करते हैं। जैसा मनुष्य का दृष्टिकोण होता है वैसा परमेश्वर का दृष्टिकोण नहीं होता, इसके अलावा, उसे काम करने के लिये मनुष्य के दृष्टिकोण, उनके ज्ञान, उनके विज्ञान या उनके दर्शनशास्त्र या कल्पनाओं का उपयोग करने की आवश्यकता नहीं होती। बल्कि प्रत्येक बात जो परमेश्वर करता और जो परमेश्वर प्रगट करता है वह सत्य से जुड़ी होती है। यानिकि उसका हर शब्द और हर कार्य सच से संबंधित है। यह सत्य कोई आधारहीन कल्पना नहीं है। यह सत्य और ये शब्द परमेश्वर द्वारा उजागर किए गये हैं। वह परमेश्वर के तत्व और उसके जीवन के कारण हुए हैं। क्योंकि ये शब्द और तत्व और प्रत्येक बात जो परमेश्वर ने की, सच है, इसलिए हम कह सकते हैं कि परमेश्वर का तत्व पवित्र है। अन्य शब्दों में प्रत्येक बात जो परमेश्वर कहते और करते हैं वह लोगों के लिए जीवन शक्ति और प्रकाश लाती है; यह लोगों को सकारात्मक बातों को और उन सकारात्मक बातों की वास्तविकता को देखने की अनुमति देती है और यह मानवता को प्रकाश की राह की ओर इंगित करती है ताकि वे सही राह पर चल सकें। ये बातें परमेश्वर के तत्व के कारण निर्धारित की गई और ये परमेश्वर के तत्व की पवित्रता के कारण निर्धारित की गई हैं।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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