परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II" | अंश 48

अय्यूब ने शैतान को हराया और परमेश्वर की दृष्टि में एक सच्चा मनुष्य बन गया

जब अय्यूब पहली बार अपनी परीक्षाओं से होकर गुज़रा था, तब उसकी सारी सम्पत्ति और उसके सभी बच्चों को उससे ले लिए गया था, परन्तु उसके परिणामस्वरूप वह नीचे नहीं गिरा या ऐसा कुछ भी नहीं कहा जो परमेश्वर के विरुद्ध पाप था। उसने शैतान की सभी परीक्षाओं पर विजय प्राप्त की थी, और उसने अपनी भौतिक सम्पत्ति एवं वंश पर, और अपनी सांसारिक सम्पत्तियों को खोने की परीक्षा पर भी विजय प्राप्त की थी, कहने का तात्पर्य है कि जब परमेश्वर ने इन्हें ले लिया तब भी वह उसकी आज्ञाओं को मानने और इसके कारण परमेश्वर को धन्यवाद एवं स्तुति देने के योग्य था। शैतान की पहली परीक्षा के दौरान अय्यूब का बर्ताव ऐसा ही था, और परमेश्वर के पहले परीक्षण के दौरान अय्यूब की गवाही ऐसी ही थी। दूसरी परीक्षा में, शैतान ने अय्यूब को तकलीफ देने के लिए अपना हाथ बढ़ाया, और हालाँकि अय्यूब ने ऐसा दर्द सहा जिसे उसने पहले कभी नहीं सहा था, तौभी उसकी गवाही लोगों को अचरज में डालने के लिए काफी थी। उसने एक बार फिर से शैतान को हराने के लिए अपनी सहनशक्ति, अंगीकार, और परमेश्वर के प्रति अपनी आज्ञाकारिता का उपयोग किया, और उसके आचरण एवं उसकी गवाही को एक बार फिर से परमेश्वर के द्वारा स्वीकृत किया गया एवं उसका समर्थन किया गया। इस परीक्षा के दौरान, अय्यूब ने शैतान पर इस बात की घोषणा करने के लिए अपने वास्तविक व्यवहार का उपयोग किया कि शरीर का दर्द परमेश्वर के प्रति उसके विश्वास एवं आज्ञाकारिता को पलट नहीं सकता था या परमेश्वर के प्रति उसकी भक्ति एवं भय को छीन नहीं सकता था; वह मृत्यु का सामना करने के कारण परमेश्वर को नहीं त्यागेगा या अपनी खराई एवं सीधाई नहीं छोड़ेगा। अय्यूब के दृढ़ संकल्प ने शैतान को कायर बना दिया, उसके विश्वास ने शैतान को भयभीत और थरथरा दिया, शैतान के साथ उसकी ज़िन्दगी और मौत की जंग ने शैतान के भीतर अत्यंत घृणा एवं रोष उत्पन्न किया, उसकी खराई एवं सीधाई ने शैतान की वो हालत कर दी कि वह उसके साथ और कुछ नहीं कर सकता था, कुछ इस तरह कि शैतान ने उस पर अपने आक्रमणों को त्याग दिया और यहोवा परमेश्वर के सामने अय्यूब पर अपने आरोपों को छोड़ दिया। इसका अर्थ यह है कि अय्यूब ने संसार पर विजय प्राप्त की थी, उसने देह पर विजय प्राप्त की थी, उसने शैतान पर विजय प्राप्त की थी, और उसने मृत्यु पर विजय प्राप्त की थी; वह पूरी तरह से और सम्पूर्ण रीति से ऐसा मनुष्य था जो परमेश्वर से सम्बन्ध रखता था। इन दोनों परीक्षाओं के दौरान, अय्यूब अपनी गवाही में दृढ़ता से स्थिर खड़ा रहा, और उसने वास्तव में अपनी खराई एवं सीधाई को जीया था, और उसने परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के अपने जीवन जीने के सिद्धान्तों के दायरे को व्यापक किया था। इन दोनों परीक्षाओं से होकर गुज़रने के पश्चात्, अय्यूब के भीतर एक समृद्ध अनुभव उत्पन्न हुआ, और इस अनुभव ने उसे और भी अधिक परिपक्व एवं अत्यंत अनुभवी बना दिया था, इसने उसे मज़बूत, और प्रबल आस्था रखने वाला मनुष्य बना दिया था, और इसने उसे ईमानदारी की सच्चाई एवं योग्यता के विषय में अति आत्मविश्वासी बना दिया जिनके तहत वह दृढ़ता से स्थिर रहा। यहोवा परमेश्वर के द्वारा अय्यूब की परीक्षाओं ने उसे मनुष्य के लिए परमेश्वर की चिंता के विषय में एक गहरी समझ एवं एहसास प्रदान किया, और उसे परमेश्वर के प्रेम की बहुमूल्यता का एहसास करने की अनुमति दी, और उस बिन्दु से परमेश्वर के लिए उसके भय में परमेश्वर के प्रति विचार और प्रेम को जोड़ दिया गया था। यहोवा परमेश्वर की परीक्षाओं ने न केवल अय्यूब को उससे दूर नहीं किया, बल्कि उसके हृदय को परमेश्वर के और निकट लाया। जब अय्यूब के द्वारा सहा गया दैहिक दर्द अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच गया, तो वह चिंता जिसे उसने परमेश्वर यहोवा की ओर से महसूस की थी उसने उसे अपने जन्म के दिन को कोसने के अलावा और कोई विकल्प नहीं दिया था। ऐसे आचरण की योजना बहुत पहले से नहीं बनाई गई थी, परन्तु ऐसा आचरण उसके हृदय के भीतर से परमेश्वर के लिए उसके विचार एवं उसके प्रेम का एक स्वाभाविक प्रकाशन था, यह एक स्वाभाविक प्रकाशन था जो परमेश्वर के लिए उसके विचार एवं उसके प्रेम से आया था। कहने का तात्पर्य है, क्योंकि उसने स्वयं से घृणा की थी, और वह परमेश्वर को कष्ट देने के लिए तैयार नहीं था, और वह परमेश्वर को कष्ट देने की बात को सहन नहीं कर सकता था, इस प्रकार उसका विचार एवं प्रेम निःस्वार्थता के बिन्दु तक पहुंच गया था। इस समय, अय्यूब ने अपनी चिरकालिक प्रशंसा और परमेश्वर के लिए अपनी लालसा और परमेश्वर के प्रति अपनी भक्ति को विचार एवं प्रेम के उस स्तर तक ऊंचा किया था। ठीक उसी समय, उसने परमेश्वर के प्रति अपने विश्वास एवं आज्ञाकारिता और परमेश्वर के भय को भी विचार एवं प्रेम के उस स्तर तक ऊंचा किया था। उसने स्वयं को कोई ऐसा कार्य करने की अनुमति नहीं दी जो परमेश्वर को हानि पहुंचाता, उसने अपने आपको ऐसा बर्ताव करने की अनुमति नहीं दी जो परमेश्वर को नुकसान पहुंचता, और उसने अपने कारण परमेश्वर पर कोई दुख, कष्ट, या अप्रसन्नता लाने की अनुमति भी नहीं दी थी। परमेश्वर की दृष्टि में, हालाँकि अय्यूब वही पहले का अय्यूब था, फिर भी अय्यूब के विश्वास, उसकी आज्ञाकारिता और परमेश्वर के प्रति उसके भय ने परमेश्वर को सम्पूर्ण संतुष्टि एवं आनन्द पहुंचाया था। इस समय, अय्यूब ने उस खराई को प्राप्त किया था जिसे हासिल करने के लिए परमेश्वर ने उससे अपेक्षा की थी, वह एक ऐसा मनुष्य बन गया था जो परमेश्वर की दृष्टि में "खरा एवं सीधा" कहलाने के योग्य था। उसकी धार्मिकता के कार्यों ने उसे शैतान पर विजय प्राप्त करने, और परमेश्वर के प्रति अपनी गवाही में दृढ़ता से स्थिर खड़े रहने की अनुमति दी थी। इस प्रकार उसकी धार्मिकता के कार्यों ने भी उसे सिद्ध किया था, और उसके जीवन के मूल्य को ऊंचा किए जाने, और किसी भी समय से सर्वोपरि होने की अनुमति दी, और उसे सबसे पहले ऐसा मनुष्य बनाया था जिससे आगे से शैतान के द्वारा उस पर हमला और उसकी परीक्षा न हो। क्योंकि अय्यूब धर्मी था, इसलिए शैतान के द्वारा उस पर आरोप लगाया गया था और उसकी परीक्षा ली गई थी; क्योंकि अय्यूब धर्मी था, इसलिए उसे शैतान को सौंप दिया गया था; और क्योंकि अय्यूब धर्मी था, इसलिए उसने शैतान पर विजय प्राप्त की और उसे हराया था, और वह अपनी गवाही में दृढ़ता से स्थिर बना रहा। अब से, अय्यूब एक ऐसा व्यक्ति बन गया था जिसे फिर कभी शैतान के हाथ में नहीं दिया जाएगा, वह सचमुच में परमेश्वर के सिंहासन के सामने आया था, और उसने परमेश्वर की आशीषों के अधीन शैतान की जासूसी या तबाही के बगैर ज्योति में जीवन बिताया था। वह परमेश्वर की दृष्टि में एक सच्चा मनुष्य बन गया था, क्योंकि उसे स्वतन्त्र किया गया था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" से उद्धृत

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