परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें" | अंश 15

लोग अनुभव के आधार पर परमेश्वर को परिभाषित करने के लिए प्रवृत्त होते हैं

परमेश्वर को जानने के विषय में वार्तालाप करते समय, क्या तुम लोगों ने किसी चीज़ पर ध्यान दिया है? क्या तुम सब ने ध्यान दिया है कि परमेश्वर की वर्तमान मनोवृत्ति एक परिवर्तन से होकर गुज़री है? क्या मानवजाति के प्रति परमेश्वर की मनोवृत्ति अपरिवर्तनीय है? क्या परमेश्वर हमेशा इसी तरह से सहता रहेगा, अनिश्चित काल तक मनुष्य को अपना सारा प्रेम एवं दया प्रदान करता रहेगा? यह मामला परमेश्वर के सार को भी शामिल करता है। ... जब एक बार लोग यह जान जाते हैं कि परमेश्वर मानवजाति से प्रेम करता है, तो वे परमेश्वर को प्रेम के एक प्रतीक के रूप में परिभाषित करते हैं; इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि लोग क्या करते हैं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि लोग किस प्रकार बर्ताव करते हैं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वे परमेश्वर से कैसा व्यवहार करते हैं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है वे कितने अनाज्ञाकारी हैं, किसी भी चीज़ से फर्क नहीं पड़ता है क्योंकि परमेश्वर के पास प्रेम है, और परमेश्वर का प्रेम असीमित एवं अथाह है। परमेश्वर के पास प्रेम है, अतः वह लोगों के साथ सहनशील हो सकता है; परमेश्वर के पास प्रेम है, अतः वह लोगों के प्रति दयावान हो सकता है, उनकी अपरिपक्वता के प्रति दयावान हो सकता है, उनकी अज्ञानता के प्रति दयावान हो सकता है, और उनकी अनाज्ञाकारिता के प्रति दयावान हो सकता है। क्या यह वास्तव में ऐसा ही है? कुछ लोगों के लिए, जब उन्होंने एक बार या कुछ बार परमेश्वर के धीरज का अनुभव कर लिया है, तो परमेश्वर के विषय में अपनी स्वयं की समझ में वे इसके साथ एक महत्वपूर्ण चीज़ के रूप में बर्ताव करते हैं, यह विश्वास करते हैं कि परमेश्वर उनके प्रति सदैव धैर्यवान होगा, और उनके प्रति सदैव दयावान होगा, और उनके जीवन के पथक्रम के दौरान वे परमेश्वर के धीरज का ग्रहण करेंगे और उसे एक मानक के रूप में मानेंगे कि किस प्रकार परमेश्वर उनसे बर्ताव करता है। ऐसे भी लोग हैं जो, जब उन्होंने एक बार परमेश्वर की सहनशीलता का अनुभव कर लिया है, हमेशा परमेश्वर को सहनशीलता के रूप में परिभाषित करेंगे, और यह सहनशीलता अनिश्चित है, बिना किसी शर्त के है, और यहाँ तक कि पूरी तरह से असैद्धांतिक है। क्या ये विश्वास सही हैं? हर बार जब परमेश्वर के सार या परमेश्वर के स्वभाव के मामलों की चर्चा की जाती है, तुम सब परेशान दिखाई देते हो। तुम लोगों को इस प्रकार देखना मुझे कुछ कुछ क्रोधित करता है। तुम लोगों ने परमेश्वर के सार के बारे में बहुत सारी सच्चाईयों को सुना है; तुम लोगों ने परमेश्वर के स्वभाव से सम्बन्धित बहुत सारे विषयों को भी ध्यान से सुना है। फिर भी, तुम सब के मनों में ये मामले और इन पहलुओं की सच्चाई मात्र स्मृतियां हैं जो मत (थ्योरी) एवं लिखित वचनों पर आधारित हैं। तुम लोगों में से कोई भी यह अनुभव करने में सक्षम नहीं है कि तुम्हारे वास्तविक जीवन में परमेश्वर का स्वभाव क्या है, और न ही तुम सब यह देख सकते हो कि परमेश्वर का स्वभाव क्या है। इसलिए, तुम सभी अपने अपने विश्वास में गड़बड़ा गए हो, तुम सब आंखें मूंदकर विश्वास करते हो, उस बिन्दु तक जहाँ तुम लोगों के पास परमेश्वर के प्रति श्रद्धा विहीन मनोवृत्ति है, और तुम सब उसे एक ओर धकेल देते हो। तुम लोगों के पास परमेश्वर के प्रति जो इस प्रकार की मनोवृत्ति है वह तुम सब को किस ओर ले जाती है? यह उस ओर ले जाती है जहाँ तुम लोग हमेशा परमेश्वर के विषय में निष्कर्ष बनाते हो। जब एक बार तुम सब को थोड़ा सा ज्ञान मिल जाता है, तो तुम लोग अत्यंत संतुष्ट महसूस करते हो, तुम सब महसूस करते हो कि तुम लोगों ने परमेश्वर को उसकी सम्पूर्णता में पा लिया है। उसके बाद, तुम सब निष्कर्ष निकालते हो कि परमेश्वर ऐसा ही है, और तुम लोग उसे स्वतन्त्रता से बढ़ने नहीं देते हो। और जब कभी परमेश्वर कुछ नया करता है, तो तुम लोग स्वीकार ही नहीं करते हो कि वह परमेश्वर है। एक दिन, जब परमेश्वर कहता है: "मैं अब मनुष्य से प्रेम नहीं करता हूँ; मैं अब उसको अपनी दया प्रदान नहीं करता हूँ; मनुष्य के प्रति मेरे पास अब और सहनशीलता या धीरज नहीं है; मैं मनुष्य के प्रति अत्यंत घृणा एवं चिढ़ से भर गया हूँ," तो लोग अपने हृदय की गहराईयों से इस प्रकार के कथन से मुठभेड़ करेंगे। कुछ लोग तो यह भी कहेंगे: "तू अब मेरा परमेश्वर नहीं है, तू अब आगे से वह परमेश्वर नहीं है जिसका मैं अनुसरण करना चाहता हूँ। जो कुछ तू कहता है यदि यह वही है, तो तू अब आगे से मेरे परमेश्वर होने के योग्य नहीं है, और मुझे लगातार तेरा अनुसरण करने की कोई आवश्यकता नहीं है। यदि तू मुझे दया प्रदान नहीं करता है, मुझे प्रेम नहीं देता है, मुझे सहनशीलता नहीं देता है, तो मैं अब आगे से तेरा अनुसरण नहीं करूंगा। यदि तू अनिश्चित काल तक मेरे प्रति सहनशील बना रहता है, और हमेशा मेरे साथ धैर्यवान रहता है, और मुझे यह देखने देता है कि तू प्रेम है, कि तू धैर्यवान है, कि तू सहनशील है, केवल तभी मैं तेरा अनुसरण कर सकता हूँ, और केवल तभी मेरे पास वह आत्मविश्वास हो सकता है कि अन्त तक अनुसरण करूं। चूँकि तेरे पास तेरा धीरज एवं दया है, मेरी अनाज्ञाकारिता और मेरे अपराधों को अनिश्चित काल तक क्षमा किया जा सकता है, और अनिश्चित काल तक माफ किया जा सकता है, और मैं किसी भी समय और किसी भी स्थान पर पाप कर सकता हूँ, किसी भी समय और किसी भी स्थान पर पाप अंगीकार कर सकता हूँ और माफ किया जा सकता हूँ, और किसी भी समय और किसी भी स्थान पर तुझे क्रोध दिला सकता हूँ। तेरे पास मुझ से सम्बन्धित अपने स्वयं के कोई विचार एवं निष्कर्ष नहीं होने चाहिए।" यद्यपि शायद तू इस प्रकार के प्रश्न के विषय में ऐसे आत्मनिष्ठ रूप से एवं चैतन्य रूप से नहीं सोचता है, फिर भी जब कभी तू परमेश्वर का विचार करता है कि वह तेरे पापों की क्षमा के लिए एक यन्त्र है और एक वस्तु है कि उसे एक खूबसूरत मंज़िल को पाने के लिए उपयोग में लाया जाए, तो तूने पहले से ही अतिसूक्ष्म रूप से जीते परमेश्वर को अपने शत्रु के रूप में अपने विरुद्ध रख दिया है। यह वही है जो मैं देखता हूँ। तू शायद लगातार कह सकता है, "मैं परमेश्वर में विश्वास करता हूँ" "मैं सत्य की खोज करता हूँ"; "मैं अपने स्वभाव को बदलना चाहता हूँ"; "मैं अंधकार के प्रभाव को तोड़कर स्वतन्त्र होना चाहता हूँ"; "मैं परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहता हूँ"; "मैं परमेश्वर की आज्ञा का पालन करना चाहता हूँ"; "मैं परमेश्वर के प्रति विश्वासयोग्य होना चाहता हूँ, और अपने कर्तव्य को अच्छे से निभाना चाहता हूँ"; एवं इत्यादि। फिर भी, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि तू जो कुछ भी कहता है वह कितना अच्छा सुनाई देता है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि तू कितने मत (थ्योरी) को जानता है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वह मत (थ्योरी) कितनी प्रभावशाली है, यह कितनी प्रतिष्ठित है, क्योंकि उस मामले की सच्चाई यह है कि तुम लोगों में से बहुत से लोग हैं जिन्होंने पहले से ही सीख लिया है कि किस प्रकार नियम, सिद्धान्त, और मत (थ्योरी) का उपयोग करें जिन पर तुम सब ने परमेश्वर के विषय में निष्कर्ष निकलने के लिए महारत हासिल की है, और पूरी तरह से स्वभाविक रीति से उसे स्वयं के विरुद्ध रख दिया है। यद्यपि तूने पत्रियों पर महारत हासिल कर ली है और सिद्धान्तों पर महारत हासिल कर ली है, फिर भी तूने असल में सत्य की वास्तविकता में प्रवेश नहीं किया है, अतः तेरे लिए परमेश्वर के करीब जाना, परमेश्वर को जानना, और परमेश्वर को समझना बहुत कठिन है। यह दयनीय है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" से उद्धृत

दुनिया आपदा से घिर गई है। यह हमें क्या चेतावनी देती है? आपदाओं के बीच हम परमेश्वर द्वारा कैसे सुरक्षित किये जा सकते हैं? इसके बारे में ज़्यादा जानने के लिए हमारे साथ हमारी ऑनलाइन मीटिंग में जुड़ें।
WhatsApp पर हमसे संपर्क करें
Messenger पर हमसे संपर्क करें

संबंधित सामग्री

परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV" | अंश 140

शैतान और यहोवा परमेश्वर के मध्य वार्तालाप (अय्यूब 1:6-11) एक दिन यहोवा परमेश्‍वर के पुत्र उसके सामने उपस्थित हुए, और उनके बीच शैतान भी आया।...

परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II" | अंश 48

अय्यूब ने शैतान को हराया और परमेश्वर की दृष्टि में एक सच्चा मनुष्य बन गया जब अय्यूब पहली बार अपनी परीक्षाओं से होकर गुज़रा था, तब उसकी सारी...

परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II" | अंश 117

मानवजाति के प्रति सृष्टिकर्ता की सच्ची भावनाएं लोग अकसर कहते हैं कि परमेश्वर को जानना सरल बात नहीं है। फिर भी, मैं कहता हूं कि परमेश्वर को...

परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें" | अंश 6

लोगों के विश्वास सत्य का स्थान नहीं ले सकते हैं कुछ लोग ऐसे हैं जो कठिनाईयों को सह सकते हैं; वे दाम चुका सकते हैं; उनका बाहरी आचरण बहुत...