परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें" | अंश 6

लोगों के विश्वास सत्य का स्थान नहीं ले सकते हैं

कुछ लोग ऐसे हैं जो कठिनाईयों को सह सकते हैं; वे दाम चुका सकते हैं; उनका बाहरी आचरण बहुत अच्छा है; वे बहुत ही आदरणीय हैं; और उनके पास अन्य लोगों की सराहना है। तुम सब क्या सोचते हो: क्या इस प्रकार के बाहरी आचरण को सत्य को अभ्यास में लाने के रूप में माना जा सकता है? क्या तुम लोग कह सकते हो कि यह व्यक्ति परमेश्वर के इरादों को संतुष्ट कर रहा है? ऐसा क्यों है कि बार-बार लोग इस प्रकार के व्यक्ति को देखते हैं और सोचते हैं कि वे परमेश्वर को संतुष्ट कर रहे हैं, यह सोचते हैं कि वे सत्य को अभ्यास में लाने के मार्ग पर चल रहे हैं, और यह कि वे परमेश्वर के मार्ग पर चल रहे हैं? कुछ लोग क्यों इस प्रकार सोचते हैं? इसके लिए केवल एक ही व्याख्या है। और वह व्याख्या क्या है? यह बहुत से लोगों के लिए ऐसा ही है, ऐसे प्रश्न जैसे सत्य को अभ्यास में लाना क्या है, परमेश्वर को संतुष्ट करना क्या है, और सत्य की यथार्थता का होना वास्तव में क्या है—ये प्रश्न बिलकुल स्पष्ट नहीं हैं। अतः कुछ लोग हैं जिन्हें अकसर ऐसे लोगों के द्वारा धोखा दिया जाता है जो ऊपर से आत्मिक प्रतीत होते हैं, कुलीन प्रतीत होते हैं, ऐसे प्रतीत होते हैं कि उनके पास उत्कृष्ट स्वरूप है। जहाँ तक ऐसे लोगों की बात है जो पत्रियों एवं सिद्धान्तों के विषय में बोल सकते हैं, और जिनके सन्देश एवं कार्य सराहना के योग्य प्रतीत होते हैं, उनके प्रशंसकों ने उनके कार्यों के सार को, उनके कार्यों के पीछे के सिद्धान्तों को, और उनके लक्ष्य क्या हैं उनको कभी अच्छी तरह से नहीं देखा है। और उन्होंने कभी अच्छी तरह से नहीं देखा है कि ये लोग वास्तव में परमेश्वर की आज्ञा का पालन करते हैं या नहीं, और वे ऐसे लोग हैं या नहीं जो सचमुच में परमेश्वर का भय मानते हैं और बुराई से दूर रहते हैं। उन्होंने इन लोगों की मानवता के मूल-तत्व को कभी नहीं परखा है। इसके बजाय, परिचित होने के पहले कदम से ही, थोड़ा थोड़ा करके, वे इन लोगों की तारीफ करने, और इन लोगों का परम आदर करने लग जाते हैं, और अन्त में ये लोग उनके आदर्श बन जाते हैं। इसके अतिरिक्त, कुछ लोगों के मनों में, वे आदर्श जिनकी वे उपासना करते हैं, जिन पर वे विश्वास करते हैं वे अपने परिवारों एवं नौकरियों को छोड़ सकते हैं, और ऊपर से देखने पर वे कीमत चुका सकते हैं—ये आदर्श लोग ऐसे हैं जो वास्तव में परमेश्वर को संतुष्ट कर रहे हैं, और ऐसे लोग हैं जो वास्तव में एक अच्छा परिणाम एवं एक अच्छी मंज़िल को प्राप्त कर सकते हैं। उनके मनों में, ये आदर्श ऐसे लोग हैं जिनकी प्रशंसा परमेश्वर करता है। किस चीज़ ने लोगों को प्रेरित किया है कि इस प्रकार के विश्वास को रखें? इस मामले का सार क्या है? यह कौन कौन से परिणामों की ओर ले जा सकता है? आओ हम पहले इसके सार के विषय (सामग्री) की चर्चा करें।

लोगों के दृष्टिकोणों, लोगों के रीति व्यवहारों, जिन सिद्धान्तों को लोग अभ्यास करने के लिए चुनते हैं, और जिस पर लोग सामान्य तौर पर जोर देते हैं उनके सम्बन्ध में, अनिवार्य रूप से इन सब का मानवजाति से की गई परमेश्वर की मांगों का कोई लेना देना नहीं है। इसकी परवाह किए बगैर कि लोग सतही मसलों पर ध्यान केन्द्रित कर रहे हैं या गंभीर मसलों पर, पत्रियों एवं सिद्धान्तों या वास्तविकता पर, लोग उसके मुताबिक नहीं चलते हैं जैसे उन्हें पूरी तरह से चलना चाहिए, और वे उसे नहीं जानते हैं जिन्हें उन्हें पूरी तरह से जानना चाहिए। इसका कारण यह है कि लोग सत्य को बिलकुल भी पसन्द नहीं करते हैं। इसलिए, लोग परमेश्वर के वचन में सिद्धान्तों को खोजने एवं अभ्यास करने के लिए समय लगाने एवं प्रयास करने के लिए तैयार नहीं है। इसके बदले, वे छोटे रास्तों का उपयोग करने को प्राथमिकता देते हैं, और जिसे वे समझते हैं, जिसे वे जानते हैं, कि यह अच्छा अभ्यास एवं अच्छा व्यवहार है उसका सारांश निकालते हैं। तब यह सारांश अनुसरण करने के लिए उनका स्वयं का लक्ष्य, एवं अभ्यास करने हेतु सत्य बन जाता है। इसका प्रत्यक्ष परिणाम ऐसे लोग हैं जो सत्य को अभ्यास में लाने के स्थान पर अच्छे मानवीय व्यवहार को उपयोग में लाते हैं, जो परमेश्वर के अनुग्रह को पाने हेतु खुशामद करने के लिए लोगों की अभिलाषाओं को भी संतुष्ट करते हैं। यह सत्य के साथ संघर्ष करने के लिए, एवं परमेश्वर के साथ तर्क करने एवं विवाद करने के लिए घातक चीज़ें देता है। ठीक उसी समय, लोग अनैतिक ढंग से परमेश्वर को भी दरकिनार कर देते हैं, और अपने हृदय के आदर्शों को परमेश्वर के स्थान में रख देते हैं। केवल एक ही मूल कारण है जिससे लोगों के पास ऐसे अज्ञानता भरे कार्य, अज्ञानता भरे दृष्टिकोण, या एकतरफा दृष्टिकोण एवं रीति व्यवहार होते हैं, और आज मैं तुम लोगों को उसके बारे में बताऊंगा। कारण यह है कि यद्यपि हो सकता है कि लोग परमेश्वर के पीछे चलते हों, प्रतिदिन उससे प्रार्थना करते हों, और प्रतिदिन परमेश्वर का वचन पढ़ते हों, फिर भी वे परमेश्वर के इच्छा को वास्तव में नहीं समझते हैं। यही समस्या की जड़ है। यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर के हृदय को समझता है, यह समझता है कि परमेश्वर क्या पसन्द करता है, किस चीज़ से परमेश्वर घृणा करता है, परमेश्वर क्या चाहता है, किस चीज़ को परमेश्वर अस्वीकार करता है, किस प्रकार के व्यक्ति से परमेश्वर प्रेम करता है, किस प्रकार के व्यक्ति को परमेश्वर नापसन्द करता है, मनुष्य से की गई अपनी मांगों के प्रति परमेश्वर किस प्रकार के मानकों (मानदंड) को लागू करता है, मनुष्य को सिद्ध करने के लिए वह किस प्रकार की पद्धति को अपनाता है, क्या तब भी उस व्यक्ति के पास अपने व्यक्तिगत विचार हो सकता है? क्या वह बस यों ही जा सकता है तथा किसी और व्यक्ति की आराधना कर सकता है? क्या कोई साधारण व्यक्ति उनका आदर्श बन सकता है? यदि कोई परमेश्वर के इरादों को समझता है, तो उनका दृष्टिकोण उसकी अपेक्षा थोड़ी बहुत न्यायसंगत होती है। वे मनमाने ढंग से किसी भ्रष्ट व्यक्ति को आदर्श के रूप में लेने वाले नहीं है, न ही वे, सत्य को अमल में लाने के पथ पर चलते समय, यह विश्वास करेंगे कि मनमाने ढंग से कुछ साधारण नियमों या सिद्धान्तों के मुताबिक चलना ही सत्य को अमल में लाने के बराबर है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" से उद्धृत

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