परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है" | अंश 3

कई लोग परमेश्वर के वचन को प्रतिदिन पढ़ने के लिए ही उठाते हैं, यहां तक कि उसके उत्कृष्ट संदर्भों को सबसे बेशकीमती सम्पत्ति के तौर पर स्मृति के लिए ध्यानपूर्वक चिन्हित करके रखते हैं और इससे भी अधिक परमेश्वर के वचन को जहां कहीं सम्भव हो प्रचार करते हैं, दूसरों को उसके वचनों की आपूर्ति करते हैं, सहायता करते हैं। वे यह सोचते हैं कि ऐसा करने से वे परमेश्वर की गवाही देते हैं, उसके वचन की गवाही देते हैं; ऐसा करना परमेश्वर के मार्ग का पालन करना है; वे यह सोचते हैं कि ऐसा करना परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीवन जीना है, ऐसा करने से उसके वचन को अपने जीवन में लागू करते हैं, ऐसा करने से उन्हें परमेश्वर की सराहना प्राप्त होगी और वे उद्धार पाएंगे और सिद्ध बनेंगे। परन्तु, जैसे वे परमेश्वर के वचन का प्रचार करते हैं, वैसे ही वे परमेश्वर के वचन को अभ्यास में कभी नहीं लाते या अपने आप को उस स्थान पर लाने की कोशिश नहीं करते हैं जो कि परमेश्वर के वचन से मेल खाती है। इसके बजाय, वे परमेश्वर के वचन को प्रशंसा पाने के लिए उपयोग में लाते हैं और दूसरों के भरोसे को भी छल से प्राप्त करते हैं, ताकि वे अपने आप ही प्रबंधन में प्रवेश कर सकें और परमेश्वर की महिमा का गबन कर सकें और चुरा सकें। वे आशा करते हैं कि मुफ्त में ही परमेश्वर के वचन को फैलाने का अवसर का लाभ उठा सकें और परमेश्वर का कार्य करके पुरस्कार और उसकी प्रशंसा को प्राप्त कर सकें। ऐसे कितने ही वर्ष गुज़र चुके होंगे, परन्तु ये लोग न केवल परमेश्वर के वचन के प्रचार करने की प्रक्रिया में परमेश्वर की प्रशंसा को प्राप्त करने के लिए अयोग्य रहे हैं और न सिर्फ़ वे परमेश्वर के वचनों की गवाही देने की प्रक्रिया में उस मार्ग खोजने में असफल रहे हैं जिसका उन्हें अनुसरण करना चाहिये था, और दूसरों को परमेश्वर के वचनों के माध्यम से सहायता और आपूर्ति पहुंचाने की प्रक्रिया में उन्होंने न केवल अपने को उससे वंचित रखा, वे न सिर्फ़ परमेश्वर को जानने में अयोग्य रहे हैं या परमेश्वर के वचन के प्रति वास्तविक श्रद्धा की जागृति के अयोग्य रहे हैं, इन सब बातों को करने की प्रक्रिया में; परन्तु इसके विपरीत, परमेश्वर के बारे में उनकी ग़लतफ़हमियां और भी गहराती जाती हैं। उस पर भरोसा न करना और भी अधिक बढ़ जाता है और उसके बारे में उनकी कल्पनाएं और भी अधिक अतिशयोक्तिपूर्ण होती जाती हैं। परमेश्वर के बारे में अपनी ही परिकल्पना से आपूर्त्त होकर और निर्देशित होकर, वे अपने ही तत्वों में परिपूर्णता को प्रदर्शित करते हैं, जैसे कि वे अपने ही कौशल से बिना कठिनता से आराम से चलते जा रहे हैं, जैसे कि उन्होंने अपने जीवन का उद्देश्य, अपना लक्ष्य प्राप्त कर लिया है, और जैसे कि उन्होंने नए जीवन को जीत लिया है और बचाए गए हैं, जैसे कि परमेश्वर के वचनों को अपने मुंह से बोलने में बड़ी स्पष्टता से सत्य तक उनकी पहुँच हो गई है, उन्होंने परमेश्वर के अभिप्राय को पकड़ लिया है और परमेश्वर को जानने के मार्ग को खोज लिया है, जैसे कि प्रचार करने की प्रक्रिया में परमेश्वर से कई बार रू-ब-रू होते हैं। और अक्सर वे “द्रवित” होकर बार-बार रोते हैं और अक्सर परमेश्वर के वचन में “परमेश्वर” के द्वारा अगुवाई प्राप्त करते हैं। वे उसकी गम्भीर उत्सुकता और उदार प्रयोजनों को निरंतर पकड़ने का दिखावा करते हैं और साथ ही साथ मनुष्य के लिए परमेश्वर के उद्धार और उसके प्रबंधन को भी जानने का दावा करते हुए दिखाई देते हैं, वे यह भी दिखावा करते हैं कि उसकी प्रकृति और उसके धार्मिक स्वभाव को भी जान गए हैं। इस नींव पर आधारित, वे परमेश्वर की मौजूदगी पर विश्वास करने का और भी दृढ़ता से दावा करते हैं, उसकी महानता की स्थिति को और भी अच्छे से परिचित होने और उसकी भव्यता एवं श्रेष्ठता को गहराई से महसूस करने का भी दावा करते हैं। परमेश्वर के वचन के ज्ञान की सतही जानकारी में प्रवेश करने के बाद, ऐसा प्रतीत होता है कि उनके विश्वास में वृद्धि हुई है, कष्टों को सहने के उनके संकल्प में उनको दृढ़ता मिली है और परमेश्वर के ज्ञान में उनकी और गहराई बढ़ी है। वे शायद ही यह जानते हैं कि जब तक वे परमेश्वर के वचन का वास्तविक अनुभव नहीं करेंगे, उनका परमेश्वर के बारे में सारा ज्ञान और उसके बारे में उनके विचार उनकी ही काल्पनिक इच्छाओं और अनुमान से निकले हैं। उनका विश्वास परमेश्वर की किसी भी जांच के सामने ठहर नहीं सकेगा। उनकी तथा-कथित आत्मिकता और उच्चता उन्हें परमेश्वर की किसी भी परीक्षा या जांच-पड़ताल के सामने बिल्कुल भी नहीं ठहर सकेगी। उनका संकल्प बालू पर बने हुए महल के समान है, और उनका तथाकथित परमेश्वर का ज्ञान भी उनकी कोरी कल्पनाओं की उड़ान है। वास्तव में, ये लोग, जिन्होंने पिछले के समान अभी भी परमेश्वर के वचन में काफी प्रयास किया है, और उन्होंने कभी भी यह महसूस नहीं किया कि वास्तविक श्रद्धा क्या है, वास्तविक समर्पण क्या है, वास्तविक सरोकार क्या है, या परमेश्वर का वास्तविक ज्ञान क्या है। वे सिद्धान्तों, कल्पनाओं, ज्ञान, भेंट, परम्परा, अंधविश्वास और यहां तक कि मानवता के नैतिक मूल्यों को लेते हैं और उन्हें परमेश्वर पर विश्वास और उसके पीछे चलने के लिए “पूंजी निवेश” और “सैन्य हथियार” के तौर पर प्रयोग करते हैं। यहां तक कि परमेश्वर पर विश्वास करने और उसका अनुगमन करने में आधार बना कर प्रयोग करते हैं। साथ ही, वे इस पूंजी और हथियारों को लेते हैं और उसे परमेश्वर को जानने, परमेश्वर के निरीक्षण पर विवाद करने के लिये, मिलने के लिये, परीक्षण करने, परख, ताड़ना देने और न्याय करने के लिए जादुई यंत्र के तौर पर बना देते हैं। अंत में, जो कुछ भी वे एकत्रित करते हैं उसमें परमेश्वर के बारे में निष्कर्षों से अधिक और कुछ भी समाहित नहीं होता है जो धार्मिक लक्ष्यार्थ, सामंती अंधविश्वास में जड़ा हुआ होता है और उन सब बातों में जो कल्पित, विचित्र और रहस्यपूर्ण होते हैं और वे परमेश्वर को जानने और परिभाषित करने के तरीके पर उसी ढर्रे में मोहर अंकित करते हैं जो केवल ऊपर स्वर्ग में या आसमान में किसी वृद्ध के होने में विश्वास करते हैं, जबकि परमेश्वर की वास्तविकता, उसकी प्रकृति, उसका स्वभाव, उसकी व्यवहारिक सम्पदा और परमेश्वरत्व जिन बातों का वास्ता में सच्चे परमेश्वर से है; उनकी समझ में नहीं आईं, पूरी तरह से असंगत और पूरी तरह अलग-अलग हैं। इस प्रकार से, हालांकि वे परमेश्वर के वचन और पालन-पोषण में जी रहे हैं, सही मायने में वे फिर भी परमेश्वर के भय और बुराई से दूर रहने के मार्ग पर वास्तविकता में चलने में असमर्थ महसूस कर रहे हैं। इसका सही कारण यह है कि वे कभी भी परमेश्वर के साथ परिचित नहीं हुए, न ही उन्होंने सामान्य सम्बन्ध या संवाद उसके साथ कभी रखा है तो इसलिए उनके लिए यह असम्भव है कि वे परमेश्वर के साथ पारस्परिक समझ को बना सकें या फिर परमेश्वर की आराधना, उसके अनुगमन में या सच्चा विश्वास करने में अपने आप को जागृत रख सकें। यह कि उन्हें इस प्रकार से परमेश्वर के वचनों को आदर देना चाहिए, कि इस प्रकार से वे परमेश्वर को आदर सम्मान दे सकें—इस दृष्टिकोण और नज़रिया ने उन्हें उनके प्रयासों से खाली हाथ लौटने और परमेश्वर के भय तथा बुराई से दूर रहने के मार्ग पर बने रहने के लिए अनन्त के लिए बर्बाद कर दिया। जिस लक्ष्य को वे साध रहे हैं और जिस ओर वे जा रहे हैं, यह बात इसको प्रदर्शित करती है कि अनन्त काल से वे परमेश्वर के शत्रु रहे हैं और यह कि अनन्त काल तक वे कभी भी उद्धार को प्राप्त नहीं कर सकेंगे।

— “वचन देह में प्रकट होता है” से उद्धृत

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