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अंतिम दिनों के मसीह के कथन - संकलन

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अंतिम दिनों के मसीह के कथन - संकलन

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वचन देह में प्रकट होता है से आगे जारी

मानवीय व्यवहार ने कभी भी मेरे हृदय को स्पर्श नहीं किया है, और न ही वह मुझे बहुमूल्य लगा है। मनुष्य की नज़रों में, मैं हमेशा उससे सख़्ती से व्यवहार कर रहा हूँ, और मैं हमेशा उसके ऊपर अधिकार का प्रयोग कर रहा हूँ। मनुष्य के सभी कार्यों में, शायद ही कोई ऐसी चीज़ है जो मेरे वास्ते की जाती है, शायद ही कोई ऐसी चीज़ है जो मेरी नज़रों के सामने अडिग रहती है। अंततः, मनुष्य से संबंधित हर चीज़ मेरे सामने अतिसूक्ष्म रूप से चूर-चूर हो जाती है, और केवल उसके बाद ही हर किसी को उसकी स्वयं की विफलता के माध्यम से मुझे ज्ञात करवाते हुए, मैं अपने कार्य-कलापों को प्रदर्शित करता हूँ। मानवीय प्रकृति अपरिवर्तित बनी रहती है। जो कुछ उनके हृदय में है वह मेरी इच्छा के अनुरूप नहीं है—यह वह नहीं है जिसकी मुझे आवश्यकता है। जिस बात से मैं सबसे ज़्यादा घृणा करता हूँ वह मनुष्य का ढीठपन और फिर से अपराध करना है, परन्तु वह कौन सी ताक़त है जो मानवजाति को लगातार मुझे जानने में असफल बने रहने, हमेशा मुझ दूर रखने, मेरे सामने मेरी इच्छा के अनुरूप कभी भी कार्य नहीं करने बल्कि उसके बजाय मेरी पीठ पीछे मेरा विरोध करने के लिए उकसाती रहती है? क्या यही उनकी वफ़ादारी है? क्या मेरे लिए यही उनका प्रेम है? वे पश्चाताप क्यों नहीं कर सकते हैं और पुनर्जन्म क्यों नहीं प्राप्त करते हैं? क्यों लोग कीचड़ मुक्त स्थान के बजाए सर्वदा दलदल में रहने की इच्छा करते हैं? क्या ऐसा हो सकता है कि मैंने उनके साथ बुरा व्यवहार किया है? क्या ऐसा हो सकता है कि मैंने उन्हें ग़लत दिशा में निर्देशित कर दिया है? क्या ऐसा हो सकता है कि मैं उन्हें नरक में ले जाता हूँ? हर कोई "नरक" में रहने की इच्छा करता है? जब प्रकाश आता है, तो उनकी आँखें तत्काल अंधी हो जाती हैं, क्योंकि जो कुछ भी उनके अपने अंदर है वह नरक से आता है। परन्तु, इससे अनजान मानवजाति मात्र "नारकीय आशीषों" का आनंद उठा रही है। यहाँ तक कि वे उन्हें एक खज़ाने की तरह इस बात से अत्यन्त भयभीत अपने सीने से लगाकर रखते हैं कि कहीँ ऐसा न हो कि मैं उन्हें छीन कर दूर कर दूँगा, और उन्हें "अस्तित्व के स्रोत" के बिना छोड़ दूँगा। लोग मुझ से डरते हैं, यही कारण है कि जब मैं पृथ्वी पर आता हूँ तो वे मुझसे बहुत दूर रहते हैं, मेरे करीब आने से नफ़रत करते हैं, क्योंकि वे "अपने ऊपर परेशानी लाने" के अनिच्छुक होते हैं, बल्कि उसके बजाए परिवार के भीतर समरसता बनाए रखने की कामना करते हैं ताकि वे "पृथ्वी पर सुख" का आनंद ले सकें। हालाँकि मैं मानवजाति को जैसा वह चाहे वैसा करने की अनुमति नहीं दे सकता हूँ, क्योंकि मनुष्य के परिवार को नष्ट करना निश्चित रूप से वह कार्य है जिसे करने के लिए मैं यहाँ हूँ। जिस क्षण मैं पहुँचता हूँ, उसी क्षण उनके घरों की शांति चली जाएगी। मैं सभी देशों को छोटे-छोटे टुकड़ों में तोड़ दूँगा, परिवारों का तो उल्लेख ही मत करो। मेरे चंगुल से कौन बच कर निकल सकता है? क्या ऐसा हो सकता है कि जो आशीषों को प्राप्त करते हैं वे अपनी अनिच्छा के आधार पर बच निकल सकते हैं? क्या कभी ऐसा हो सकता है कि जो ताड़ना को सहते हैं वे अपने भय के आधार पर मेरी सहानुभूति प्राप्त कर सकते हैं? मेरे समस्त वचनों में, लोगों ने मेरी इच्छा को और मेरे कार्यकलापों को देखा है, परन्तु कौन कभी अपने स्वयं के विचारों की उलझन को तोड़कर स्वतन्त्र हो सकता है? कौन कभी मेरे वचनों के भीतर या बाहर से निकलने का मार्ग ढूँढ़ सकता है?

मानवजाति ने मेरी गर्मजोशी का अनुभव किया, उन्होंने ईमानदारी से मेरी सेवा की, और वे ईमानदारी से मेरे प्रति आज्ञाकारी थे, मेरी उपस्थिति में मेरे लिए हर चीज़ कर रहे थे। परन्तु आज लोग किसी भी तरह से इस प्रकार की स्थिति में होने का प्रबंधन नहीं कर सकते हैं, और वे केवल अपनी आत्मा में विलाप कर सकते हैं मानो उन्हें किसी खूँखार भेड़िए के द्वारा बल पूर्वक ले जाया गया हो। वे केवल अहसाय भाव से मेरी ओर देख सकते हैं, लगातार मुझे सहायता के लिए पुकार सकते हैं, परन्तु अंत में अपनी दुर्दशा से बच निकलने में वे असमर्थ रहते हैं। मैं पीछे की बातों को सोचता हूँ कि किस प्रकार अतीत में लोगों ने मेरी उपस्थिति में प्रतिज्ञाएँ की थीं, अपने स्नेह से मेरी दयालुता को चुकाने की स्वर्ग और पृथ्वी की शपथ ली थी। वे मेरे सामने दुःखी होकर रोते थे, और उनके रोने की आवाज़ हृदय-विदारक और असहनीय थी। मैंने प्रायः मानवजाति को उसके संकल्प की शक्ति के आधार पर अपनी सहायता प्रदान की। अनगिनत बार लोग मेरे प्रति समर्पण करने के लिए ऐसे आराध्य तरीके से मेरे सामने आए हैं जो अविस्मरणीय हैं। अनगिनत बार उन्होंने अविचल निष्ठा के साथ मुझसे प्रेम किया है, और उनकी सच्ची भावनाएँ प्रशंसनीय हैं। अनगिनत अवसरों पर, उन्होंने अपने जीवन को बलिदान करने की हद तक मुझसे प्रेम किया है, उन्होंने अपने आप से अधिक मुझ से प्रेम किया है, और उनकी ईमानदारी को देखकर, मैंने उनके प्रेम को स्वीकार कर लिया है। अनगिनत अवसरों पर, उन्होंने मेरी उपस्थिति में अपने आप को अर्पित किया है, और मेरे वास्ते मृत्यु का सामना करने पर भी विरक्त रहे हैं, और मैंने उनके चेहरों से चिन्ता को मिटा डाला है, और सावधानीपूर्वक उनके चेहरों का बारीकी से निरीक्षण किया है। ऐसे अनगिनत अवसर हैं आए जहाँ मैंने उन्हें अपने स्वयं के खज़ाने के रूप में प्यार किया है, और ऐसे अनगिनत अवसर भी आए जहाँ मैंने उनसे अपने स्वयं के शत्रु के रूप में नफ़रत की है। मैं एैसा ही हूँ—मनुष्य कभी भी इस बात की थाह नहीं पा सकता है कि मेरे मन में क्या है? जब लोग दुःखी होते हैं, तो मैं उन्हें सान्त्वना देने के लिए आता हूँ, और जब वे कमज़ोर होते हैं, तो मैं उनकी सहायता के लिए उनके साथ हो जाता हूँ। जब वे खो जाते हैं, मैं उन्हें दिशा निर्देश देता हूँ। जब वे रोते हैं, तो मैं उनके आँसुओं को पोंछता हूँ। हालाँकि, जब मैं उदास होता हूँ, तो कौन अपने हृदय से मुझे सान्त्वना दे सकता है? जब मैं चिंतित हो कर अस्वस्थ होता हूँ, तो कौन मेरी भावनाओं के बारे में विचारशील होता है? जब मैं दुःखी होता हूँ, तो कौन मेरे हृदय के घावों को भर सकता है? जब मुझे किसी की आवश्यकता होती है, तो कौन मेरे साथ कार्य करने के लिए स्वेच्छा से प्रस्तुत होगा? क्या ऐसा कैसे हो सकता है कि मेरे प्रति लोगों की पूर्व की प्रवृत्ति अब खो गई है और कभी वापस नहीं आएगी? ऐसा क्यों है कि उनकी स्मृति में रत्ती भर भी नहीं बचा है? ऐसा कैसे है कि लोग इन सभी बातों को भूल गए हैं? क्या यह सब इसलिए नहीं है क्योंकि मानवजाति को उसके शत्रुओं के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है?

जब स्वर्गदूत मेरी स्तुति में संगीत बजाते हैं, तो मनुष्य पर अपनी अनुकम्पा उँड़ेलने के अलावा मेरे पास अन्य कोई विकल्प नहीं होता है। तत्काल मेरा हृदय उदासी से भर जाता है, और मेरे लिए इस दुःखदायी भाव से छुटकारा पाना असंभव हो जाता है। मनुष्य से पृथक होने और फिर एक होने के आनन्द और दुःखों में, हम मनोभावों का आदान-प्रदान करने में असमर्थ होते है। ऊपर स्वर्ग और नीचे पृथ्वी पर पृथक हुए, मैं और मनुष्य नियमित रूप से मिलने में असमर्थ हैं। पूर्व की भावनाओं के विषाद से कौन मुक्त हो सकता है? कौन अतीत के बारे में स्मरण करने से अपने आप को रोक सकता है? कौन अतीत के मनोभावों की निरंतरता की आशा नहीं करेगा? कौन मेरी वापसी की अभिलाषा नहीं करेगा? कौन मनुष्य के साथ मेरे फिर से एक हो जाने की लालसा नहीं करेगा? मेरा हृदय अत्यंत अशांत है, और मनुष्य की आत्मा गहराई तक चिंतित हैं। यद्यपि आत्माओं में एक समान हैं, फिर भी हम प्रायः एक साथ नहीं हो सकते हैं, और हम प्रायः एक दूसरे को नहीं देख सकते हैं। इस प्रकार समस्त मानवजाति का जीवन व्यथा से भरा है और उसमें प्राणशक्ति की कमी है, क्योंकि मनुष्य हमेशा मेरे लिए तड़पा है। यह ऐसा है मानो कि मानवजाति स्वर्ग से गिराए गए पदार्थ हों; वे ज़मीन पर से मेरी ओर टकटकी लगाकर देखते हुए, पृथ्वी से मेरे नाम की दोहाई देते हों—परन्तु वे खूँखार भेड़िए के जबड़े से कैसे बच कर भाग सकते हैं? वे उसके ख़तरे और प्रलोभन से स्वयं को कैसे मुक्त कर सकते हैं? मानवजाति मेरी योजना की व्यवस्था के प्रति आज्ञाकारिता के रूप में स्वयं को बलिदान कैसे नहीं कर सकते हैं? जब वे जोर से गिड़गिड़ाते हैं, तो मैं उनसे अपना मुँह फेर लेता हूँ, मैं उन्हें देखना अव और सहन नहीं कर सकता हूँ; हालाँकि, मैं उनकी अश्रुपूरित पुकारों को कैसे नहीं सुन सकता हूँ? मैं मानवीय संसार के इन अन्यायों को सही करूँगा। मैं अपने लोगों को फिर से नुकसान पहुँचाने से शैतान को रोकते हुए, शत्रु को पुनः जो चाहे वह करने से रोकते हुए, पूरे संसार में अपने स्वयं के हाथों से अपना कार्य करूँगा। मैं अपने सभी शत्रुओं को ज़मीन पर गिराते हुए और अपने सामने उनसे उनके अपराधों को अंगीकार करवाते हुए, पृथ्वी पर राजा बन जाऊँगा और वहाँ अपना सिंहासन ले जाऊँगा। अपने दुःख में, जिसमें क्रोध मिश्रित है, मैं किसी को नहीं छोड़ते हुए, और अपने शत्रुओं को भयभीत करते हुए समस्त विश्व को कुचल कर समतल कर दूँगा। मैं इस पृथ्वी को खण्डहर में बदल दूँगा, और अपने शत्रुओं को खण्डहर में गिरा दूँगा, ताकि अब से वे मानवजाति को अब और भ्रष्ट नहीं कर सकें। मेरी योजना पहले से ही निर्धारित है, और कोई भी, चाहे वह कोई भी हो, इसे बदलने में समर्थ नहीं होगा। जब मैं ब्रह्माण्ड के ऊपर प्रतापी ठाट-बाट के साथ चलूँगा, तो समस्त मानवजाति नए सिरे से बन जाएगी, और हर चीज़ पुनर्जीवित हो जाएगी। मनुष्य अब और नहीं रोएगा, और सहायता के लिए अब और मेरी दोहाई नहीं देगा। तब मेरा हृदय आनन्दित होगा, और लोग उत्सव मनाते हुए मेरे पास लौटेंगे। पूरा विश्व, ऊपर से नीचे तक, हर्षोल्लास में झूमेगा...।

आज दुनिया के देशों के बीच, मैं उस कार्य को कर रहा हूँ जिसे पूरा करने का मैने बीड़ा उठाया है। मैं अपनी योजना के अंतर्गत समस्त कार्य करते हुए मानवजाति के बीच घूम रहा हूँ, और समस्त मानवजाति मेरी योजना के अनुसार विभिन्न देशों को "खण्डित" कर रही है। पृथ्वी पर लोगों ने अपना ध्यान अपनी स्वयं की नियति पर केन्द्रित करवा लिया है, क्योंकि दिन नज़दीक आ रहा है और स्वर्गदूत अपनी तुरहियाँ बजा रहे हैं। अब और विलंब नहीं होंगे, और उसके बाद समस्त सृष्टि हर्षोल्लास में नृत्य करना आरम्भ कर देंगी। कौन अपनी इच्छा से मेरे दिन को बढ़ा सकता है? क्या कोई पृथ्वीवासी? अथवा क्या आकाश के तारे? या स्वर्गदूत? जब मैं इस्राएल के लोगों के उद्धार आरम्भ करने के लिए कोई कथन कहता हूँ, तो मेरा दिन संपूर्ण मानवजाति में पहुँच जाता है। हर मनुष्य इस्राएल की वापसी का भय खाता है। जब इस्राएल वापस आएगा, तो वह मेरी महिमा का दिन होगा, और यही वह दिन भी होगा जब सब कुछ बदल जाता है और नया हो जाता है। जैसे ही धार्मिक न्याय संपूर्ण जगत में सन्निकटता से पहुँचता है, तो सभी लोग कातर और डरे हुए हो जाते हैं, क्योंकि मानवीय संसार में धार्मिकता अनसुनी है। जब धार्मिकता का सूर्य प्रकट होगा, तो पूर्वदिशा रोशन हो जाएगी, और तब वह, हर एक के पास पहुँचते हुए, पूरे विश्व को रोशन कर देगी। यदि मनुष्य वास्तव में मेरी धार्मिकता को कर सकता, तो डरने जैसा क्या होता? मेरे सभी लोग मेरे दिन के आगमन की प्रतीक्षा करते हैं, वे सभी मेरे दिन के आगमन की चाहना करते हैं। वे संपूर्ण मानवजाति को प्रतिफल देने और धार्मिकता के सूर्य के रूप में मेरी भूमिका में मानवजाति की नियति को व्यवस्थित करने के लिए मेरी प्रतीक्षा करते हैं। मेरा राज्य समस्त ब्रह्माण्ड के ऊपर आकार ले रहा है, और मेरा सिंहासन खरबों लोगों के हृदयों में प्रभुत्व वाला हो रहा है। स्वर्गदूतों की सहायता से, मेरी महान उपलब्धि शीघ्र ही फलित हो जाएगी। मेरे सभी पुत्र और लोग, मेरे साथ उनके फिर से एक होने, और फिर कभी अलग न होने की चाहना करते हुए, साँस रोक कर मेरे आगमन की प्रतीक्षा करते हैं। मेरे राज्य की असंख्य आबादी, मेरे उनके साथ होने की वजह से, हर्षित उत्सव में एक दूसरे की ओर क्यों नहीं भाग सकती है? क्या यह कोई ऐसा पुनर्मिलन हो सकता है जिसके लिए कोई कीमत चुकाने की आवश्यकता नहीं है? मैं सभी मनुष्यों की नज़रों में सम्मानित हूँ, सभी के वचनों में मेरी घोषणा होती है। जब मैं लौटूँगा, तब मैं शत्रु की सभी ताक़तों को और भी अधिक जीतूँगा। समय आ गया है! मैं अपने कार्य को गति दूँगा, मैं मनुष्यों के बीच राजा के रूप में शासन करूँगा! मैं लौटने के बिन्दु पर हूँ! और मैं प्रस्थान करने ही वाला हूँ! यही है वह जिसकी हर कोई आशा कर रहा है, यही है वह जिसकी वे अभिलाषा करते हैं? मैं संपूर्ण मानवजाति को मेरे दिन के आगमन को देखने दूँगा और मेरे दिन के आगमन का स्वागत करने दूँगा।

2 अप्रैल 1992

अंतिम दिनों के मसीह के कथन - संकलन

केवल वह जो परमेश्वर के कार्य को अनुभव करता है वही परमेवर में सच में विश्वास करता है परमेश्वर का प्रकटीकरण एक नया युग लाया है केवल परमेश्वर के प्रबंधन के मध्य ही मनुष्य बचाया जा सकता है सात गर्जनाएँ – भविष्यवाणी करती हैं कि राज्य के सुसमाचार पूरे ब्रह्माण्ड में फैल जाएंगे उद्धारकर्त्ता पहले से ही एक "सफेद बादल" पर सवार होकर वापस आ चुका है जब तुम यीशु के आध्यात्मिक शरीर को देख रहे होगे ऐसा तब होगा जब परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी को नये सिरे से बना चुका होगा वे जो मसीह से असंगत हैं निश्चय ही परमेश्वर के विरोधी हैं बुलाए हुए बहुत हैं, परन्तु चुने हुए कुछ ही हैं तुम्हें मसीह की अनुकूलता में होने के तरीके की खोज करनी चाहिए मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है क्या तुम जानते हो? परमेश्वर ने मनुष्यों के बीच एक बहुत बड़ा काम किया है केवल अंतिम दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनन्त जीवन का मार्ग दे सकता है अपनी मंज़िल के लिए तुम्हें अच्छे कर्मों की पर्याप्तता की तैयारी करनी चाहिए तुम किस के प्रति वफादार हो? पृथ्वी के परमेश्वर को कैसे जानें परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है सर्वशक्तिमान का आह भरना तुम लोगों को अपने कार्यों पर विचार करना चाहिए भ्रष्ट मनुष्य परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने में अक्षम है विश्वासियों को क्या दृष्टिकोण रखना चाहिए परमेश्वर में अपने विश्वास में तुम्हें परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करना चाहिए प्रतिज्ञाएं उनके लिए जो पूर्ण बनाए जा चुके हैं दुष्ट को दण्ड अवश्य दिया जाना चाहिए वास्तविकता को कैसे जानें परमेश्वर की इच्छा की समरसता में सेवा कैसे करें सहस्राब्दि राज्य आ चुका है तुम्हें पता होना चाहिए कि व्यावहारिक परमेश्वर ही स्वयं परमेश्वर है आज परमेश्वर के कार्य को जानना क्या परमेश्वर का कार्य इतना सरल है, जितना मनुष्य कल्पना करता है? तुम्हें सत्य के लिए जीना चाहिए क्योंकि तुम्हें परमेश्वर में विश्वास है परमेश्वर पर विश्वास करना वास्तविकता पर केंद्रित होना चाहिए, न कि धार्मिक रीति-रिवाजों पर जो आज परमेश्वर के कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर की सेवा कर सकते हैं जो सच्चे हृदय से परमेश्वर के आज्ञाकारी हैं वे निश्चित रूप से परमेश्वर के द्वारा ग्रहण किए जाएँगे राज्य का युग वचन का युग है भाग एक राज्य का युग वचन का युग ह भाग दो "सहस्राब्दि राज्य आ चुका है" के बारे में एक संक्षिप्त वार्ता वे सब जो परमेश्वर को नहीं जानते हैं वे ही परमेश्वर का विरोध करते हैं क्या त्रित्व का अस्तित्व है? भाग एक क्या त्रित्व का अस्तित्व है? भाग दो जब परमेश्वर की बात आती है, तो तुम्हारी समझ क्या होती है एक वास्तविक मनुष्य होने का क्या अर्थ है तुम विश्वास के विषय में क्या जानते हो? देहधारियों में से कोई भी कोप के दिन से नहीं बच सकता है सुसमाचार को फैलाने का कार्य मनुष्यों को बचाने का कार्य भी है व्यवस्था के युग में कार्य छुटकारे के युग में कार्य के पीछे की सच्ची कहानी तुम्हें पता होना चाहिए कि समस्त मानवजाति आज के दिन तक कैसे विकसित हुई भाग एक तुम्हें पता होना चाहिए कि समस्त मानवजाति आज के दिन तक कैसे विकसित हुई भाग दो पद नामों एवं पहचान के सम्बन्ध में भाग एक पद नामों एवं पहचान के सम्बन्ध में भाग दो वह मनुष्य किस प्रकार परमेश्वर के प्रकटनों को प्राप्त कर सकता है जिसने उसे अपनी ही धारणाओं में परिभाषित किया है? जो परमेश्वर को और उसके कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर को सन्तुष्ट कर सकते हैं देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर भाग दो देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर भाग एक परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का काम भाग एक परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का काम भाग दो परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का काम भाग तीन परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है (भाग दो) परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है (भाग एक) भ्रष्ट मानवजाति को देह धारण किए हुए परमेश्वर के उद्धार की अत्यधिक आवश्यकता है भाग एक भ्रष्ट मानवजाति को देह धारण किए हुए परमेश्वर के उद्धार की अत्यधिक आवश्यकता है भाग दो भ्रष्ट मानवजाति को देह धारण किए हुए परमेश्वर के उद्धार की अत्यधिक आवश्यकता है भाग तीन परमेश्वर द्वारा आवासित देह का सार भाग एक परमेश्वर द्वारा आवासित देह का सार भाग दो परमेश्वर का कार्य एवं मनुष्य का रीति व्यवहार भाग एक परमेश्वर का कार्य एवं मनुष्य का रीति व्यवहार भाग दो परमेश्वर का कार्य एवं मनुष्य का रीति व्यवहार भाग तीन स्वर्गिक परमपिता की इच्छा के प्रति आज्ञाकारिता ही मसीह का वास्तविक सार है मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक बेहतरीन मंज़िल पर ले चलना भाग एक मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक बेहतरीन मंज़िल पर ले चलना भाग दो मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक बेहतरीन मंज़िल पर ले चलना भाग तीन परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे भाग एक परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे भाग दो संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - सातवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - आठवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - नौवाँ कथन नये युग की आज्ञाएँ संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - ग्यारहवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - तेरहवाँ कथन दस प्रशासनिक आज्ञाएँ जिनका परमेश्वर के चयनित लोगों द्वारा राज्य के युग में पालन अवश्य किया जाना चाहिए क्या आप जाग उठे हैं? देहधारण के महत्व को दो देहधारण पूरा करते हैं परमेश्वर के वचन के द्वारा सब कुछ प्राप्त हो जाता है भाग एक पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान भाग एक क्या तुम परमेश्वर के एक सच्चे विश्वासी हो? केवल पूर्ण बनाया गया ही एक सार्थक जीवन जी सकता है संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - बारहवाँ कथन तुझे अपने भविष्य मिशन से कैसे निपटना चाहिए "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग चार "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग तीन देहधारी परमेश्वर और परमेश्वर द्वारा उपयोग किए गए लोगों के बीच महत्वपूर्ण अंतर संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - बीसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - दसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - चौदहवाँ कथन "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग छे: "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग पांच केवल वही जो परमेश्वर को जानते हैं, उसकी गवाही दे सकते हैं संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - छठवाँ कथन एक अपरिवर्तित स्वभाव का होना परमेश्वर के साथ शत्रुता होना है पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान भाग दो पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान भाग तीन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - पन्द्रहवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - अठारहवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - उन्नीसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - अट्ठाइसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - सत्रहवाँ कथन "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग दो परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग हमेशा के लिए उसके प्रकाश में रहेंगे सफलता या असफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है भाग एक सफलता या असफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है भाग दो "कार्य और प्रवेश" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग एक "परमेश्वर के काम का दर्शन" पर परमेश्वर के वचन के तीन अंशों से संकलन भाग दो "देहधारण का रहस्य" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग चार तीन चेतावनियाँ संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - चौथा कथन परमेश्वर के स्वभाव को समझना अति महत्वपूर्ण है "देहधारण का रहस्य" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग तीन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - सत्ताईसवाँ कथन "परमेश्वर के काम का दर्शन" पर परमेश्वर के वचन के तीन अंशों से संकलन भाग एक संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - पाँचवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - पच्चीसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - तेइसवाँ कथन "देहधारण का रहस्य" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग एक संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - इक्कीसवाँ कथन सेवा के धार्मिक तरीके पर अवश्य प्रतिबंध लगना चाहिए परमेश्वर सम्पूर्ण सृष्टि का प्रभु है परमेश्वर सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियन्ता है पतरस ने यीशु को कैसे जाना "जीतने वाले कार्य का भीतरी सत्य" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग दो भाग दो संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - सोलहवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - चैबीसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - छब्बीसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - बाईसवाँ कथन संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के कथन - उन्तीसवाँ कथन

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