परमेश्वर का कार्य एवं मनुष्य का रीति व्यवहार भाग तीन

पवित्र आत्मा के कार्य का प्रत्येक चरण उसी समय मनुष्य की गवाही की भी अपेक्षा करता है। कार्य का प्रत्येक चरण परमेश्वर एवं शैतान के मध्य एक युद्ध है, और इस युद्ध का लक्ष्य शैतान है, जबकि वह शख्स जिसे इस कार्य के द्वारा पूर्ण बनाया जाएगा वह मनुष्य है। परमेश्वर का कार्य फलवन्त हो सकता है या नहीं यह परमेश्वर के प्रति मनुष्य की गवाही के तरीके पर निर्भर करता है। यह गवाही वह बात है जिसकी अपेक्षा परमेश्वर उन लोगों से करता जो उसका अनुसरण करते हैं; यह वह गवाही है जिसे शैतान के सामने दी जाती है, और यह उसके कार्य के प्रभावों का प्रमाण भी है। परमेश्वर के सम्पूर्ण प्रबंधन को तीन चरणों में विभक्त किया गया है, और प्रत्येक चरण में, मनुष्य से यथोचित अपेक्षाएं की जाती हैं। इसके अतिरिक्त, जैसे जैसे युग बीतते एवं आगे बढ़ते जाते हैं, परमेश्वर की समस्त मानवजाति से अपेक्षाएं और अधिक ऊँची होती जाती हैं। इस प्रकार, कदम दर कदम, परमेश्वर का प्रबंधन अपने चरम पर पहुंच जाता है, जब तक मनुष्य "देह में वचन के प्रकट होने" को देख नहीं लेता, और इस तरह से मनुष्य से की गई अपेक्षाएं और अधिक ऊँची हो जाती हैं, और गवाही देने के लिए मनुष्य से अपेक्षाएं और भी अधिक ऊँची हो जाती हैं। मनुष्य परमेश्वर के साथ सहयोग करने में जितना अधिक समर्थ होता है, उतना ही अधिक वह परमेश्वर को गौरवान्वित करता है। मनुष्य का सहयोग वह गवाही है जिसे देने के लिए उससे अपेक्षा की जाती है, और वह गवाही जिसे वह देता है वह मनुष्य का व्यवहार है। और इस प्रकार, परमेश्वर के कार्य का उचित प्रभाव हो सकता है या नहीं, और वहाँ सच्ची गवाही हो सकती है या नहीं, ये जटिल रूप से मनुष्य के सहयोग एवं गवाही से जुड़े हुए हैं। जब कार्य समाप्त हो जाता है, कहने का अर्थ है, जब परमेश्वर का सम्पूर्ण प्रबंधन अपनी समाप्ति पर पहुंच जाता है, तब मनुष्य से अपेक्षा की जाएगी कि वह और अधिक ऊँची गवाही दे, और जब परमेश्वर का कार्य अपनी समाप्ति पर पहुंच जाता है, तब मनुष्य का व्यवहार एवं प्रवेश अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच जाएगा। अतीत में, मनुष्य से अपेक्षा की गई थी कि वह व्यवस्था एवं आज्ञाओं का पालन करे, और उससे अपेक्षा की गई थी कि वह धैर्यवान एवं विनम्र हो। आज, मनुष्य से अपेक्षा की जाती है कि वह परमेश्वर के समस्त प्रबंधन का पालन करे और परमेश्वर के सर्वोच्च प्रेम को धारण करे, और अन्ततः उससे अपेक्षा की जाती है कि वह क्लेश के मध्य भी परमेश्वर से प्रेम करे। ये तीन चरण ऐसी अपेक्षाएं हैं जिन्हें परमेश्वर कदम दर कदम अपने सम्पूर्ण प्रबंधन के दौरान मनुष्य से करता है। परमेश्वर के कार्य का प्रत्येक चरण पिछले चरण की तुलना में और अधिक गहरा होता जाता है, और प्रत्येक चरण में मनुष्य से की गई अपेक्षाएं पिछले चरण की तुलना में और अधिक गम्भीर होती हैं, और इस तरह से, परमेश्वर का सम्पूर्ण प्रबंधन धीरे धीरे अपना आकार लेता है। मनुष्य से की गई अपेक्षाएं हमेशा से कहीं अधिक ऊँची हो जाने के कारण ही मनुष्य का स्वभाव परमेश्वर के द्वारा अपेक्षित उन मापदंडों के कहीं अधिक नज़दीक आ जाता है, और केवल तभी सम्पूर्ण मानवजाति धीरे धीरे शैतान के प्रभाव से अलग होती है, जब परमेश्वर का कार्य पूर्ण समाप्ति पर आ जाता है, तब तक सम्पूर्ण मानवजाति को शैतान के प्रभाव से बचा लिया जाता है। जब वह समय आता है, तो परमेश्वर का कार्य अपनी समाप्ति पर पहुंच चुका होगा, और अपने स्वभाव में परिवर्तनों को हासिल करने के लिए परमेश्वर के साथ मनुष्य का और कोई सहयोग नहीं होगा, और सम्पूर्ण मानवजाति परमेश्वर के प्रकाश में जीवन बिताएगी, और उसके बाद से, परमेश्वर के प्रति कोई विद्रोही या विरोध नहीं होगा। परमेश्वर भी मनुष्य से कोई माँग नहीं करेगा, और मनुष्य एवं परमेश्वर के मध्य और अधिक सुसंगत सहयोग होगा, एक ऐसा सहयोग जो मनुष्य एवं परमेश्वर दोनों का आपस का जीवन होगा, ऐसा जीवन जो परमेश्वर के प्रबंधन के पूरी तरह से समाप्त होने, और परमेश्वर के द्वारा मनुष्य को शैतान के शिकंजों से पूरी तरह से बचाए जाने के पश्चात् आता है। ऐसे लोग जो करीब से परमेश्वर के पदचिन्हों का अनुसरण नहीं कर सकते हैं वे ऐसे जीवन को पाने में असमर्थ हैं। उन्होंने अपने आपको अंधकार में नीचे गिरा दिया होगा, जहाँ वे रोएंगे और अपने दाँत पीसेंगे; वे ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर में विश्वास तो करते हैं किन्तु उसका अनुसरण नहीं करते हैं, जो परमेश्वर में विश्वास तो करते हैं किन्तु उसके सम्पूर्ण कार्य का पालन नहीं करते हैं। चूँकि मनुष्य परमेश्वर में विश्वास करता है, तो उसे परमेश्वर के पदचिन्हों का करीब से, कदम दर कदम, अनुसरण करना होगा; और उसे "जहाँ कहीं मेम्ना जाता है उसका अनुसरण" करना चाहिए। केवल ये ही ऐसे लोग हैं जो सच्चे मार्ग को खोजते हैं, केवल ये ही ऐसे मनुष्य हैं जो पवित्र आत्मा के कार्य को जानते हैं। लोग जो दासत्व से पत्रों एवं सिद्धान्तों का अनुसरण करते हैं वे ऐसे लोग हैं जिन्हें पवित्र आत्मा के कार्य के द्वारा निष्कासित किया गया है। समय की प्रत्येक अवधि में, परमेश्वर नया कार्य आरम्भ करेगा, और प्रत्येक अवधि में, मनुष्य के बीच में एक नई शुरुआत होगी। यदि मनुष्य केवल इन सच्चाईयों में ही बना रहता है कि "यहोवा ही परमेश्वर है" और "यीशु ही मसीहा है," जो ऐसी सच्चाईयां हैं जो केवल एक अकेले युग पर ही लागू होती हैं, तो मनुष्य कभी भी पवित्र आत्मा के कार्य के साथ कदम नहीं मिला पाएगा, और वह हमेशा पवित्र आत्मा के कार्य को हासिल करने में असमर्थ रहेगा। इसकी परवाह किए बगैर कि परमेश्वर कैसे कार्य करता है, मनुष्य जरा सा भी सन्देह किए बिना अनुसरण करता है, और वह करीब से अनुसरण करता है। इस रीति से, पवित्र आत्मा के द्वारा मनुष्य को कैसे निष्काषित किया जा सकता है? इसकी परवाह किए बगैर कि परमेश्वर क्या करता है, जब तक मनुष्य को निश्चय है कि यह पवित्र आत्मा का कार्य है, और वह बिना किसी आशंका के पवित्र आत्मा के कार्य में सहयोग करता है, और परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा करने का प्रयास करता है, तो उसे कैसे दण्ड दिया जा सकता है? परमेश्वर का कार्य कभी नहीं रूका है, उसके पदचिन्ह कभी नहीं थमे हैं, और उसके प्रबंधन के कार्य की पूर्णता से पहले, वह सदैव से व्यस्त रहा है, और कभी नहीं रुका है। किन्तु मनुष्य अलग हैः पवित्र आत्मा के कार्य के आंशिक भाग को प्राप्त करने के बाद, वह ऐसा व्यवहार करता है मानो वह कार्य कभी नहीं बदलेगा; थोड़ा का ज्ञान प्राप्त करने के बाद, वह परमेश्वर के नए कार्य के पदचिन्हों का अनुसरण करने के लिए आगे नहीं बढ़ता है; परमेश्वर के कार्य के सिर्फ छोटे से भाग को देखने के बाद, वह तुरन्त ही परमेश्वर को लकड़ी की एक विशिष्ट आकृति के रूप में निर्धारित करता है, और यह मानता है कि परमेश्वर सदैव इस आकार में बना रहेगा जिसे वह अपने सामने देखता है, कि यह भूतकाल में ऐसा ही था और भविष्य में भी ऐसा ही बना रहेगा; सिर्फ एक सतही ज्ञान प्राप्त करने के बाद, मनुष्य इतना घमण्डी हो जाता है कि वह स्वयं को भूल जाता है और बेहूदा ढंग से परमेश्वर के स्वभाव एवं अस्तित्व के विषय में घोषणा करता है कि साधारण तौर पर उनका कोई अस्तित्व नहीं है; और पवित्र आत्मा के कार्य के एक चरण का दृढ़ता से अनुसरण करने का चुनाव करने के बाद, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है की वह किस किस्म का व्यक्ति है जो परमेश्वर के नए कार्य की घोषणा करता है, मनुष्य इसे स्वीकार नहीं करता है। ये ऐसे लोग हैं जो पवित्र आत्मा के नए कार्य को स्वीकार नहीं कर सकते हैं; वे अति रूढ़िवादी हैं, और वे नई चीज़ों को स्वीकार करने में असमर्थ हैं। इस प्रकार के लोग ऐसे हैं जो परमेश्वर में विश्वास तो करते हैं किन्तु परमेश्वर का तिरस्कार भी करते हैं। मनुष्य विश्वास करता है कि इस्राएली ग़लत थे क्योंकि उन्होंने "केवल यहोवा में विश्वास किया और यीशु में विश्वास नहीं किया," फिर भी अधिकांश लोग एक ऐसी भूमिका निभाते हैं जिसके अंतर्गत वे "केवल यहोवा में विश्वास करते हैं तथा यीशु को ठुकराते हैं" और "मसीहा के वापस लौटने की लालसा करते हैं, किन्तु उस मसीहा का विरोध करते हैं जिसे यीशु कहते हैं।" तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं है कि लोग पवित्र आत्मा के कार्य के एक चरण को स्वीकार करने के पश्चात् अभी भी शैतान के प्रभुत्व के अधीन जीवन बिताते हैं, और उन्होंने अभी भी परमेश्वर की आशीषों को प्राप्त नहीं किया है। क्या यह मनुष्य के विद्रोहीपन का परिणाम नहीं है? सम्पूर्ण संसार के मसीही जिन्होंने आज के नए कार्य के साथ कदम नहीं मिलाया है वे सभी उस विश्वास को थामे रहते हैं कि वे भाग्यशाली लोग हैं, और यह कि परमेश्वर उनकी प्रत्येक इच्छा को पूरा करेगा। फिर भी वे निश्चय से यह नहीं कह सकते हैं कि परमेश्वर क्यों उन्हें तीसरे स्वर्ग पर ले जाएगा, न ही वे इसके विषय में निश्चित हैं कि किस प्रकार यीशु उन्हें इकट्टा करने के लिए श्वेत बादल पर सवार होकर आएगा, और वे पूर्ण निश्चयता के साथ यह तो बिलकुल भी नहीं कह सकते हैं कि यीशु सचमुच में उस दिन सफेद बदल पर सवार होकर आएगा या नहीं जिसकी वे कल्पना करते हैं। वे सब चिन्तित हैं, और वे घाटे में है; वे स्वयं भी नहीं जानते हैं कि परमेश्वर उनमें से प्रत्येक को ऊपर ले जाएगा या नहीं, जो विभिन्न समूहों के थोड़े से मुट्टीभर लोग हैं, जो प्रत्येक समुदायों से उसकी जय जयकार करते हैं। वह कार्य जिसे परमेश्वर ने अब किया है, वर्तमान युग, और परमेश्वर की इच्छा - उनके पास इनमें से किसी भी चीज़ की कोई समझ नहीं है, और वे अपनी ऊंगलियों में दिनों को गिनने के आलावा और कुछ नहीं कर सकते हैं। ऐसे लोग जो अंत तक मेम्ने के पदचिन्हों का अनुसरण करते हैं केवल वे ही अन्तिम आशीष को प्राप्त कर सकते हैं, जबकि वे "चतुर लोग", जो बिल्कुल अंत तक अनुसरण करने में असमर्थ हैं फिर भी विश्वास करते हैं कि उन्हें सब कुछ प्राप्त हो चुका है, वे परमेश्वर के प्रगटीकरण की गवाही देने में असमर्थ हैं। वे सब विश्वास करते हैं कि वे पृथ्वी पर सबसे चतुर व्यक्ति हैं, और वे अकारण ही परमेश्वर के कार्य के लगातार विकास को छोटा करते हैं, और ऐसा प्रतीत होता है कि वे पूर्ण निश्चयता के साथ विश्वास करते हैं कि परमेश्वर उन्हें स्वर्ग ले जाएगा, वे जिनके "पास परमेश्वर के प्रति अत्याधिक वफादारी है, परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, और परमेश्वर के वचन में बने रहते हैं।" यद्यपि उनके पास परमेश्वर के द्वारा बोले गए वचनों के प्रति "अत्याधिक वफादारी" है, फिर भी उनके वचन एवं कार्य अत्यंत घिनौने लगते हैं क्योंकि वे पवित्र आत्मा के कार्य का विरोध करते हैं, और छल एवं दुष्टता करते हैं। ऐसे लोग जो बिल्कुल अंत तक अनुसरण नहीं करते हैं, जो पवित्र आत्मा के कार्य के साथ कदम नहीं मिलाते हैं, और जो केवल पुराने कार्य से चिपके रहते हैं और वे न केवल परमेश्वर के प्रति वफादारी हासिल करने में असफल नहीं हुए हैं, बल्कि इसके विपरीत, वे ऐसे लोग बन गए हैं जो परमेश्वर का विरोध करते हैं, वे ऐसे लोग बन गए हैं जिन्हें नए युग के द्वारा ठुकरा दिया गया है, और जिन्हें दण्ड दिया जाएगा। क्या उनसे भी अधिक बेचारा और कोई है? अनेक लोग यह भी विश्वास करते हैं कि वे सब जो प्राचीन व्यवस्था को ठुकराते हैं और नए कार्य को स्वीकार करते हैं वे विवेकहीन हैं। ये लोग, जो केवल विवेक की ही बात करते हैं, और पवित्र आत्मा के कार्य को नहीं जानते हैं, अन्ततः उनके स्वयं के विवेक द्वारा उनके भविष्य की संभावनाओं को छोटा कर दिया जाएगा। परमेश्वर का कार्य सिद्धान्त के द्वारा बना नहीं रहता है, और यद्यपि यह उसका स्वयं का कार्य है, फिर भी परमेश्वर इससे अभी भी चिपका नहीं रहता है। जिसे नकारा जाना चाहिए उसे नकारा गया है, जिसे हटाया जाना चाहिए उसे हटाया गया है। फिर भी मनुष्य परमेश्वर के प्रबंधन के कार्य के सिर्फ एक छोटे से भाग को ही पकड़े रहने के द्वारा स्वयं को परमेश्वर से शत्रुता की स्थिति में रख देता है। क्या यह मनुष्य की मूर्खता नहीं है? क्या यह मनुष्य की अज्ञानता नहीं है? लोग जितना अधिक भयभीत एवं अति सतर्क होते हैं क्योंकि वे परमेश्वर की आशीषों को प्राप्त न करने के विषय में डरते हैं, उतना ही अधिक वे और बड़ी आशीषों को हासिल करने, और अंतिम आशीष को पाने में असमर्थ होते हैं। ऐसे लोग जो दासत्व से व्यवस्था में बने रहते हैं वे सभी व्यवस्था के प्रति अत्यंत वफादारी का प्रदर्शन करते हैं, और वे जितना अधिक व्यवस्था के प्रति ऐसी वफादारी का प्रदर्शन करते हैं, उतना ही अधिक वे ऐसे विद्रोही होते हैं जो परमेश्वर का विरोध करते हैं। क्योंकि अब राज्य का युग है और व्यवस्था का युग नहीं है, और आज के कार्य को अतीत के कार्य के विरूद्ध रोका नहीं जा सकता है, और अतीत के कार्य की तुलना आज के कार्य से नहीं की जा सकती है। परमेश्वर का कार्य बदल चुका है, और मनुष्य का रीति व्यवहार भी बदल चुका है, उसे व्यवस्था को पकड़े रहना या क्रूस को उठाना नहीं है। अतः, व्यवस्था एवं क्रूस के प्रति लोगों की वफादारी परमेश्वर की स्वीकृति को प्राप्त नहीं करेगी।

राज्य के युग में मनुष्य को पूरी तरह से पूर्ण किया जाएगा। विजय के कार्य के पश्चात्, मनुष्य को परिष्करण एवं क्लेश के अधीन किया जाएगा। जो लोग विजय प्राप्त कर सकते हैं और इस क्लेश के दौरान गवाह के रूप में खड़े हो सकते हैं वे ऐसे मनुष्य हैं जिन्हें अन्ततः पूर्ण बनाया जाएगा; वे विजय प्राप्त करनेवाले लोग हैं। इस क्लेश के दौरान, मनुष्य से अपेक्षा की जाती है कि वह इस परिष्करण को स्वीकार करे, और यह परिष्करण परमेश्वर के कार्य की अन्तिम घटना है। यह वह अंतिम समय है जब परमेश्वर के प्रबंधन के समस्त कार्य के समापन से पहले मनुष्य को परिष्कृत किया जाएगा, और वे सब जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं उन्हें इस अंतिम परीक्षा को स्वीकार करना होगा, और इस अंतिम परिष्करण को स्वीकार करना होगा। ऐसे लोग जो क्लेश के द्वारा परेशान हो जाते हैं वे पवित्र आत्मा के कार्य एवं परमेश्वर के मार्गदर्शन से रहित हैं, किन्तु ऐसे लोग जिन्हें सच में जीत लिया गया है और जो सच में परमेश्वर की खोज करते हैं वे अंततः दृढ़ता से स्थिर रहेंगे; वे ऐसे मनुष्य हैं जो विनम्रता एवं दीनता धारण करते हैं, और जो सचमुच में परमेश्वर से प्रेम करते हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि परमेश्वर क्या करता है, इन विजयी मनुष्यों को दर्शनों से वंचित नहीं किया जाएगा और वे अपनी गवाही में असफल हुए बिना अब भी सत्य को अभ्यास में लाएंगे। ये ऐसे मनुष्य हैं जो अंततः बड़े क्लेश से उभर कर निकलेंगे। यद्यपि वे जो अशांत समुद्र में मछली पकड़ते हैं वे आज भी भारमुक्त हो सकते हैं, फिर भी कोई भी मनुष्य अंतिम क्लेश से बचने के योग्य नहीं है, और कोई भी अंतिम परीक्षा से बच नहीं सकता है। उनके लिए जो विजय प्राप्त करते हैं, ऐसे क्लेश भयंकर परिष्करण हैं; किन्तु उनके लिए जो अशांत समुद्र में मछली पकड़ते हैं, यह पूरी तरह से अलग किए जाने का कार्य है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि उन्हें किस प्रकार परखा जाता है, उन लोगों की स्वामी भक्ति अपरिवर्तनीय बनी रहती है जिनके हृदय में परमेश्वर है, किन्तु उनके लिए जिनके हृदय में परमेश्वर नहीं है, जब एक बार परमेश्वर का कार्य उनकी देह के लिए फायदेमन्द नहीं होता है, तो वे परमेश्वर के विषय में अपने दृष्टिकोण को बदल देते हैं, और यहाँ तक कि परमेश्वर को छोड़कर चले जाते हैं। इस प्रकार के लोग ऐसे मनुष्य हैं जो अंत में दृढ़ता से स्थिर नहीं रहेंगे, जो केवल परमेश्वर की आशीषों को ही खोजते हैं और उनके पास परमेश्वर के लिए अपने आपको विस्तृत करने और उसके प्रति अपने आपका समर्पण करने की कोई इच्छा नहीं होती है। इस किस्म के सभी नीच लोगों को तब बहिष्कृत किया जाएगा जब परमेश्वर का कार्य समाप्ति पर आ जाता है, और वे किसी भी प्रकार की सहानुभूति के योग्य नहीं है। ऐसे लोग जो मानवता से रहित हैं वे सचमुच में परमेश्वर से प्रेम करने में असमर्थ हैं। जब माहौल सही सलामत एवं सुरक्षित होता है, या जब वे लाभ प्राप्त कर सकते हैं, तब वे परमेश्वर के प्रति पूरी तरह आज्ञाकारी रहते हैं, किन्तु जब एक बार जिस वस्तु की वे इच्छा करते हैं उससे समझौता करना पड़ता है या अंतत: उसका इंकार कर दिया जाता है, तो वे एकदम से विरोध करते हैं। यहाँ तक कि एक रात के अन्तराल में भी, वे एक मुस्कुराते हुए, "उदार हृदय" वाले व्यक्ति से एक कुरूप एवं जघन्य हत्यारे में बदल जाते हैं, और बिना किसी तर्क या कारण के अचानक ही अपने कल के उपकारकों से अपने शारीरिक शत्रु के समान व्यवहार करने लगते हैं। यदि इन दुष्ट आत्माओं को नहीं निकाला जाता, ऐसे दुष्ट आत्मा जो पलक झपकते ही हत्या कर सकते हैं, तो क्या वे आगे और अधिक मुसीबतों का स्रोत नहीं बनेंगे? विजय के समापन के कार्य का अनुकरण करने से मनुष्य को बचाने के कार्य को हासिल नहीं किया जाता है। यद्यपि विजय का कार्य समाप्ति पर आ गया है, फिर भी मनुष्य के शुद्धिकरण का कार्य समाप्ति पर नहीं आया है; ऐसा कार्य केवल तभी समाप्त होगा जब एक बार मनुष्य को सम्पूर्ण रीति से शुद्ध कर दिया जाता है, जब एक बार ऐसे लोगों को पूर्ण कर लिया जाता है जो सचमुच में परमेश्वर के अधीन होते हैं, और जब एक बार उन बहरुपियों को शुद्ध कर दिया जाता है जो अपने हृदय में परमेश्वर से रहित हैं। ऐसे लोग जो परमेश्वर के कार्य की अन्तिम अवस्था में उसे संतुष्ट नहीं करते हैं उन्हें पूरी तरह से निकाल दिया जाएगा, और ऐसे लोग जिन्हें निकाला गया है वे शैतान के हैं। जबकि वे परमेश्वर को संतुष्ट करने में असमर्थ हैं, तो वे परमेश्वर के विरूद्ध विद्रोही हैं, और यद्यपि ये लोग आज परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, फिर भी इससे यह साबित नहीं होता है कि वे ऐसे लोग हैं जो अंततः बने रहेंगे। यह कि "ऐसे लोग जो अंत तक परमेश्वर का अनुसरण करेंगे वे उद्धार प्राप्त करेंगे," इन शब्दों में "अनुसरण करने" का अर्थ है क्लेश के मध्य दृढ़ता से स्थिर रहना। आज, बहुत से लोग मानते हैं कि परमेश्वर के पीछे चलना आसान है, किन्तु जब परमेश्वर का कार्य समाप्त होने ही वाला है, तब तुम "अनुसरण करने" का असली अर्थ जानोगे। सिर्फ इसलिए क्योंकि जीत लिए जाने के पश्चात् तुम आज भी परमेश्वर का अनुसरण करने के योग्य हो, इससे यह प्रमाणित नहीं होता है कि तुम उन लोगों में से एक हो जिन्हें पूर्ण किया जाएगा। ऐसे लोग जो परीक्षाओं को सहने में असमर्थ हैं, जो क्लेशों के मध्य विजयी होने में असक्षम हैं वे अन्ततः दृढ़ता से स्थिर खड़े रहने में असक्षम होंगे, और इस प्रकार वे बिलकुल अंत तक अनुसरण करने में असमर्थ होंगे। ऐसे लोग जो सचमुच में परमेश्वर के पीछे चलते हैं वे अपने कार्य की परीक्षा का सामना करने के योग्य हैं, जबकि ऐसे लोग जो सचमुच में परमेश्वर का अनुसरण नहीं करते हैं वे परमेश्वर की किसी भी परीक्षाओं का सामना करने में असमर्थ हैं। जल्दी या देर से ही सही उन्हें बाहर निकाल दिया जाएगा, जबकि विजय प्राप्त करनेवाले राज्य में बने रहेंगे। मनुष्य परमेश्वर को खोजता है या नहीं इसका निर्धारण उसके कार्य की परीक्षा के द्वारा किया जाता है, अर्थात्, परमेश्वर की परीक्षाओं के द्वारा किया जाता है, और इसका स्वयं मनुष्य के द्वारा लिए गए निर्णय के साथ, कोई लेना देना नहीं होता है। परमेश्वर सनक के साथ किसी मनुष्य का तिरस्कार नहीं करता है; वह सब कुछ इसलिए करता है ताकि मनुष्य को पूर्णरूप से आश्वस्त किया जा सके। वह ऐसा कुछ भी नहीं करता है जो मनुष्य के लिए अदृश्य हो, या कोई ऐसा कार्य नहीं करता है जो मनुष्य को आश्वस्त न कर सके। मनुष्य का विश्वास सही है या नहीं इसे तथ्यों के द्वारा साबित किया जाता है, और इसका निर्णय मनुष्य के द्वारा नहीं किया जा सकता है। "गेहूँ को जंगली घासपात नहीं बनाया जा सकता है, और जंगली घासपात को गेहूँ नहीं बनाया जा सकता है" इसमें कोई सन्देह नहीं है। वे सब लोग जो सचमुच में परमेश्वर से प्रेम करते हैं वे अंततः राज्य में बने रहेंगे, और परमेश्वर किसी ऐसे के साथ दुर्व्यवहार नहीं करेगा जो वास्तव में उससे प्रेम करता है। उनके विभिन्न कार्यों एवं गवाहियों के आधार पर, राज्य के भीतर विजय पानेवाले लोग याजकों एवं अनुयायियों के रूप में सेवा करेंगे, और वे सब जो क्लेश के मध्य विजयी हुए हैं वे राज्य के भीतर याजकों का एक समूह बन जाएंगे। याजकों का समूह बनाया जाएगा जब सम्पूर्ण विश्व में सुसमाचार का कार्य समाप्ति पर आ जाएगा। जब वह समय आता है, तब जिसे मनुष्य के द्वारा किया जाना चाहिए वह परमेश्वर के राज्य के भीतर उसके कर्तव्य का निष्पादन होगा, और राज्य के भीतर परमेश्वर के साथ उसका जीवन जीना होगा। याजकों के समूह में महायाजक एवं याजक होंगे, और शेष बचे हुए लोग परमेश्वर की संतान एवं उसके लोग होंगे। यह सब क्लेश के दौरान परमेश्वर के प्रति उनकी गवाहियों के द्वारा निर्धारित किया जाता है, ये ऐसी उपाधियाँ नहीं हैं जिन्हें सनक के साथ दिया गया है। जब एक बार मनुष्य के रुतबे को स्थापित कर दिया जाता है, तो परमेश्वर का कार्य ठहर जाएगा, क्योंकि प्रत्येक को उसके किस्म के अनुसार वर्गीकृत किया जाता है और प्रत्येक अपनी मूल स्थिति में वापस लौट जाता है, और यह परमेश्वर के कार्य के समापन का चिन्ह है, यह परमेश्वर के कार्य एवं मनुष्य के अभ्यास का अन्तिम परिणाम है, और यह परमेश्वर के कार्य के दर्शनों एवं मनुष्य के सहयोग का साकार रुप है। अंत में, मनुष्य परमेश्वर के राज्य में विश्राम पाएगा, और परमेश्वर भी विश्राम करने के लिए अपने निवास स्थान में लौट जाएगा। यह परमेश्वर एवं मनुष्य के बीच 6000 वर्षों के सहयोग का अन्तिम परिणाम है।

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