परमेश्वर के दैनिक वचन | "कार्य और प्रवेश (3)" | अंश 309

मनुष्य के स्वभाव को बदलने का सबसे अच्छा तरीका लोगों के अंतर्मन के उन हिस्सों को ठीक करना है, जिन्हें गहराई से विषैला कर दिया गया है, ताकि लोग अपनी सोच और नैतिकता को बदल सकें। सबसे पहले, लोगों को स्पष्ट रूप से यह देखने की ज़रूरत है कि परमेश्वर के लिए धार्मिक संस्कार, धार्मिक गतिविधियाँ, वर्ष और महीने, और त्योहार घृणास्पद हैं। उन्हें सामंती विचारधारा के इन बंधनों से मुक्त होना चाहिए और अंधविश्वास की गहरी जमी बैठी प्रवृत्ति के हर निशान को जड़ से उखाड़ देना चाहिए। ये सब मनुष्यजाति के प्रवेश में सम्मिलित हैं। तुम लोगों को यह समझना चाहिए कि क्यों परमेश्वर मनुष्यजाति को सांसारिक जगत से बाहर ले जाता है, और फिर क्यों वह मनुष्यजाति को नियमों और विनियमों से दूर ले जाता है। यही वह द्वार है, जिससे तुम लोग प्रवेश करोगे, और यद्यपि इन चीज़ों का तुम्हारे आध्यात्मिक अनुभव के साथ कोई संबंध नहीं है, फिर भी ये तुम लोगों का प्रवेश और परमेश्वर को जानने का मार्ग अवरुद्ध करने वाली सबसे बड़ी अड़चनें हैं। वे एक जाल बुनती हैं, जो लोगों को फँसा लेता है। कई लोग बाइबल को बहुत अधिक पढ़ते हैं, यहाँ तक कि अपनी स्मृति से बाइबिल के अनेक अंश सुना भी सकते हैं। आज अपने प्रवेश में लोग परमेश्वर के कार्य को मापने के लिए अनजाने में बाइबल का प्रयोग करते हैं, मानो परमेश्वर के कार्य में इस चरण का आधार बाइबल हो और उसका स्रोत भी बाइबल हो। जब परमेश्वर का कार्य बाइबल के अनुरूप होता है, तब लोग परमेश्वर के कार्य का दृढ़ता से समर्थन करते हैं और नई श्रद्धा के साथ उसका आदर करते हैं; जब परमेश्वर का कार्य बाइबल के अनुरूप नहीं होता, तब लोग इतने व्याकुल हो जाते हैं कि बाइबल में परमेश्वर के कार्य का आधार खोजते-खोजते उनके पसीने छूटने लगते हैं; यदि बाइबल में परमेश्वर के कार्य का कोई उल्लेख न मिले, तो लोग परमेश्वर को अनदेखा कर देंगे। यह कहा जा सकता है कि जहाँ तक परमेश्वर के आज के कार्य का संबंध है, ज्यादातर लोग उसे बहुत सतर्कतापूर्वक स्वीकार करते हैं, उसका चयनात्मक रूप से पालन करते हैं, और उसे जानने के बारे में उदासीन अनुभव करते हैं; जहाँ तक अतीत की बातों का प्रश्न है, वे उनके आधे भाग को पकड़े रहते हैं और बाकी आधे को त्याग देते हैं। क्या इसे प्रवेश कहा जा सकता है? दूसरों की पुस्तकें किसी खज़ाने की तरह थामकर और उन्हें स्वर्ग के द्वार की सुनहरी कुंजी समझकर लोग साफ़-साफ़ उस चीज़ में रुचि नहीं दर्शाते, जो परमेश्वर आज उनसे चाहता है। इतना ही नहीं, बहुत सारे "बुद्धिमान विशेषज्ञ" परमेश्वर के वचन अपने बाएँ हाथ में और दूसरों की "उत्कृष्ट कृतियाँ" अपने दाएँ हाथ में रखते हैं, मानो वे परमेश्वर के आज के वचनों का आधार इन उत्कृष्ट कृतियों में खोजना चाहते हों, ताकि पूर्ण रूप से यह सिद्ध कर सकें कि परमेश्वर के वचन सही हैं, यहाँ तक कि वे दूसरों के सामने परमेश्वर के वचनों की व्याख्या उत्कृष्ट कृतियों के साथ जोड़कर करते हैं, मानो बड़ा भारी काम कर रहे हों। सच कहा जाए, तो मनुष्यजाति में ऐसे बहुत सारे "वैज्ञानिक शोधकर्ता" हैं, जिन्होंने आज की वैज्ञानिक उपलब्धियों को कभी अधिक महत्व नहीं दिया, ऐसी वैज्ञानिक उपलब्धियों को, जिनकी कोई मिसाल नहीं है (अर्थात् परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर के वचन, और जीवन में प्रवेश का मार्ग), इसलिए लोग पूरी तरह से "आत्मनिर्भर" हैं, अपनी वाक्पटुता के बल पर बड़े और व्यापक "उपदेश" देते हैं और "परमेश्वर के अच्छे नाम" पर अकड़ते हैं। इस बीच, उनका स्वयं का प्रवेश संकट में होता है और वे परमेश्वर की अपेक्षाओं से उतनी ही दूर दिखते हैं, जितनी दूर इस क्षण सृष्टि दिखती है। कितना सरल है परमेश्वर का कार्य करना? ऐसा प्रतीत होता है कि लोगों ने पहले ही स्वयं को आधा बीते हुए कल में छोड़ देने और आधा आज में लाने, आधा शैतान को सौंपने और आधा परमेश्वर को प्रस्तुत करने का मन बना लिया है, मानो यही अपने अंत:करण को शांत करने तथा कुछ सुख की भावना अनुभव करने का मार्ग हो। लोगों की भीतरी दुनिया इतनी कपट से भरी है कि वे न सिर्फ आने वाले कल को, बल्कि बीते हुए कल को भी खोने से डरते हैं, वे आज शैतान और परमेश्वर, जो लगता है कि है भी और नहीं भी, दोनों को अप्रसन्न करने से गहराई से डरते हैं। चूँकि लोग अपनी सोच और नैतिकता को सही तरीके से विकसित करने में विफल रहे हैं, इसलिए उनमें विवेक की विशेष कमी है, और वे यह बता ही नहीं सकते कि आज का कार्य परमेश्वर का कार्य है या नहीं है। शायद ऐसा इसलिए है, क्योंकि लोगों की सामंती और अंधविश्वासी सोच इतनी गहरी है कि उन्होंने बहुत पहले ही अंधविश्वास और सत्य, परमेश्वर और मूर्तियों में अंतर की परवाह न करते हुए उन्हें एक ही श्रेणी में रख दिया है और अपने दिमाग़ पर जोर देने के बावजूद वे उनमें स्पष्ट रूप से अंतर करने में असमर्थ प्रतीत होते हैं। इसलिए मनुष्य अपने मार्ग पर ठहर गए हैं और अब और आगे नहीं बढ़ते। यह सब समस्याएँ लोगों में सही वैचारिक शिक्षा की कमी के कारण उत्पन्न होती है, जो उनके प्रवेश में बहुत कठिनाइयाँ उत्पन्न करती है। परिणामस्वरूप, लोग सच्चे परमेश्वर के कार्य में कोई रुचि महसूस नहीं करते, बल्कि मनुष्य के (जैसे कि उनके, जिन्हें वे महापुरुष समझते हैं) कार्य से दृढ़ता से चिपके रहते हैं, जैसे कि उन पर उसकी मुहर लग गई हो। क्या ये नवीनतम विषय नहीं हैं, जिनमें मनुष्यजाति को प्रवेश करना चाहिए?

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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