परमेश्वर के दैनिक वचन | "केवल सत्य की खोज करके ही स्वभाव में बदलाव लाया जा सकता है" | अंश 556

केवल सत्य का अनुसरण करके ही व्यक्ति अपने स्वभाव में बदलाव ला सकता है : यह एक ऐसी बात है, जिसे लोगों को अच्छी तरह से जानना-बूझना चाहिए, और समझना चाहिए। अगर तुम्हें सत्य की पर्याप्त समझ नहीं है, तो तुम आसानी से फिसल जाओगे और मार्ग से भटक जाओगे। यदि तुम जीवन में विकास करना चाहते हो, तो तुम्हें हर चीज़ में सत्य की तलाश करनी चाहिए। तुम चाहे कुछ भी कर रहे हो, तुम्हें इस बात की खोज करनी चाहिए कि सत्य के अनुरूप जीने के लिए किस तरह व्यवहार करना चाहिए, और इस बात का पता लगाना चाहिए कि तुम्हारे भीतर क्या दोष मौजूद है, जो इसका उल्लंघन करता है; तुम्हें इन चीज़ों की स्पष्ट समझ होनी चाहिए। तुम चाहे कुछ भी कर रहे हो, तुम्हें इस बात पर विचार करना चाहिए कि उसका कोई मूल्य है या नहीं। तुम वे चीज़ें कर सकते हो जो अर्थपूर्ण हों, लेकिन तुम्हें वे चीज़ें नहीं करनी चाहिए जिनका कोई अर्थ न हो। जहाँ तक उन चीज़ों का संबंध है, जिन्हें तुम कर भी सकते हो और नहीं भी कर सकते, उन्हें यदि जाने दिया जा सकता है, तो तुम्हें उन्हें जाने देना चाहिए। अन्यथा यदि तुम कुछ समय के लिए उन चीज़ों को करते हो और बाद में पाते हो कि तुम्हें उन्हें जाने देना चाहिए, तो एक त्वरित निर्णय लो और उन्हें ज़ल्दी से जाने दो। यह वह सिद्धांत है, जिसका अनुसरण तुम्हें अपने हर काम में करना चाहिए। कुछ लोग यह प्रश्न उठाते हैं : सत्य की तलाश करना और उसे व्यवहार में लाना इतना ज्यादा मुश्किल क्यों है—मानो तुम धारा के विरुद्ध नाव खे रहे हो और अगर तुमने आगे की ओर नाव खेना बंद कर दिया, तो पीछे बह जाओगे? बुरी या निरर्थक चीज़ें करना वास्तव में बहुत आसान क्यों है—नाव को धारा के साथ खेने जितना आसान? ऐसा क्यों है? ऐसा इसलिए है, क्योंकि मनुष्य का स्वभाव परमेश्वर के साथ विश्वासघात करना है। शैतान की प्रकृति ने मनुष्यों के भीतर एक प्रमुख भूमिका ग्रहण कर ली है, और वह एक प्रतिक्रियावादी शक्ति है। परमेश्वर के साथ विश्वासघात करने की प्रकृति वाले मनुष्य निश्चित रूप से ऐसी चीज़ें आसानी से कर सकते हैं, जो परमेश्वर के साथ विश्वासघात करती हैं, और सकारात्मक कार्य करना उनके लिए स्वाभाविक रूप से कठिन होता है। यह पूरी तरह से मनुष्य की प्रकृति और सार द्वारा निश्चित किया जाता है। एक बार जब तुम वास्तव में सत्य को समझ जाते हो और उसे अपने भीतर से प्यार करना शुरू कर देते हो, तो तुम्हारे पास उन चीजों को करने की शक्ति होगी, जो सत्य के अनुरूप हैं। तब यह सामान्य हो जाता है, यहाँ तक कि सहज और सुखद भी, और तुम महसूस करते हो कि कोई नकारात्मक चीज़ करने के लिए भारी प्रयास की आवश्यकता होगी। ऐसा इसलिए है, क्योंकि सत्य ने तुम्हारे दिल में एक प्रमुख भूमिका ले ली है। अगर तुम वाकई मानव-जीवन का सत्य समझते हो और अगर तुम यह सत्य समझते हो कि किस तरह का व्यक्ति होना चाहिए—किस तरह एक निष्कपट और सीधा-सादा व्यक्ति बनना चाहिए, एक ईमानदार व्यक्ति, ऐसा व्यक्ति जो परमेश्वर की गवाही देता हो और उसकी सेवा करता हो—तो तुम फिर कभी परमेश्वर की अवहेलना करने वाले बुरे कार्य करने में सक्षम नहीं होगे, और न ही तुम कभी एक झूठे अगुआ, झूठे कार्यकर्ता या मसीह-विरोधी की भूमिका निभाओगे। भले ही शैतान तुम्हें धोखा दे, या कोई दुष्ट तुम्हें उकसाए, तुम वो नहीं करोगे; कोई तुम्हारे साथ कितनी भी ज़बरदस्ती करे, तुम फिर भी वैसा नहीं करोगे। यदि लोग सत्य को प्राप्त कर लेते हैं और सत्य उनका जीवन बन जाता है, तो वे बुराई से घृणा करने और नकारात्मक चीजों से आंतरिक विरक्ति महसूस करने में सक्षम हो जाते हैं। उनके लिए बुराई करना मुश्किल होगा, क्योंकि उनके जीवन स्वभाव बदल गए हैं और उन्हें परमेश्वर द्वारा पूर्ण बना दिया गया है।

अगर तुम्हारे भीतर वाकई सत्य है, तो जिस मार्ग पर तुम चलते हो वह स्वाभाविक रूप से सही मार्ग होगा। सत्य के बिना, बुरे काम करना आसान है और तुम यह अपनी मर्जी के बिना करोगे। उदाहरण के लिए, यदि तुम्हारे भीतर अहंकार और दंभ मौजूद हुआ, तो तुम परमेश्वर की अवहेलना करने से खुद को रोकना असंभव पाओगे; तुम्हें महसूस होगा कि तुम उसकी अवहेलना करने के लिए मज़बूर किये गये हो। तुम ऐसा जानबूझ कर नहीं करोगे; तुम ऐसा अपनी अहंकारी और दंभी प्रकृति के प्रभुत्व के अधीन करोगे। तुम्हारे अहंकार और दंभ के कारण तुम परमेश्वर को तुच्छ समझोगे और उसे ऐसे देखोगे जैसे कि उसका कोई महत्व ही न हो, वे तुमसे स्वयं की प्रशंसा करवाने की वजह होंगे, निरंतर तुमको दिखावे में रखवाएंगे और अंततः परमेश्वर के स्थान पर बैठाएंगे और स्वयं के लिए गवाही दिलवाएंगे। अंत में तुम आराधना किए जाने हेतु सत्य में अपने स्वयं के विचार, अपनी सोच, और अपनी स्वयं की धारणाएँ बदल लोगे। देखो लोग अपनी उद्दंडता और अहंकारी प्रकृति के प्रभुत्व के अधीन कितनी बुराई करते हैं! अपने बुरे कर्मों के समाधान के लिए, पहले उन्हें अपनी प्रकृति की समस्या को हल करना होगा। स्वभाव में बदलाव किए बिना, इस समस्या का मौलिक समाधान हासिल करना संभव नहीं है। जब तुम्हें परमेश्वर की कुछ समझ होगी, जब तुम अपनी भ्रष्टता को देख सकोगे, अहंकार और दंभ की कुरूपता और घिनौनेपन को पहचान सकोगे, तब तुम नफरत, घृणा और व्यथा को महसूस करोगे। तुम परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए अपनी इच्छा से कुछ काम करने में सक्षम होगे और ऐसा करने में तुम्हें सुकून महसूस होगा। तुम अपनी इच्छा से परमेश्वर के लिए गवाही देने में सक्षम होगे और ऐसा करने में तुम खुशी महसूस करोगे। तुम अपनी इच्छा से अपने आपको बेनकाब करोगे, अपनी खुद की कुरूपता को उजागर करोगे और ऐसा करके तुम अंदर से अच्छा महसूस करोगे और तुम अपने आपको बेहतर मानसिक स्थिति में महसूस करोगे। इसलिये, अपने स्वभाव में बदलाव लाने की कोशिश का पहला चरण परमेश्वर के वचनों को समझने की कोशिश करना और सत्य में प्रवेश करना है। केवल सत्य को समझकर ही तुम्हारे अंदर विवेक आएगा; केवल विवेक से ही तुम चीज़ों को पूरी तरह समझ पाओगे; चीज़ों को पूरी तरह समझकर ही तुम देह की इच्छाओं का त्याग कर सकते हो और परमेश्वर में अपने विश्वास के साथ तुम कदम-दर-कदम सही मार्ग पर आगे बढ़ पाओगे। यह इस बात से जुड़ा है कि सत्य का अनुसरण करते समय लोग कितने दृढ़ होते हैं। यदि कोई वास्तव में दृढ़ है, तो छह महीने या एक साल के बाद वे सही रास्ते पर आने शुरू हो जाएंगे। तीन या पांच वर्षों के भीतर, वे परिणाम देख लेंगे, और महसूस करेंगे कि वे जीवन में प्रगति कर रहे हैं। यदि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो लेकिन सत्य का अनुसरण नहीं करते, तो दस साल तक विश्वास कर सकते हो लेकिन तुम्हें किसी बदलाव का अनुभव नहीं होगा। अंत में, तुम सोचोगे कि परमेश्वर में विश्वास करने का ठीक यही मतलब है; तुम सोचोगे कि यह बहुत हद तक वैसा ही है जैसे तुम पहले दुनिया में रहते थे, और जीवित रहना अर्थहीन है। यह वास्तव में दिखाता है कि सत्य के बिना जीवन खोखला है। तुम कुछ सैद्धांतिक शब्द बोलने में सक्षम हो सकते हो, लेकिन तुम अभी भी असहज और बेचैन महसूस करोगे। यदि लोगों को परमेश्वर के बारे में कुछ जानकारी है, वे जानते हैं कि एक सार्थक जीवन कैसे जीना है, और वे परमेश्वर को संतुष्ट करने वाली कुछ चीजें कर सकते हैं, तो वे महसूस करेंगे कि यही वास्तविक जीवन है, केवल इसी तरह से रहने से उनके जीवन का अर्थ होगा, और परमेश्वर को थोड़ी संतुष्टि प्रदान करने और कृतज्ञ महसूस करने के लिए उन्हें इसी तरह से रहना होगा। यदि वे सजगतापूर्वक परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं, सत्य को व्यवहार में ला सकते हैं, स्वयं को त्याग सकते हैं, अपने विचारों को छोड़ सकते हैं, और परमेश्वर की इच्छा के प्रति आज्ञाकारी और विचारशील हो सकते हैं—यदि वे इन सभी चीजों को सजगतापूर्वक करने में सक्षम हैं—तो सत्य को सटीक रूप से व्यवहार में लाने, और सत्य को वास्तव में व्यवहार में लाने का यही अर्थ है, और यह उनकी कल्पनाओं पर उनकी पिछली निर्भरता और सिद्धांतों और नियमों से चिपके रहने से बिलकुल भिन्न है। वास्तव में, जब वे सत्य को नहीं समझते तो उनका कुछ भी करना थकाऊ है, सिद्धांतों और नियमों से चिपके रहना थकाऊ है, और कोई लक्ष्य न होना और चीज़ों को आँखें मूँदकर करते रहना थकाऊ है। केवल सत्य के साथ ही वे मुक्त हो सकते हैं—यह कोई झूठ नहीं है—और उसके साथ वे चीज़ों को आसानी से और खुशी से कर सकते हैं। ऐसी स्थिति वाले लोग वे लोग हैं, जिनके पास सत्य है; वे ही हैं जिनके स्वभाव बदल दिए गए हैं।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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