परमेश्वर के दैनिक वचन | "पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान" | अंश 525

परमेश्वर मनुष्य का न्याय करता है और उसको ताड़ना देता है क्योंकि यह उसके कार्य की मांग है, और इसके अतिरिक्त, मनुष्य को इसकी आवश्यकता है। मनुष्य को ताड़ना दिए जाने और उसका न्याय किए जाने की आवश्यकता है, और केवल तब ही वह परमेश्वर के प्रेम को प्राप्त कर सकता है। आज, तुम लोग पूरी तरह विश्वस्त हो चुके हो, परन्तु जब तुम लोग जरा सा भी पीछे हटते हो तो तुम लोग परेशानी में आ जाते हो; तुम लोगों की आकृति अभी भी बहुत छोटी है, और एक गहरा ज्ञान प्राप्त करने के लिए तुम लोगों को अभी भी ऐसी ताड़ना और न्याय का और भी अधिक अनुभव करने की आवश्यकता है। आज, तुम लोगों में परमेश्वर के प्रति कुछ आदर है, और तुम लोग परमेश्वर से डरते हो, और तुम लोग जानते हो कि वह सच्चा परमेश्वर है, परन्तु तुम लोगों के पास उसके लिए एक महान प्रेम नहीं है, और सच्चा प्रेम तो तुम लोगों ने बिलकुल भी हासिल नहीं किया है; तुम लोगों का ज्ञान बहुत ही छिछला है, और तुम लोगों की हस्ती अभी भी अपर्याप्त है। जब तुम लोग सचमुच में एक वातावरण का सामना करते हो, तब भी तुम लोग गवाही नहीं देते हो, तुम लोगों का बहुत कम प्रवेश अग्रसक्रिय होता है, और तुम लोगों में कोई समझ नहीं है कि अभ्यास कैसे करें। बहुत से लोग निष्क्रिय और सुस्त होते हैं; वे केवल गुप्त रूप से अपने हृदय में परमेश्वर से प्रेम करते हैं, किन्तु उनके पास अभ्यास का कोई तरीका नहीं है, और न ही वे इस बात को लेकर स्पष्ट हैं कि उनके लक्ष्य क्या हैं। वे जिन्हें सिद्ध बनाया गया है उनके पास न केवल सामान्य मानवीयता है, बल्कि उनके पास ऐसी सच्चाईयाँ हैं जो विवेक के मापदण्डों से बढ़कर हैं, और जो विवेक स्तरों से ऊँचे हैं; वे परमेश्वर के प्रेम का प्रतिफल देने के लिए न केवल अपने विवेक का इस्तेमाल करते हैं, बल्कि, उस से बढ़कर, वे परमेश्वर को जान चुके हैं, और यह देख चुके हैं कि परमेश्वर प्रेमी है, और वह मनुष्य के प्रेम के योग्य है, और यह कि परमेश्वर से प्रेम करने के लिए उस में इतना कुछ है कि मनुष्य उसे प्रेम करने के सिवाय और कुछ नहीं कर सकता है। वे लोग जिन्हें सिद्ध किया गया है उनके लिए परमेश्वर का प्रेम उनकी व्यक्तिगत आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए है। उनका प्रेम स्वैच्छिक है, एक ऐसा प्रेम जो बदले में कुछ भी नहीं मांगता है, और जो एक व्यापार नहीं है। वे परमेश्वर से प्रेम करते हैं क्योंकि वे उसके ज्ञान को छोड़ और कुछ भी नहीं जानते हैं। ऐसे लोग यह परवाह नहीं करते हैं कि परमेश्वर उन पर अनुग्रह करेगा कि नहीं, और परमेश्वर को संतुष्ट करने के सिवाय और किसी भी चीज़ से तृप्त नहीं होते हैं। वे परमेश्वर से मोल भाव नहीं करते हैं, और न ही वे विवेक के द्वारा परमेश्वर के प्रति अपने प्रेम को नापते हैं: तूने मुझ से प्रेम किया है, इस प्रकार उसके बदले मैं तुझसे प्रेम करता हूँ; यदि तू मुझे कुछ नहीं देता है, तो बदले में मेरे पास भी तेरे लिए कुछ नहीं है। वे जिन्हें सिद्ध किया गया है उन्होंने हमेशा विश्वास किया है कि परमेश्वर सृष्टिकर्ता है, यह कि वह उन के लिए अपना कार्य करता है, और यह कि, चूँकि उनके पास सिद्ध किए जाने के लिए यह अवसर, परिस्थिति और योग्यता है, इसीलिए एक अर्थपूर्ण जीवन बिताना ही उनकी प्रवृत्ति होनी चाहिए, और उन्हें परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहिए। यह बिलकुल वैसा ही है जैसे पतरस ने अनुभव किया था: जब वह बेहद कमज़ोर था, तब उसने प्रार्थना की और कहा, "हे परमेश्वर! समय और स्थान की परवाह न करते हुए, तू जानता है कि मैं ने तुझे हमेशा याद किया है। इस से कोई फर्क नहीं पड़ता कि समय और स्थान क्या था, तू जानता है कि मैं तुझसे प्रेम करना चाहता हूँ, परन्तु मेरी हस्ती बहुत छोटी है, मैं बहुत कमज़ोर और निर्बल हूँ, मेरा प्रेम बहुत सीमित है, और तेरे प्रति मेरी सत्य निष्ठा बहुत थोड़ी सी है। तेरे प्रेम की तुलना में, मैं साधारणतः जीने के भी योग्य नहीं हूँ। मैं कामना करता हूँ कि मेरा जीवन व्यर्थ न हो, और यह कि मैं न केवल तेरे प्रेम का प्रतिफल दूँ, बल्कि, इसके अतिरिक्त, यह कि वह सब कुछ जो मेरे पास है उसे तेरे लिए समर्पित कर दूँ। यदि मैं तुझे संतुष्ट कर सकता, तब एक प्राणी होने के नाते, मेरे पास मन की शांति होती, और मैं कुछ और नहीं मांगूंगा। यद्यपि अब मैं कमज़ोर और निर्बल हूँ, फिर भी मैं तेरे प्रोत्साहन को नहीं भूलुंगा, और तेरे प्रेम को नहीं भूलुंगा। अब मैं तेरे प्रेम का प्रतिफल देने के सिवाय कुछ और नहीं कर रहा हूँ। हे परमेश्वर, मैं भंयकर भय का एहसास कर रहा हूँ! मेरे हृदय में तेरे लिए जो प्रेम है उसे मैं वापस कैसे दे सकता हूँ, वह सब कुछ जो मैं कर सकता हूँ उसे मैं कैसे कर सकता हूँ, मैं तेरी इच्छाओं को पूरा करने के योग्य कैसे हो सकता हूँ, और मैं वह सब कुछ भेंट चढ़ाने के योग्य कैसे हो सकता हूँ जिसे मुझे तुझे भेंट चढ़ाना है? तू मनुष्य की कमज़ोरी को जानता है; मैं तेरे प्रेम के काबिल कैसे हो सकता हूँ? हे परमेश्वर! तू जानता है कि मेरी हस्ती छोटी सी है, और यह कि मेरा प्रेम बहुत थोड़ा सा है। इस प्रकार के वातावरण में मैं अपने भरसक सबसे उत्तम कार्य कैसे कर सकता हूँ? मैं जानता हूँ कि मुझे तेरे प्रेम का प्रतिफल देना चाहिए, मैं जानता हूँ कि मुझे वह सब कुछ देना चाहिए जिसे मुझे तुझे देना है, परन्तु आज मेरी हस्ती बहुत छोटी है। मैं तुझसे मांगता हूँ कि तू मुझे सामर्थ दे, और मुझे आत्मविश्वास दे, जिस से तुझे समर्पित करने के लिए मैं और अधिक शुद्ध प्रेम को प्राप्त करने के योग्य हो जाऊँगा, और वह सब कुछ समर्पित करने के लिए और अधिक योग्य हो जाऊँगा जिसे मुझे तुझे समर्पित करना है; न केवल मैं तुझे तेरे प्रेम का प्रतिफल देने के योग्य हो जाऊँगा, बल्कि तेरी ताड़ना, न्याय और परीक्षाओं, और यहाँ तक कि कठिन अभिशापों का भी अनुभव करने के लिए और अधिक योग्य हो जाऊँगा। तूने मुझे अपने शुद्ध प्रेम को देखने दिया है, और तुझसे प्रेम न करने में मैं असमर्थ हूँ, और आज भले ही मैं कमज़ोर और निर्बल हूँ, फिर भी मैं तुझे कैसे भूल सकता हूँ? तेरे प्रेम, ताड़ना और न्याय इन सब से मैं ने तुझे जाना है, फिर भी तेरे प्रेम की पूर्ति करने में मैं असमर्थता महसूस करता हूँ, क्योंकि तू कितना महान है। मैं वह सब कुछ कैसे समर्पित कर सकता हूँ जिसे मुझे सृष्टिकर्ता के लिए समर्पित करना है?" पतरस की विनती ऐसी ही थी, फिर भी उसकी हस्ती बिलकुल ना काफी थी। इस क्षण, उसने महसूस किया कि एक कटार उसके हृदय के आर-पार हो गया था और वह पीड़ा में था; वह नहीं जानता था कि ऐसी स्थिति में क्या करना है। फिर भी वह लगातार प्रार्थना करता रहा: "हे परमेश्वर! मनुष्य की हस्ती बचकानी है, उसका विवेक कमज़ोर है, और तेरे प्रेम का प्रतिफल देना ही वह एक मात्र चीज़ है जिसे मैं हासिल कर सकता हूँ। आज, मैं नहीं जानता हूँ कि तेरी इच्छाओं को कैसे संतुष्ट करूँ, या वह सब कैसे करूँ जिसे मैं कर सकता हूँ, या वह सब कुछ तुझे समर्पित कैसे करूँ जिसे मुझे तुझे समर्पित करना है। तेरे न्याय के बावजूद, तेरी ताड़नाओं के बावजूद, इसके बावजूद कि तू मुझे क्या देता है, इसके बावजूद कि तू मुझ से क्या ले लेता है, मुझे तेरी छोटी सी भी शिकायत से आज़ाद कर। कई बार, जब तूने मेरी ताड़ना की और मेरा न्याय किया, मैं अपने आप में कुड़कुड़ाता था, और मैं शुद्धता प्राप्त करने, या तेरी इच्छाओं की पूर्ति करने में असमर्थ था। मैंने मजबूरी में तेरे प्रेम का प्रतिफल दिया था, और इस घड़ी मैं अपने आप से और भी अधिक नफरत करता हूँ।" यह इसलिए क्योंकि वह परमेश्वर के शुद्ध प्रेम की खोज करता था इसलिए पतरस ने इस प्रकार प्रार्थना की थी। वह खोज रहा था, और विनती कर रहा था, और, उससे बढ़कर, वह अपने आप पर इल्ज़ाम लगा रहा था, और परमेश्वर के सामने अपने पापों को अंगीकार कर रहा था। उसने महसूस किया कि वह परमेश्वर का ऋणी था, और उसने अपने आप से नफरत किया था, फिर भी वह कुछ कुछ उदास और निष्क्रिय भी था। उसने हमेशा ऐसा महसूस किया था, कि मानो वह परमेश्वर की इच्छाओं के प्रति उतना अच्छा नहीं था, और वह अपना बेहतरीन कार्य करने में असमर्थ था। ऐसी स्थितियों के अन्तर्गत, पतरस ने तब भी अय्यूब के विश्वास पर अनुसरण किया था। उसने देखा था कि अय्यूब का विश्वास कितना बड़ा था, क्योंकि अय्यूब ने यह देखा था कि उसका सब कुछ परमेश्वर के द्वारा दिया गया था, और उसका सब कुछ ले लेना परमेश्वर के लिए स्वभाविक था, यह कि परमेश्वर जिसको चाहेगा उसको देगा—परमेश्वर का धर्मी स्वभाव ऐसा ही था। अय्यूब ने कोई शिकायत नहीं की थी, और तब भी परमेश्वर की स्तुति कर रहा था। पतरस भी स्वयं को जानता था, और उसने अपने हृदय में प्रार्थना की, "आज अपने विवेक के इस्तेमाल करके तेरे प्रेम बदला चुका कर मुझे संतुष्ट नहीं होना चाहिए और मैं ने तुझे जितना अधिक प्रेम वापस किया है उस से भी मुझे संतुष्ट नहीं होना चाहिए, क्योंकि मेरे विचार बहुत ही भ्रष्ट हैं, और मैं तुझे सृष्टिकर्ता के रूप में देख पाने में असमर्थ हूँ। क्योंकि मैं अभी भी तुझसे प्रेम करने के योग्य नहीं हूँ, मुझे उस योग्यता को सिद्ध करना होगा जिस से वह सब कुछ समर्पित कर सकूँ जिसे मुझे तुझको समर्पित करना है, और मैं यह खुशी से करूँगा। मुझे वह सब कुछ जानना होगा जो तूने किया है, और मेरे पास कोई विकल्प नहीं है, और मुझे तेरे प्रेम को देखना होगा, और मुझे तेरी स्तुति करना और तेरे पवित्र नाम का गुणगान करना होगा, ताकि तू मेरे जरिए बड़ी महिमा प्राप्त कर सके। मैं तेरी इस गवाही में तेरे साथ मज़बूती के साथ खड़े होने को तैयार हूँ। हे परमेश्वर! तेरा प्रेम कितना बहुमूल्य और सुन्दर है; मैं उस दुष्ट के हाथों में जीने की कामना कैसे कर सकता हूँ? क्या मुझे तेरे द्वारा नहीं बनाया गया था? मैं शैतान के प्रभुत्व के अधीन कैसे जी सकता हूँ? मैं यह ज़्यादा पसंद करता हूँ कि मेरा सारा जीवन तेरी ताड़नाओं के मध्य गुज़रे। मैं उस दुष्ट के शासन के अधीन नहीं जीना चाहता हूँ। यदि मुझे पवित्र बनाया जा सकता है, और यदि मैं अपना सब कुछ तुझे समर्पित कर सकता हूँ, तो मैं आपके न्याय और ताड़ना के लिए अपने शरीर और मन की भेंट चढ़ाने को तैयार हूँ। क्योंकि मैं शैतान से घृणा करता हूँ, और मैं उसके शासन के अधीन जीवन बिताने में इच्छुक नहीं हूँ। मेरा न्याय करने द्वारा तू अपने धर्मी स्वभाव को प्रकट करता है; मैं खुश हूँ, और मेरे पास जरा सी भी शिकायत नहीं है। यदि मैं प्राणी होने के कर्तव्य को निभा सकता हूँ, तो मैं तैयार हूँ कि मेरा सम्पूर्ण जीवन तेरे न्याय के साथ जुड़ जाए, जिसके जरिए मैं तेरे धर्मी स्वभाव को जान पाऊँगा, और उस दुष्ट के प्रभाव से अपने आपको छुड़ा पाऊँगा।" पतरस ने हमेशा इस प्रकार प्रार्थना की, हमेशा इसकी ही खोज की, और वह एक ऊँचे आयाम तक पहुँच गया। वह न केवल परमेश्वर के प्रेम का प्रतिफल देने के योग्य हो पाया, बल्कि, उससे भी अधिक महत्वपूर्ण, उसने एक प्राणी होने के रूप में अपने कर्तव्य को भी निभाया। उस पर न केवल उसके विवेक के द्वारा ही दोष नहीं लगाया गया था, बल्कि वह विवेक के मापदण्डों से परे होने में सक्षम हो गया था। उसकी प्रार्थनाएँ लगातार ऊपर परमेश्वर के सामने पहुँचने लगीं, कुछ इस तरह कि उसकी आकांक्षाएँ हमेशा की तरह और ऊँची हो गईं, और परमेश्वर के प्रति उसका प्रेम हमेशा की तरह विशाल हो गया था। यद्यपि उसने अति पीड़ा देनेवाला दर्द सहा था, फिर भी उसने परमेश्वर के प्रेम को नहीं भूलाया, और फिर भी उसने परमेश्वर की इच्छा को समझने की क्षमता को प्राप्त करने का प्रयास किया। उसकी प्रार्थनाओं में निम्नलिखित वचन कहे गए: तेरे प्रेम का प्रतिफल देने के अलावा मैं ने और कुछ पूर्ण नहीं किया है। मैं ने शैतान के सामने तेरे लिए गवाही नहीं दी है, मैं ने अपने आपको शैतान के प्रभाव से आज़ाद नहीं किया है, और मैं अब भी शरीर में जीता हूँ। मैं कामना करता हूँ कि काश मैं अपने प्रेम का इस्तेमाल कर के शैतान को हरा पाता, और उसे लज्जित कर पाता, और इस प्रकार तेरी इच्छा को संतुष्ट कर पाता। मैं आशा करता हूँ कि काश मैं अपना सर्वस्व तुझे समर्पित कर पाता, और अपना थोड़ा सा भी अंश शैतान को नहीं देता, क्योंकि शैतान तेरा शत्रु है। जितना ज़्यादा उसने इस दिशा में प्रयास किया, उतना ही ज़्यादा वह द्रवित हुआ, और उतना ही ज़्यादा इन विषयों पर उसका ज्ञान बढ़ता गया। इसका एहसास किए बगैर, उसे पता चला कि उसे अपने आपको शैतान के प्रभाव से मुक्त कर देना चाहिए, और उसे पूरी तरह परमेश्वर के पास वापस लौट जाना चाहिए। उसने ऐसा ही आयाम हासिल किया था। वह शैतान के प्रभाव से भी आगे बढ़ गया था, और वह शरीर की अभिलाषाओं और मौज मस्ती से अपने आपको छुड़ा रहा था, और वह परमेश्वर की ताड़ना और न्याय दोनों को और अधिक गम्भीरता से अनुभव करने की इच्छा कर रहा था। उसने कहा, "यद्यपि मैं तेरी ताड़नाओं और तेरे न्याय के बीच रहता हूँ, फिर भी उससे मिली कठिनाई के बावजूद, मैं अभी भी शैतान के प्रभुत्व के अधीन जीवन व्यतीत करना नहीं चाहता हूँ, और मैं शैतान के छल कपट को सहना नहीं चाहता हूँ। मैं तेरे अभिशापों के बीच जी कर आनन्दित हूँ, मैं शैतान की आशीषों के मध्य जी कर नाराज़ हूँ। मैं तुझसे प्रेम करता हूँ क्योंकि मैं तेरे न्याय के बीच जीवन बिताता हूँ, और इस से मुझे बहुत आनन्द प्राप्त होता है। तेरी ताड़ना और न्याय धर्मी और पवित्र है; यह मुझे शुद्ध करने के लिए है, और उस से बढ़कर मुझ बचाने के लिए है। मैं अधिक पसंद करूँगा कि अपना सारा जीवन तेरी देखरेख में तेरे न्याय के बीच बिता दूँ। मैं एक घड़ी भी शैतान के प्रभुत्व में जीवन बिताने को तैयार नहीं हूँ; मैं तेरे द्वारा शुद्ध होना चाहता हूँ, मैं दुख तकलीफ सहना चाहता हूँ, और मैं शैतान के द्वारा शोषित होने और छले जाने को इच्छुक नहीं हूँ। मुझे, इस प्राणी को, तेरे द्वारा इस्तेमाल किया जाना चाहिए, तेरे द्वारा प्राप्त किया जाना चाहिए, और तेरे द्वारा मेरा न्याय किया जाना चाहिए, और तेरे द्वारा मुझे ताड़ना दिया जाना चाहिए। यहाँ तक कि मुझे तेरे द्वारा शापित किया जाना चाहिए। जब तू मुझे आशीष देने की इच्छा करता है तो मेरा हृदय आनन्दित होता है, क्योंकि मैं तेरे प्रेम को देख चुका हूँ। तू सृष्टिकर्ता है, और मैं एक जीवधारी हूँ: मुझे तुझको धोखा देकर शैतान के प्रभुत्व में नहीं जीवन व्यतीत करना चाहिए, और मुझे शैतान के द्वारा शोषित नहीं किया जाना चाहिए। शैतान के लिए जीने के बजाय मुझे तेरा घोड़ा, या बैल होना चाहिए। मैं तेरी ताड़नाओं के मध्य, बिना किसी शारीरिक आनन्द के, जीवन व्यतीत करना ज़्यादा पसंद करूँगा, और इस से मुझे प्रसन्नता होगी भले ही मुझे तेरे अनुग्रह को खोना पड़े। यद्यपि तेरा अनुग्रह मेरे साथ नहीं है, फिर भी मैं तेरे द्वारा ताड़ना दिए जाने और न्याय किए जाने से प्रसन्न हूँ; यह तेरी सब से बेहतरीन आशीष है, और तेरा सब से बड़ा अनुग्रह है। यद्यपि तू हमेशा प्रतापी है और मेरे प्रति क्रोधित है, किन्तु अभी भी मैं तुझको नहीं छोड़ सकता हूँ, और मैं अभी भी तुझ से पर्याप्त प्रेम नहीं कर सकता हूँ। मैं तेरे घर में रहना अधिक पसंद करूँगा, मैं तेरे द्वारा शापित, और प्रताड़ित किया जाना, और मार खाना अधिक पसंद करूँगा, और मैं शैतान के प्रभुत्व के अधीन जीने को तैयार नहीं हूँ, न ही मैं केवल शरीर के लिए हड़बड़ाने और व्यस्त रहने की इच्छा करता हूँ, और शरीर के लिए जीने के लिए तो बिलकुल भी तैयार नहीं हूँ।" पतरस का प्रेम एक पवित्र प्रेम था। यह सिद्ध किए जाने का अनुभव है, और यह सिद्ध किए जाने का सर्वोच्च आयाम है, और इसको छोड़ और कोई जीवन नहीं है जो और भी अधिक सार्थक हो। उसने परमेश्वर की ताड़ना और न्याय को स्वीकार किया था, उसने परमेश्वर के धर्मी स्वभाव को संजोकर रखा था, और इसको छोड़ पतरस के बारे में और कुछ बहुमूल्य नहीं था। उसने कहा, "शैतान मुझे भौतिक आनन्द देता है, परन्तु मैं उनको संजोकर नहीं रखता हूँ। परमेश्वर की ताड़ना और न्याय मुझ पर आ गया है—मैं इस में अनुग्रहित हूँ, और मुझे इस में आनन्द मिलता है, और मैं इस में आशीषित हूँ। यदि यह परमेश्वर के न्याय की बात नहीं होती तो मैं परमेश्वर से कभी प्यार नहीं कर पाता, मैं अभी भी शैतान के प्रभुत्व के अधीन जीवन बिताता, मुझे अभी भी उसके द्वारा नियन्त्रित किया जाता, और आज्ञा दिया जाता। यदि स्थिति ऐसी होती, तो मैं कभी भी एक सच्चा इंसान नहीं बन पाता, क्योंकि मैं परमेश्वर को संतुष्ट करने में असमर्थ हो जाता, और मैं अपने सम्पूर्ण जीवन को परमेश्वर को समर्पित नहीं कर पाता। भले ही परमेश्वर मुझे आशीष न दे, और मुझे बिना किसी भीतरी सुकून के, मानो एक आग मेरे भीतर जल रही हो, और बिना किसी शांति या आनन्द के छोड़ दे, और भले ही परमेश्वर की ताड़ना और अनुशासन कभी मुझ से दूर नहीं हुआ, फिर भी मैं परमेश्वर की ताड़ना और न्याय में उसके धर्मी स्वभाव को देखने में सक्षम हूँ। मैं इस में आनन्दित हूँ; जीवन में इस से बढ़कर कोई मूल्यवान और अर्थपूर्ण बात नहीं है। यद्यपि उसकी सुरक्षा और देखभाल क्रूर ताड़ना, न्याय, अभिशाप और पीड़ा बन चुके हैं, किन्तु मैं अभी भी इन चीज़ों में आनन्दित होता हूँ, क्योंकि वे मेरे भले के लिए मुझे शुद्ध कर सकते हैं, मुझे बदल सकते हैं, मुझे परमेश्वर के नज़दीक ला सकते हैं, मुझे परमेश्वर से और भी अधिक प्रेम करने के योग्य बना सकते हैं, और परमेश्वर के प्रति मेरे प्रेम को और अधिक शुद्ध कर सकते हैं। यह मुझे इस योग्य बनाता है कि मैं एक जीवधारी रूप में अपने कर्तव्य को पूरा करूँ, और यह मुझे परमेश्वर के सामने ले जाता है और शैतान के प्रभाव से दूर कर देता है, ताकि मैं आगे से शैतान की सेवा न करूँ। जब मैं शैतान के प्रभुत्व के अधीन जीवन नहीं बिताता हूँ, और जब मैं, बिना किसी चीज़ को छिपाए, अपना सब कुछ जो मेरे पास है और वह सब कुछ जिसे मैं परमेश्वर के लिए कर सकता हूँ उसे समर्पित करने के योग्य हो जाता हूँ—तो यह तब होगा जब मैं पूरी तरह संतुष्ट हो जाऊँगा। यह परमेश्वर की ताड़ना और न्याय है जिसने मुझे बचाया है, और मेरे जीवन को परमेश्वर की ताड़नाओं और न्याय से अलग नहीं किया जा सकता है। पृथ्वी पर मेरा जीवन शैतान के प्रभुत्व में है, और यदि यह परमेश्वर की ताड़ना और न्याय की देखभाल और सुरक्षा के लिए नहीं होता, तो मैं हमेशा शैतान के प्रभुत्व के अधीन जीवन बिताता, और, इसके अतिरिक्त, मेरे पास एक सार्थक जीवन जीने का अवसर या अभिप्राय नहीं होता। बस परमेश्वर की ताड़ना और न्याय मुझे कभी छोड़कर न जाए, तब ही मैं परमेश्वर के द्वारा शुद्ध किए जाने के योग्य हो सकता हूँ। केवल परमेश्वर के कठोर शब्दों और धार्मिकता, और परमेश्वर के प्रतापी न्याय के कारण ही, मैं ने सर्वोच्च सुरक्षा प्राप्त की है, और ज्योति में रहता हूँ, और मैं ने परमेश्वर की आशीषों को प्राप्त किया है। शुद्ध किए जाने के लिए, और अपने आपको शैतान से मुक्त कराने के लिए, और परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन जीवन बिताने के लिए—यह आज मेरी ज़िन्दगी की सब से बड़ी आशीष है।" यह पतरस के द्वारा अनुभव किया गया सर्वोच्च आयाम है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

संबंधित सामग्री

परमेश्वर के दैनिक वचन | "आज्ञाओं का पालन करना और सत्य का अभ्यास करना" | अंश 425

व्यवहार में, आज्ञाओं के पालन को सत्य को अभ्यास में डालने से जोड़ा जाना चाहिए। आज्ञाओं का पालन करते हुए, एक व्यक्ति को सत्य का अभ्यास करना ही...

परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है" | अंश 7

कार्य के तीन चरण परमेश्वर के सम्पूर्ण कार्य का अभिलेख हैं, ये परमेश्वर द्वारा मानवजाति के उद्धार का अभिलेख हैं, और ये काल्पनिक नहीं हैं।...

परमेश्वर के दैनिक वचन | "उपाधियों और पहचान के सम्बन्ध में" | अंश 165

परमेश्वर के कार्य का प्रत्येक चरण एक एवं समान धारा का अनुसरण करता है, और इस प्रकार परमेश्वर की छह हज़ार सालों की प्रबंधकीय योजना में, संसार...