परमेश्वर के दैनिक वचन | "सफलता या असफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है" | अंश 477

हालाँकि जब पतरस ने यीशु के पीछे पीछे चलना शुरू किया उसके पश्चात् प्राकृतिक प्रकाशन घटित नहीं हुए थे, फिर भी बिलकुल शुरुआत से ही स्वभाव में वह ऐसा व्यक्ति था जो पवित्र आत्मा के प्रति समर्पित होने और मसीह को खोजने के लिए तैयार था। पवित्र आत्मा के प्रति उसकी आज्ञाकारिता पवित्र थी: उसने प्रसिद्धि एवं सौभाग्य की खोज नहीं की, बल्कि इसके बजाय सत्य का पालन करने के द्वारा प्रेरित हुआ था। हालाँकि ऐसे तीन समय थे जब पतरस ने यीशु को जानने से इन्कार किया था, और यद्यपि उसने यीशु की परीक्षा ली थी, फिर भी ऐसी मामूली मानवीय कमज़ोरी का उसके स्वभाव से कोई सम्बन्ध नहीं था, और उसके भविष्य के अनुसरण को प्रभावित नहीं किया था, और यह पर्याप्त रूप से यह साबित नहीं करता है कि उसकी परीक्षा शैतान का कार्य था। सामान्य मानवीय कमज़ोरी ऐसी चीज़ है जिसे संसार के सभी लोगों के द्वारा साझा किया जाता है—क्या तू पतरस से अपेक्षा करता है कि वह कुछ अलग हो? क्या लोग पतरस के बारे में कुछ निश्चित दृष्टिकोण नहीं रखते हैं क्योंकि उसने अनेक मूर्खतापूर्ण ग़लतियां की थीं? और क्या लोग उस समस्त कार्य के कारण जिसे उसने किया था, और उन सभी पत्रियों के कारण जिन्हें उसने लिखा था इसी तरह पौलुस की अत्यंत प्रशंसा नहीं करते हैं? मनुष्य किसी व्यक्ति के सार के आर-पार देखने में सक्षम कैसे हो सकता है? निश्चित रूप से ऐसे लोग जिनके पास सचमुच में समझ (आभास) है वे किसी ऐसी महत्वहीन चीज़ को देख सकते हैं? हालाँकि पतरस के दर्दनाक अनुभवों के कई वर्षों को बाइबिल में दर्ज नहीं किया गया है, फिर भी इससे यह साबित नहीं होता है कि पतरस के पास वास्तविक अनुभव नहीं थे, या यह कि पतरस को सिद्ध नहीं किया गया था। परमेश्वर के कार्य को मनुष्य के द्वारा पूर्ण रूप से कैसे नापा जा सकता है? बाइबिल के अभिलेखों को यीशु के द्वारा व्यक्तिगत रूप से चयन नहीं किया गया था, बल्कि बाद की पीढ़ियों के द्वारा संकलित किया गया था। इस रीति से, क्या वह सब जिसे बाइबिल में दर्ज किया गया था उन्हें मनुष्य के विचारों के अनुसार चुना नहीं गया था? इसके अतिरिक्त, पतरस एवं पौलुस के अन्त को पत्रियों में खुले तौर पर नहीं कहा गया है, अतः मनुष्य अपने स्वयं के पूर्वाग्रहों के अनुसार, एवं अपनी स्वयं की प्राथमिकताओं के अनुसार पतरस एवं पौलुस को आंकता है। और क्योंकि पौलुस ने इतना अधिक कार्य किया था, क्योंकि उसके "योगदान" कितने महान थे, इसलिए उसने जनसमुदाय के भरोसे को जीता था। क्या मनुष्य सिर्फ ऊपरी चीजों पर ही अपना ध्यान केन्द्रित नहीं करता है? मनुष्य किसी व्यक्ति के सार के आर-पार देखने में सक्षम कैसे हो सकता है? जिक्र करने की कोई आवश्यकता नहीं है, यह माना जाता है कि हज़ारों सालों से पौलुस आराधना का एक विषय रहा है, कौन उसके कार्यों को जल्दबाज़ी में इन्कार करने की हिम्मत करेगा? पतरस मात्र एक मछुआरा था, तो उसका योगदान पौलुस के समान महान कैसे हो सकता था? योगदान के आधार पर, पौलुस को पतरस से पहले पुरस्कृत किया जाना चाहिए था, और उसे ऐसा व्यक्ति होना चाहिए था जो परमेश्वर की स्वीकृति को प्राप्त करने के लिए बेहतर योग्यता रखता हो। कौन यह कल्पना कर सकता था कि, पौलुस के प्रति अपने बर्ताव में, परमेश्वर उससे महज उसके वरदानों के जरिए कार्य कराता था, जबकि परमेश्वर ने पतरस को सिद्ध बनाया था। किसी भी मायने में स्थिति यह नहीं है कि बिलकुल शुरुआत से ही प्रभु यीशु ने पतरस एवं पौलुस के लिए योजनाओं को बनाया था: इसके बजाय उन्हें सिद्ध बनाया गया था या उन्हें उनके अंतर्निहित स्वभाव के अनुसार कार्य में लगाया गया था। और इस प्रकार, जो कुछ लोग देखते हैं वे सिर्फ मनुष्य के बाह्य योगदान हैं, जबकि जो कुछ परमेश्वर देखता है वह मनुष्य का सार है, साथ ही साथ वह पथ है जिसका अनुसरण मनुष्य शुरुआत से करता है, और वह प्रेरणा है जो मनुष्य के अनुसरण के पीछे होता है। लोग अपनी धारणाओं के अनुसार, और अपने स्वयं के पूर्वाग्रहों के अनुसार किसी मनुष्य को मापते हैं, फिर भी उसकी बाहरी चीज़ों के अनुसार किसी मनुष्य के निर्णायक अन्त को निर्धारित नहीं किया जाता है। और इस प्रकार मेरा कहना है कि यदि वह पथ सफलता का पथ है जिसे तू शुरुआत से लेता है, और अनुसरण के प्रति तेरा दृष्टिकोण का बिन्दु शुरुआत से ही सही है, तो तू पतरस के समान है; यदि वह पथ असफलता का पथ है जिस पर तूने कदम रखा है, तो चाहे तू कोई भी कीमत चुकाए, तेरा अन्त अब भी पौलुस के समान ही होगा। स्थिति जो भी हो, तेरी नियति, और चाहे तू सफल हो या असफल, दोनों इससे निर्धारित होते हैं कि वह पथ जिसका तू अनुसरण करता है वह सही पथ है या नहीं, बजाय तेरे समर्पण के, या उस कीमत के जो तू चुकाता है। पतरस एवं पौलूस के सार, और वे लक्ष्य जिनका उन्होंने अनुसरण किया भिन्न थे; मनुष्य इन चीज़ों की खोज करने में असमर्थ है, और केवल परमेश्वर ही इन्हें उनकी सम्पूर्णता में जान सकता है। क्योंकि जो कुछ परमेश्वर देखता है वह मनुष्य का सार है, जबकि मनुष्य अपने स्वयं के सार को नहीं जानता है। मनुष्य, मनुष्य के भीतर के सार, या अपनी वास्तविक कद-काठी को देखने में असमर्थ है, और इस प्रकार वह पौलुस एवं पतरस की सफलता एवं विफलता के कारणों की पहचान करने में असमर्थ है। अधिकांश लोग पतरस की नहीं बल्कि पौलुस की अत्यंत प्रशंसा करते हैं उसका कारण यह है क्योंकि पौलुस को सार्वजनिक कार्य के लिए उपयोग किया गया था, और मनुष्य ऐसे कार्य का एहसास कर सकते हैं, और इस प्रकार लोग पौलुस की "उपलब्धियों" को स्वीकार करते हैं। इसी बीच पतरस के अनुभव मनुष्य के लिए अदृश्य हैं, और जिसकी उसने खोज की थी उसे मनुष्य के द्वारा अर्जित नहीं किया जा सकता है, और इस प्रकार मनुष्य को पतरस में कोई दिलचस्पी नहीं है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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