परमेश्वर के दैनिक वचन | "पौलुस की प्रकृति और स्‍वभाव को कैसे पहचाना जाए" | अंश 472

परमेश्वर तुम्हें सभी प्रकार के झंझावातों, विपत्तियों, कठिनाइयों और अनगिनत असफलताओं और झटकों का अनुभव कराता है, ताकि अंतत: इन सब चीज़ों का अनुभव करने के दौरान तुम्हें पता चल जाए कि परमेश्वर जो कुछ कहता है, वह सब सही है, और कि तुम्हारे विश्वास, धारणाएँ, कल्पनाएँ, ज्ञान, दार्शनिक सिद्धांत, दर्शन, इस संसार में जो कुछ भी तुमने सीखा है और तुम्हारे माता-पिता ने तुम्हें सिखाया है, वह सब ग़लत है। वे तुम्हें जीवन में सही मार्ग पर नहीं ले जा सकते, वे सत्य को समझने और परमेश्वर के सामने आने में तुम्हारी अगुआई नहीं कर सकते, और तुम जिस मार्ग पर चल रहे हो, वह विफलता का मार्ग है। परमेश्वर अंतत: तुम्हें इन्हीं बातों का एहसास कराएगा। तुम्हारे लिए यह एक आवश्यक प्रक्रिया है, जिसे तुम्हें उद्धार का अनुभव करने की प्रक्रिया के दौरान प्राप्त करना चाहिए। लेकिन यह परमेश्वर को दुःखी भी करता है : चूँकि लोग विद्रोही और भ्रष्ट स्वभाव के हैं, इसलिए उन्हें इस प्रक्रिया से गुज़रना और इन झटकों का अनुभव करना चाहिए। किंतु यदि कोई सत्य से सचमुच प्यार करता है, यदि वह सचमुच परमेश्वर द्वारा बचाए जाने का इच्छुक है, यदि वह परमेश्वर के उद्धार की विभिन्न पद्धतियों—उदाहरण के लिए परीक्षण, अनुशासन, न्याय और ताड़ना—को स्वीकार करने के लिए तैयार है, यदि वह यह सब भुगतने के लिए दृढ़संकल्प है, यदि वह यह मूल्य चुकाने के लिए तैयार है, तो परमेश्वर वास्तव में नहीं चाहता कि वह इतने ज़्यादा कष्ट उठाए, न ही वह यह चाहता है कि वह इतने अधिक झटके और विफलताएँ झेले। किंतु लोग बहुत विद्रोही हैं। वे कुटिल मार्ग अपनाना चाहते हैं, वे ये विपत्तियाँ झेलने को तैयार हैं। मनुष्य इसी तरह की चीज़ है, और परमेश्वर के पास मनुष्य को शैतान के हाथों में सौंपने और उसे विभिन्न स्थितियों में रखकर तैयार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है, ताकि वह सभी प्रकार के अनुभव प्राप्त करे और इन स्थितियों से विभिन्न सबक सीखे, और सभी प्रकार की बुरी चीज़ों के सार को पहचाने। इसके उपरांत मनुष्य पीछे मुड़कर देखे और पाए कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं, वह स्वीकार करे कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं, कि केवल परमेश्वर ही सभी सकारात्मक चीज़ों की वास्तविकता है, और केवल परमेश्वर ही मनुष्य से वास्तव में प्रेम करता है, और मनुष्य के लिए परमेश्वर से बेहतर या उससे अधिक उसकी परवाह करने वाला कोई नहीं है। लोग अंतत: किस सीमा तक तैयार किए जाते हैं? इस सीमा तक कि तुम कहो, "मैंने हर तरह की परिस्थिति का अनुभव किया है, और कोई भी स्थिति, व्यक्ति, विषय या वस्तु नहीं है जो मुझे सत्य को समझा सके, जो मुझे सत्य का आनंद दिला सके, जो मुझे सत्य-वास्तविकता में प्रवेश करा सके। मैं केवल आज्ञाकारी बनकर परमेश्वर के वचनों के अनुसार अभ्यास कर सकता हूँ, आज्ञाकारी बनकर मनुष्य के स्थान पर रह सकता हूँ, एक सृजित प्राणी की स्थिति और कर्तव्य का पालन कर सकता हूँ, आज्ञाकारी बनकर परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाएँ स्वीकार कर सकता हूँ, और बिना किसी शिकायत या पसंद के, और बिना अपनी माँगों या इच्छाओं के, सृष्टिकर्ता के समक्ष आ सकता हूँ।" जब लोग इस स्तर पर पहुँच जाते हैं, तब वे परमेश्वर के सामने सचमुच शीश झुकाते हैं, और परमेश्वर को उन्हें अनुभव करवाने के लिए किन्हीं और स्थितियों का निर्माण करने की आवश्यकता नहीं होती। तो तुम लोग कौन-सा मार्ग अपनाना चाहते हो? कोई भी इंसान अपनी व्यक्तिपरक इच्छाओं में विपत्ति नहीं झेलना चाहता, और कोई भी झटके, विफलता, आपदा, हताशाओं और झंझावातों का अनुभव नहीं करना चाहता। किंतु कोई दूसरा मार्ग ही नहीं है। मनुष्य के भीतर की चीज़ें—उसकी प्रकृति का सार, उसका विद्रोहीपन, उसके विचार और दृष्टिकोण—अत्यधिक जटिल हैं; प्रतिदिन वे तुम्हारे भीतर घुल-मिल और गड्डमड्ड हो जाते हैं, और वे तुम्हें भीतर से मथ देते हैं। तुम सत्य-वास्तविकता में कम ही प्रवेश करते हो, तुम सत्य को कम ही समझते हो, और तुम्हारे भीतर अपने भ्रष्ट स्वभाव, अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के सार पर विजय पाने की शक्ति का अभाव होता है। इसलिए तुम्हारे पास इसके सिवा कोई चारा नहीं होता कि दूसरा तरीका स्वीकार कर लो : लगातार विफलता और हताशा झेलो, लगातार नीचे गिरो, विपत्तियों के हाथों उछाले और पटके जाओ, कीचड़ में लोटो, जब तक कि वह दिन नहीं आ जाता, जब तुम कहो, "मैं थक गया हूँ, मैं उकता गया हूँ, मैं इस तरह जीना नहीं चाहता। मैं इन विफलताओं से गुजरना नहीं चाहता, मैं आज्ञाकारी बनकर सृष्टिकर्ता के सम्मुख आना चाहता हूँ। मैं परमेश्वर के वचन सुनूँगा, मैं वही करूँगा जो वह कहता है। जीवन में केवल यही सही मार्ग है।" जिस दिन तुम पूरी तरह से हार स्वीकार कर लोगे, केवल उसी दिन तुम परमेश्वर के सामने आओगे। क्या इससे तुम परमेश्वर के स्वभाव के बारे में कुछ जान पाए? मनुष्य के प्रति परमेश्वर का रवैया क्या है? परमेश्वर चाहे कुछ भी करे, लेकिन वह इंसान का भला चाहता है। वह तुम्हारे लिए किसी भी परिवेश का निर्माण करे या वह तुमसे कुछ भी करने के लिए कहे, वह हमेशा सर्वोत्तम परिणाम देखना चाहता है। मान लो, तुम्हारे ऊपर कुछ बीतता है और तुम झटकों तथा विफलताओं का सामना करते हो। परमेश्वर नहीं चाहता कि तुम्हें विफल होता देखे और फिर सोचे कि तुम समाप्त हो चुके हो, कि तुम्हें शैतान ने छीन लिया है, और उस बिंदु से तुम दोबारा कभी अपने पैरों पर खड़े नहीं हो सकोगे, और तुम निराशा में डूब गए हो—परमेश्वर यह परिणाम नहीं देखना चाहता। परमेश्वर क्या देखना चाहता है? तुम इस मामले में भले ही विफल हो गए हो, पर तुम सत्य की तलाश करने, अपनी विफलता का कारण पता करने में समर्थ हो; तुम इस विफलता की सच्चाई स्वीकार करो और इससे कुछ ग्रहण करो, तुम सबक सीखो, तुम महसूस करो कि उस तरह कार्य करना ग़लत था, कि केवल परमेश्वर के वचनों के अनुसार कार्य करना ही सही है। तुम्हें एहसास होता है, "मैं बुरा हूँ और मेरा भ्रष्ट शैतानी स्वभाव है। मुझमें विद्रोहीपन है, परमेश्वर जिन धार्मिक लोगों की बात करता है, मैं उनसे कुछ दूर हूँ, और मेरे अंदर परमेश्वर का भय मानने वाला हृदय नहीं है।" तुम्हें एक घटना का, मामले के वास्तविक तथ्य का एहसास होता है, और तुम चीज़ों को समझते हो और इस झटके तथा विफलता से उबरकर परिपक्व हो जाते हो। परमेश्वर यही देखना चाहता है। "परिपक्व होने" का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि परमेश्वर तुम्हें प्राप्त करने में समर्थ है और तुम उद्धार प्राप्त करने में समर्थ हो। इसका अर्थ है कि तुम सत्य-वास्तविकता में प्रवेश करने में समर्थ हो, कि तुम परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग पर कदम रखने के क़रीब आ गए हो। परमेश्वर यही देखना चाहता है। परमेश्वर अच्छे इरादे से काम करता है, और उसके समस्त कार्यों में उसका प्रेम छिपा होता है, जिसे लोग अक्सर समझ नहीं पाते। मनुष्य संकीर्ण और क्षुद्र है, और उसका हृदय सुई के छेद के समान संकीर्ण है; जब परमेश्वर उसे स्वीकार नहीं करता या उसे कोई अनुग्रह या आशीष नहीं देता, तो वह परमेश्वर को दोषी ठहराता है। फिर भी परमेश्वर मनुष्य के साथ झगड़ा नहीं करता; वह ऐसा परिवेश निर्मित करता है, जो मनुष्य को यह बताता है कि अनुग्रह और लाभ कैसे प्राप्त किए जाते हैं, मनुष्य के लिए अनुग्रह का क्या अर्थ है, और मनुष्य उससे क्या प्राप्त कर सकता है। मान लो, तुम्हें कोई अच्छी चीज़ खाना पसंद है, जिसे परमेश्वर कहता है कि अधिक मात्रा में खाना तुम्हारे स्वास्थ्य के लिए बुरा है। तुम नहीं सुनते, उसी चीज़ को खाने पर अड़े रहते हो, और परमेश्वर तुम्हें आराम से खाने देता है। नतीजतन, तुम बीमार हो जाते हो। इसे कई बार अनुभव करने के बाद, तुम्हें समझ में आता है कि परमेश्वर की बात ही सही है, वह जो कुछ कहता है, वह सब सच है, और तुम्हें उसके वचनों के अनुसार ही अभ्यास करना चाहिए। यही सही मार्ग है। और इसलिए ये झटके, विफलताएँ और दुःख, जिनसे लोग गुज़रते हैं, क्या बन जाते हैं? तुम परमेश्वर के श्रमसाध्य इरादे को सराहते हो, और तुम यह भी मानते और विश्वास करते हो कि परमेश्वर के वचन सही हैं; परमेश्वर में तुम्हारा विश्वास बढ़ जाता है। कुछ और भी होता है : विफलता के इस दौर का अनुभव करने के माध्यम से तुम परमेश्वर के वचनों की सच्चाई और सटीकता का एहसास करने लगते हो, तुम देखते हो कि परमेश्वर के वचन ही सत्य हैं, और तुम सत्य का अभ्यास करने का सिद्धांत समझने लगते हो। इसलिए, यह अच्छा है कि लोग विफलता का अनुभव करें—यह कुछ कष्टदायक अवश्य है, किंतु यह उन्हें तैयार करता है। यदि इस प्रकार तैयार होने के परिणामस्वरूप अंतत: तुम परमेश्वर के समक्ष लौट आते हो, उसके वचनों को स्वीकार करते हो, और उन्हें सत्य के रूप में लेते हो, तो इस तरह तैयार होने, झटके और विफलताएँ सहने का अनुभव व्यर्थ नहीं जाता। परमेश्वर यही देखना चाहता है।

— 'मसीह की बातचीत के अभिलेख' से उद्धृत

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