परमेश्वर के दैनिक वचन | "तुम्हें परमेश्वर के प्रति अपनी भक्ति बनाए रखनी चाहिए" | अंश 470

परमेश्वर के कार्य के हर चरण के लिए एक तरीका है, जिसमें लोगों को सहयोग करना चाहिए। परमेश्वर लोगों को शुद्ध करता है, ताकि शुद्धिकरणों से गुज़रने पर उनमें आत्मविश्वास रहे। परमेश्वर लोगों को पूर्ण बनाता है, ताकि उनमें परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने का आत्मविश्वास हो और वे उसके शुद्धिकरणों को स्वीकार करने और उसके द्वारा निपटान और काँट-छाँट किए जाने के लिए तैयार हो जाएँ। परमेश्वर का आत्मा लोगों में प्रबुद्धता और रोशनी लाने और उनसे परमेश्वर के साथ सहयोग करवाने और अभ्यास करवाने के लिए उनके भीतर कार्य करता है। शुद्धिकरण के दौरान परमेश्वर बात नहीं करता। वह अपनी वाणी नहीं बोलता, फिर भी, ऐसा कार्य है जिसे लोगों को करना चाहिए। तुम्हें वह बनाए रखना चाहिए जो तुम्हारे पास पहले से है, तुम्हें फिर भी परमेश्वर से प्रार्थना करने, परमेश्वर के निकट होने, और परमेश्वर के सामने गवाही देने में सक्षम होना चाहिए; इस तरह तुम अपना कर्तव्य पूरा करोगे। तुम सबको परमेश्वर के कार्य से स्पष्ट रूप से देखना चाहिए कि लोगों के आत्मविश्वास और प्यार के उसके परीक्षण यह अपेक्षा करते हैं कि वे परमेश्वर से अधिक प्रार्थना करें, और कि वे परमेश्वर के सामने उसके वचनों का अधिक बार स्वाद लें। यदि परमेश्वर तुम्हें प्रबुद्ध करता है और तुम्हें अपनी इच्छा समझाता है, लेकिन फिर भी तुम उसे अभ्यास में बिलकुल नहीं लाते, तो तुम कुछ भी प्राप्त नहीं करोगे। जब तुम परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाते हो, तब भी तुम्हें उससे प्रार्थना करने में सक्षम होना चाहिए, और जब तुम उसके वचनों का स्वाद लेते हो, तो तुम्हें उसके सामने आना चाहिए और प्रार्थना करनी चाहिए तथा हताशा या उदासीनता अनुभव करने के किसी भी चिह्न के बिना उसके प्रति विश्वास से भरे होना चाहिए। जो लोग परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में नहीं लाते, वे सभाओं के दौरान तो ऊर्जा से भरे होते हैं, लेकिन घर लौटकर अंधकार में गिर जाते हैं। कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो एक साथ इकट्ठे भी नहीं होना चाहते। इसलिए तुम्हें स्पष्ट रूप से देखना चाहिए कि वह कौन-सा कर्तव्य है, जिसे लोगों को पूरा करना चाहिए। हो सकता है कि तुम न जानते हो कि परमेश्वर की इच्छा वास्तव में क्या है, लेकिन तुम अपना कर्तव्य कर सकते हो, जब तुम्हें प्रार्थना करनी चाहिए तब तुम प्रार्थना कर सकते हो, जब तुम्हें सत्य को अभ्यास में लाना चाहिए तब तुम उसे अभ्यास में ला सकते हो, और तुम वह कर सकते हो जो लोगों को करना चाहिए। तुम अपनी मूल दृष्टि बनाए रख सकते हो। इस तरह, तुम परमेश्वर के कार्य के अगले चरण को स्वीकार करने में अधिक सक्षम होगे। जब परमेश्वर छिपे तरीके से कार्य करता है, तब यदि तुम तलाश नहीं करते, तो यह एक समस्या है। जब वह सभाओं के दौरान बोलता और उपदेश देता है, तो तुम उत्साह से सुनते हो, लेकिन जब वह नहीं बोलता, तो तुममें ऊर्जा की कमी हो जाती है और तुम पीछे हट जाते हो। ऐसा किस तरह का व्यक्ति करता है? वह ऐसा व्यक्ति होता है, जो सिर्फ झुंड के पीछे चलता है। उसके पास कोई उद्देश्य नहीं होता, कोई गवाही नहीं होती, और कोई दर्शन नहीं होता! ज्यादातर लोग ऐसे ही होते हैं। यदि तुम इस तरह से जारी रखते हो, तो एक दिन जब तुम पर कोई महान परीक्षण आएगा, तो तुम्हें सजा भोगनी पड़ जाएगी। परमेश्वर द्वारा लोगों को पूर्ण बनाने की प्रक्रिया में एक दृष्टिकोण का होना बहुत महत्वपूर्ण है। यदि तुम परमेश्वर के कार्य के एक कदम पर भी शक नहीं करते, यदि तुम मनुष्य का कर्तव्य पूरा करते हो, तुम ईमानदारी के साथ उसे बनाए रखते हो जिसका परमेश्वर ने तुमसे अभ्यास करवाया है, अर्थात् तुम्हें परमेश्वर के उपदेश याद हैं, और इस बात की परवाह किए बिना कि वह वर्तमान में क्या करता है, तुम उसके उपदेशों को भूलते नहीं हो, यदि उसके कार्य के बारे में तुम्हें कोई संदेह नहीं है, तुम अपना दृष्टिकोण कायम रखते हो, अपनी गवाही बनाए रखते हो, और मार्ग के हर चरण में विजय प्राप्त करते हो, तो अंत में तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण कर दिए जाओगे और एक विजेता बना दिए जाओगे। यदि तुम परमेश्वर के परीक्षणों के हर चरण में दृढ़तापूर्वक खड़े रहने में सक्षम हो, और तुम अभी भी बिलकुल अंत तक दृढ़तापूर्वक खड़े रह सकते हो, तो तुम एक विजेता हो, तुम एक ऐसे व्यक्ति हो जिसे परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया गया है। यदि तुम अपने वर्तमान परीक्षणों में दृढ़तापूर्वक खड़े नहीं रह सकते, तो भविष्य में यह और भी अधिक मुश्किल हो जाएगा। यदि तुम केवल मामूली पीड़ा से ही गुजरते हो और सत्य का अनुसरण नहीं करते, तो अंतत: तुम्हें कुछ भी प्राप्त नहीं होगा। तुम खाली हाथ रह जाओगे। कुछ लोग जब यह देखते हैं कि परमेश्वर बोल नहीं रहा, तो अपना प्रयास छोड़ देते हैं, और उनका दिल टूट जाता है। क्या ऐसा व्यक्ति मूर्ख नहीं है? इस तरह के लोगों में कोई वास्तविकता नहीं होती। जब परमेश्वर बोल रहा होता है, तो वे हमेशा बाहर से व्यस्त और उत्साही दिखते हुए, भाग-दौड़ करते रहते हैं, लेकिन अब जबकि वह बोल नहीं रहा, तो वे तलाश करना बंद कर देते हैं। इस तरह के व्यक्ति का कोई भविष्य नहीं है। शुद्धिकरण के दौरान, तुम्हें सकारात्मक दृष्टिकोण से प्रवेश करना चाहिए और जो सबक सीखने चाहिए, उन्हें सीखना चाहिए; जब तुम परमेश्वर से प्रार्थना करते हो और उसके वचन पढ़ते हो, तो तुम्हें अपनी स्वयं की स्थिति की इससे तुलना करनी चाहिए, अपनी कमियों का पता लगाना चाहिए और जानना चाहिए कि तुम्हारे पास सीखने के लिए अभी भी बहुत-से सबक हैं। शुद्धिकरण से गुज़रने पर जितना अधिक ईमानदारी से तुम तलाश करोगे, उतना ही अधिक तुम स्वयं को अपर्याप्त पाओगे। जब तुम शुद्धिकरण का सामना कर रहे होते हो, तो कई मुद्दे तुम्हारे सामने आते हैं; तुम उन्हें स्पष्ट रूप से नहीं देख सकते, तुम शिकायत करते हो, तुम अपने देह-सुख को प्रकट करते हो—केवल इसी तरह से तुम पता लगा सकते हो कि तुम्हारे भीतर बहुत अधिक भ्रष्ट स्वभाव हैं।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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