परमेश्वर के दैनिक वचन | "देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर" | अंश 448

मनुष्य का अपना कर्तव्य निभाना, वास्तव में, उस सबका निष्पादन है जो मनुष्य के भीतर अन्तर्निहित है, अर्थात्, जो मनुष्य के लिए संभव है, उसका निष्पादन है। यह इसके बाद ही है कि उसका कर्तव्य पूरा होता है। मनुष्य की सेवा के दौरान मनुष्य के दोष उसके प्रगतिशील अनुभवों और न्याय के अनुभव की उसकी प्रक्रिया के माध्यम से धीरे-धीरे कम होते जाते हैं; वे मनुष्य के कर्तव्य में बाधा हैं या प्रभाव नहीं डालते हैं। वे लोग जो सेवा करना बंद कर देते हैं या हार मान लेते हैं और ऐसे दोषों के भय से पीछे हट जाते हैं जो सेवा में विद्यमान हो सकते हैं सभी मनुष्यों में सबसे कायर होते हैं। यदि मनुष्य वह व्यक्त नहीं कर सकता है जो उसे सेवा के दौरान व्यक्त करना चाहिए या वह प्राप्त नहीं कर सकता है जो मनुष्य के लिए अंतर्निहित रूप से संभव है, और इसके बजाय वह समय गँवाता है और बिना रुचि के कार्य करता है, तो उसने अपने उस प्रकार्य को खो दिया है जो एक सृजन किए गए प्राणी में होना चाहिए। इस प्रकार का मनुष्य साधारण दर्जे का तुच्छ मनुष्य और स्थान घेरने वाला निरर्थक कचरा समझा जाता है; इस तरह के किसी व्यक्ति को कैसे सृजन किए गए प्राणी की उपाधि से सम्मानित किया जा सकता है? क्या वे भ्रष्टता के अस्तित्व नहीं हैं जो बाहर से तो चमकते हैं परन्तु भीतर से सड़े हुए हैं? यदि कोई मनुष्य अपने आप को परमेश्वर कहता हो मगर अपनी दिव्यता को व्यक्त करने में, परमेश्वर स्वयं का कार्य करने में, या परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने में असमर्थ हो, तो वह निसंदेह ही परमेश्वर नहीं है, क्योंकि उसमें परमेश्वर का सार नहीं है, और परमेश्वर जो अंतर्निहित रूप से प्राप्त कर सकता है वह उसके भीतर विद्यमान नहीं है। यदि मनुष्य वह खो देता है जो अंतर्निहित रूप से प्राप्य है, तो वह अब और मनुष्य नहीं समझा जा सकता है, और वह सृजन किए गए प्राणी के रूप में खड़े होने या परमेश्वर के सामने आकर उसकी सेवा करने के योग्य नहीं है। इसके अलावा, वह परमेश्वर का अनुग्रह प्राप्त करने या परमेश्वर के द्वारा ध्यान रखे जाने, बचाए जाने, और सिद्ध बनाए जाने के योग्य नहीं है। कई लोग जिन्होंने परमेश्वर के भरोसे को खो दिया है परमेश्वर के अनुग्रह को भी खोते चले जाते हैं। वे न केवल अपने कुकर्मों से घृणा नहीं करते हैं बल्कि ढिठाई से इस विचार का प्रचार करते हैं कि परमेश्वर का मार्ग गलत है। और वे विद्रोही परमेश्वर के अस्तित्व को भी इनकार करते हैं; कैसे इस प्रकार की विद्रोहशीलता वाला मनुष्य परमेश्वर के अनुग्रह का आनन्द लेने का सौभाग्य प्राप्त कर सकता है? जो मनुष्य अपने कर्तव्य को पूरा करने में विफल हो गए हैं वे परमेश्वर के विरुद्ध अत्यधिक विद्रोही रहे हैं और उसके अत्यधिक ऋणी हैं फिर भी वे पलट जाते हैं और कटुता से कहते हैं कि परमेश्वर गलत है। कैसे इस प्रकार का मनुष्य सिद्ध बनाए जाने के लायक हो सकता है? क्या यह अलग कर दिए और दण्ड दिए जाने का अग्रदूत नहीं है? ऐसा व्यक्ति जो परमेश्वर के सामने अपना कर्तव्य नहीं निभाता है पहले से ही सबसे जघन्य अपराध का दोषी है, जिसके लिए यहाँ तक कि मृत्यु भी अपर्याप्त सज़ा है, फिर भी परमेश्वर के साथ बहस करने की धृष्टता करता है और स्वयं का उस से मिलान करता है। इस प्रकार के मनुष्य को सिद्ध बनाने का क्या महत्व है? यदि मनुष्य अपने कर्तव्य को पूरा करने में विफल होता है, तो उसे अपने आप को दोषी और ऋणी समझना चाहिए; उसे अपनी कमजोरी और अनुपयोगिता, अपनी विद्रोहशीलता और भ्रष्टता से घृणा करनी चाहिए, और इससे भी अधिक, परमेश्वर के लिए अपना जीवन और रक्त अर्पण कर देना चाहिए। केवल तभी वह सृजन किया गया प्राणी है जो परमेश्वर से सच्चा प्रेम करता है, और केवल इस प्रकार का मनुष्य ही परमेश्वर के आशीषों और प्रतिज्ञाओं का आनन्द लेने के, और उसके द्वारा सिद्ध किए जाने के योग्य है। और तुम लोगों में से बहुतायत का क्या होगा? तुम लोग उस परमेश्वर के साथ किस तरह का व्यवहार करते हो जो तुम लोगों के मध्य रहता है? तुम लोगों ने उसके सामने अपने कर्तव्य को किस प्रकार से निभाया है? क्या तुम लोगों ने, यहाँ तक कि अपने स्वयं के जीवन की कीमत पर भी, वह सब कर लिया है जिसे करने के लिए तुम लोगों को बुलाया गया था? तुम लोगों ने क्या बलिदान किया है? क्या तुम लोगों ने मुझसे बहुत अधिक प्राप्त नहीं किया है? क्या तुम अंतर कर सकते हो? तुम लोग मेरे प्रति कितने वफादार हो? तुम लोगों ने मेरी किस प्रकार से सेवा की है? और उस सब का क्या हुआ जो मैंने तुमको प्रदान किया है और तुम लोगों के लिए किया है? क्या तुम लोगों ने इस सब का मूल्यांकन कर लिया है? क्या तुम सभी लोगों ने इसका आँकलन और इसकी तुलना उस जरा से विवेक के साथ कर ली है जो तुम लोगों के पास तुम लोगों के भीतर है? तुम्हारे वचनों और कार्यों को कौन ठीक कर सकताहै? क्या ऐसा हो सकता है कि तुम लोगों का ऐसा मामूली सा बलिदान उस सबके योग्य है जो मैने तुम लोगों को प्रदान किया है। मेरे पास और कोई विकल्प नहीं है और पूरे हृदय से तुम लोगों के प्रति समर्पित हूँ, फिर भी तुम लोग मेरे बारे में दुष्ट आशंकाओं को प्रश्रय देते हो और मेरे प्रति खिन्नमन रहते हो। यही तुम लोगों के कर्तव्य की सीमा, तुम लोगों का एकमात्र कार्य है। क्या यह ऐसा नहीं है? क्या तुम लोग नहीं जानते हो कि तुम लोगों ने एक सृजन किए गए प्राणी के कर्तव्य को बिल्कुल भी पूरा नहीं किया है? तुम लोगों को एक सृजन किया गया प्राणी कैसे माना जा सकता है? क्या तुम लोग स्पष्टता से नहीं जानते हो कि यह क्या है जिसे तुम लोग व्यक्त कर रहे और जी रहे हो? तुम लोग अपने कर्तव्य को पूरा करने में असफल रहे हो, किन्तु तुम परमेश्वर की दया और भरपूर आशीषें प्राप्त करने की लालसा करते हो। इस प्रकार का अनुग्रह तुम लोगों के जैसे बेकार और अधम लोगों के लिए नहीं, बल्कि उन लोगों के लिए तैयार किया गया है जो कुछ नहीं माँगते हैं और खुशी से बलिदान करते हैं। तुम लोगों के जैसे मनुष्य, ऐसे मामूली तुच्छ व्यक्ति, स्वर्ग के अनुग्रह का आनन्द लेने के बिल्कुल भी योग्य नहीं हैं। केवल कठिनाई और अनन्त दण्ड ही तुम लोगों के दिनों में तुम्हारे साथ रहेगा! यदि तुम लोग मेरे प्रति विश्वसनीय नहीं रह सकते हो, तो तुम लोगों के भाग्य में पीड़ा ही बनी रहेगी। यदि तुम लोग मेरे वचनों और कार्यों के प्रति जवाबदेह नहीं हो सकते हो, तो तुम्हार भाग्य में दण्ड ही होगा। राज्य के किसी भी अनुग्रह, आशीषों और अद्भुत जीवन का तुम लोगों के साथ कोई लेना-देना नहीं होगा। यही वह अंत है जिसे तुम लोग प्राप्त करने के योग्य हो और तुम लोगों की अपनी करतूतों का परिणाम है!

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

अपना कर्तव्य करने का अर्थ है भरसक प्रयत्न करना

इंसान का फ़र्ज़ निभाना, दरअसल, है पूरा करना अपना निहित सभी, जो भी हो संभव वो करना, उसका फ़र्ज़ पूरा होगा तभी।

सेवा के दौरान इंसान के दोष कम हो जाते हैं अनुभव से, न्याय किए जाने से; वे उसके फ़र्ज़ में ख़लल नहीं डालते। जो सेवा बंद करते, समझौता करते, अपनी सेवा में दोष के डर से जो पीछे हट जाते हैं, वे ही सबसे कायर होते हैं। इंसान का फ़र्ज़ निभाना, दरअसल, है पूरा करना अपना निहित सभी, जो भी हो संभव वो करना, उसका फ़र्ज़ पूरा होगा तभी। इंसान का फ़र्ज़ निभाना, दरअसल, है पूरा करना अपना निहित सभी, जो भी हो संभव वो करना, उसका फ़र्ज़ पूरा होगा तभी।

यदि ईश्वर सेवा में इंसान कह न पाए जो कहना चाहिए न पा सके अपने साध्य को, लापरवाही, बेमन से काम करे, तो वो खो देता है अपना मानवी फ़र्ज़। ऐसा इंसान समझा जाता है साधारण और कचरा। उसे सृजित प्राणी कैसे बुलाए कोई? बाहर से चमकते हुए वो क्या भीतर से सड़ रहा नहीं? इंसान का फ़र्ज़ निभाना, दरअसल, है पूरा करना अपना निहित सभी, जो भी हो संभव वो करना, उसका फ़र्ज़ पूरा होगा तभी। इंसान का फ़र्ज़ निभाना, दरअसल, है पूरा करना अपना निहित सभी, जो भी हो संभव वो करना, उसका फ़र्ज़ पूरा होगा तभी, पूरा होगा तभी।

'मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ' से

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