परमेश्वर के दैनिक वचन : जीवन में प्रवेश | अंश 441

जब तुम स्वयं को जीवन के लिए तैयार कर रहे हो, तो तुम्हें परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने पर ध्यान देना चाहिए, तुम्हें परमेश्वर के बारे में ज्ञान के विषय में, मानवीय जीवन के विषय में और विशेष रूप से अंत के दिनों में परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य के विषय में बातचीत करने के योग्य होना चाहिए। चूँकि तुम जीवन का अनुसरण करते हो, तो तुम्हारे अंदर ये चीज़ें होनी चाहिए। जब तुम परमेश्वर के वचनों को खाते-पीते हो, तो तुम्हें इनके सामने अपनी स्थिति की वास्तविकता को मापना चाहिए। यानी, जब तुम्हें अपने वास्तविक अनुभव के दौरान अपनी कमियों का पता चले, तो तुम्हें अभ्यास का मार्ग ढूँढ़ने, गलत अभिप्रेरणाओं और धारणाओं से मुँह मोड़ने में सक्षम होना चाहिए। अगर तुम हमेशा इन बातों का प्रयास करो और इन बातों को हासिल करने में अपने दिल को उँड़ेल दो, तो तुम्हारे पास अनुसरण करने के लिए एक मार्ग होगा, तुम अपने अंदर खोखलापन महसूस नहीं करोगे, और इस तरह तुम एक सामान्य स्थिति बनाए रखने में सफल हो जाओगे। तब तुम ऐसे इंसान बन जाओगे जो अपने जीवन में भार वहन करता है, जिसमें आस्था है। ऐसा क्यों होता है कि कुछ लोग परमेश्वर के वचनों को पढ़कर, उन्हें अमल में नहीं ला पाते? क्या इसकी वजह यह नहीं है कि वे सबसे अहम बात को समझ नहीं पाते? क्या इसकी वजह यह नहीं है कि वे जीवन को गंभीरता से नहीं लेते? वे अहम बात को समझ नहीं पाते और उनके पास अभ्यास का कोई मार्ग नहीं होता, उसका कारण यह है कि जब वे परमेश्वर के वचनों को पढ़ते हैं, तो वे उनसे अपनी स्थितियों को जोड़ नहीं पाते, न ही वे अपनी स्थितियों को अपने वश में कर पाते हैं। कुछ लोग कहते हैं : "मैं परमेश्वर के वचनों को पढ़कर उनसे अपनी स्थिति को जोड़ पाता हूँ, और मैं जानता हूँ कि मैं भ्रष्ट हूँ और मेरी क्षमता खराब है, लेकिन मैं परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करने के काबिल नहीं हूँ।" तुमने केवल सतह को ही देखा है; और भी बहुत-सी वास्तविक चीज़ें हैं जो तुम नहीं जानते : देह-सुख का त्याग कैसे करें, दंभ को दूर कैसे करें, स्वयं को कैसे बदलें, इन चीज़ों में कैसे प्रवेश करें, अपनी क्षमता कैसे बढ़ाएँ और किस पहलू से शुरू करें। तुम केवल सतही तौर पर कुछ चीज़ों को समझते हो, तुम बस इतना जानते हो कि तुम वाकई बहुत भ्रष्ट हो। जब तुम अपने भाई-बहनों से मिलते हो, तो तुम यह चर्चा करते हो कि तुम कितने भ्रष्ट हो, तो ऐसा लगता है कि तुम स्वयं को जानते हो और अपने जीवन के लिए एक बड़ा भार वहन करते हो। दरअसल, तुम्हारा भ्रष्ट स्वभाव बदला नहीं है, जिससे साबित होता है कि तुम्हें अभ्यास का मार्ग मिला नहीं है। अगर तुम किसी कलीसिया की अगुवाई करते हो, तो तुम्हें भाई-बहनों की स्थितियों को समझने और उस ओर उनका ध्यान दिलाने में समर्थ होना चाहिए। क्या सिर्फ इतना कहना पर्याप्त होगा : "तुम अवज्ञाकारी और पिछड़े हुए हो!"? नहीं, तुम्हें खास तौर से बताना चाहिए कि उनकी अवज्ञाकारिता और पिछड़ापन किस प्रकार अभिव्यक्त हो रहा है। तुम्हें उनकी अवज्ञाकारी स्थिति पर, उनके अवज्ञाकारी बर्ताव पर और उनके शैतानी स्वभावों पर बोलना चाहिए, और इन बातों पर इस ढंग से बोलना चाहिए जिससे कि वे तुम्हारे शब्दों की सच्चाई से पूरी तरह आश्वस्त हो जाएँ। अपनी बात रखने के लिए तथ्यों और उदाहरणों का सहारा लो, और उन्हें बताओ कि वे किस तरह विद्रोही व्यवहार से अलग हो सकते हैं, और उन्हें अभ्यास का मार्ग बताओ—यह है लोगों को आश्वस्त करने का तरीका। जो इस तरह से काम करते हैं, वही दूसरों की अगुवाई कर सकते हैं; उन्हीं में सत्य की वास्तविकता होती है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

सभी विश्वासी यीशु मसीह की वापसी के लिए तरस रहे हैं। क्या आप उनमें से एक हैं? हमारी ऑनलाइन सहभागिता में शामिल हों और आपको परमेश्वर से फिर से मिलने का अवसर मिलेगा।

संबंधित सामग्री

परमेश्वर के दैनिक वचन : परमेश्वर के कार्य को जानना | अंश 188

परमेश्वर पर विश्वास करने वाले व्यक्ति के रूप में, तुम को यह समझना चाहिए कि, आज, इन अंतिम दिनों में परमेश्वर का कार्य और तुम में परमेश्वर की...

परमेश्वर के दैनिक वचन : परमेश्वर का प्रकटन और कार्य | अंश 56

सर्वशक्तिमान सच्चा परमेश्वर, सिंहासन पर विराजमान राजा, सभी राष्ट्रों और सभी लोगों के सामने, पूरे ब्रह्मांड पर शासन करता है, और स्वर्ग के...

परमेश्वर के दैनिक वचन : परमेश्वर के कार्य को जानना | अंश 182

आखिरकार, परमेश्वर का कार्य इंसान के कार्य से अलग है और, इसके अलावा, उसकी अभिव्यक्तियाँ इंसानों की अभिव्यक्तियों के समान कैसे हो सकती हैं?...

WhatsApp पर हमसे संपर्क करें