परमेश्वर के दैनिक वचन | "सत्य को समझने के बाद, तुम्हें उस पर अमल करना चाहिए" | अंश 424

वर्तमान चरण में, पहले सत्य को जानना बेहद महत्वपूर्ण है, फिर उसे अमल में लाना और उसके बाद सत्य के सच्चे अर्थ से स्वयं को समर्थ बनाना। तुम लोगों को इसे प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। दूसरों से मात्र अपनी बातों का अनुसरण करवाने का प्रयास करने के बजाय, तुम्हें उनसे अपने अभ्यास का अनुसरण करवाना चाहिए। केवल इसी प्रकार से तुम कुछ सार्थक हासिल कर सकते हो। तुम पर चाहे कोई भी मुसीबत आए, चाहे तुम्हें किसी का भी सामना करना पड़े, अगर तुम्हारे अंदर सत्य है, तो तुम डटे रह पाओगे। परमेश्वर के वचन इंसान को जीवन देते हैं, मृत्यु नहीं। अगर परमेश्वर के वचन पढ़कर भी तुम जीवित नहीं होते बल्कि मुर्दे ही रहते हो, तो तुम्हारे साथ कुछ गड़बड़ है। अगर कुछ समय के बाद तुम परमेश्वर के काफी वचनों को पढ़ लेते हो और व्यवहारिक उपदेशों को सुन लेते हो, लेकिन तब भी तुम मृत्यु की स्थिति में रहते हो, तो यह इस बात का प्रमाण है कि तुम सत्य की कद्र करने वाले इंसान नहीं हो, न ही तुम सत्य के लिए प्रयास करने वाले इंसान हो। अगर तुम लोग सचमुच परमेश्वर को पाने का प्रयास करते, तो तुम लोग सिद्धांतों से लैस होने और लोगों को सिखाने के लिए ऊँचे-ऊँचे सिद्धांतों का इस्तेमाल करने में अपना ध्यान केंद्रित न करते, बल्कि परमेश्वर के वचनों का अनुभव करने और सत्य को अमल में लाने पर ध्यान केंद्रित करते। क्या अब तुम लोगों को इसमें प्रवेश करने का प्रयास नहीं करना चाहिए?

परमेश्वर के पास इंसान में कार्य करने का सीमित समय है, इसलिए अगर तुम उसके साथ सहयोग न करो तो उसका परिणाम क्या हो सकता है? परमेश्वर हमेशा क्यों चाहता है कि एक बार समझ लेने पर तुम लोग उसके वचनों पर अमल करो? वो ऐसा इसलिए चाहता है क्योंकि परमेश्वर ने तुम लोगों के सामने अपने वचनों को प्रकट कर दिया है और तुम लोगों का अगला कदम है उन पर वास्तव में अमल करना। जब तुम उन वचनों पर अमल करोगे, तो परमेश्वर प्रबोधन और मार्गदर्शन का कार्य पूरा करेगा। यह कार्य इसी तरह से किया जाना है। परमेश्वर के वचनों से इंसान का जीवन फलता-फूलता है, उसमें ऐसा कोई तत्व नहीं होता जो इंसान को भटकाए या उसे निष्क्रिय बनाए। तुम कहते हो कि तुमने परमेश्वर के वचनों को पढ़ा है और उस पर अमल किया है, लेकिन तुमने अभी भी पवित्र आत्मा से कोई कार्य प्राप्त नहीं किया है। तुम्हारे शब्द सिर्फ किसी बच्चे को बेवकूफ बना सकते हैं। अन्य लोगों को शायद न पता लगे कि तुम्हारे इरादे सही हैं या नहीं, लेकिन क्या तुम्हें लगता है कि परमेश्वर को पता नहीं चलेगा? ऐसा कैसे है कि लोग परमेश्वर के वचनों पर अमल करते हैं और उन्हें पवित्र आत्मा का प्रबोधन प्राप्त हो जाता है, लेकिन तुम उसके वचनों पर अमल करके भी पवित्र आत्मा का प्रबोधन प्राप्त नहीं करते? क्या परमेश्वर के अंदर भावनाएँ हैं? अगर तुम्हारे इरादे सचमुच सही हैं और तुम सहयोग करते हो, तो परमेश्वर का आत्मा तुम्हारे साथ होगा। कुछ लोग हमेशा अपना ही झंडा बुलंद रखना चाहते हैं, किन्तु क्यों परमेश्वर उन्हें ऊपर उठकर कलीसिया की अगुवाई नहीं करने देता? कुछ लोग मात्र अपना काम करते हैं और अपने कर्तव्यों को करते हैं, और इससे पहले कि वे इसे जाने, वे परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त कर लेते हैं। ऐसा कैसे हो सकता है? परमेश्वर इंसान के अंतरतम हृदय की जाँच करता है और जो लोग सत्य का पालन करते हैं उन्हें ऐसा सही इरादों के साथ करना चाहिए। जिन लोगों के इरादे सही नहीं होते, वे दृढ़ नहीं रह पाते। मूलत:, तुम लोगों का लक्ष्य परमेश्वर के वचनों को अपने अंदर प्रभाव ग्रहण करने देना है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर के वचनों के अपने अभ्यास में वचनों की सच्ची समझ हासिल करना है। शायद परमेश्वर के वचनों को समझने की तुम्हारी क्षमता थोड़ी कच्ची है, लेकिन जब तुम लोग परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करते हो, तो वह इस दोष को दूर कर सकता है, तो तुम लोगों को न केवल बहुत-से सत्यों को जानना चाहिए, बल्कि तुम्हें उनका अभ्यास भी करना चाहिए। यह सबसे महत्वपूर्ण केंद्र-बिंदु है जिसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता। यीशु ने भी अपने साढ़े तैंतीस वर्षों में बहुत से अपमान सहे और बहुत कष्ट उठाए। उसने इतने अधिक कष्ट केवल इसलिए उठाए क्योंकि उसने, सत्य पर अमल किया, सभी चीज़ों में परमेश्वर की इच्छा को पूरा किया, और केवल परमेश्वर की इच्छा की ही परवाह की। अगर उसने सत्य पर अमल किए बिना उसे जान लिया होता तो वह ये कष्ट न उठाता। अगर यीशु ने यहूदियों की शिक्षाओं का पालन किया होता और फरीसियों का अनुसरण किया होता, तो उसने कष्ट न उठाए होते। तुम यीशु के कर्मों से सीख सकते हो कि इंसान पर परमेश्वर के कार्य की प्रभावशीलता इंसान के सहयोग से ही आती है, यह बात तुम लोगों को समझ लेनी चाहिए। अगर यीशु ने सत्य पर अमल न किया होता, तो क्या उसने वो दुख उठाए होते जो सूली पर उठाए? अगर उसने परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप कार्य न किया होता तो क्या वह ऐसी दर्दभरी प्रार्थना कर पाता? इसलिए, तुम लोगों को सत्य के अभ्यास की खातिर कष्ट उठाने चाहिए; इंसान को इस तरह के कष्ट उठाने चाहिए।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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