परमेश्वर के दैनिक वचन | "राज्य का युग वचन का युग है" | अंश 404

जब परमेश्वर बोलते हैं, तुम्हें तुरंत उसके वचनों को स्वीकार करना और उन्हें खाना चाहिये। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम कितना समझे, इस विचार धारा को अपनाओ कि तुम वचन को खाने, उसे जानने और उसके वचन पर अमल करने पर अपना ध्यान केंद्रित करोगे। तुम्हें यही करना चाहिये। इस बात की चिंता न करो कि तुम्हारा कद कितना बड़ा हो जायेगा; केवल परमेश्वर के वचन को खाने पर ध्यान केंद्रित करो। इसी तरह से मनुष्यों को परमेश्वर का सहयोग करना चाहिये। तुम्हारा आत्मिक जीवन मुख्यतः उस वास्तविकता में प्रवेश करना है, जहां तुम परमेश्वर के वचनों को खाओ पीओ और उन पर अमल करो। तुम्हें अन्य किसी बात पर ध्यान केंद्रित नहीं करना चाहिये। कलीसिया के अगुवे को इस बारे में सभी भाई बहनों की अगुवाई करने में सक्षम होना चाहिए कि वे परमेश्वर के वचन को कैसे खाएं-पीएं। यह सभी कलीसियाई अगुवों की जिम्मेवारी है। वे चाहें युवा हों या वृद्ध, सभी को परमेश्वर के वचन को खाने पीने को महत्व देना चाहिये और उन वचनों को अपने-अपने हृदयों में रखना चाहिये। यदि तुम इस वास्तविकता में प्रवेश कर लेते हो-तो तुम राज्य के युग में प्रवेश कर लोगे। आजकल बहुत से हैं जो महसूस करते हैं कि वे परमेश्वर के वचन को खाए-पीए बिना नहीं रह सकते और समय चाहे जैसा भी हो, वे महसूस करते हैं कि परमेश्वर का वचन नया है। तब कहीं मनुष्य सही मार्ग पर चलना आरंभ करता है। परमेश्वर मनुष्यों में काम करने और उनकी आपूर्ति करने के लिये वचन का उपयोग करता है। जब सब लोग परमेश्वर के वचन की लालसा और भूख-प्यास रखते हैं, वे परमेश्वर के वचन के संसार में प्रवेश करेंगे।

परमेश्वर बहुत बातें कह चुका है। तुमने कितना ज्ञान पाया है? तुमने कितने में प्रवेश पाया है? यदि कलीसिया के अगुवे ने भाइयों और बहनों को परमेश्वर के वचन की वास्तविकता में अगुवाई नहीं की है, वे अपने कर्तव्य पालन में चूक गये हैं और अपनी जिम्मेवारियों को पूरा करने में असफल हुये हैं! परमेश्वर के वचन को खाने पीने में तुम्हारी कितनी भी गहराई है, या तुम कितना भी अधिक ग्रहण कर सकते हो, उसके बावजूद तुम्हें परमेश्वर के वचन को खाना-पीना आना चाहिये; तुम्हें परमेश्वर के वचन का महत्व मानना चाहिये और परमेश्वर के वचन को खाने-पीने की आवश्यकता को समझना चाहिये और उसका महत्व समझना चाहिये। परमेश्वर ने बहुत कुछ कह दिया है। यदि तुम उसके वचन को नहीं खाते-पीते, और उसे खोजते नहीं या उस पर अमल नहीं करते, यह नहीं माना जा सकता कि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो। क्योंकि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो, तुम्हें उसके वचन को खाना-पीना चाहिये, उसका अनुभव करना चाहिये, और उसे जीना चाहिये। केवल यही परमेश्वर पर विश्वास करना है! यदि तुम कहते हो कि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो, परंतु उसके किसी वचन को बोल नहीं सकते, या उन पर अमल नहीं कर सकते, तो यह नहीं माना जा सकता कि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो। ऐसा करना भूख शांत करने के लिये रोटी की खोज करने जैसा है। केवल छोटी-छोटी बातों की गवाही, अनुपयोगी मसले, और सतही मुद्दों के बारे में बातें करना, और उनमें लेशमात्र भी वास्तविकता न होना, परमेश्वर पर विश्वास नहीं है। उसी तरह, तुमने परमेश्वर पर विश्वास करने के सही तरीके को नहीं समझा है। तुम्हें परमेश्वर के वचनों को क्यों अधिक खाना-पीना चाहिये? क्या यह विश्वास माना जायेगा यदि तुम परमेश्वर के वचनों को खाते पीते नहीं, और केवल स्वर्ग पर उठाये जाने की खोज में हो? परमेश्वर पर विश्वास करने वाले का पहला कदम क्या है? परमेश्वर किस मार्ग से मनुष्यों को पूर्ण बनाता है? क्या परमेश्वर के वचन को बिना खाए-पीए तुम पूर्ण बनाए जा सकते हो? क्या परमेश्वर के वचन को बिना अपनी वास्तविकता बनाये, तुम परमेश्वर के राज्य के व्यक्ति माने जा सकते हो? परमेश्वर पर विश्वास करना वास्तव में क्या है? परमेश्वर पर विश्वास करने वालों का कम से कम बाहरी तौर पर आचरण अच्छा होना चाहिये, और सबसे महत्वपूर्ण बात परमेश्वर का वचन रखना है। तब चाहे कुछ भी हो तुम उसके वचन से भी दूर नहीं जा सकते। परमेश्वर के प्रति तुम्हारा ज्ञान और उसकी इच्छा को पूरा करना, सब उसके वचन के द्वारा हासिल किया जाता है। सभी देश, भाग, कलीसियायें, और प्रदेश भी भविष्य में वचन के द्वारा जीते जायेंगे। परमेश्वर सीधे बात करेगा, और सभी लोग अपने हाथों में परमेश्वर का वचन थामकर रखेंगे; इसके द्वारा लोग पूर्ण बनाए जाएंगे। परमेश्वर का वचन सब तरफ फैलता जायेगा: लोगों का परमेश्वर के वचन को बोलना, और परमेश्वर के वचन के अनुसार आचरण करना, जब हृदय में भीतर रखा जाए तब भी परमेश्वर का वचन है। भीतर और बाहर दोनों तरफ वे परमेश्वर के वचन से भरे हैं और इस प्रकार वे पूर्ण बनाए जाते हैं। परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने वाले और वे जो उसकी गवाही देते हैं, वे हैं जिन्होंने परमेश्वर के वचन को वास्तविकता बनाया है।

वचन के युग अर्थात् सहस्राब्दिक राज्य के युग में प्रवेश करना वह कार्य है जो अभी पूरा किया जा रहा है। अब से वचन की सहभागिता करने का अभ्यास करो। केवल परमेश्वर के वचन को खाने-पीने और अनुभव करने से तुम परमेश्वर के वचन को प्रदर्शित कर सकते हो। केवल तुम्हारे अनुभव के वचनों के द्वारा दूसरे लोग तुम्हारे कायल हो सकते हैं। यदि तुम्हारे पास परमेश्वर का वचन नहीं है तो कोई भी कायल नहीं होगा! परमेश्वर द्वारा उपयोग किये जाने वाले सब लोग परमेश्वर का वचन बोलने में सक्षम होते हैं। यदि तुम परमेश्वर का वचन नहीं बोल सकते, यह दर्शाता है पवित्र आत्मा ने तुममें काम नहीं किया है और तुम पूर्ण नहीं बनाए गये हो। यह परमेश्वर के वचन का महत्व है। क्या तुम्हारे पास ऐसा हृदय है जो परमेश्वर के वचन की भूख-प्यास रखता है? वे जो परमेश्वर के वचन के प्यासे हैं, वे सत्य के लिये प्यासे हैं, और केवल ऐेसे ही लोग परमेश्वर के द्वारा अशीषित हैं। भविष्य में, परमेश्वर सभी पंथों और संप्रदायों से बहुत सी अन्य बातें भी कहेगा। वह सबसे पहले तुम लोगों के बीच बोलता और अपनी वाणी सुनाता है और तुम्हें पूरा करता है और उसके बाद अन्य बुतपरस्तों से बातें करेगा, उन तक अपनी वाणी पहुँचाएगा और उन्हें जीतेगा। वचन के द्वारा सभी लोग ईमानदारी से और पूरी तरह से कायल किये जायेंगे। परमेश्वर के वचन के द्वारा और उसके प्रकाशनों के द्वारा मनुष्य का भ्रष्ट स्वभाव कम प्रभावी हुआ है। सभी में मनुष्यों का स्वरूप है और मनुष्य का विद्रोही स्वभाव बहुत कम हो गया है। वचन मनुष्यों में अधिकार के साथ काम करता है, और परमेश्वर की ज्योति में मनुष्यों को जीतता है। परमेश्वर वर्तमान युग में जो कार्य करेगा, और उसके कार्य का निर्णायक मोड़ सभी कुछ परमेश्वर के वचन के भीतर मिल सकता है। यदि तुम उसके वचन को नहीं पढ़ते, तो तुम कुछ नहीं समझोगे। उसके वचन को खाने-पीने के द्वारा, भाइयों और बहनों के साथ सहभागिता करके, और तुम्हारे वास्तविक अनुभव के द्वारा परमेश्वर के वचन का तुम्हारा ज्ञान व्यापक हो जाएगा। केवल इसी प्रकार से तुम सचमुच वास्तविक जीवन में उसे जी सकते हो।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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