परमेश्वर के दैनिक वचन | "सत्य के अनुसरण का महत्व और अनुसरण का मार्ग" | अंश 378

यदि तुम सत्य को व्यवहार में लाना और उसे समझना चाहते हो, तो सबसे पहले अपने सामने आने वाली कठिनाइयों और अपने आसपास घटने वाली चीज़ों का सार समझो, समझो कि इन मुद्दों के साथ क्या समस्याएँ हैं, साथ ही इस बात को भी समझो कि वो सत्य के किस पहलू से संबंधित हैं। इन चीज़ों की तलाश करो और उसके बाद अपनी वास्तविक कठिनाइयों के आधार पर सत्य की खोज करो। इस तरह, जैसे-जैसे तुम अनुभव प्राप्त करोगे, वैसे-वैसे तुम अपने साथ होने वाली हर चीज़ में परमेश्वर का हाथ देखने लगोगे, और यह भी जानने लगोगे कि वह क्या करना चाहता है और तुममें कौन-से परिणाम प्राप्त करना चाहता है। शायद तुम्हें कभी ऐसा न लगता हो कि जो कुछ भी तुम्हारे साथ हो रहा है, वह परमेश्वर में विश्वास और सत्य से जुड़ा है, और बस अपने आप से कहो, "इससे निपटने का मेरा अपना तरीका है; मुझे सत्य की या परमेश्वर के वचनों की आवश्यकता नहीं है। जब मैं सभाओं में भाग लूँगा, या जब मैं परमेश्वर के वचनों को पढूँगा, या अपना कर्तव्य निभाऊँगा, तो मैं अपनी जाँच सत्य और परमेश्वर के वचनों से तुलना करके करूँगा।" अगर तुम्हें लगता है कि तुम्हारे जीवन में होने वाली रोज़मर्रा की चीज़ों का, जैसे परिवार, काम-काज, विवाह और तुम्हारे भविष्य से संबंधित विभिन्न चीज़ों का, सत्य से कोई लेना-देना नहीं है, और तुम उन्हें मानवीय तरीकों से हल करते हो, अगर तुम्हारे अनुभव करने का यही तरीका है, तो तुम्हें सत्य कभी प्राप्त नहीं होगा; तुम कभी यह नहीं समझ पाओगे कि परमेश्वर तुम्हारे भीतर क्या करना चाहता है या वह कौन-से परिणाम प्राप्त करना चाहता है। सत्य का अनुसरण करना एक लंबी प्रक्रिया है। इसका एक सरल पक्ष है, और इसका एक जटिल पक्ष भी है। सरल शब्दों में, हमें अपने आसपास होने वाली हर चीज़ में सत्य की खोज करनी चाहिए और परमेश्वर के वचनों का अभ्यास और अनुभव करना चाहिए। एक बार जब तुम ऐसा करना शुरू कर दोगे, तो तुम यह देखोगे कि तुम्हें परमेश्वर पर अपने विश्वास में कितना सत्य हासिल करना चाहिए और उसका कितना अनुसरण करना चाहिए, तुम जानोगे कि सत्य बहुत वास्तविक है और सत्य ही जीवन है। यह सच नहीं है कि केवल परमेश्वर की सेवा करने वालों और कलीसिया के अगुआओं को ही सब-कुछ सत्य के अनुसार करने की आवश्यकता होती है, साधारण अनुयायियों को नहीं; यदि ऐसा होता, तो परमेश्वर द्वारा व्यक्त वचनों में कोई बड़ा अर्थ नहीं होता। क्या अब तुम लोगों के पास सत्य के अनुसरण का मार्ग है? सत्य का अनुसरण करते हुए पहला काम क्या करना चाहिए? सबसे पहले तुम्हें परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने और संगति सुनने में ज्यादा समय बिताना चाहिए। जब तुम्हारे सामने कोई समस्या आए, तो ज्यादा प्रार्थना करो, ज्यादा खोजो। जब तुम लोग अधिक सत्य से युक्त हो जाओगे, जीवन-प्रवेश पा लोगे, और तुम्हारा कद आध्यात्मिक हो जाएगा, तो तुम लोग कुछ वास्तविक कर पाओगे, कुछ काम हाथ में ले पाओगे, और इस तरह कुछ परीक्षणों और प्रलोभनों के माध्यम से सफलता पाने में सक्षम हो पाओगे। उस समय तुम महसूस करोगे कि तुमने वास्तव में कुछ सत्य समझ और पा लिए हैं, और तुम जानोगे कि परमेश्वर द्वारा कहे गए वचन ही लोगों की आवश्यकता हैं, उन्हें ही हासिल करना चाहिए, और वही दुनिया में एकमात्र सत्य हैं, जो लोगों को जीवन दे सकते हैं।

— 'मसीह की बातचीत के अभिलेख' से उद्धृत

अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

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