परमेश्वर के दैनिक वचन | "अपराध मनुष्य को नरक में ले जाएगा" | अंश 610

मेरी बहुत-सी इच्छाएं हैं। मैं चाहता हूँ कि तुम लोग अपने आचरण को उपयुक्त और बेहतर बनाओ, अपने दायित्व पूरी निष्ठा से पूरे करो, तुम्हारे अंदर सच्चाई और मानवीयता हो, ऐसे बनो जो अपना सर्वस्व, अपना जीवन परमेश्वर के लिये न्योछावर कर सके, वगैरह-वगैरह। ये सारी कामनाएँ तुम्हारी कमियों, भ्रष्टता और अवज्ञाओं से उत्पन्न होती हैं। अगर तुम लोगों से मेरी तमाम बातचीत भी तुम्हारा ध्यान आकर्षित नहीं कर सकी तो फिर शायद मेरा चुप हो जाना ही बेहतर है। हालाँकि, तुम लोग इसके परिणाम को समझ सकते हो। मैं कभी आराम नहीं करता, तो अगर बोलूंगा नहीं तो कुछ ऐसा करूँगा जिधर लोगों का ध्यान जाए। मैं किसी की जीभ गला सकता हूँ, या किसी का अंग-भंग कर उसे मृत्यु दे सकता हूँ, या किसी को स्नायु रोग दे सकता हूँ और उन्हें ऐसा बना सकता हूँ कि वे पागलों जैसी हरकतें करें और मैं उन्हें अनेक तरीकों से, देखने में घिनौना बना सकता हूँ। फिर से, मैं कुछ लोगों के लिए ऐसा उत्पीड़न पैदा कर सकता हूँ जो उन्हें झेलना पड़े। इस तरह मुझे अच्छा लगेगा, बेहद ख़ुशी और प्रसन्नता होगी। हमेशा से "भलाई का बदला भलाई से और बुराई का बदला बुराई से," दिया जाता रहा है, तो अब क्यों नहीं? यदि तुम मेरा विरोध करना चाहते हो और मेरे बारे में राय व्यक्त करना चाहते हो, तो मैं तुम्हारे मुँह को गला दूँगा, और उससे मुझे अपार प्रसन्नता होगी। क्योंकि आख़िरकार, जो कुछ तुमने किया है वह सच नहीं है, इसका ज़िंदगी से कुछ भी लेना-देना नहीं है, जबकि मेरे हर कार्य में सच्चाई होती है, हर चीज़ मेरे तय किए गए कार्यों के सिद्धांतों और आदेशों से सम्बद्ध होती है। अत: मेरी तुम सभी से गुज़ारिश है कि कुछ गुण संचित करो, बुराई करना बन्द करो, और फुरसत के समय में मेरी माँगों पर विचार करो। तब मुझे ख़ुशी होगी। यदि तुम लोग जितना समय देह-सुख में लगाते हो, उसका हज़ारवाँ हिस्सा भी सच्चाई में लगाओ, तो मैं तो कहूँगा कि तब न तो तुम बहुधा उल्लंघन करोगे और न तुम्हारा मुँह विगलित होगा। बताओ, ऐसा होगा कि नहीं?

तुम जितना अधिक उल्लंघन करोगे, अपने गंतव्य को पाने के तुम्हारे अवसर उतने ही कम होते जाएँगे। इसके विपरीत, उल्लंघन जितने कम होंगे, परमेश्वर की प्रशंसा पाने के तुम्हारे अवसर उतने ही बढ़ जाएँगे। यदि तुम्हारे उल्लंघन इतने बढ़ जाएँ कि मैं भी तुम्हें क्षमा न कर सकूँ, तो फिर समझ लो कि तुमने माफ़ी पाने के अपने सारे अवसर गँवा दिए। तब तुम्हारा गंतव्य उच्च की बजाय निम्न होगा। यदि तुम्हें मेरी बातों पर यकीन नहीं है, तो बेधड़क गलत काम करो और फिर ख़ुद ही उसके नतीजे देखो। यदि तुम ईमानदार हो और सत्य पर अमल करते हो तो यह मौका ज़रूर आएगा कि तुम्हारे उल्लंघनों को क्षमा कर दिया जाए, और इस तरह तुम्हारे आज्ञालंघन कम से कमतर होते चले जाएँगे। और यदि तुम सत्य पर अमल नहीं करना चाहते, तो परमेश्वर के समक्ष तुम्हारे उल्लंघन बढ़ते ही जाएँगे, तुम्हारे आज्ञालंघनों में वृद्धि होती जाएगी, और ऐसा तब तक होगा जब तक तुम हद तक न पहुँच जाओ, जो तुम्हारी पूरी तबाही का समय होगा। और यह तब होगा जब आशीष पाने का तुम्हारा खूबसूरत सपना चूर-चूर हो चुका होगा। अपने उल्लंघनों को किसी नादान या बेककूफ़ इंसान की गलतियां मत मान बैठो, न ही इस बहानेबाज़ी की आड़ में छुपने का प्रयास करना कि तुम्हारे अंदर सत्य पर अमल करने की कुव्वत ही नहीं है, और उससे भी अधिक, अपने उल्लंघनों को किसी अज्ञानी व्यक्ति के कृत्य मत समझ बैठना। यदि तुम स्वयं को क्षमा करने की कला में सिद्ध-हस्त हो और ख़ुद के प्रति उदार भाव रखते हो, तो तुम एक ऐसे कायर इंसान हो जिसे कभी सत्य हासिल नहीं होगा, तुम्हारे उल्लंघन किसी साये की तरह तुम्हारा पीछा करेंगे, सत्य की अपेक्षाओं को कभी पूरा नहीं होने देंगे और हमेशा के लिये शैतान का चिर-स्थायी साथी बना देंगे। लेकिन फिर भी मेरी सलाह है: केवल अपने लक्ष्य पर दृष्टि मत रखो, अपने गुप्त उल्लंघनों को नज़रंदाज़ मत करो; उन्हें गंभीरता से लो, अपने लक्ष्य की चिंता में अपने उल्लंघनों के प्रति असावधान मत रहो।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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