परमेश्वर के दैनिक वचन | "मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक अद्भुत मंज़िल पर ले जाना" | अंश 589

सृष्टिकर्ता ने सभी प्राणियों के लिए आयोजन करने का इरादा किया है। आपको किसी भी चीज़ को ठुकराना या उसकी अनाज्ञाकारिता नहीं करना होगा, न ही आपको उसके प्रति विद्रोह करना चाहिए। वह कार्य जिसे वह करता है वह अन्ततः उसके लक्ष्यों को हासिल करेगा, और इसमें वह महिमा प्राप्त करेगा। आज, ऐसा क्यों नहीं कहा जाता है कि आप मोआब के वंशज हैं, या उस बड़े लाल अजगर की संतान हैं? चुने हुए लोगों के विषय में कोई बातचीत क्यों नहीं होती है, और केवल प्राणियों के विषय में ही बातचीत होती है? प्राणी—यह मनुष्य का मूल पद नाम था, और यह वह है जो उसकी स्वाभाविक पहचान है। नाम अलग अलग होते हैं क्योंकि कार्य के युग एवं समय अवधियां भिन्न भिन्न होती हैं; वास्तव में, मनुष्य एक साधारण प्राणी है। सभी प्राणी, चाहे वे अत्यंत भ्रष्ट हों अत्यंत पवित्र, उन्हें एक प्राणी के कर्तव्य को निभाना होगा। जब परमेश्वर विजय के कार्य को सम्पन्न करता है, तो वह आपके भविष्य की संभावनाओं, नियति या मंज़िल का इस्तेमाल करके आपको नियन्त्रित नहीं करता है। वास्तव में इस रीति से कार्य करने की कोई आवश्यकता ही नहीं है। विजय के कार्य का लक्ष्य मनुष्य से एक प्राणी के कर्तव्य का पालन करवाना है, उससे सृष्टिकर्ता की आराधना करवाना है, और केवल इसके बाद ही वह उस बेहतरीन मंज़िल में प्रवेश कर सकता है। मनुष्य की नियति को परमेश्वर के हाथों के द्वारा नियन्त्रित किया जाता है। आप स्वयं को नियन्त्रित करने में असमर्थ हैं: इसके बावजूद हमेशा स्वयं के लिए दौड़-भाग करते एवं व्यस्त रहते हैं, मनुष्य स्वयं को नियन्त्रित करने में असमर्थ बना रहता है। यदि आप अपने स्वयं के भविष्य की संभावनाओं को जान सकते, यदि आप अपनी स्वयं की नियति को नियन्त्रित कर सकते, तो क्या आप तब भी एक प्राणी ही होते? संक्षेप में, इसकी परवाह किए बगैर कि परमेश्वर कैसे कार्य करता है, उसके सभी कार्य सिर्फ मनुष्य की खातिर ही होते हैं। उदाहरण के लिए, स्वर्ग पृथ्वी एवं सभी चीज़ों को ही लीजिए जिन्हें परमेश्वर ने मनुष्य की सेवा करने के लिए सृजा था: चंद्रमा, सूर्य एवं तारागण जिन्हें उसने मनुष्य के लिए बनाया था: जानवर, पेड़-पौधे, बसंत ऋतु, ग्रीष्म ऋतु, शरद ऋतु एवं शीत ऋतु, एवं इत्यादि—ये सब मनुष्य के अस्तित्व की खातिर ही हैं। और इस प्रकार, इसकी परवाह किए बगैर कि परमेश्वर मनुष्य का न्याय कैसे करता है और उसे दण्ड कैसे देता है, यह सब कुछ मनुष्य के उद्धार के लिए ही है। हालाँकि, वह मनुष्य को उसकी शारीरिक आशाओं से वंचित कर देता है, फिर भी यह केवल मनुष्य को शुद्ध करने के लिए ही होता है, और मनुष्य का शुद्धिकरण उसके अस्तित्व के लिए होता है। मनुष्य की मंज़िल सृष्टिकर्ता के हाथ में होती है, अतः मनुष्य स्वयं का नियन्त्रण कैसे कर सकता है?

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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