परमेश्वर के दैनिक वचन | "व्यवस्था के युग का कार्य" | अंश 20

व्यवस्था के युग के दौरान, यहोवा ने मूसा के लिए अनेक आज्ञाएँ निर्धारित की कि वह उन्हें उन इस्राएलियों के लिए आगे बढ़ा दे जिन्होंने मिस्र से बाहर उसका अनुसरण किया था। ये आज्ञाएँ यहोवा द्वारा इस्राएलियों को दी गई थीं, और उनका मिस्र के लोगों से कोई संबंध नहीं था; वे इस्राएलियों को नियन्त्रण में रखने के अभिप्राय से थीं। परमेश्वर ने उनसे माँग करने के लिए इन आज्ञाओं का उपयोग किया। उन्होंने सब्त का पालन किया या नहीं, उन्होंने अपने माता पिता का आदर किया या नहीं, उन्होंने मूर्तियों की आराधना की या नहीं, इत्यादि: यही वे सिद्धांत थे जिनसे उनके पापी या धार्मिक होना आँकलन किया जाता था। उनमें से, कुछ ऐसे थे जो यहोवा की आग से त्रस्त थे, कुछ ऐसे थे जिन्हें पत्थऱ मार कर मार डाला गया था, और कुछ ऐसे थे जिन्होंने यहोवा का आशीष प्राप्त किया था, और इसका निर्धारण इस बात के अनुसार किया जाता था कि उन्होंने इन आज्ञाओं का पालन किया या नहीं। जो सब्त का पालन नहीं करते थे उन्हें पत्थर मार कर मार डाला जाएगा। जो याजक सब्त का पालन नहीं करते थे उन्हें यहोवा की आग से त्रस्त किया जाएगा। जो अपने माता पिता का आदर नहीं करते थे उन्हें भी पत्थर मार कर मार डाला जाएगा। यह सब कुछ यहोवा द्वारा अनुशंसा किया गया था। यहोवा ने अपनी आज्ञाओं और व्यवस्थाओं को स्थापित किया था ताकि, जब वह उनके जीवन में उनकी अगुवाई करे, तब लोग उसके वचन को सुनें और उसके वचन का पालन करें और उसके विरूद्ध विद्रोह न करें। उसने नई जन्मी हुई मानव प्रजाति को नियन्त्रण में रखने, अपने भविष्य के कार्य की नींव को बेहतर ढंग से डालने के लिए इन व्यवस्थाओं का उपयोग किया। और इसलिए, उस कार्य के आधार पर जो यहोवा ने किया, प्रथम युग को व्यवस्था का युग कहा गया था। यद्यपि यहोवा ने बहुत से कथन कहे और बहुत सा कार्य किया, किंतु उसने इन अज्ञानी लोगों को यह सिखाते हुए कि इंसान कैसे बनें, कैसे जीएँ, यहोवा के मार्ग को कैसे समझें, लोगों का केवल सकारात्मक ढंग से मार्गदर्शन किया। ज़्यादातर, उसने जो कार्य किया वह लोगों से उसके मार्ग का पालन करवाना और उसकी व्यवस्थाओं का अनुसरण करवाना था। कार्य उन लोगों पर किया गया था जो कम गहराई तक भ्रष्ट थे; यह उनके स्वभाव का रूपान्तरण करने या जीवन में प्रगति तक विस्तारित नहीं था। वह लोगों को सीमित और नियन्त्रित करने के लिए केवल व्यवस्था का उपयोग करने तक चिंतित था। उस समय इस्राएलियों के लिए, यहोवा मात्र मन्दिर का एक परमेश्वर, स्वर्ग का एक परमेश्वर था। वह बादल का एक खम्भा, आग का एक खम्भा था। वह सब जो यहोवा उनसे करने की अपेक्षा करता था वह था उन बातों का पालन करना जिन्हें आज लोग उसकी व्यवस्थाओं और आज्ञाओं—कोई इन्हें नियम भी कह सकता है—के रूप में जानते हैं क्योंकि जो यहोवा ने किया वह उन्हें रूपान्तरित करने के अभिप्राय से नहीं था, बल्कि उन्हें बहुत सी वस्तुएँ देना था जो मनुष्य के पास होनी चाहिए, उन्हें स्वयं अपने मुँह से निर्देश देना था, क्योंकि सृजित किए जाने के बाद, मनुष्य के पास उस बारे में कुछ नहीं था जो उसके पास होना चाहिए। और इसलिए, जिन लोगों की यहोवा ने अगुवाई की थी उन्हें उनके पूर्वजों, आदम और हव्वा से भी श्रेष्ठ बनाते हुए, उसने लोगों को वे वस्तुएँ दी जो पृथ्वी पर उनके जीवन के लिए उनके पास होनी चाहिए, क्योंकि जो कुछ यहोवा ने उन्हें दिया था वह उस से बढ़कर था जो उसने आदम और हव्वा को आरंभ में दिया था। इसके बावजूद, यहोवा ने इस्राएल में जो कार्य किया वह केवल मानवजाति का मार्गदर्शन करने और मानवजाति से उनके रचयिता की पहचान करवाने के लिए था। उसने उन्हें जीता नहीं या उन्हें रूपान्तरित नहीं किया, बल्कि मात्र उनका मार्गदर्शन किया। व्यवस्था के युग में यहोवा के कार्य का यही सारांश है। इस्राएल की संपूर्ण धरती पर यह उसके कार्य की पृष्ठभूमि, सच्ची कहानी, और सार है, और छः हज़ार वर्षों के उसके कार्य—मानवजाति को यहोवा के हाथ के नियन्त्रण के अधीन रखने—का आरंभ है। इसमें से उसकी छः-हज़ार-वर्षों की प्रबन्धन योजना में और अधिक कार्य पैदा हुआ था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" से उद्धृत

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