परमेश्वर के दैनिक वचन | "देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर" | अंश 161

अनुग्रह के युग में, यीशु ने भी काफ़ी बातचीत की और काफ़ी कार्य किया। वह यशायाह से किस प्रकार भिन्न था? वह दानिय्येल से किस प्रकार भिन्न था? क्या वह कोई भविष्यद्वक्ता था? ऐसा क्यों कहा जाता है कि वह मसीह है? उनके मध्य क्या भिन्नताएँ हैं? वे सभी मनुष्य थे जिन्होंने वचन बोले थे, और मनुष्य को उनके वचन लगभग एक से प्रतीत होते थे। उन सभी ने बातें की और कार्य किए। पुराने विधान के भविष्यवद्क्ताओं ने भविष्यवाणियाँ की, और उसी तरह से, यीशु भी वैसा ही कर सका। ऐसा क्यों है? यहाँ कार्य की प्रकृति के आधार पर भिन्नता है। इस मामले को समझने के लिए, तुम देह की प्रकृति पर विचार नहीं कर सकते हो और तुम्हें किसी व्यक्ति के वचनों की गहराई या सतहीपन पर विचार नहीं करना चाहिए। तुम्हें अवश्य हमेशा सबसे पहले उसके कार्य पर और उन प्रभावों पर विचार करना चाहिए जिसे उसका कार्य मनुष्य में प्राप्त करता है। उस समय यशायाह के द्वारा कही गई भविष्यवाणियों ने मनुष्य का जीवन प्रदान नहीं किया, और दानिय्येल जैसे लोगों द्वारा प्राप्त किए गए संदेश मात्र भविष्यवाणियाँ थीं न कि जीवन का मार्ग थीं। यदि यहोवा की ओर से प्रत्यक्ष प्रकाशन नहीं होता, तो कोई भी इस कार्य को नहीं कर सकता था, क्योंकि यह नश्वरों के लिए सम्भव नहीं है। यीशु, ने भी, बहुत बातें की, परन्तु वे वचन जीवन का मार्ग थे जिसमें से मनुष्य अभ्यास का मार्ग प्राप्त कर सकता था। कहने का अर्थ है, कि सबसे पहले, वह लोगों में जीवन प्रदान कर सकता था, क्योंकि यीशु जीवन है; दूसरा, वह मनुष्यों के विचलनों को पलट सकता था; तीसरा, युग को आगे बढ़ाने के लिए उसका कार्य यहोवा के कार्य का उत्तरवर्ती हो सकता था; चौथा, वह मनुष्य के भीतर की आवश्यकता को समझ सकता था और समझ सकता था कि मनुष्य में किस चीज का अभाव है; पाँचवाँ, वह नए युग का सूत्रपात कर सकता था और पुराने का समापन कर सकता था। यही कारण है कि उसे परमेश्वर और मसीह कहा जाता है; वह न सिर्फ़ यशायाह से भिन्न है परन्तु अन्य भविष्यद्वक्ताओं से भी भिन्न है। भविष्यवद्क्ताओं के कार्य के लिए तुलना के रूप में यशायाह को लें। सबसे पहले, वह मानव का जीवन प्रदान नहीं कर सकता था; दूसरा, वह नए युग का सूत्रपात नहीं कर सकता था। वह यहोवा की अगुआई के अधीन और न कि नए युग का सूत्रपात करने के लिए कार्य कर रहा था। तीसरा, उसने जिसके बारे में स्वयं बोला वह उसकी ही समझ से परे था। वह परमेश्वर के आत्मा से प्रत्यक्षतः प्रकाशनों को प्राप्त कर रहा था, और दूसरे उन्हें सुन कर भी, उसे नहीं समझे होंगे। ये कुछ ही बातें अकेले यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं कि उसके वचन भविष्यवाणियों की अपेक्षा अधिक नहीं थे, यहोवा के बदले किए गए कार्य के एक पहलू से ज़्यादा कुछनहीं थे। हालाँकि, वह यहोवा का प्रतिनिधित्व पूरी तरह से नहीं कर सकता था। वह यहोवा का नौकर था, यहोवा के काम में एक उपकरण था। वह केवल व्यवस्था के युग के भीतर और यहोवा के कार्य के क्षेत्र के भीतर ही कार्य कर रहा था; उसने व्यवस्था के युग से परे कार्य नहीं किया। इसके विपरीत, यीशु का कार्य भिन्न था। उसने यहोवा के कार्य क्षेत्र से बाहर जाकर कार्य किया; उसने देहधारी परमेश्वर के रूप में कार्य किया और सम्पूर्ण मानवजाति का उद्धार करने के लिए सलीब पर चढ़ गया। अर्थात्, उसने यहोवा के द्वारा किए गए कार्य से परे नया कार्य किया। यह नए युग का सूत्रपात करना था। दूसरी स्थिति यह है कि वह उस बारे में बोलने में समर्थ था जिसे मनुष्य प्राप्त नहीं कर सकता था। उसका कार्य परमेश्वर के प्रबंधन के भीतर कार्य था और सम्पूर्ण मानवजाति को समाविष्ट करता था। उसने मात्र कुछ ही मनुष्यों में कार्य नहीं किया, न ही उसका कार्य कुछ सीमित संख्या के लोगों की अगुआई करना था। जहाँ तक इस बात का संबंध है कि कैसे परमेश्वर मनुष्य बनने के लिए देहधारी हुआ था, कैसे उस समय पवित्र आत्मा ने प्रकाशनों को दिया, और कैसे पवित्रात्मा ने कार्य करने के लिए मनुष्य पर अवरोहण किया, ये ऐसी बातें हो जिन्हें मनुष्य देख नहीं सकता है या स्पर्श नहीं कर सकता है। इन सत्यों के लिए इस बात के साक्ष्य के रूप में कार्य करना सर्वथा असंभव है कि वही देहधारी परमेश्वर है। वैसे तो, परमेश्वर के केवल उन वचनों और कार्य पर ही अंतर किया जा सकता है, जो मनुष्य के लिए स्पर्शगोचर हो। केवल यही वास्तविक है। यह इसलिए है क्योंकि पवित्र आत्मा के मामले तुम्हारे लिए दृष्टिगोचर नहीं हैं और केवल परमेश्वर स्वयं को ही स्पष्ट रूप से ज्ञात हैं, और यहाँ तक कि परमेश्वर का देहधारी देह भी सब बातों को नहीं जानता है; तुम सिर्फ़ उसके द्वारा किए गए कार्य से इस बात की पुष्टि कर सकते हो कि वह परमेश्वर है। उसके कार्यों से, यह देखा जा सकता है, सबसे पहले, वह एक नए युग का मार्ग प्रशस्त करने में समर्थ है; दूसरा, वह मनुष्य का जीवन प्रदान करने और अनुसरण करने का मार्ग मनुष्य को दिखाने में समर्थ है। यह इस बात को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि वह परमेश्वर स्वयं है। कम से कम, जो कार्य वह करता है वह पूरी तरह से परमेश्वर का आत्मा का प्रतिनिधित्व कर सकता है, और ऐसे कार्य से यह देखा जा सकता है कि परमेश्वर का आत्मा उसके भीतर है। चूँकि देहधारी परमेश्वर के द्वारा किया गया कार्य मुख्य रूप से नए युग का सूत्रपात करना, नए कार्य की अगुआई करना और नई परिस्थितियों को पैदा करना था, इसलिए ये कुछ स्थितियाँ अकेले ही यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं कि वह परमेश्वर स्वयं है। इस प्रकार यह उसे यशायाह, दानिय्येल और अन्य महान भविष्यद्वक्ताओं से भिन्नता प्रदान करता है। यशायाह, दानिय्येल और अन्य भविष्यद्वक्ता उच्च शिक्षित वर्ग के और सुसंस्कृत लोग थे; वे यहोवा की अगुआई में असाधारण लोग थे। परमेश्वर का देहधारी देह भी ज्ञान-सम्पन्न था और उसमें ज्ञान का अभाव नहीं था; किन्तु उसकी मानवता विशेष रूप से सामान्य थी। वह एक साधारण मनुष्य था, और नग्न आँखें उसके बारे में किसी विशेष मानवता को नहीं देख सकती थी या उसकी मानवता में दूसरों से भिन्न कोई बात नहीं ढूँढ सकती थी। वह अलौकिक या अद्वितीय बिल्कुल नहीं था, और वह उच्चतर शिक्षा, ज्ञान या सिद्धांत से सम्पन्न नहीं था। जिस जीवन के बारे में उसने कहा और जिस मार्ग की उसने अगुआई की वे सिद्धांत के माध्यम से, ज्ञान के माध्यम से, जीवन के अनुभव के माध्यम से अथवा पारिवारिक पालन-पोषण के माध्यम से प्राप्त नहीं किए जाते थे। बल्कि, वे पवित्र आत्मा और देहधारी देह के प्रत्यक्ष कार्य थे। ऐसा इसलिए था क्योंकि मनुष्य की परमेश्वर के बारे में महान अवधारणाएँ थी, और विशेष रूप से क्योंकि ये अवधारणाएँ बहुत से अस्पष्टता के तत्वों और अलौकिता से बने हैं, इसलिए मनुष्य की दृष्टि में, मानवीय कमज़ोरियों वाला साधारण परमेश्वर, जो संकेतों और चमत्कारों को नहीं कर सकता है, वह निश्चित रूप से परमेश्वर नहीं है। क्या ये मनुष्य की श्रुटिपूर्ण अवधारणाएँ नहीं है? यदि देहधारी परमेश्वर की देह एक सामान्य मनुष्य नहीं होती, तो उसे देह बन जाना कैसे कहा जा सकता था? देह का होना एक साधारण, सामान्य मनुष्य होना है; यदि वह कोई सर्वोत्त्कृष्ट प्राणी रहा होता, तो वह देह का नहीं हुआ होता। यह सिद्ध करने के लिए कि वह देह का है, देहधारी परमेश्वर को एक सामान्य देह धारण करने की आवश्यक थी। यह सिर्फ़ देहधारण के महत्व को पूरा करने के लिए था। हालाँकि, भविष्यद्वक्ताओं और मनुष्य के पुत्रों के लिए ऐसा मामला नहीं था। ये पवित्र आत्मा के द्वारा वरदान दिए गए और उपयोग किए गए मनुष्य थे; मनुष्य की नज़रों में, उनकी मानवता विशेष रूप से महान थी और उन्होंने कई कार्य किए जो सामान्य मानवता से परे थे। इसी कारण से, मनुष्यों ने उन्हें परमेश्वर के रूप में माना। अब तुम सब लोगों को इसकी सही प्रकृति का पता स्पष्ट रूप से अवश्य लगा लेना चाहिए, क्योंकि यह ऐसा मुद्दा रहा है जिसे अतीत के युगों में सभी मनुष्यों द्वारा आसानी से भ्रमित किया गया है। इसके अतिरिक्त, देहधारण सबसे अधिक रहस्यमय बात है, और मनुष्य के लिए देहधारी परमेश्वर को स्वीकार करना सर्वाधिक कठिन है। जो मैं कहता हूँ वह तुम लोगों के प्रकार्य को पूरा करने और देहधारण के रहस्य को समझने में सहायक है। यह सब परमेश्वर के प्रबंधन, दर्शन से संबंधित है। इसके बारे में तुम लोगों की समझ दर्शन, अर्थात्, प्रबंधन के कार्य, का ज्ञान प्राप्त करने में अधिक लाभदायक होगी। इस तरह, तुम लोग भी उस कर्तव्य के बारे में और अधिक समझ प्राप्त करोगे जिसे विभिन्न प्रकार से मनुष्यों को करना चाहिए। यद्यपि ये वचन तुम्हें प्रत्यक्ष रूप से मार्ग नहीं दिखाते हैं, तब भी वे तुम लोगों के प्रवेश के लिए बहुत सहायता हैं, क्योंकि वर्तमान में तुम लोगों के जीवनों में दर्शन का अत्यधिक अभाव है, और यह तुम लोगों के प्रवेश में रुकावट डालते हुए एक महत्वपूर्ण बाधा बन जाएगा। यदि तुम लोग इन मुद्दों को समझने में असमर्थ रहे हो, तो तुम लोगों की प्रविष्टि को चलाने वाली कोई प्रेरणा नहीं होगी। और कैसे इस तरह की तलाश तुम लोगों को अपने कर्तव्य को पूरा करने में समर्थ बना सकती है?

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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