5. परमेश्वर उन लोगों को क्यों नहीं बचाता, जिनमें बुरी आत्माओं का कार्य है या जो शैतानों के कब्ज़े में हैं

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

मैंने लंबे समय से दुष्ट आत्माओं के विभिन्न दुष्कर्मों को स्पष्ट रूप से देखा है। और दुष्ट आत्माओं द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले लोगों (गलत इरादों वाले लोग, जो देह-सुख या धन की लालसा करते हैं, जो खुद को ऊंचा उठाते हैं, जो कलीसिया को बाधित करते हैं, आदि) की असलियत भी मैं स्पष्ट रूप से जान गया हूँ। यह मत समझो कि दुष्ट आत्माओं को बाहर निकालते ही सब कुछ खत्म हो जाता है। मैं तुम्हें बता दूँ! अब से, मैं इन लोगों का एक-एक करके निपटारा करूँगा, कभी उनका उपयोग नहीं करूँगा! कहने का तात्पर्य है, दुष्ट आत्माओं द्वारा भ्रष्ट किसी भी व्यक्ति का उपयोग मेरे द्वारा नहीं किया जाएगा, और उसे बाहर निकाल दिया जाएगा! ऐसा मत सोचना कि मैं भावनाविहीन हूँ! जान लो! मैं पवित्र परमेश्वर हूँ, और मैं एक गंदे मंदिर में नहीं रहूँगा! मैं केवल ईमानदार और बुद्धिमान लोगों का उपयोग करता हूँ जो मेरे प्रति पूरी तरह वफ़ादार और मेरे बोझ के प्रति विचारशील हो सकते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि ऐसे लोगों को मेरे द्वारा पूर्वनिर्धारित किया गया था। कोई भी दुष्ट आत्मा उनपर बिलकुल काम नहीं करता है। मुझे यह बात स्पष्ट करने दो: अब से, जिन सब लोगों के पास पवित्र आत्मा का कार्य नहीं है, उनके पास दुष्ट आत्माओं का काम है। मैं एक बार फिर बता दूँ: मैं एक भी ऐसे व्यक्ति को नहीं चाहता जिसपर दुष्ट आत्माएँ काम करती हैं। वे सभी अपनी देह के साथ नरक में डाल दिए जाएँगे!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 76' से उद्धृत

लोग अक्सर नरक और अधोलोक का उल्लेख करते हैं। किंतु ये दोनों शब्द क्या इंगित करते हैं, और उनके बीच क्या अंतर है? क्या ये सचमुच किसी ठंडे, अंधकारमय कोने को इंगित करते हैं? मानव मस्तिष्क मेरे प्रबंधन में हमेशा व्यवधान डालता रहता है, वे अपने निरुद्देश्य विचारों को बहुत अच्छी चीज मानते हैं। पर ये उनकी अपनी कपोल-कल्पनाओं के अलावा और कुछ भी नहीं हैं। अधोलोक और नरक दोनों गंदगी के मंदिर को संदर्भित करते हैं जहाँ पहले शैतान या दुष्ट आत्माओं का वास था। कहने का अर्थ है कि जिस किसी पर भी पहले शैतान या बुरी आत्माओं का कब्जा रह चुका है, वही वे लोग हैं जो अधोलोक हैं और वही वे लोग हैं जो नरक हैं—इसमें कोई संदेह नहीं है! यही कारण है कि मैंने अतीत में बार-बार जोर दिया है कि मैं गंदगी के मंदिर में नहीं रहता हूँ। क्या मैं (परमेश्वर स्वयं) अधोलोक में, या नरक में रह सकता हूँ? क्या यह हास्यास्पद बकवास नहीं होगी? मैंने यह कई बार कहा है लेकिन तुम लोगों की समझ में अभी भी नहीं आता है कि मेरा मतलब क्‍या है। नरक की तुलना में, अधोलोक को शैतान द्वारा कहीं ज्यादा दूषित किया जाता है। जो लोग अधोलोक के लिए हैं वे सबसे गंभीर मामले हैं, और मैंने इन लोगों को पूर्वनियत किया ही नहीं है; जो लोग नरक के लिए हैं ये वे ऐसे लोग हैं जिन्हें मैंने पूर्वनियत किया है, किंतु उन्हें निकाल दिया गया है। आसान भाषा में कहें तो, मैंने इन लोगों में से एक को भी नहीं चुना है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 90' से उद्धृत

कुछ मसीह-विरोधी बहुत स्पष्ट रूप से दुष्ट आत्माएँ हैं, जबकि कुछ मसीह-विरोधी इस हद तक नहीं जाते कि स्वयं को दुष्टात्माओं के रूप में प्रस्तुत करें, इसलिए उन्हें इस रूप में परिभाषित नहीं किया जा सकता। जब कोई उन मसीह-विरोधियों का अनुसरण करता है जो स्पष्ट रूप से बुरी आत्माएँ हैं, तो जैसा कि परमेश्वर का सार और स्वभाव है, उसके अनुसार क्या वह उस व्यक्ति को स्वीकार करेगा? परमेश्वर पवित्र है, और वह ईर्ष्यालु परमेश्वर है—वह उन लोगों को अस्वीकार कर देता है, जिन्होंने बुरी आत्माओं का अनुसरण किया है। भले ही ऊपर से वह व्यक्ति तुम्हें अच्छा प्रतीत होता हो, परमेश्वर उस पहलू को नहीं देख रहा। "ईर्ष्यालु" क्या होता है? यहाँ "ईर्ष्यालु" का क्या अर्थ है? यदि यह शब्द से ही स्पष्ट नहीं है, तो देखो कि क्या तुम लोग मेरी व्याख्या से समझ सकते हो। जब से परमेश्वर द्वारा किसी व्यक्ति को चुना जाता है, तब से जब तक वे यह निर्धारित नहीं कर लेते कि परमेश्वर सत्य है, कि वह धार्मिकता, बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता है, कि एकमात्र केवल वही है—जब वे यह सब समझ जाते हैं, तो वे अपने दिल की गहराई में परमेश्वर के स्वभाव और सार के साथ-साथ उसके स्वरूप की एक बुनियादी समझ हासिल कर लेते हैं। यह बुनियादी समझ तब उनका विश्वास बन जाती है, और यही उन्हें परमेश्वर का अनुसरण करने, स्वयं को परमेश्वर के लिए खपाने और अपना कर्तव्य निभाने के लिए प्रेरित करती है। यह उनका आध्यात्मिक कद है, है ना? (हाँ।) इन चीजों ने पहले ही उनके जीवन में जड़ें जमा ली हैं और वे फिर कभी परमेश्वर को नहीं नकारेंगे। लेकिन अगर उन्हें मसीह या व्यावहारिक परमेश्वर का सच्चा ज्ञान नहीं है, तो वे फिर भी किसी मसीह-विरोधी की आराधना और उसका अनुसरण कर सकते हैं। ऐसा व्यक्ति अभी भी खतरे में है। वे अभी भी किसी दुष्ट मसीह-विरोधी का अनुसरण करने के लिए देहधारी मसीह से मुँह मोड़ सकते हैं; यह खुले तौर पर मसीह को नकारना और परमेश्वर से संबंध तोड़ना होगा। इसका निहितार्थ है : "मैं अब तुम्हारे पीछे नहीं चलूँगा, बल्कि मैं शैतान का अनुसरण कर रहा हूँ। मैं शैतान से प्यार करता हूँ और उसकी सेवा करना चाहता हूँ; मैं शैतान का अनुसरण करना चाहता हूँ, और चाहे वह मेरे साथ कैसा भी व्यवहार करे, वह कैसे भी मुझे बरबाद करे, रौंदे और भ्रष्ट करे, मैं सहर्ष तैयार हूँ। तुम चाहे कितने भी धार्मिक और कितने भी पवित्र हो, मैं अब तुम्हारा अनुसरण नहीं करना चाहता। इस तथ्य के बावजूद कि तुम परमेश्वर हो, मैं तुम्हारा अनुसरण नहीं करना चाहता।" और वे ऐसे ही छोड़कर चले जाते हैं, और किसी ऐसे व्यक्ति का अनुसरण करने लगते हैं जिसका उनसे कोई लेना-देना नहीं होता, ऐसे व्यक्ति का जो परमेश्वर का शत्रु है, या जो एक बुरी आत्मा भी है। क्या परमेश्वर अब भी इस तरह के व्यक्ति को चाहेगा? क्या उसे ठुकराना परमेश्वर के लिए उचित होगा? यह बिलकुल उचित होगा। सामान्य ज्ञान से, सभी लोग जानते हैं कि परमेश्वर एक ईर्ष्यालु परमेश्वर है, कि वह पवित्र है, लेकिन क्या तुम वास्तव में इसके पीछे की वास्तविक स्थिति को समझते हो? क्या मैं यहाँ जो कह रहा हूँ, वह सही नहीं है? (है।) यदि ऐसा है, तो क्या परमेश्वर द्वारा उस व्यक्ति का त्याग करना उसकी क्रूरता माना जाएगा? परमेश्वर सिद्धांत के अनुसार कार्य करता है—अगर तुम जानते हो कि परमेश्वर कौन है लेकिन तुम उसका अनुसरण नहीं करना चाहते, और तुम जानते हो कि शैतान कौन है और तुम अभी भी उसका अनुसरण करना चाहते हो, तो मैं जोर नहीं दूँगा। मैं तुम्हें हमेशा के लिए शैतान का अनुसरण करने दूँगा और तुम्हें वापस आने के लिए नहीं कहूँगा, बल्कि मैं तुम्हें छोड़ दूँगा। परमेश्वर का यह किस प्रकार का स्वभाव है? क्या यह हठ है? क्या वह भावनाओं में बहकर काम कर रहा है या गौरवान्वित हो रहा है? यह गौरव नहीं है, न ही हठ है, बल्कि परमेश्वर की "ईर्ष्या" का हिस्सा है। अर्थात्, अगर एक सृजित प्राणी के रूप में तुम भ्रष्ट होने में प्रसन्न हो, तो परमेश्वर क्या कह सकता है? अगर तुम भ्रष्ट होना चाहते हो, तो यह तुम्हारी व्यक्तिगत पसंद है—अंततः तुम ही परिणाम भुगतोगे, और दोषी तुम खुद ही होगे। लोगों के साथ व्यवहार करने के परमेश्वर के सिद्धांत अपरिवर्तनीय हैं, इसलिए अगर तुम भ्रष्टता से खुश हो, तो तुम्हारा अपरिहार्य अंत दंडित किया जाना है। चाहे तुमने पहले कितने भी वर्षों तक परमेश्वर का अनुसरण किया हो; अगर तुम भ्रष्ट होना चाहते हो, तो परमेश्वर चुनने में तुम्हारी मदद करेगा, न ही वह तुम्हें मजबूर करेगा। तुम स्वयं शैतान का अनुसरण करने के लिए, शैतान द्वारा गुमराह और अशुद्ध किए जाने के लिए तैयार हो, और इसलिए अंत में तुम्हें परिणाम भुगतने होंगे। इसलिए इन लोगों पर कोई चीज काम नहीं करती, चाहे दूसरे लोग उनकी मदद करने की कितनी भी कोशिश करें। परमेश्वर उन्हें अब और नहीं चाहता, तो इंसान क्या कर सकता है? इसके पीछे असली वजह यही है। लेकिन लोगों को वही करना चाहिए जो उन्हें करना चाहिए, अपने दायित्व और जिम्मेदारियाँ पूरी करनी चाहिए, और जब वे ऐसा कर लेते हैं, तो अंतिम परिणाम परमेश्वर की अगुआई पर निर्भर है। मेरी विस्तृत व्याख्या से क्या तुम सभी लोगों ने इस कहावत की थोड़ी और समझ हासिल की है, "परमेश्वर एक ईर्ष्यालु परमेश्वर है"? यह इसका एक पहलू है, अर्थात् परमेश्वर उन्हें अस्वीकार कर देता है, जिन्हें बुरी आत्माओं ने दूषित कर दिया है। और परमेश्वर उन्हें अस्वीकार क्यों कर देता है? ऐसा इसलिए है, क्योंकि उन्होंने शैतान को चुना। उसके बाद परमेश्वर उन्हें कैसे चाह सकता था? क्या परमेश्वर अब भी उन पर दया कर सकता है, उन्हें प्रेरित कर सकता है ताकि वे वापस आ जाएँ? क्या परमेश्वर ऐसा कर सकता है? वह निश्चित रूप से कर सकता है, लेकिन करेगा नहीं। "ईर्ष्यालु" का यही अर्थ है।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे दुष्ट, धूर्त और कपटी हैं (II)' से उद्धृत

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