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97. परमेश्वर के उद्धार और पूर्णता को स्वीकार करने के लिए इतनी अधिक तकलीफें सहना क्यों आवश्यक है?

परमेश्वर के वचन से जवाब:

तुम परमेश्वर से प्रेम करना कैसे सीखते हो? यातना और शोधन के बिना, पीड़ादायक परीक्षाओं के बिना, और यदि परमेश्वर ने मनुष्य को अनुग्रह, प्रेम और दया ही प्रदान की होती, तो क्या तुम परमेश्वर के सच्चे प्रेम को प्राप्त कर सकत थे? एक ओर, परमेश्वर की ओर से आने वाले परीक्षाओं के दौरान मनुष्य अपनी त्रुटियों को जान पाता है, और देख लेता है कि वह महत्वहीन, घृणित, और निम्न है, और कि उसके पास कुछ नहीं है, और वह कुछ नहीं है; दूसरी ओर, अपने परीक्षाओं के दौरान परमेश्वर मनुष्य के लिए भिन्न वातावरणों की रचना करता है जो मनुष्य को परमेश्वर की मनोहरता का अनुभव करने के अधिक योग्य बनाता है। यद्यपि पीड़ा अधिक है, और कभी-कभी तो असहनीय है—और यह कुचलने वाले कष्ट तक भी पहुँच जाती है—परंतु इसका अनुभव करने के बाद मनुष्य देखता है कि उसमें परमेश्वर का कार्य कितना मनोहर है, और केवल इसी नींव पर मनुष्य में परमेश्वर के सच्चे प्रेम का जन्म होता है। आज मनुष्य देखता है कि परमेश्वर के केवल अनुग्रह, प्रेम और उसकी दया के साथ वह स्वयं को पूरी तरह से जान सकने में असमर्थ है, और वह मनुष्य के तत्व को तो जान ही नहीं सकता है। केवल परमेश्वर के शोधन और न्याय के द्वारा, केवल ऐसे शोधन के द्वारा तुम अपनी कमियों को जान सकते हो, और तुम जान सकते हो कि तुम्हारे पास कुछ भी नहीं है। अतः,मनुष्य का परमेश्वर के प्रति प्रेम परमेश्वर की ओर से आने वाले शोधन और न्याय की नींव पर आधारित होता है। शांतिमय पारिवारिक जीवन या भौतिक आशीषों के साथ, यदि तुम केवल परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद लेते हैं, तो तुमने परमेश्वर को प्राप्त नहीं किया है, और परमेश्वर में तुम्हारा विश्वास पराजित हो गया है। परमेश्वर ने शरीर में अनुग्रह के कार्य के एक चरण को पहले ही पूरा कर लिया है, और मनुष्य को भौतिक आशीषें प्रदान कर दी हैं—परंतु मनुष्य को केवल अनुग्रह, प्रेम और दया के साथ सिद्ध नहीं किया जा सकता। मनुष्य के अनुभवों में वह परमेश्वर के कुछ प्रेम का अनुभव करता है, और परमेश्वर के प्रेम और उसकी दया को देखता है, फिर भी कुछ समय तक इसका अनुभव करने के बाद वह देखता है कि परमेश्वर का अनुग्रह और उसका प्रेम और उसकी दया मनुष्य को सिद्ध बनाने में असमर्थ हैं, और उसे प्रकट करने में भी असमर्थ है जो मनुष्य में भ्रष्ट है, और न ही वे मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव से उसे आज़ाद कर सकते हैं, या उसके प्रेम और विश्वास को सिद्ध बना सकते हैं। परमेश्वर का अनुग्रह का कार्य एक अवधि का कार्य था, और मनुष्य परमेश्वर को जानने के लिए परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद उठाने पर निर्भर नहीं रह सकता।

परमेश्वर के द्वारा मनुष्य की सिद्धता किसके द्वारा पूरी होती है? उसके धर्मी स्वभाव के द्वारा। परमेश्वर के स्वभाव मुख्यतः धार्मिकता, क्रोध, भव्यता, न्याय और शाप शामिल है, और उसके द्वारा मनुष्य की सिद्धता प्राथमिक रूप से न्याय के द्वारा होती है। कुछ लोग नहीं समझते, और पूछते हैं कि क्यों परमेश्वर केवल न्याय और शाप के द्वारा ही मनुष्य को सिद्ध बना सकता है। वे कहते हैं कि यदि परमेश्वर मनुष्य को शाप दे, तो क्या वह मर नहीं जाएगा? यदि परमेश्वर मनुष्य का न्याय करे, तो क्या वह दोषी नहीं ठहरेगा? तब वह कैसे सिद्ध बनाया जा सकता है? ऐसे शब्द उन लोगों के होते हैं जो परमेश्वर के कार्य को नहीं जानते। परमेश्वर मनुष्य की अवज्ञाकारिता को शापित करता है, और वह मनुष्य के पापों को न्याय देता है। यद्यपि वह बिना किसी संवेदना के कठोरता से बोलता है, फिर भी वह उन सबको प्रकट करता है जो मनुष्य के भीतर होता है, और इन कठोर वचनों के द्वारा वह उन सब बातों को प्रकट करता है जो मूलभूत रूप से मनुष्य के भीतर होती हैं, फिर भी ऐसे न्याय के द्वारा वह मनुष्य को शरीर के सार का गहरा ज्ञान प्रदान करता है, और इस प्रकार मनुष्य परमेश्वर के समक्ष आज्ञाकारिता के प्रति समर्पित होता है। मनुष्य का शरीर पाप का है, और शैतान का है, यह अवज्ञाकारी है, और परमेश्वर की ताड़ना का पात्र है—और इसलिए, मनुष्य को स्वयं का ज्ञान प्रदान करने के लिए परमेश्वर के न्याय के वचनों का उस पर पड़ना आवश्यक है और हर प्रकार का शोधन होना आवश्यक है; केवल तभी परमेश्वर का कार्य प्रभावशाली हो सकता है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "केवल पीड़ादायक परीक्षाओं का अनुभव करने के द्वारा ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो" से

परमेश्वर का सच्चा प्रेम उसके सम्पूर्ण स्वभाव में निहित है, और जब परमेश्वर का सम्पूर्ण स्वभाव तेरे ऊपर प्रकट होता है, तो यह तेरे देह पर क्या लेकर आता है? जब परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव तुझे दिखाया जाता है, तेरा देह अनिवार्य रूप से अत्यधिक कष्ट सहेगा। यदि तू इस पीड़ा को नहीं सहेगा, तो तुझे परमेश्वर के द्वारा पूर्ण नहीं बनाया जा सकता है, न ही तू परमेश्वर को सच्चा प्रेम अर्पित कर पाएगा। यदि परमेश्वर तुझे पूर्ण बनाता है, तो वह तुझे निश्चय ही अपना सम्पूर्ण स्वभाव दिखाएगा। सृष्टि की रचना के बाद से आज तक, परमेश्वर ने अपने सम्पूर्ण स्वभाव को कभी भी नहीं दिखाया है—परन्तु अंतिम दिनों में वह इसे उस समूह के लोगों को प्रकट करता है जिन्हें उसने पूर्व निर्धारित किया है और चुना है, और मनुष्यों को पूर्ण बनाने के द्वारा वह अपने स्वभाव को खुला प्रकट करता है, जिसके माध्यम से वह एक समूह के लोगों को पूर्ण बनाता है। लोगों के लिए ऐसा है परमेश्वर का सच्चा प्रेम। उनको परमेश्वर के सच्चे प्रेम को अनुभव करने के लिए उन्हे अत्यधिक पीड़ा को सहना और एक अधिकतम मूल्य चुकाना आवश्यक है। केवल इसके बाद ही वे परमेश्वर के द्वारा प्राप्त किए जाएंगे और परमेश्वर को अपना प्रेम वापस चुका पाएँगे और केवल इस के बाद ही परमेश्वर का हृदय संतुष्ट होगा। यदि लोग परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाने की इच्छा रखते हैं और यदि वे उसकी इच्छा को पूरा करना चाहते हैं और पूरी तरह से परमेश्वर को प्रेम करने के लिए अपना हृदय दे देते हैं, तो उन्हें मृत्यु से भी भयंकर कष्ट सहने के लिए अत्यधिक कष्ट और कई परिस्थितियों की पीड़ाओं से होकर गुजरना होगा, अंततः उन्हें परमेश्वर को अपना वास्तविक हृदय देना ही पड़ेगा। कोई व्यक्ति परमेश्वर से वास्तव में प्रेम करता है या नहीं यह कठिनाई और शुद्धिकरण के समय प्रकट होता है। परमेश्वर लोगों के प्रेम को शुद्ध करता और यह केवल कठिनाई और शुद्धिकरण के मध्य ही प्राप्त किया जा सकता है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "केवल परमेश्वर को प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है" से

आज अधिकाँश लोग यह महसूस नहीं करत: वे मानते हैं कि दुःख उठाने का कोई महत्व नहीं है, वे संसार के द्वारा त्यागे जाते हैं, उनके पारिवारिक जीवन में परेशानी होती है, वे परमेश्वर के प्रिय भी नहीं होते, और उनकी अपेक्षाएँ काफी निराशापूर्ण होती हैं। कुछ लोगों के कष्ट एक विशेष बिंदु तक पहुँच जाते हैं, और उनके विचार मृत्यु की ओर मुड़ जाते हैं। यह परमेश्वर के लिए सच्चा प्रेम नहीं है; ऐसे लोग कायर होते हैं, उनमें बिलकुल धीरज नहीं होता, वे कमजोर और शक्तिहीन होते हैं! परमेश्वर उत्सुक है कि मनुष्य उससे प्रेम करे, परंतु मनुष्य जितना अधिक उससे प्रेम करता है, मनुष्य के कष्ट उतने अधिक बढ़ते हैं, और जितना अधिक मनुष्य उससे प्रेम करता है, मनुष्य के क्लेश उतने अधिक होते हैं। यदि तुम उससे प्रेम करते हो, तब हर प्रकार के कष्ट तुम पर आएँगे - और यदि तुम उससे प्रेम नहीं करते, तब शायद सब कुछ तुम्हारे लिए अच्छा चलता रहेगा, और तुम्हारे चारों ओर सब कुछ शांतिमय होगा। जब तुम परमेश्वर से प्रेम करते हो, तो तुम महसूस करोगे कि तुम्हारे चारों ओर सब कुछ दुर्गम है, और क्योंकि तुम्हारी क्षमता बहुत कम है, इसलिए तुम्हें शुद्ध किया जाएगा, और तुम परमेश्वर को संतुष्ट करने में असमर्थ हो; तुम महसूस करोगे कि परमेश्वर की इच्छा बहुत अधिक बड़ी है, कि यह मनुष्य की पहुँच से बाहर है। इन सब बातों के कारण तुम्हें शुद्ध किया जाएगा—क्योंकि तुममें बहुत निर्बलता है, और ऐसा बहुत कुछ है जो परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करने में असमर्थ है, इसलिए तुम्हें भीतर से शुद्ध किया जाएगा। फिर भी तुम्हें स्पष्टता से यह देखना आवश्यक है कि केवल शोधन के द्वारा ही शुद्धीकरण प्राप्त किया जाता है। इस प्रकार, इन अंतिम दिनों में, तुम्हें परमेश्वर के प्रति गवाही देनी है। इस बात की परवाह किए बिना कि तुम्हारे कष्ट कितने बड़े हैं, तुम्हें अपने अंत की ओर बढ़ना है, अपनी अंतिम सांस तक भी तुम्हें परमेश्वर के प्रति विश्वासयोग्य बने रहना आवश्यक है, और यह परमेश्वर की कृपा पर आधारित होना चाहिए; केवल यही वास्तव में परमेश्वर से प्रेम करना है और केवल यही मजबूत और सामर्थी गवाही है। जब तुम परीक्षा में पड़ते हो तो तुम्हेंयह कहना चाहिए: "मेरा हृदय परमेश्वर का है, और परमेश्वर ने मुझे पहले से ही प्राप्त कर लिया है। मैं तुझे संतुष्ट नहीं कर सकता—मुझे अपना सर्वस्व परमेश्वर को संतुष्ट करने में लगाना आवश्यक है।" जितना अधिक तुम परमेश्वर को संतुष्ट करते हो, उतनी अधिक परमेश्वर तुम्हें आशीष देता है, और परमेश्वर के लिए तुम्हारे प्रेम का सामर्थ्य भी उतना ही अधिक होगा; और इसके साथ-साथ तुममें विश्वास और दृढ़ -निश्चय होगा, औरतुम महसूस करोगे कि प्रेमी परमेश्वर के साथ बिताए जाने वाले जीवन से बढ़कर कीमती और महत्वपूर्ण औरकुछ नहीं है। …परमेश्वर के अधिकाँश कार्यों से यह देखा जा सकता है कि परमेश्वर सचमुच मनुष्य से प्रेम करता है, बस मनुष्य की आत्मा की आँखों का पूरी तरह से खुलना अभी बाक़ी है, और वह परमेश्वर के अधिकाँश कार्य को, और परमेश्वर की इच्छा को, और उन बहुत से कार्यों को देखने में असमर्थ है जो परमेश्वर के विषय में मनोहर हैं; मनुष्य में परमेश्वर के प्रति सच्चा प्रेम बहुत कम है। …मुश्किलों और शोधन का अनुभव करने के बाद ही मनुष्य जान पाता है कि परमेश्वर मनोहर है। आज तक इसका अनुभव करने के बाद, यह कहा जा सकता है कि मनुष्य परमेश्वर की मनोहरता के एक भाग को जान गया है - परंतु यह अभी भी पर्याप्त नहीं है, क्योंकि मनुष्य में बहुत सी घटियाँ हैं। उसे परमेश्वर के अद्भुत कार्यों का और अधिक अनुभव करना, और परमेश्वर द्वारास्थापित कष्टों के शोधन का और अधिक अनुभव करना आवश्यक है। केवल तभी मनुष्य के जीवन की स्थिति बदल सकती है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "केवल पीड़ादायक परीक्षाओं का अनुभव करने के द्वारा ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो" से

कुछ लोग यह भी सोचते हैं: हम परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, और हमें अपने भीतर आनंद महसूस करना चाहिए। अनुग्रह के युग में पवित्र आत्मा ने फिर भी लोगों को शांति और सुख दिया। अब बहुत कम शांति और सुख बचा है; अब अनुग्रह के युग के समान प्रसन्नता नहीं बची है। आज परमेश्वर में विश्वास करना बहुत परेशान करता है। तुम केवल यह जानते हो कि देह का सुख ही सब कुछ है। तुम नहीं जानते कि आज परमेश्वर क्या कर रहा है। परमेश्वर तुम लोगों की देह को पीड़ित होने देता है ताकि तुम लोगों के स्वभाव में परिवर्तन लाया जा सके। …आज दुनिया भर में हर किसी की आज़माइश की जा रही है: परमेश्वर अभी भी पीड़ित है—क्या यह सही है कि तुम लोग पीड़ा न सहो? भयानक आपदाओं के माध्यम से परिशोधन के बिना वास्तविक विश्वास उत्पन्न नहीं हो सकता, और सत्य और जीवन प्राप्त नहीं किया जा सकता। आज़माइशों और परिशोधन के बिना कुछ हासिल नहीं किया जाएगा। पतरस को अंत में सात सालों (जब वह तिरपन वर्ष का हो गया था) के लिए आज़माया गया था। उन सात सालों में वह सैकड़ों परीक्षणों से गुज़रा था, और केवल उन्हीं तीन और तीन और एक साल बाद ही उसने जीवन और अपने स्वभाव में परिवर्तन प्राप्त किया। …इस समय तुम लोग जिस पीड़ा से गुज़र रहे हो, क्या यह वही परमेश्वर की पीड़ा नहीं है? तुम परमेश्वर के साथ पीड़ा सहते हो, और परमेश्वर उनकी पीड़ा में लोगों के साथ है, है न? आज तुम सब की मसीह के क्लेश, राज्य और धैर्य में एक भूमिका है, और अंत में तुम महिमा प्राप्त करोगे। इस प्रकार का दुख सार्थक है, है न? संकल्प नहीं होने से काम नहीं चलेगा। तुम्हें आज के दुखों के महत्व को समझना होगा और समझना होगा कि तुम्हें क्यों पीड़ा सहने की आवश्यकता है। इस में थोड़ा-सा सत्य ढूंढों और थोड़ा-सा परमेश्वर के इरादे को समझो, और उसके बाद तुम्हें पीड़ा सहन करने का संकल्प मिलेगा। यदि तुम परमेश्वर के इरादे को नहीं समझते हो और केवल अपने दुखों पर चिंतन करते हो, तो जितना अधिक तुम उसके बारे में सोचोगे उतना कठिन उसे सहना हो जाएगा—यह एक परेशानी बन जाएगी—और इससे मृत्यु की पीड़ा शुरू होगी। …देहधारी परमेश्वर अभी भी पीड़ित है। तुम लोग शैतान द्वारा दूषित हो एक ऐसे स्वभाव से जो परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह करता है। तुम सबने अनजाने में परमेश्वर के विरोध में परमेश्वर की अवज्ञा की है। तुम सबके साथ न्याय किया जाना चाहिए और तुम्हें ताड़ना दी जानी चाहिए। जब एक बीमार व्यक्ति का इलाज होता है, तब वह पीड़ा से डर नहीं सकता, तो क्या यह तुम लोगों के लिए सही है, जो चाहते हो कि तुम्हारा दूषित स्वभाव बदल जाए और तुम्हें जीवन प्राप्त हो, और तुम लोग थोड़ी-सी भी पीड़ा न सहो? तुम लोगों को अपनी पीड़ाएं सहनी चाहिए; उन्हें सहना होगा। ये पीड़ाएं बेगुनाहों पर नहीं गिरती हैं, और इससे भी अधिक वे तुम पर थोपी नहीं जाती हैं।

"मसीह की बातचीतों के अभिलेख" से "मनुष्य का स्वभाव कैसे जानें" से

पिछला:परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के अतिरिक्त किसी के लिए उनकी परीक्षा और शुद्धिकरण को स्वीकार करना क्यों आवश्यक है?

अगला:एक अच्छे गंतव्य के लिए विश्वासियों को इतने अधिक नेक काम क्यों करने पड़ते हैं?

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