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8. परमेश्वर में विश्वास करनेवाले लोगों को नया जीवन पाने के लिए, प्रार्थना करना, इकट्ठा होना और परमेश्वर के वचन को पढ़ना क्यों आवश्यक है?

परमेश्वर के वचन से जवाब:

प्रार्थना एक ऐसा तरीका है जिसमें मनुष्य परमेश्वर के साथ सहयोग करता है, यह एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा मनुष्य परमेश्वर को पुकारता है, और यह ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा मनुष्य को परमेश्वर के आत्मा के द्वारा स्पर्श किया जाता है। यह कहा जा सकता है कि जो प्रार्थनारहित होते हैं वे आत्मा के बिना मृत लोग होते हैं, और यह इसका प्रमाण है कि उनमें परमेश्वर के द्वारा स्पर्श को पाने की क्षमताओं की कमी होती है। प्रार्थना के बिना वे एक सामान्य आत्मिक जीवन को प्राप्त नहीं कर सकते, वे पवित्र आत्मा के कार्य का अनुसरण करने के योग्य भी नहीं बन पाते; प्रार्थना के बिना वे परमेश्वर के साथ अपने संबंध को तोड़ देते हैं, और वे परमेश्वर के अनुमोदन को प्राप्त करने में अयोग्य हो जाते हैं। एक ऐसे व्यक्ति के रूप में जो परमेश्वर पर विश्वास करता है, जितना अधिक तुम प्रार्थना करते हो, उतना अधिक तुम परमेश्वर के द्वारा स्पर्श को प्राप्त करते हो। ऐसे व्यक्तियों के पास दृढ़ निश्चय होता है और वे परमेश्वर की ओर से नवीनतम प्रकाशन को प्राप्त करने के अधिक योग्य होते हैं; परिणामस्वरूप, इस प्रकार के लोग ही पवित्र आत्मा के द्वारा जितनी जल्दी हो सके उतनी जल्दी सिद्ध किए जा सकते हैं।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "प्रार्थना की क्रिया के विषय में" से

प्रार्थना का उद्देश्य यह है कि लोग परमेश्वर की उपस्थिति में आ सकें और उन वस्तुओं को प्राप्त कर सकें जो परमेश्वर उन्हें देना चाहता है। यदि तुम प्रायः प्रार्थना करते हो और प्रायः परमेश्वर की उपस्थिति में आते हो, तब तुम परमेश्वर के साथ एक निरन्तर सम्बन्ध रखोगे, और तुम सदैव परमेश्वर के द्वारा प्रेरित किए जाओगे, सदैव उसके प्रावधान प्राप्त करोगे; और इस प्रकार तुम रूपान्तरित कर दिए जाओगे, तुम्हारी परिस्थितियाँ निरन्तर सुधरेंगी और बदतर नहीं होंगी। विशेष रूप से जब भाई और बहनें प्रार्थना में एक साथ इकट्ठे होते हैं। जब प्रार्थना समाप्त हो जाती है, तब वहाँ एक असाधारण रूप से बड़ी मात्रा में ऊर्जा होती है, हर एक का चेहरा पसीने से भर जाता है, और वे अनुभव करते हैं कि वे बहुत सी चीज़ें प्राप्त करते हैं। वास्तव में तो, कुछ दिन एक साथ रहने के पश्चात् उन्होंने अधिक संवाद नहीं किया, यह प्रार्थना ही थी जिसने उनकी ऊर्जा को उत्तेजित किया और वे अभिलाषा करते हैं कि वे तत्काल अपने परिवारों और संसार को त्याग सकते, वे अभिलाषा करते हैं कि वे सब कुछ त्याग कर सकते हैं, परमेश्वर को छोड़कर सब कुछ। तुम देखते हो कि उनकी ऊर्जा कितनी अधिक है। पवित्र आत्मा लोगों को यह सामर्थ्य देने के लिए कार्य करता है और लोग कभी भी इसका पूरा आनन्द नहीं उठाएँगे! यदि तुम इस सामर्थ्य पर भरोसा नहीं करते हो, अपने हृदय को निष्ठुर बना लेते हो और अपनी गरदन अकड़ा लेते हो; या यदि तुम अपनी इच्छाशक्ति और महत्वाकांक्षाओं पर भरोसा करते हो, तो तुम कहाँ जा सकते हो? तुम ज्यादा दूर नहीं जा पाओगे और लड़खड़ा कर गिरने पड़ोगे, और जब तुम जाओगे तो तुम्हारे पास वह सामर्थ्य नहीं होगी। लोगों को अवश्य आरम्भ से लेकर अन्त तक परमेश्वर के साथ सम्पर्क बनाए रखना चाहिए, परन्तु जैसे-जैसे वे आगे बढ़ते हैं, वे परमेश्वर से पीछा छुड़ा लेते हैं। परमेश्वर, परमेश्वर है। लोग, लोग हैं, और वे अपने अलग-अलग रास्तों पर चलते हैं। परमेश्वर अपना वचन बोलता है और लोग अपने मार्गों पर चलते हैं। जब लोगों के पास सामर्थ्य नहीं होती है, तो कुछ सामर्थ्य उधार लेने के लिए वे परमेश्वर के पास आ कर कुछ वचन कह सकते हैं। उनके थोड़ी सामर्थ्य उधार लेने के पश्चात, वे भाग जाते हैं। कुछ समय तक भागने के पश्चात्, उनकी सामर्थ्य समाप्त हो जाती है और वे परमेश्वर के पास वापिस लौटते हैं और उससे थोड़ी और सामर्थ्य माँगते हैं। लोग इसी प्रकार के हैं और वे बहुत अधिक समय तक स्थिर नहीं रह सकते हैं। जब लोग परमेश्वर को छोड़ देते हैं, तो उनके पास कोई मार्ग नहीं होता है।

…लोग परमेश्वर का वचन नहीं पढ़ते हैं और वे आध्यात्मिक चीज़ों से संबद्ध नहीं होते हैं। उन्हें अपनी स्वयं की स्थिति के बारे में समझ ही नहीं होती है। प्रार्थना किए बिना और कलीसिया के जीवन के बिना, आध्यात्मिक जीवन की हालत को समझना असम्भव है। क्या तुम ऐसा महसूस करते हो? परमेश्वर पर विश्वास करने के लिए, इस तरह से प्रार्थना करना अनिवार्य है। बिना प्रार्थना किए, तुम परमेश्वर पर विश्वास की सदृशता प्राप्त नहीं कर सकते हो।

"मसीह की बातचीतों के अभिलेख" से "प्रार्थना का महत्व और अभ्यास" से

यद्यपि मैंने संभवतः अपने वचन बोलना पूरा कर लिया हो, लोग फिर भी पूरी तरह से समझ नहीं पाते, और यह इसलिए है क्योंकि उनमें गुणवत्ता की कमी है। इस समस्या को कलीसिया के जीवन के माध्यम से और एक दूसरे के साथ सहभागिता के माध्यम से हल किया जा सकता है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "अभ्यास (1)" से

यह जानकर कि परमेश्वर सदैव बातचीत करता है, कुछ लोग उसके वचनों से थक जाते हैं, और वे सोचते हैं कि परमेश्वर के वचन को पढ़ने या न पढ़ने का कोई परिणाम नहीं होता। यह सामान्य दशा नहीं है। उनके हृदय वास्तविकता में प्रवेश करने की इच्छा नहीं करते, और ऐसे लोगों में पूर्ण बनाए जाने की भूख-प्यास नहीं होती और न ही वे इसे महत्वपूर्ण मानते हैं। जब भी तुम्हें लगता है कि तुम में परमेश्वर के वचन की भूख-प्यास नहीं है, तो यह संकेत है कि तुम्हारी दशा सामान्य नहीं है। …इसलिये स्थिति चाहे जो भी हो, तुम्हें परमेश्वर के वचन को खाना और पीना चाहिये, तुम चाहे व्यस्त हो, या न हो, परिस्थितियां विपरीत हो या न हो, और चाहे तुम परखे जा रहे हो या नहीं परखे जा रहे हो। कुल मिलाकर परमेश्वर का वचन मनुष्य के अस्तित्व का आधार है। कोई भी उसके वचन से विमुख नहीं हो सकता, और उसके वचन को ऐसे खाना होगा मानों वे दिन के तीन बार के भोजन हों। क्या परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाया जाना और प्राप्त किया जाना इतना आसान हो सकता है? अभी तुम इसे समझो या न समझो, तुम्हारे भीतर परमेश्वर के कार्य को समझने की अंर्तदृष्टि हो या न हो, तुम्हें परमेश्वर के वचन को अधिक से अधिक खाना और पीना चाहिये। यह तत्परता और क्रियाशीलता के साथ प्रवेश करना है। परमेश्वर के वचन को पढ़ने के बाद, जिसमे प्रवेश कर सको उस पर अमल करने की तत्परता दिखाओ, तुम जो नहीं कर सकते, उसे कुछ समय के लिये दरकिनार रखो। …वे सब जो परमेश्वर के वचन को महत्व नहीं देते, और उसके प्रति सदैव एक अलग तरह का दृष्टिकोण रखते हैं, लापरवाही का, और यह विश्वास करते हैं कि वे वचन को पढ़ें या न पढ़ें कुछ फर्क नहीं पड़ता, वे हैं जो वास्तविकता नहीं जानते। उन व्यक्तियों में न तो पवित्र आत्मा का कार्य और न ही उसके द्वारा की गई रोशनी दिखाई देती है। ऐसे व्यक्ति बस साथ-साथ चलते हैं, और वे बिना उचित योग्यताओं के मात्र दिखावा करने वाले लोग हैं, जैसे कि एक दृष्टांत में नैनगुओ थे।[क]

…क्योंकि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो, तुम्हें उसके वचन को खाना-पीना चाहिये, उसका अनुभव करना चाहिये, और उसे जीना चाहिये। केवल यही परमेश्वर पर विश्वास करना है! यदि तुम कहते हो कि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो, परंतु उसके किसी वचन को बोल नहीं सकते, या उन पर अमल नहीं कर सकते, तो यह नहीं माना जा सकता कि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो। ऐसा करना भूख शांत करने के लिये रोटी की खोज करने जैसा है। केवल छोटी-छोटी बातों की गवाही, अनुपयोगी मसले, और सतही मुद्दों के बारे में बातें करना, और उनमें लेशमात्र भी वास्तविकता न होना, परमेश्वर पर विश्वास नहीं है। उसी तरह, तुमने परमेश्वर पर विश्वास करने के सही तरीके को नहीं समझा है। तुम्हें परमेश्वर के वचनों को क्यों अधिक खाना-पीना चाहिये? क्या यह विश्वास माना जायेगा यदि तुम परमेश्वर के वचनों को खाते पीते नहीं, और केवल स्वर्ग पर उठाये जाने की खोज में हो? परमेश्वर पर विश्वास करने वाले का पहला कदम क्या है? परमेश्वर किस मार्ग से मनुष्यों को पूर्ण बनाता है? क्या परमेश्वर के वचन को बिना खाए-पीए तुम पूर्ण बनाए जा सकते हो? क्या परमेश्वर के वचन को बिना अपनी वास्तविकता बनाये, तुम परमेश्वर के राज्य के व्यक्ति माने जा सकते हो? परमेश्वर पर विश्वास करना वास्तव में क्या है? परमेश्वर पर विश्वास करने वालों का कम से कम बाहरी तौर पर आचरण अच्छा होना चाहिये, और सबसे महत्वपूर्ण बात परमेश्वर का वचन रखना है। तब चाहे कुछ भी हो तुम उसके वचन से भी दूर नहीं जा सकते। परमेश्वर के प्रति तुम्हारा ज्ञान और उसकी इच्छा को पूरा करना, सब उसके वचन के द्वारा हासिल किया जाता है। सभी देश, भाग, कलीसियायें, और प्रदेश भी भविष्य में वचन के द्वारा जीते जायेंगे। परमेश्वर सीधे बात करेगा, और सभी लोग अपने हाथों में परमेश्वर का वचन थामकर रखेंगे; इसके द्वारा लोग पूर्ण बनाए जाएंगे। परमेश्वर का वचन सब तरफ फैलता जायेगा: लोगों का परमेश्वर के वचन को बोलना, और परमेश्वर के वचन के अनुसार आचरण करना, जब हृदय में भीतर रखा जाए तब भी परमेश्वर का वचन है। भीतर और बाहर दोनों तरफ वे परमेश्वर के वचन से भरे हैं और इस प्रकार वे पूर्ण बनाए जाते हैं। परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने वाले और वे जो उसकी गवाही देते हैं, वे हैं जिन्होंने परमेश्वर के वचन को वास्तविकता बनाया है।

वचन के युग अर्थात् सहस्राब्दिक राज्य के युग में प्रवेश करना वह कार्य है जो अभी पूरा किया जा रहा है। अब से वचन की सहभागिता करने का अभ्यास करो। केवल परमेश्वर के वचन को खाने-पीने और अनुभव करने से तुम परमेश्वर के वचन को प्रदर्शित कर सकते हो। केवल तुम्हारे अनुभव के वचनों के द्वारा दूसरे लोग तुम्हारे कायल हो सकते हैं। यदि तुम्हारे पास परमेश्वर का वचन नहीं है तो कोई भी कायल नहीं होगा! परमेश्वर द्वारा उपयोग किये जाने वाले सब लोग परमेश्वर का वचन बोलने में सक्षम होते हैं। यदि तुम परमेश्वर का वचन नहीं बोल सकते, यह दर्शाता है पवित्र आत्मा ने तुममें काम नहीं किया है और तुम पूर्ण नहीं बनाए गये हो। यह परमेश्वर के वचन का महत्व है। क्या तुम्हारे पास ऐसा हृदय है जो परमेश्वर के वचन की भूख-प्यास रखता है? वे जो परमेश्वर के वचन के प्यासे हैं, वे सत्य के लिये प्यासे हैं, और केवल ऐेसे ही लोग परमेश्वर के द्वारा अशीषित हैं। भविष्य में, परमेश्वर सभी पंथों और संप्रदायों से बहुत सी अन्य बातें भी कहेगा। वह सबसे पहले तुम लोगों के बीच बोलता और अपनी वाणी सुनाता है और तुम्हें पूरा करता है और उसके बाद अन्य बुतपरस्तों से बातें करेगा, उन तक अपनी वाणी पहुँचाएगा और उन्हें जीतेगा। वचन के द्वारा सभी लोग ईमानदारी से और पूरी तरह से कायल किये जायेंगे। परमेश्वर के वचन के द्वारा और उसके प्रकाशनों के द्वारा मनुष्य का भ्रष्ट स्वभाव कम प्रभावी हुआ है। सभी में मनुष्यों का स्वरूप है और मनुष्य का विद्रोही स्वभाव बहुत कम हो गया है। वचन मनुष्यों में अधिकार के साथ काम करता है, और परमेश्वर की ज्योति में मनुष्यों को जीतता है। परमेश्वर वर्तमान युग में जो कार्य करेगा, और उसके कार्य का निर्णायक मोड़ सभी कुछ परमेश्वर के वचन के भीतर मिल सकता है। यदि तुम उसके वचन को नहीं पढ़ते, तो तुम कुछ नहीं समझोगे। उसके वचन को खाने-पीने के द्वारा, भाइयों और बहनों के साथ सहभागिता करके, और तुम्हारे वास्तविक अनुभव के द्वारा परमेश्वर के वचन का तुम्हारा ज्ञान व्यापक हो जाएगा। केवल इसी प्रकार से तुम सचमुच वास्तविक जीवन में उसे जी सकते हो।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "राज्य का युग वचन का युग है" से

वह सत्य जिसे मनुष्य को धारण करने की आवश्यकता है उसे परमेश्वर के वचन में पाया जाता है, यह एक सत्य है जो मानवजाति के लिए सबसे अधिक लाभदायक और सहायक है। यह वह शक्तिवर्धक पेय और भरण-पोषण है जिसकी जरूरत तुम लोगों के शरीर को है। कुछ ऐसा जो तुम्हारे सामान्य मानवता को बहाल करने में सहायता करता है। अर्थात् एक सत्य जिससे तुम लोगों को सुसज्जित किया जाना चाहिए। तुम लोग परमेश्वर के वचन का जितना अधिक अभ्यास करते हो, उतनी ही जल्दी तुम लोगों का जीवन फूल की तरह खिलेगा; तुम लोग परमेश्वर के वचन का जितना अधिक अभ्यास करते हो, सत्य उतना ही अधिक स्पष्ट हो जाता है। जैसे जैसे तुम्हारी उच्चता बढ़ती है, तुम लोग आध्यात्मिक संसार की चीज़ों को और भी अधिक साफ साफ देखोगे, और तुम लोग शैतान के ऊपर विजय पाने के लिए और भी अधिक शक्तिशाली होगे। …इसलिए, तू सत्य के साथ हर जगह जा सकता है, किन्तु यदि तुम्हारे अंदर कोई सत्य नहीं है, तो धार्मिक लोगों को विश्वास दिलाने के विषय में सोचो भी नहीं, अपने परिवार को तो बिल्कुल भी नहीं। तू सत्य के बिना लुढ़कते बर्फ के समान होगा। किन्तु सत्य के साथ, तू प्रसन्न और स्वतंत्र होगा, जहाँ कोई तुझ पर आक्रमण नहीं कर सकता है। भले ही कोई सिद्धांत कितना भी मजबूत हो, यह सत्य पर विजय नहीं पा सकता है। सत्य के साथ, स्वयं संसार को डगमगाया जा सकता है तथा पर्वत और समुद्र खिसकाए जा सकते हैं, जबकि सत्य की कमी कीड़े-मकौडों के द्वारा की गई तबाही की ओर ले जाते हैं; यह मात्र तथ्य है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "सत्य को समझ लेने के बाद उसका अभ्यास करो" से

फुटनोट:

क. मूल पाठ में "दृष्टांत में" नहीं है।

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अगला:चूंकि परमेश्वर मानवजाति से प्रेम करते हैं, तो वे उन्हें नकारने और उनका विरोध करनेवाले सभी बुरे लोगों का विनाश करने के लिए तबाही क्यों करते हैं?