71. देहधारी रूप में प्रकट होने में, परमेश्वर एक महाकाय या रोबदार रूप में प्रकट क्यों नहीं हुए?

परमेश्वर के वचन से जवाब:

वह मात्र शरीर में काम कर रहा है, जानबूझ कर मनुष्य से यह नहीं कह रहा है कि वे उसकी देह की महानता या पवित्रता को बड़ा ठहराएँ। वह मात्र मनुष्यों को अपने कार्य की बुद्धिमत्ता और वह समस्त अधिकार दिखा रहा है जिसे वह उपयोग करता है। इसलिए, भले ही उसके पास उत्कृष्ट मानवता है, फिर भी वह कोई घोषणा नहीं करता है, और केवल उस कार्य पर ध्यान केन्द्रित करता है जो उसे करना चाहिए। तुम लोगों को जानना चाहिए कि ऐसा क्यों है कि परमेश्वर देह बनता है फिर भी उसकी शेखी नहीं बघारता है या अपनी सामान्य मानवता के प्रति गवाही नहीं देता है, और इसके बजाय मात्र उस कार्य को सम्पन्न करता है जिसे करने की उसकी इच्छा है। यही कारण है कि तुम लोग परमेश्वर देह बनता है में केवल दिव्यता के अस्तित्व को देखते हो, मात्र इसलिए क्योंकि वह मनुष्य के लिए स्पर्धा करने हेतु कभी भी मानवता के अपने अस्तित्व की घोषणा नहीं करता है। …परमेश्वर केवल अपने कार्य के माध्यम से ही मनुष्य पर विजय पाता है (अर्थात्, मनुष्य के लिए अप्राप्य कार्य)। वह मनुष्य को प्रभावित नहीं करता है या पूरी मानवजाति से अपनी "आराधना" नहीं करवाता है, किन्तु मात्र मनुष्य में आदर की भावना डालता है या मनुष्य को अपनी अभेद्यता से अवगत कराता है। मनुष्य को प्रभावित करने की परमेश्वर को कोई आवश्यकता नहीं है। वह तुम लोगों से बस इतना चाहता है कि जब एक बार तुम लोगों ने उसके स्वभाव को देख लिया है तो उसका आदर करो।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "देहधारण का रहस्य (2)" से

उन सभी को प्रकट करने के लिए मेरा देहधारण हुआ है जो मुझसे जन्मे तो थे लेकिन मेरा अनादर करने के लिए उठ गए हैं। यदि मैं देह नहीं बनता, तो उन्हें प्रकट करने का कोई तरीका नहीं होता (जिसका अर्थ है कि वे लोग जो मेरे सामने एक तरह से क्रिया करते हैं और मेरी पीठ पीछे दूसरी तरह से)। यदि मैं एक पवित्रात्मा के रूप में बना रहता, तो लोग अपनी धारणाओं में मेरी आराधना करते, और सोचते कि मैं एक निराकार और अगम्य परमेश्वर हूँ। आज लोगों की धारणाओं (मेरी ऊँचाई और मेरे प्रकटन के सम्बन्ध में) के विपरीत, बहुत लंबा नहीं होते हुए, मैंने एक साधारण व्यक्ति के समान मैंनेदेहधारण किया है। यही स्थिति शैतान को सर्वाधिक अपमानित करती है और लोगों की धारणाओं (शैतान की ईशनिन्दा) का सबसे शक्तिशाली प्रत्युत्तर है। यदि मेरा प्रकटन हर किसी से भिन्न होता तो यह परेशानी उत्पन्न करता—सभी मेरी आराधना करने आते और अपनी धारणाओं के माध्यम से मुझे समझते, और वे मेरे लिए उस सुंदर गवाही को देने में समर्थ नहीं होते। इसलिए मैंने स्वयं उस छवि को लिया जो आज मेरी है, और इसे समझना बिल्कुल भी मुश्किल नहीं है। सभी को अपनी धारणाओं से बाहर आना चाहिए और शैतान के कुटिल षड़यंत्रों से धोखा नहीं खाना चाहिए।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "इक्यानवेवाँ कथन" से

यद्यपि पृथ्वी पर मसीह परमेश्वर स्वयं के स्थान पर कार्य करने में समर्थ है, किन्तु वह सब लोगों को देह में अपनी छवि दिखाने के आशय से नहीं आता है। वह सब लोगों को स्वयं का दर्शन कराने नहीं आता है; वह मनुष्य को अनुमति देने आता है कि वह उसका हाथ पकड़कर उसकी अगुवाई में चलें, इस प्रकार नवीन युग में प्रवेश करें। मसीह के देह का कार्य स्वयं परमेश्वर के कार्य, अर्थात्, देह में परमेश्वर के कार्य के लिए है, और मनुष्य को समर्थ करने के लिए नहीं है कि वह उसकी देह के सार को पूर्णतः समझे। चाहे वह जैसे भी कार्य करे, वह उससे अधिक नहीं करता है जो देह के लिए प्राप्य से अधिक हो। चाहे वह जैसे भी कार्य करे, वह ऐसा देह में होकर सामान्य मानवता के साथ करता है, तथा वह मनुष्य पर परमेश्वर की वास्तविक मुखाकृति को प्रकट नहीं करता है। इसके अतिरिक्त, देह में उसका कार्य इतना अलौकिक या अपरिमेय नहीं है जैसा कि मनुष्य समझता है। …परमेश्वर केवल देह का कार्य पूर्ण करने के लिये देहधारी होता है, मात्र सब मनुष्यों को उसे देखने देने की अनुमति देने के लिए नहीं। बल्कि, वह अपने कार्य से अपनी पहचान की पुष्टि होने देता है, तथा जो वह प्रकट करता है उसे अपने सार को प्रमाणित करने की अनुमति देता है। …

…यद्यपि उसकी छवि ज्ञानेन्द्रियों के लिए सुखद नहीं है, उसके प्रवचन असाधारण हाव-भाव से सम्पन्न नहीं है, तथा उसका कार्य धरती या आकाश को थर्रा देने वाला नहीं है जैसा कि मनुष्य कल्पना करता है, तब भी वह वास्तव में मसीह है, जो सच्चे हृदय से स्वर्गिक परमपिता की इच्छा पूरी करता है, पूर्णतः स्वर्गिक परमपिता के प्रति समर्पण करता है, तथा मृत्यु तक आज्ञाकारी बना रहता है। यह इस कारण है क्योंकि उसका सार मसीह का सार है। मनुष्य के लिए इस सत्य पर विश्वास करना कठिन है किन्तु वास्तव में इसका अस्तित्व है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "स्वर्गिक परमपिता की इच्छा के प्रति आज्ञाकारिता ही मसीह का वास्तविक सार है" से

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