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96. परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के अतिरिक्त किसी के लिए उनकी परीक्षा और शुद्धिकरण को स्वीकार करना क्यों आवश्यक है?

संदर्भ के लिए बाइबल के पद:

"उसने कहा, हे दानिय्येल, चला जा; क्योंकि ये बातें अन्तसमय के लिये बन्द हैं और इन पर मुहर दी हुई है। बहुत से लोग तो अपने अपने को निर्मल और उजले करेंगे, और स्वच्छ हो जाएँगे; परन्तु दुष्‍ट लोग दुष्‍टता ही करते रहेंगे; और दुष्‍टों में से कोई ये बातें न समझेगा; परन्तु जो बुद्धिमान हैं वे ही समझेंगे" (दानिय्येल 12:9-10)।

"यहोवा की यह भी वाणी है, कि इस देश के सारे निवासियों की दो तिहाई मार डाली जाएगी, और बची हुई तिहाई उस में बनी रहेगी। उस तिहाई को मैं आग में डालकर ऐसा निर्मल करूँगा, जैसा रूपा निर्मल किया जाता है, और ऐसा जाँचूँगा जैसा सोना जाँचा जाता है" (जकर्याह 13:8-9)।

परमेश्वर के वचन से जवाब:

मनुष्य की दशा और परमेश्वर के प्रति मनुष्य के व्यवहार को देखने पर परमेश्वर ने नया कार्य किया है, उसने मनुष्य को अनुमति दी है कि वह उसके विषय में ज्ञान और उसके प्रति आज्ञाकारिता रखे, और प्रेम और गवाही दोनों रखे। इस प्रकार, मनुष्य को परमेश्वर के शोधन, और साथ ही उसके दंड, उसके व्यवहार और काँट-छाँट का अनुभव करना चाहिए, जिसके बिना मनुष्य कभी परमेश्वर को नहीं जानेगा, और कभी सच्चाई के साथ परमेश्वर से प्रेम करने और उसकी गवाही देने में समर्थ नहीं होगा। परमेश्वर द्वारा मनुष्य का शोधन केवल एकतरफा प्रभाव के लिए नहीं होता, बल्कि बहुतरफा प्रभाव के लिए होता है। केवल इसी रीति से परमेश्वर उनमें शोधन का कार्य करता है जो सत्य को खोजने के लिए तैयार रहते हैं, ताकि मनुष्य का दृढ़ निश्चय और प्रेम परमेश्वर के द्वारा सिद्ध किया जाए। जो सत्य को खोजने के लिए तैयार रहते हैं, और जो परमेश्वर की लालसा करते हैं, उनके लिए ऐसे शोधन से अधिक अर्थपूर्ण, या अधिक सहयोगपूर्ण कुछ नहीं हैं। परमेश्वर का स्वभाव मनुष्य के द्वारा सरलता से जाना या समझा नहीं जाता, क्योंकि परमेश्वर आखिरकार परमेश्वर है। अंततः, परमेश्वर के लिए मनुष्य जैसे स्वभाव को रखना असंभव है, और इस प्रकार मनुष्य के लिए परमेश्वर के स्वभाव को जानना सरल नहीं है। मनुष्य के द्वारा सहजता से सत्य को प्राप्त नहीं किया जाता, और यह सरलता से उनके द्वारा समझा नहीं जाता जो शैतान के द्वारा भ्रष्ट किए गए हैं; मनुष्य सत्य से रहित है, और सत्य को अभ्यास में लाने के दृढ़ निश्चय से रहित है, और यदि वह दुःख नहीं उठाता, और उसका शोधन नहीं किया जाता या उसे दंड नहीं दिया जाता, तो उसका दृढ़ निश्चय कभी सिद्ध नहीं किया जाएगा। सब लोगों के लिए शोधन कष्टदायी होता है, और स्वीकार करने के लिए बहुत कठिन होता है—परंतु फिर भी, परमेश्वर शोधन के समय में ही मनुष्य के समक्ष अपने धर्मी स्वभाव को स्पष्ट करता है, और मनुष्य के लिए अपनी मांगों को सार्वजनिक करता है, तथा और अधिक प्रबुद्धता प्रदान करता है, और इसके साथ-साथ और अधिक वास्तविक कांट-छांट और व्यवहार को भी; तथ्यों और सत्यों के बीच की तुलना के द्वारा वह स्वयं के बारे में और सत्य के बारे में मनुष्य को और अधिक ज्ञान प्रदान करता है, और मनुष्य को परमेश्वर की इच्छा के विषय में अधिक समझ प्रदान करता है, और इस प्रकार मनुष्य को परमेश्वर के सच्चे और शुद्ध प्रेम को प्राप्त करने की अनुमति देता है। शोधन का कार्य करने में परमेश्वर के लक्ष्य ये हैं। वह सारा कार्य जो परमेश्वर मनुष्य में करता है, उसके अपने लक्ष्य और उसका अपना महत्व होता है; परमेश्वर व्यर्थ कार्य नहीं करता है, और न ही वह ऐसा कार्य करता है जो मनुष्य के लिए लाभदायक न हो। शोधन का अर्थ परमेश्वर के सामने से लोगों को हटा देना नहीं है, और न ही इसका अर्थ उन्हें नरक में डालकर नाश कर देना है। इसका अर्थ शोधन के दौरान मनुष्य के स्वभाव को बदलना है, उसकी प्रेरणाओं, उसके पुराने दृष्टिकोणों को बदलना है, परमेश्वर के प्रति उसके प्रेम को बदलना है, और उसके पूरे जीवन को बदलना है। शोधन मनुष्य की वास्तविक परख है, और एक वास्तविक प्रशिक्षण का रूप है, और केवल शोधन के दौरान ही उसका प्रेम उसके अंतर्निहित कार्य को पूरा कर सकता है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "केवल शोधन का अनुभव करने के द्वारा ही मनुष्य सच्चाई के साथ परमेश्वर से प्रेम कर सकता है" से

भविष्य में आशीर्वाद प्राप्त करने के उद्देश्य से ही लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं। सभी लोगों की यही अभिलाषा और आशा है। तथापि, मानव प्रकृति के भीतर भ्रष्टाचार का हल परीक्षण के माध्यम से किया जाना चाहिए। जिन-जिन पहलुओं में आप उत्तीर्ण नहीं होते हैं, इन पहलुओं में आपको परिष्कृत किया जाना चाहिए—यह परमेश्वर की व्यवस्था है। परमेश्वर आपके लिए एक वातावरण बनाते है, जिससे आप अपने खुद के भ्रष्टाचार को जानने के लिए, परिष्कृत होने के लिए बाध्य हों। अंततः आप उस बिंदु पर पहुंच जाते हैं जहां आप मर जाना और अपनी योजनाओं और इच्छाओं को छोड़ देना और परमेश्वर की सार्वभौमिकता और व्यवस्था के प्रति समर्पण करना अधिक पसंद करेंगे।

इसलिए यदि लोगों में कई वर्षों का शुद्धिकरण नहीं है, यदि उनके पास कुछ मात्रा में पीड़ा नहीं है, तो वे, देह के भ्रष्टाचार के बंधन से बचने के लिए उनकी सोच में और उनके दिल में, सक्षम नहीं होंगे। जिन पहलुओं में आप अभी भी शैतान के बंधन के अधीन हैं, जिन पहलुओं में आप अभी भी आपकी अपनी इच्छाएं रखते हैं, आपकी अपनी मांगें हैं—उन पहलुओं में ही आपको कष्ट उठाना होगा। केवल दुख में ही सबक सीखा जा सकता है, जिसका मतलब है कि सच्चाई प्राप्त करने में और परमेश्वर का इरादा समझने में सक्षम होना। वास्तव में, कई सच्चाइयों को दर्दनाक परीक्षणों के अनुभव के भीतर समझा जाता है। कोई भी नहीं कहता है कि परमेश्वर की इच्छा ज्ञात है, कि उनकी सर्वसमर्थता और उनका ज्ञान समझ लिए गए हैं, कि परमेश्वर के न्यायपरायण स्वभाव की सराहना आसानी के, या अनुकूल परिस्थितियों के, परिवेश में की जाती है। यह असंभव होगा!

"मसीह की बातचीतों के अभिलेख" से "कसौटियों के बीच परमेश्वर को कैसे संतुष्ट करें" से

परमेश्वर के द्वारा शोधन जितना बड़ा होता है, लोगों के हृदय उतने अधिक परमेश्वर से प्रेम करने के योग्य हो जाते हैं। उनके हृदयों की यातना उनके जीवनों के लिए लाभदायक होती है, वे परमेश्वर के समक्ष अधिक शांत रह सकते हैं, परमेश्वर के साथ उनका संबंध और अधिक निकटता का हो जाता है, और वे परमेश्वर के सर्वोच्च प्रेम और उसके सर्वोच्च उद्धार को और अच्छी तरह से देख पाते हैं। पतरस ने सैंकड़ों बार शोधन का अनुभव किया, और अय्यूब कई परीक्षाओं से गुजरा। यदि तुम लोग परमेश्वर के द्वारा सिद्ध किया जाना चाहते हो, तो तुम लोगों को भी सैंकड़ों बार शोधन से होकर गुजरना होगा; केवल इस प्रक्रिया से होकर जाने और इस कदम पर निर्भर रहने के द्वारा ही तुम लोग परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट कर पाओगे और परमेश्वर के द्वारा सिद्ध किए जाओगे। शोधन वह सर्वोत्तम माध्यम है जिसके द्वारा परमेश्वर लोगों को सिद्ध बनाता है, केवल शोधन और कड़वी परीक्षाएँ ही लोगों के हृदयों में परमेश्वर के लिए सच्चे प्रेम को उत्पन्न सकती हैं। कठिनाइयों के बिना, लोगों में परमेश्वर के लिए सच्चे प्रेम की कमी रहती है; यदि भीतर से उनको परखा नहीं जाता, और यदि वे सच्चाई के साथ शोधन के अधीन नहीं होते, तो उनके हृदय बाहरी संसार में भटकते रहेंगे। एक निश्चित बिंदु तक शोधन किए जाने के बाद तुम अपनी स्वयं की निर्बलताओं और कठिनाइयों को देखोगे, तुम देखोगे कि तुममें कितनी घटी है और कि तुम उन बहुत सी समस्याओं पर विजय पाने में असमर्थ हो जिनका तुम सामना करते हो, और तुम देखोगे कि तुम्हारी अवज्ञाकारिता कितनी बड़ी है। केवल परीक्षाओं के द्वारा ही लोग अपनी सच्ची अवस्थाओं को सचमुच देख पाएँगे, और परीक्षाएँ लोगों को सिद्ध किए जाने के लिए अधिक योग्य बनाती हैं।

अपने जीवनकाल में, पतरस ने सैंकड़ों बार शोधन का अनुभव किया और बहुत सी पीड़ादायक परीक्षाओं से होकर गुजरा। यह शोधन परमेश्वर के लिए उसके सर्वोच्च प्रेम की नींव बन गया, और उसके संपूर्ण जीवन का एक महत्वपूर्ण अनुभव बन गया। यह तथ्य कि वह परमेश्वर के लिए सर्वोच्च प्रेम को रख पाया, एक तरह से, परमेश्वर से प्रेम करने के उसके दृढ़ निश्चय के कारण था; परंतु इससे भी अधिक महत्वपूर्ण रूप में, यह उस शोधन और दुःख के कारण था जिसमें से वह होकर गुजरा। यह दुःख परमेश्वर से प्रेम करने के मार्ग पर उसका मार्गदर्शक बन गया, और ऐसी बात बन गया जो उसके लिए सबसे अधिक यादगार थी। यदि लोग परमेश्वर से प्रेम करते हुए शोधन की पीड़ा से नहीं गुजरते तो उनका प्रेम स्वाभाविकता और उनकी प्राथमिकताओं से भरा हुआ होता है; इस प्रकार का प्रेम शैतान के विचारों से भरा होता है, और परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करने में असमर्थ होता है। परमेश्वर से प्रेम करने का दृढ़ निश्चय रखना, सच्चाई के साथ परमेश्वर से प्रेम करने के समान नहीं है। यद्यपि अपने हृदयों में जो कुछ वे सोचते हैं, वह परमेश्वर से प्रेम करने और परमेश्वर को संतुष्ट करने की खातिर ही होता है, मानो उनके विचार मानवीय विचारों से रहित हों, मानो वे सब परमेश्वर की खातिर हों, परंतु जब उनके विचारों को परमेश्वर के सामने लाया जाता है तो उन विचारों की परमेश्वर के द्वारा प्रशंसा या आशीष नहीं मिलती। जब लोग सारे सत्यों को पूरी तरह से समझ लेते हैं—जब वे सब कुछ जान जाते हैं—तब भी इसे परमेश्वर से प्रेम करने के चिह्न के रूप में नहीं माना जा सकता, यह नहीं कहा जा सकता कि ये लोग वास्तव में परमेश्वर से प्रेम करते हैं। शोधन में से होकर गुजरे बिना बहुत से सत्यों को समझ लेने के बावजूद भी लोग इन सत्यों को अभ्यास में लाने में असमर्थ होते हैं; केवल शोधन के दौरान ही लोग इन सत्यों के वास्तविक अर्थ को समझ सकते हैं, केवल तभी लोग ईमानदारी के साथ अपने आंतरिक अर्थ की सराहना कर सकते हैं। उस समय, जब वे पुनः प्रयास करते हैं, तब वे उचित रीति से और परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप सत्यों को अभ्यास में ला सकते हैं; उस समय उनके मानवीय विचार कम हो जाते हैं, उनकी मानवीय स्वाभाविकता घट जाती है, और उनकी मानवीय संवेदनाएँ कम हो जाती हैं; केवल उसी समय उनका अभ्यास परमेश्वर के प्रेम का सच्चा प्रकटीकरण होता है। परमेश्वर के प्रेम के सत्य के प्रभाव को मौखिक ज्ञान या मानसिक तैयारी के साथ हासिल नहीं किया जा सकता, और न ही इसे केवल समझे जाने के द्वारा हासिल किया जा सकता है। इसमें यह जरुरी होता है कि लोग एक मूल्य अदा करें, और कि वे शोधन के दौरान काफी कड़वाहट से होकर गुजरें, केवल तभी उनका प्रेम शुद्ध होगा और परमेश्वर के हृदय के अनुसार होगा।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "केवल शोधन का अनुभव करने के द्वारा ही मनुष्य सच्चाई के साथ परमेश्वर से प्रेम कर सकता है" से

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