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42. परमेश्वर किन लोगों को बचाता है? वह किन लोगों को हटा देता है?

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

जो शैतान से संबंधित होते हैं वे परमेश्वर के वचनों को नहीं समझते हैं और जो परमेश्वर से संबंधित होते हैं वे परमेश्वर की आवाज़ को सुन सकते हैं। वे सभी लोग जो मेरे द्वारा बोले गए वचनों को महसूस करते और समझते हैं ऐसे लोग हैं जो बचाए जाएँगे, और परमेश्वर की गवाही देंगे; वे सभी लोग जो मेरे द्वारा बोले गए वचनों को नहीं समझते हैं परमेश्वर की गवाही नहीं दे सकते हैं, और ऐसे लोग हैं जो निकाल दिए जाएँगे।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है" से

परमेश्वर उन्हें बचाता है जो जीवित हो सकते हैं, जो परमेश्वर के उद्धार को देख सकते हैं, जो परमेश्वर के प्रति निष्ठावान हैं और जो परमेश्वर को खोजने के इच्छुक हैं। परमेश्वर उन्हें बचाता है जो परमेश्वर के अवतरण में विश्वास करते हैं और उसके प्रकटन में विश्वास करते हैं। कुछ लोग जीवित हो जाते हैं, कुछ नहीं; यह इस बात पर निर्भर करता है कि उनका स्वभाव बचाया जा सकता है या नहीं। बहुत से लोगों ने परमेश्वर के वचनों को सुना है परंतु उसकी इच्छा को नहीं समझते, उन्होंने परमेश्वर के बहुत से वचनों को सुना परंतु तब भी उन्हें अपने आचरण में नहीं लाए पाए। वे किसी भी सत्य को जीने में असमर्थ हैं और जानबूझकर परमेश्वर के कार्यों में हस्तक्षेप करते हैं। वे परमेश्वर के लिए कोई भी कार्य नहीं कर सकते, वे उसे कुछ भी अर्पण नहीं कर सकते, और वे गुप्त रूप से कलीसिया के पैसे खर्च करते और बिना दाम दिए परमेश्वर के घर में खाते हैं। ये लोग मरे हुए हैं, और बचाए नहीं जाएंगे। परमेश्वर उन सब को बचाता है, जो उसके लिए कार्यरत हैं। परंतु उनमें से कुछ हैं जो परमेश्वर के उद्धार को ग्रहण नहीं कर सकते, केवल कुछ ही उसके उद्धार को प्राप्त कर सकते हैं, क्योंकि बहुत से लोग बिल्कुल मरे हुए हैं, वे इतने मरे हुए हैं कि उनका उद्धार नहीं हो सकता, वे पूर्णतः शैतान द्वारा शोषित हैं, और स्वभाव में बहुत दुष्ट हैं।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "क्या आप जाग उठे हैं?" से

परमेश्वर ने सदैव उन्हें पूर्ण बनाया है जो उसकी सेवा करते हैं। वह उन्हें अकारण ही बहिष्कृत नहीं करता है। यदि तुम परमेश्वर के वचन के न्याय और ताड़ना को सच में स्वीकार करते हो, यदि तुम अपने पुराने धार्मिक अभ्यासों और नियमों को एक ओर रख सकते हो, और पुरानी धार्मिक अवधारणाओं को आज परमेश्वर के वचन की माप के रूप में उपयोग करना बंद कर सकते हो, केवल तभी तुम्हारे लिए एक भविष्य होगा। किन्तु यदि तुम पुरानी चीजों से चिपके रहते हो, यदि तुम उन्हें अभी भी सँजो कर रखते हो, तो ऐसा कोई तरीका नहीं है कि तुम्हें बचाया सके। परमेश्वर इस तरह के लोगों पर कोई ध्यान नहीं देता है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "सेवा के धार्मिक तरीके पर अवश्य प्रतिबंध लगना चाहिए" से

जो लोग परमेश्वर में सच्चे मन से विश्वास करते हैं, वे लोग हैं जो परमेश्वर के वचनों को आत्मसात करने को तत्पर रहते हैं, और ये वे लोग हैं जो सत्य का पालन करने को तत्पर हैं। जो लोग सच्चे मन से परमेश्वर की गवाही देने को तैयार हैं, वे लोग हैं जो उनके वचनों का पालन करने को तत्पर हैं, और ये वे लोग हैं जो सच्चे मन से सत्य के पक्ष में खड़े हो सकते हैं। जो लोग चालबाज़ियों का सहारा लेते हैं और अन्याय करते हैं, उनमें लेश-मात्र भी सत्य नहीं होता और ऐसे लोग परमेश्वर को लज्जित करते हैं। जो लोग कलीसिया में रहकर वाद-विवाद करते हैं, वे शैतान के अनुचर हैं और उसी के मूर्तरूप हैं। इस प्रकार का व्यक्ति द्वेष से भरा होता है। जिन लोगों में विवेक नहीं होता और सत्य के पक्ष में खड़े होने का सामर्थ्य नहीं होता, उन सब के अंदर बुराई पल रही होती है और ऐसे लोग सत्य को कलंकित करते हैं। ऐसे ही लोग शैतान के खास नुमाइंदे होते हैं; ऐसे लोगों का कभी उद्धार नहीं होता और कहना न होगा कि ऐसे लोगों का सफाया हो जाता है। … जो सत्य का अभ्यास करते हैं, उन्हें अंत में बचा लिया जायेगा और सत्य के द्वारा उन्हें पूर्णता प्रदान कर दी जायेगी। जो सत्य का पालन नहीं करते, वे अंत में सत्य के द्वारा ही अपने विनाश को प्राप्त होंगे। जो सत्य का अनुसरण करते हैं और जो नहीं करते, इस प्रकार का अंत उनकी प्रतीक्षा कर रहा है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "जो सत्य का पालन नहीं करते, उनके लिये चेतावनी" से

परमेश्वर अब लोगों के समूह को जीतना चाहता है—वे ऐसे लोग हैं जो उसके साथ सहयोग करने का प्रयास करते हैं, जो उसके कार्य का पालन कर सकते हैं, जो विश्वास करते हैं कि परमेश्वर द्वारा बोले हुए वचन सत्य हैं, जो परमेश्वर की आवश्यकताओं को अपने अभ्यास में ला सकते हैं। ये वे लोग हैं जिनके हृदयों में सच्ची समझ है। वे उनमें से हैं, जिन्हें पूर्ण बनाया जा सकता है, और वे निःसंदेह पूर्णता के पथ पर चलेंगे। वे जो परमेश्वर के कार्य की स्पष्ट समझ के बिना हैं, वे जो परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते नहीं हैं, वे जो उसके वचनों की ओर ध्यान नहीं देते, और वे जिनके हृदय में परमेश्वर के लिए कोई प्रेम नहीं है - ऐसे लोग पूर्ण नहीं बनाए जा सकते। वे जो देहधारी परमेश्वर पर संदेह करते हैं, वे जो उसके बारे में अनिश्चित रहते हैं, वे जो उसके वचनों के बारे में कभी भी गंभीर नहीं होते हैं, और वे जो परमेश्वर को हमेशा धोखा देते हैं, वे परमेश्वर का विरोध करते हैं और शैतान के हैं - ऐसे लोगों को पूर्ण बनाने का कोई उपाय नहीं है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर उन्हें पूर्ण बनाता है, जो उसके हृदय के अनुसार चलते हैं" से

कुछ लोग परमेश्वर की उपस्थिति में नियम-निष्ठ और उचित शैली में व्यवहार करते हैं और विशेष रूप से "शिष्ट" व्यवहार करते हैं, मगर पवित्रात्मा की उपस्थिति में वे अवज्ञाकारी हो जाते हैं और सभी संयम खो देते हैं। क्या तुम लोग ऐसे मनुष्य की गिनती ईमानदार लोगों की श्रेणी में करोगे? यदि तुम एक पाखंडी हो और ऐसे व्यक्ति हो जो लोगों से घुलने मिलने में दक्ष है, तो मैं कहता हूँ कि तुम निश्चित रूप से ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर को तुच्छ समझता है। यदि तुम्हारे वचन बहानों और अपनी महत्वहीन तर्कसंगतताओं से भरे हुए हैं, तो मैं कहता हूँ कि तुम ऐसे व्यक्ति हो जो सत्य का अभ्यास करने का अत्यधिक अनिच्छुक है। यदि तुममें बहुत से आत्मविश्वास हैं जिन्हें साझा करने के तुम अनिच्छुक हो, और यदि तुम अपने रहस्यों को-कहने का अर्थ है, अपनी कठिनाईयों को-दूसरों के सामने प्रकट करने के अत्यधिक अनिच्छुक हो ताकि प्रकाश का मार्ग खोजा जा सके, तो मैं कहता हूँ कि तुम ऐसे व्यक्ति हो जिसे आसानी से उद्धार प्राप्त नहीं होगा और जो आसानी से अंधकार से नहीं निकलेगा। यदि सच्चाई का मार्ग खोजने से तुम लोगों को प्रसन्नता मिलती है, तो तुम उसके समान हो जो सदैव प्रकाश में जीवन निवास करता है। यदि तुम परमेश्वर के घर में सेवा करने वाले के रूप काम करने वाला बन कर प्रसन्न हो, तथा गुमनामी में कर्मठतापूर्वक और शुद्ध अंतःकरण के साथ काम करते हो, हमेशा अर्पित करते हो और कभी भी लेते नहीं हो, तो मैं कहता हूँ कि तुम एक वफादार संत हो, क्योंकि तुम किसी प्रतिफल की खोज नहीं करते हो और तुम मात्र एक ईमानदार मनुष्य बने रहते हो। यदि तुम निष्कपट बनने के इच्छुक हो, यदि तुम अपना सर्वस्व व्यय करने के इच्छुक हो, यदि तुम परमेश्वर के लिए अपना जीवन बलिदान करने और उसका गवाह बनने में समर्थ हो, यदि तुम इस स्तर तक ईमानदार हो जहाँ तुम केवल परमेश्वर को प्रसन्न करना जानते हो, और अपने बारे में विचार नहीं करते हो या अपने लिए कुछ नहीं लेते हो, तो मैं कहता हूँ कि ये लोग वे हैं जो प्रकाश में पोषित हैं और सदा के लिए राज्य में रहेंगे।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "तीन चेतावनियाँ" से

कुछ लोग नकारात्मकता आ गिरने पर हार मान लेते हैं, और हर एक झटके के बाद उठने में असमर्थ हो जाते हैं। ये लोग बेवकूफ और साधारण व्यक्ति हैं, जो बिना सच्चाई जाने पूरा जीवन बिता देते हैं, तो फिर यह लोग अंत तक कैसे साथ दे पाएंगे? यदि एक ही बात आपके साथ दस बार होती है, लेकिन आपको इससे कोई लाभ नहीं होता है, तो आप एक साधारण और बेकार व्यक्ति हैं। दक्ष लोग और वे लोग जिनके पास सच में आध्यात्मिक मामलों को समझने की आंतरिक गुणवत्ता है, वे सच्चाई के साधक हैं, और दस में से आठ बार वें शायद कुछ प्रेरणा, पाठ, प्रबुद्धता और प्रगति हासिल करने में सक्षम हैं। जब एक ही चीज़ एक साधारण व्यक्ति के साथ दस बार होती है, वे एक बार भी कोई भी जीवन लाभ प्राप्त नहीं करेंगे, वे एक बार भी कोई बदलाव नहीं करेंगे और वह खत्म होने से पहले एक बार भी अपने प्रकृति को नहीं समझेंगे। जब भी ऐसा होता है, वे हर बार गिर जाते हैं, हर बार उन्हें खींचने के लिए या साथ घसीटने के लिए किसी दूसरे व्यक्ति की ज़रूरत होती है, और दूसरों को उनके साथ धैर्य रखना पड़ता है। अगर कोई भी उनके साथ धैर्य नही रखेगा, उन्हें खींचेगा, पीटेगा या घसीटेगा नहीं, तो उनका खेल खत्म हुआ और वे उठेंगे नहीं। हर बार ऐसा होता है, तब गिरने का खतरा होता है, और हर बार उनके बिगड़ने का खतरा रहता है। क्या यह इनके लिए अंत नहीं है? उनको बचाने के लिए क्या अभी भी कोई आधार बाकी हैं? किसी को बचाना याने उनका वह हिस्सा बचाना जो उनकी इच्छा और उनका संकल्प हैं, और उनके दिल के अन्दर का वह हिस्सा जो सत्य और धार्मिकता की इच्छा रखता है। ऐसा कहना कि किसी के पास संकल्प है का अर्थ है कि वे धर्म, भलाई और सच्चाई की आशा करते हैं, और उनके पास विवेक है। आपका यह हिस्सा परमेश्वर बचाकर रखते हैं, और इसके द्वारा वह आपके भ्रष्ट स्वभाव के पहलू में परिवर्तन करते हैं। यदि आपके पास ये चीजें नहीं हैं, तो आप को बचाया नहीं जा सकता, आपका उद्धार नहीं हो सकता। अगर आपको धार्मिकता की लालसा नहीं है या सच्चाई में आनन्दित नहीं हैं, बुरी चीजों को दूर करने की आपको चाह नहीं है, या कष्ट का सामना करने के लिए आपके पास संकल्प नहीं है, और यदि आपका विवेक सुन्न है, सत्य प्राप्त करने के लिए आपकी क्षमता भी सुन्न है, सच्चाई या होनेवाली चीजों के प्रति आप संवेदनशील नहीं हैं, कुछ भी भेद समझ नहीं कर पा रहे हैं, और चीजों को संभालने या हल करने की आपके पास कोई स्वतंत्र क्षमता नहीं है, तो फिर बचाव का कोई रास्ता नहीं है। इस तरह के व्यक्ति को सुझाव देने के लिए कुछ भी नहीं होता, काम करने के लिए कुछ भी नहीं होता। उनका विवेक सुन्न होता है, उनका दिमाग मैला होता है, वे सच्चाई में आनन्दित नहीं होते या अपने दिल की गहराई में धार्मिकता की इच्छा नहीं रखते और परमेश्वर चाहे कितने भी स्पष्ट रूप से अथवा पारदर्शिता से सत्य के बारे में बात करते हैं, वे प्रतिक्रिया नहीं देते, जैसे कि वे पहले से ही मर चुके हैं। क्या उनके लिए सब खत्म नहीं हो चुका है? जिसके पास सांस है उसे कृत्रिम श्वसन के द्वारा बचाया जा सकता है, और उनकी सांस को पुनर्जीवित किया जा सकता है। लेकिन अगर वे पहले ही मर चुके हैं और उनकी आत्मा जा चुकी है, तो कृत्रिम श्वसन कुछ भी नहीं करेगा। एक बार जब आप पर कुछ आ गिरता है, आप सिकुड़ते हैं, और आप कोई गवाही नहीं देते, तो आपका कभी भी उद्धार नहीं हो सकता और आपका पूरी तरह से काम तमाम हो चुका है।

"मसीह की बातचीतों के अभिलेख" से "भ्रमित लोगों का उद्धार नहीं हो सकता" से

जो लोग बाद में विश्राम के माध्यम से जीवित बचेंगे उन सबने क्लेश के दिन को सहन किया हुआ होगा और परमेश्वर की गवाही दी हुई होगी; ये वे लोग होंगे जिन्होंने अपने कर्तव्य पूरे किए हैं और परमेश्वर का आज्ञापालन करना चाहते हैं। जो लोग केवल सत्य का अभ्यास करने से बचने के लिए सेवा करने के अवसर का लाभ उठाना चाहते हैं, वे नहीं बच पाएँगे। … यदि कोई वास्तव में अपने कर्तव्यों को कर सकता है, तो इसका अर्थ है कि वह परमेश्वर के प्रति अनंतकाल तक विश्वसनीय है, और पुरस्कार की तलाश नहीं करता है, इस बात की परवाह किए बिना कि चाहे उन्हें आशीषें मिले या वे दुर्भाग्य से पीड़ित हों। यदि आशीषों को देखते समय लोग विश्वसनीय रहते हैं किन्तु जब वे आशीषों को नहीं देख सकते हैं तो विश्वसनीयता खो देते हैं, और अभी भी अंत में वे परमेश्वर की गवाही देने में असमर्थ रहते हैं और अभी भी अपने उन कर्तव्यों को करने में असमर्थ रहते हैं जो उन्हें करने चाहिए, तो ये लोग जिन्होंने किसी समय विश्वसनीयता से परमेश्वर की सेवा की थी, तब भी नष्ट हो जाएँगे। संक्षेप में, दुष्ट लोग अनंतकाल तक जीवित नहीं बच सकते हैं, न ही वे विश्राम में प्रवेश कर सकते हैं; केवल धार्मिक लोग ही विश्राम के अधिकारी हैं।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर और मनुष्य एक साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे" से

ऐसे मनुष्यों को नए कार्य की कोई समझ नहीं होती है परन्तु वे अंतहीन अवधारणाओं से भरे हुए होते हैं। वे कलीसिया में किसी भी तरह का कोई कार्य नहीं करते हैं; बल्कि, यहाँ तक कि कलीसिया में हर प्रकार के दुर्व्यवहार और अशांति में संलग्न होने की हद तक, वे अनिष्ट करते हैं और हर कहीं नकारात्मकता फैलाते हैं, और परिणामस्वरूप उन लोगों को भ्रम और अव्यवस्था में डाल देते हैं जिनमें विभेदन-क्षमता का अभाव होता है। इन जीवित दुष्ट आत्माओं, और इन बुरी आत्माओं को जितना जल्दी हो सके कलीसिया छोड़ देनी चाहिए, कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारे कारण कलीसिया को नुक़सान पहुँचे। हो सकता है कि तुम आज के कार्य से भयभीत न हो, किन्तु क्या तुम आने वाले कल के धार्मिक दण्ड से भयभीत नहीं हो? कलीसिया में बहुत से लोग हैं जो मुफ़्तखोर हैं, और साथ ही एक बड़ी संख्या में भेड़िए हैं जो परमेश्वर के सामान्य कार्य को अस्तव्यस्त करने की कोशिश करते हैं। ये सभी चीज़ें दुष्ट आत्माएँ हैं जिन्हें शैतान के द्वारा भेजा गया है और दुष्ट भेड़िए हैं जो निर्दोष मेमनों को हड़पने का प्रयास करते हैं। यदि इन तथाकथित मनुष्यों को खदेड़ा नहीं जाता है, तो वे कलीसिया पर परजीवी और चढ़ावों को हड़पने वाले कीट-पतंगे बन जाते हैं। इन कुत्सित, अज्ञानी, नीच, और अरुचिकर कीड़ों को एक दिन दण्डित किया जाएगा!

"वचन देह में प्रकट होता है" से "जो सच्चे हृदय से परमेश्वर के आज्ञाकारी हैं वे निश्चित रूप से परमेश्वर के द्वारा ग्रहण किए जाएँगे" से

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