मसीह की बातचीतों के अभिलेख

विषय-वस्तु

अध्याय 20. किस प्रकार के लोगों को दण्डित किया जायेगा

परमेश्वर के विरुद्ध निन्दा और झूठी बदनामी ऐसा पाप है जो न तो इस युग में और न आने वाले युग में क्षमा किया जाएगा और जो लोग ऐसा पाप करते हैं वे कभी भी दोबारा देहधारी नहीं होंगे। इसका अर्थ यह है कि परमेश्वर का स्वभाव मानवजाति के अपराध को बर्दाश्त नहीं करता है। कुछ लोग खराब और भद्दे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं जब वे समझते नहीं हैं या जब उन्हें दूसरों के द्वारा धोखा दिया जाता है, उन पर प्रतिबन्ध लगाया जाता है, उनका नियन्त्रण किया जाता है, या उन्हें कुचला जाता है। परन्तु जब वे भविष्य में सही रास्ते को स्वीकार करेंगे तब वे खेद से भर जायेंगे। तब वे बहुत अच्छे काम करते हैं और परिवर्तन का अनुभव करने और समझ प्राप्त करने में सक्षम होते हैं और इस तरह से उनके पिछले अपराधों को अब याद नहीं किया जायेगा। आप सभी को पूरी तरह से परमेश्वर को जानना चाहिये, आप लोगों को यह मालूम होना चाहिये कि परमेश्वर के वे वचन और उन वचनों का सन्दर्भ किसकी ओर संकेत करते हैं, और आप लोगों को बेतरतीब ढंग से परमेश्वर के वचनों को लागू नहीं करना चाहिये, और न ही मनमाने ढंग से परमेश्वर के वचनों का अर्थ निकालना चाहिये। ऐसे लोग जिनके पास कोई अनुभव नहीं है वे किसी भी चीज में अपनी तुलना परमेश्वर के वचन से नहीं करते हैं। जबकि थोड़ा अनुभव या थोड़ी अन्त:दृष्टि रखने वाले लोग अधिक संवेदनशील होते हैं। जब वे परमेश्वर के उन वचनों को सुनते हैं जो लोगों को श्राप देते हैं, उनको तुच्छ जानते हैं, उनसे नफरत करते हैं या उनको निकाल देते हैं, तो वे इसे अपने ऊपर ले लेते हैं। इससे पता चलता है कि वे परमेश्वर के वचन को नहीं समझते हैं और वे हमेशा परमेश्वर को गलत समझते हैं। कुछ लोग किसी पुस्तक को पढ़ने, किसी प्रकार की खोजबीन करने, और जो लोग परमेश्वर के नए काम को समझते हैं उनकी सभा के किसी सन्देश को सुनने, या पवित्र आत्मा का थोड़ा-सा प्रकाशन पाने से पहले ही परमेश्वर पर दोष मढ़ देते हैं। इसके बाद कोई व्यक्ति उन्हें सुसमाचार सुनाता है और वे उसे स्वीकार कर लेते हैं। और बाद में, वे उन मामलों के लिये बहुत खेद महसूस करते हैं, और वे पश्चाताप करते हैं। तब उन्हें भविष्य के उनके व्यवहार के अनुसार देखा जायेगा। परमेश्वर पर विश्वास करने के बाद, यदि उनका व्यवहार विशेष रूप से बुरा रहा है, और वे यह कहते हुए खुद को ख़ारिज करते हैं कि, “किसी न किसी प्रकार से, मैंने पहले ईश्वर की निन्दा की है और बुरे शब्दों का प्रयोग किया है। परमेश्वर ने यह घोषणा की है कि मुझ जैसे लोग दण्डित होंगे। खैर, अब मेरा जीवन समाप्त हो गया है,” तो ऐसे लोग वास्तव में समाप्त हो जाते हैं। लोगों की परिस्थितियों के लिहाज़ से, कुछ लोगों ने हमेशा विरोध किया था, कुछ ने विद्रोह किया था, अन्य लोगों ने शिकायत भरे वचनों को कहा था, ग़लत आचरण किया था, चर्च के विरुद्ध काम किया था या ऐसी चीज़ों को अंजाम दिया था जिन्होंने परमेश्वर के परिवार को नुकसान पहुंचाया था। उनके स्वभाव और उनके पूरे सन्दर्भ में उनके परिणामों को निर्धारित किया जायेगा। कुछ लोग दुष्ट हैं, कुछ लोग मूर्ख हैं, कुछ भोले हैं, और कुछ लोग तो जानवर हैं। सब लोग अलग-अलग हैं। कुछ दुष्ट लोग दुष्ट आत्माओं से ग्रसित हैं, जबकि अन्य लोग दुष्ट शैतान के दूत हैं। अपने स्वभाव के लिहाज़ से कुछ विशेष रूप से भयावह हैं, कुछ विशेष रूप से धूर्त हैं, कुछ लोग विशेष रूप से धन के लोभी हैं, कुछ लोग स्वच्छंद वासना से भरे हुए हैं। प्रत्येक व्यक्ति का व्यवहार अलग है, अतः प्रत्येक व्यक्ति को उसके व्यवहार और व्यक्तिगत स्वभाव के अनुसार व्यापक रूप से देखा जाना चाहिये। इंसान के नश्वर शरीर की, वह जो भी हो, सहज प्रवृत्ति बस यही है कि उसके पास एक स्वतन्त्र इच्छा है, और वह केवल चीज़ों के बारे में सोचने के लिए सक्षम है परन्तु उसके पास आत्मिक संसार में सीधे प्रवेश करने की क्षमता नहीं है। जैसे कि जब आप सच्चे परमेश्वर पर विश्वास लाते हैं और आप उसके इस नये कार्य की अवस्था को स्वीकार करना चाहते हैं, परन्तु किसी के द्वारा आपको सुसमाचार सुनाये बगैर, मात्र पवित्र आत्मा के कार्य करने से, मात्र आपको प्रकाशित करने और कहीं न कहीं आपकी अगुवाई करने मात्र से, आपके लिये यह जानना असम्भव है कि परमेश्वर भविष्य में क्या कुछ करने वाला है। लोग परमेश्वर की गहराई को नहीं नाप सकते हैं, उनके पास यह योग्यता या क्षमता नहीं है। लोगों के पास आत्मिक संसार की गहराई को सीधे तौर पर नापने की या परमेश्वर के कार्य के आर-पार देखने की कोई क्षमता नहीं है, फिर एक स्वर्गदूत की तरह पूरे मन से परमेश्वर की सेवा करने की तो बात ही क्या है। जब तक परमेश्वर लोगों पर विजय न पाये, उन्हें न बचाए और उनका पुनः सुधार न करे, या परमेश्वर द्वारा प्रदत्त वस्तुओं से उनका भरण-पोषण न करे, , तब तक लोग नये कार्य को स्वीकार करने में असमर्थ हैं। यदि परमेश्वर यह कार्य नहीं करता है, तो लोगों के भीतर यह सब कुछ नहीं होगा, और यह मनुष्य की सहज प्रवृत्ति के द्वारा तय किया जाता है। अतः जब मैं ऐसी बातों को सुनता हूँ कि लोग विरोध कर रहे हैं या विद्रोह कर रहे हैं, तो मुझे बहुत गुस्सा आता है, परन्तु उसके बाद, जब मैं इन्सान की सहज प्रवृत्तियों पर विचार करता हूँ तो मैं अलग तरह से व्यवहार करता हूँ। इसलिये, परमेश्वर के द्वारा किये गए किसी भी काम को अच्छी तरह से मापा जाता है। परमेश्वर जानता है कि क्या करना है और कैसे करना है। क्योंकि लोग सहज प्रेरणा से उन चीज़ों को नहीं कर सकते हैं, और निश्चित रूप से वह उन्हें ऐसा करने भी नहीं देगा। परमेश्वर प्रत्येक व्यक्ति के साथ उस समय की पृष्ठभूमि, वास्तविक स्थिति, लोगों के कार्यों, प्रदर्शन और अभिव्यक्तियों, और उस वातावरण और सन्दर्भ के अनुसार व्यवहार करता है जिसमें वे हैं। परमेश्वर किसी के साथ कभी भी ग़लत नहीं करेगा। यह परमेश्वर की धार्मिकता है। जैसा कि आप देखते हैं, कि हव्वा ने भले एवं बुरे के ज्ञान के वृक्ष से फल खाया था जब साँप के द्वारा उसे धोखा दिया गया था। परन्तु यहोवा परमेश्वर ने उसे धिक्कारा नहीं था, क्या उसने धिक्कारा था? उसने यह नहीं कहा: “तुमने फल क्यों खाया? मैंने तुम्हें खाने को मना किया था, फिर भी तुमने क्यों खाया? तुम में यह समझ होनी चाहिये और तुम्हें यह जानना चाहिये कि साँप केवल तुम्हें बहकाने के लिये ऐसा कहता है।” उसने उससे ऐसा नहीं कहा, और न ही उस पर दोष लगाया। जैसा कि उसने लोगों को बनाया है, वह जानता है कि लोगों की सहज प्रवृत्तियां क्या हैं, उनकी सहज प्रवृत्तियां किस तरह से बनी हैं, और किस हद तक लोग उन्हें नियन्त्रित कर सकते हैं, और लोग क्या कर सकते हैं। जब परमेश्वर किसी के साथ व्यवहार करता है, जब वह किसी के प्रति एक मनोवृत्ति को अपनाता है-तो भले ही यह तुच्छ, द्वेषपूर्ण या घृणित हो-वह लोगों के शब्दों और उनकी परिस्थितियों के सन्दर्भ की पूरी समझ के आधार पर ऐसा करता है। लोग हमेशा सोचते हैं कि परमेश्वर में मात्र ईश्वरत्व है, धर्मिता है और भलाई है। वे सोचते हैं कि परमेश्वर के अन्दर कोई मानवीयता नहीं है, वह लोगों की कठिनाइयों पर कोई विचार नहीं करता है, और वह खुद को लोगों के स्थान पर नहीं रखता है; और यह कि जब तक लोग सच्चाई का पालन नहीं करते, तब तक परमेश्वर उन्हें दण्ड देगा, और भले कोई थोड़ा-सा ही विरोध क्यों न करे परमेश्वर याद रखेगा और बाद में उन्हें दण्ड देगा। वास्तव में ऐसा नहीं है। यदि आप परमेश्वर की धार्मिकता, परमेश्वर के कार्य, और लोगों के प्रति परमेश्वर के बर्ताव को इस रीति से समझते हैं, तो आपने बहुत भारी ग़लती की है। लोगों के साथ व्यवहार करने के लिए परमेश्वर का जो आधार है, वह मनुष्य के लिए अकल्पनीय है। परमेश्वर धर्मी है और वह अपनी निष्ठा से सभी लोगों को कभी न कभी आश्वस्त कर ही लेगा।