22. मनुष्य का अनुसरण करना किसे कहते हैं?

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

कुछ लोग सत्य का आनन्द नहीं लेते हैं, न्याय का तो बिल्कुल भी नहीं। बल्कि वे शक्ति और सम्पत्तियों में आनन्दित होते हैं; इस प्रकार के लोग शक्ति के खोजी कहे जाते हैं। ये लोग अनन्य रूप से दुनिया के प्रभावशाली सम्प्रदायों तथा सेमिनरी से आने वाले पादरियों और शिक्षकों को खोजते हैं। सत्य के मार्ग को स्वीकार करने के बावजूद, वे संशय में रहते हैं और खुद को पूरी तरह से समर्पित करने में असमर्थ होते हैं। वे परमेश्वर के लिए बलिदान करने की बात करते हैं, किन्तु उनकी नज़रें बड़े पादरियों और शिक्षकों पर केन्द्रित रहती हैं, और मसीह को एक ओर कर दिया जाता है। उनके हृदयों में प्रसिद्धि, वैभव और महिमा भरी रहती हैं। उन्हें बिल्कुल विश्वास नहीं होता है कि ऐसा मामूली सा आदमी बहुत से लोगों पर विजय प्राप्त कर सकता है, यह कि एक इतना साधारण व्यक्ति लोगों को पूर्ण बनाने में सक्षम है। उन्हें बिल्कुल विश्वास नहीं होता है कि ये धूल और घूरे में पड़े नाचीज़ परमेश्वर के द्वारा चुने गए लोग हैं। वे मानते हैं कि यदि ऐसे लोग परमेश्वर के उद्धार की योजना के लक्ष्य रहे होते, तो स्वर्ग और पृथ्वी उलट-पुलट हो जाते और सभी लोग ठहाके लगाकर हँसते। उनका मानना है कि यदि परमेश्वर ने ऐसे नाचीज़ों को पूर्ण बनाने के लिए चुना होता, तो वे सभी बड़े लोग स्वयं परमेश्वर बन जाते। उनके दृष्टिकोण अविश्वास से दूषित हैं; दरअसल, अविश्वास से दूर, वे हास्यास्पद जानवर हैं। क्योंकि वे केवल पद, प्रतिष्ठा और सत्ता को महत्व देते हैं; वे विशाल समूहों और सम्प्रदायों को ऊँचा सम्मान देते हैं। उनमें उनके लिए बिल्कुल भी सम्मान नहीं है जिनकी अगुवाई मसीह करता है; वे मात्र विश्वसघाती हैं जिन्होंने मसीह से, सत्य से और जीवन से अपना मुँह मोड़ लिया है।

तुम जिसकी प्रशंसा करते हो वह मसीह की विनम्रता नहीं, बल्कि विशेष हैसियत वाले उन झूठे चरवाहों की है। तुम मसीह की सुन्दरता या बुद्धि से प्रेम नहीं करते हो, बल्कि उन आवारा लोगों से प्रेम करते हो जो घृणित संसार से जुडे हैं। तुम मसीह की पीड़ा पर हँसते हो, जिसके पास अपना सिर टिकाने तक की जगह नहीं है, किन्तु उन मुरदों की तारीफ़ करते हो जो चढ़ावों को हड़प लेते हैं और लंपटता का जीवन जीते हैं। तुम मसीह के साथ-साथ कष्ट सहने को तैयार नहीं हो, परन्तु उन धृष्ट मसीह विरोधियों की बाहों में प्रसन्नता से जाते हो, हालाँकि वे तुम्हें सिर्फ देह, लिखित पत्र और नियंत्रण ही प्रदान कर सकते हैं। फिर भी तुम्हारा हृदय उनकी ही ओर, उनकी प्रतिष्ठा की ओर, उनकी हैसियत, उनके प्रभाव की ओर जाता रहता है, फिर भी तुम ऐसा रवैया बनाये रखते हो जहाँ तुम मसीह के कार्य को स्वीकारना कठिन पाते हो और उसे स्वीकारने के अनिच्छुक हो। इसीलिए मैं कहता हूँ कि तुम में मसीह को स्वीकार करने का विश्वास नहीं है। तुम ने आज तक उसका अनुसरण सिर्फ़ इसलिए किया क्योंकि तुम्हारे पास कोई चारा नहीं था। तुम्हारे हृदय में हमेशा कई अहंकारी आचरण वाली छवियों का ऊँचा स्थान रहा है; तुम न तो उनके हर वचन और कर्म को, और न ही उनके प्रभावशाली वचनों और हाथों को भूल सकते हो। तुम सब के हृदय में वे हमेशा सर्वोच्च और नायक हैं। किन्तु आज के मसीह के लिए ऐसा नहीं है। तुम्हारे हृदय में वह हमेशा महत्वहीन और हमेशा आदर के अयोग्य रहा है। क्योंकि वह बहुत ही साधारण है, उसका बहुत ही कम प्रभाव है और वह अहंकारी तो बिल्कुल नहीं है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्या तुम परमेश्वर के एक सच्चे विश्वासी हो?' से उद्धृत

कुछ लोग हैं जिन्हें अक्सर ऐसे लोगों के द्वारा धोखा दिया जाता है जो बाहर से आध्यात्मिक प्रतीत होते हैं, कुलीन प्रतीत होते हैं, उत्कृष्ट छवि वाले प्रतीत होते हैं। जहाँ तक उन लोगों की बात है जो पत्रों एवं सिद्धान्तों के बारे में बोल सकते हैं, और जिनके भाषण और कार्यकलाप सराहना के योग्य प्रतीत होते हैं, तो जो लोग उनके द्वारा धोखा दिए गए हैं उन्होंनेने उनके कार्यकलापों के सार को, उनके कर्मों के पीछे के सिद्धान्तों को, और उनके लक्ष्य क्या हैं इसे कभी अच्छी तरह से नहीं देखा है। और उन्होंने कभी भी अच्छी तरह से नहीं देखा है कि ये लोग वास्तव में परमेश्वर का आज्ञापालन करते हैं या नहीं, और वे ऐसे लोग हैं या नहीं जो सचमुच में परमेश्वर का भय मानते हैं और दुष्टता से दूर रहते हैं। उन्होंने इन लोगों के मानवता के सार को कभी नहीं पहचाना है। इसके बजाय, परिचित होने के पहले कदम से ही, थोड़ा-थोड़ा करके, वे इन लोगों की तारीफ करने, और इन लोगों का आदर करने लगते हैं, अन्त में ये लोग उनके आदर्श बन जाते हैं। इसके अतिरिक्त, कुछ लोगों के मन में, वे आदर्श जिनकी वे उपासना करते हैं, जिन पर वे विश्वास करते हैं कि वे अपने परिवारों एवं नौकरियों को छोड़ सकते हैं, और सतही तौर पर क़ीमत चुका सकते हैं—ये आदर्श ऐसे लोग हैं जो वास्तव में परमेश्वर को संतुष्ट कर रहे हैं, और ऐसे लोग हैं जो वास्तव में एक अच्छा परिणाम और एक अच्छी मंज़िल को प्राप्त कर सकते हैं। उनके मन में, ये आदर्श ऐसे लोग हैं जिनकी प्रशंसा परमेश्वर करता है। किस कारण से लोग इस प्रकार का विश्वास रखते हैं? ...

... केवल एक ही मूल कारण है जो लोगों से ऐसे अज्ञानता भरे कार्य, अज्ञानता भरे दृष्टिकोण, या एकतरफा दृष्टिकोण और अभ्यास करवाता है, और आज मैं तुम लोगों को उसके बारे में बताऊँगा। कारण यह है कि भले ही लोग परमेश्वर का अनुसरण करते हों, प्रतिदिन उससे प्रार्थना करते हों, और प्रतिदिन परमेश्वर के वचन को पढ़ते हों, फिर भी वे परमेश्वर की इच्छा को वास्तव में नहीं समझते हैं। यही समस्या की जड़ है। यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर के हृदय को समझता है, यह समझता है कि परमेश्वर क्या पसन्द करता है, किस चीज़ से परमेश्वर घृणा करता है, परमेश्वर क्या चाहता है, किस चीज़ को परमेश्वर अस्वीकार करता है, किस प्रकार के व्यक्ति से परमेश्वर प्रेम करता है, किस प्रकार के व्यक्ति को परमेश्वर नापसन्द करता है, मनुष्य पर अपनी माँगों के प्रति परमेश्वर किस प्रकार का मानक लागू करता है, मनुष्य को सिद्ध करने के लिए वह किस प्रकार की पद्धति को अपनाता है, तो क्या तब भी उस व्यक्ति के पास अपना व्यक्तिगत विचार हो सकता है? क्या वह यूँही जा कर किसी अन्य व्यक्ति की आराधना कर सकता है? क्या कोई साधारण व्यक्ति उनका आदर्श बन सकता है? यदि कोई परमेश्वर की इच्छा को समझता है, तो उनका दृष्टिकोण उसकी अपेक्षा थोड़ा अधिक तर्क-संगत होता है। वे मनमाने ढंग से किसी भ्रष्ट व्यक्ति की आदर्श के रूप में आराधना नहीं करते है, न ही वे, सत्य को अभ्यास में लाने के मार्ग पर चलते हुए, यह विश्वास करेंगे कि मनमाने ढंग से कुछ साधारण नियमों या सिद्धान्तों के मुताबिक चलना सत्य को अभ्यास में लाने के बराबर है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्यजो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें' से उद्धृत

उन लोगों के लिए, जो परमेश्वर का अनुसरण करने का दावा करते हैं, अपनी आँखें खोलना और इस बात को ध्यान से देखना सर्वोत्तम रहेगा कि दरअसल वे किस में विश्वास करते हैं: क्या यह वास्तव में परमेश्वर है जिस पर तू विश्वास करता है, या शैतान है? यदि तू जानता कि जिस पर तू विश्वास करता है वह परमेश्वर नहीं है, बल्कि तेरी स्वयं की प्रतिमाएँ हैं, तो फिर यही सबसे अच्छा होता यदि तू विश्वासी होने का दावा नहीं करता। यदि तुझे वास्तव में नहीं पता कि तू किस में विश्वास करता है, तो, फिर से, यही सबसे अच्छा होता यदि तू विश्वासी होने का दावा नहीं करता। वैसा कहना कि तू विश्वासी था ईश-निंदा होगी! तुझसे कोई ज़बर्दस्ती नहीं कर रहा कि तू परमेश्वर में विश्वास कर। मत कहो कि तुम लोग मुझमें विश्वास करते हो, मैं ऐसी बहुत सी बातें बहुत पहले बहुत सुन चुका हूँ और इसे दुबारा सुनने की इच्छा नहीं है, क्योंकि तुम जिनमें विश्वास करते हो वे तुम लोगों के मन की प्रतिमाएँ और तुम लोगों के बीच स्थानीय गुण्डे हैं। जो लोग सत्य को सुनकर अपनी गर्दन ना में हिलाते हैं, जो मौत की बातें सुनकर अत्यधिक मुस्कराते हैं, वे शैतान की संतान हैं; और नष्ट कर दी जाने वाली वस्तुएँ हैं। ऐसे कई लोग कलीसिया में मौजूद हैं, जिनमें कोई विवेक नहीं है। और जब कुछ कपटपूर्ण घटित होता है, तो वे शैतान के पक्ष में जा खड़े होते हैं। जब उन्हें शैतान का अनुचर कहा जाता है तो उन्हें लगता है कि उनके साथ अन्याय हुआ है। और कोई कह सकता है कि उनमें विवेक नहीं है, लेकिन वे हमेशा उस पक्ष में खड़े होते हैं जहाँ सत्य नहीं होता है; ऐसा एक भी महत्वपूर्ण समय नहीं हुआ है जब वे सत्य के पक्ष में खड़े हुए हों, एक बार भी उन्होंने सत्य के पक्ष में खड़े होकर दलील पेश नहीं की—तो क्या वे वाकई विवेकहीन हैं? वे हमेशा शैतान के पक्ष में क्यों खड़े होते हैं? वे कभी भी एक भी शब्द ऐसा क्यों नहीं बोलते हैं जो निष्पक्ष हो या सत्य के समर्थन में तार्किक हो? क्या ऐसी स्थिति वाकई उनके क्षणिक भ्रम के परिणामस्वरूप पैदा हुई है? लोगों में विवेक की जितनी कमी होगी, वे सत्य के पक्ष में उतना ही कम खड़ा हो पाएँगे। इससे क्या ज़ाहिर होता है? क्या इससे यह ज़ाहिर नहीं होता कि विवेकशून्य लोग बुराई से प्रेम करते हैं? क्या इससे यह ज़ाहिर नहीं होता कि वे शैतान की निष्ठावान संतान हैं? ऐसा क्यों है कि वे हमेशा शैतान के पक्ष में खड़े होकर उसी की भाषा बोलते हैं? उनका हर शब्द और कर्म, और उनके चेहरे के हाव-भाव, यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं कि वे सत्य के किसी भी प्रकार के प्रेमी नहीं हैं; बल्कि, वे ऐसे लोग हैं जो सत्य से घृणा करते हैं। शैतान के साथ उनका खड़ा होना यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि शैतान इन तुच्छ इब्लीसों को वाकई में प्रेम करता है जो शैतान की खातिर लड़ते हुए अपना जीवन व्यतीत कर देते हैं। क्या ये सभी तथ्य पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हैं?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी' से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण:

लोगों का अनुसरण करने का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है उन ऐसे व्यक्ति का अनुसरण करना जिनकी वे आराधना करते हैं। परमेश्वर के लिए उनके हृदयों में अधिक स्थान नहीं होता है; उन्होंने केवल एक संकेत टाँग लिया है कि वे परमेश्वर पर विश्वास करते हैं। हर चीज़ जो वे करते हैं उसमें वे लोगों की नकल या अनुकृति करते हैं। विशेष रूप से जब कोई बड़ी बात होती है, तो वे लोगों को निर्णय लेने देते हैं, वे लोगों को उनके भाग्य पर नियंत्रण करने देते हैं। वे स्वयं परमेश्वर के अभिप्राय की खोज नहीं करते हैं, और वे लोगों के द्वारा कहे गये वचनों को समझने में असमर्थ होते हैं। जब तक जो वे सुनते हैं वह उन्हें तर्कसंगत लगता है, तब तक इस बात की परवाह किए बिना कि यह सत्य के अनुरूप है या नहीं, वे तब भी इसे स्वीकार कर लेते हैं और इसका पालन करते हैं। ये लोगों का अनुसरण करने वाले का आचरण है। ऐसे लोगों के परमेश्वर में विश्वास के कोई सिद्धांत नहीं हैं। उनके कृत्यों में कोई सत्यता नहीं होती है। वे हर उस व्यक्ति की बात सुनते हैं जो तर्क से बोलता है। भले ही उनके आराध्य व्यक्ति गलत मार्ग अपना लें, वे अंत तक उनका अनुसरण करते हैं। यदि परमेश्वर उनके आराध्य व्यक्तियों की निंदा करता है, तो वे परमेश्वर के बारे में कुछ धारणाएँ बना लेंगे और अपने आराध्य व्यक्तियों की बातों से कस कर चिपक जाते हैं। उनका तर्क है कि "हमें उसकी बात सुननी चाहिए जो हमारा प्रभारी है। एक उच्चाधिकारी की तुलना किसी सामान्य प्रबंधक से नहीं की जा सकती।" यह सिर्फ़ एक बेवकूफ़ का तर्क है। लोगों का अनुसरण करने वाले असल में हक्के-बक्के होते हैं। जो लोगों का अनुसरण करते हैं, वे सत्य के बिना हैं। केवल वे जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करते हैं। जो लोगों का अनुसरण करते हैं वे आराध्य व्यक्तियों की आराधना करते हैं, वे लोगों के द्वारा बहकाए गए हैं, वे परमेश्वर के सच्चे विश्वासी नहीं हैं और उनके हृदयों में न तो परमेश्वर है, न ही सत्य है।

— ऊपर से संगति से उद्धृत

लोग अपने हृदयों में जिस किसी की भी उपासना करते हैं, वह उनका आराध्य व्यक्ति है। जो कोई भी अपने अगुवाओं की आराधना करता है, वह कोई ऐसा व्यक्ति है जो आराध्य व्यक्तियों की आराधना करता है। वह व्यक्ति जिसकी लोग आराधना करते हैं, उसका उनके हृदयों में एक स्थान होता है, और वह अपरिहार्य रूप से उन पर कब्जा कर लेगा और उन्हें अपना दास बना लेगा। सुसमाचार के प्रसार का कार्य करने के दौरान, हम पाते हैं कि विभिन्न धर्मों और संप्रदाओं के सभी लोग आराध्य व्यक्तियों की आराधना करते हैं, और सभी अपने अगुवाओं द्वारा नियंत्रित होते हैं। यहाँ तक कि वे सत्य को स्वीकार करने का साहस तक नहीं करते हैं। वे दयनीय दासों के समान हैं। जो लोग अपने अगुवाओं की उपासना करते हैं ये वे लोग हैं जो आराध्य व्यक्तियों की आराधना करते हैं, उनके हृदय निर्विवाद रूप से सत्य के बिना हैं। वे परमेश्वर को बिल्कुल भी नहीं जानते हैं; इसलिए, उनके हृदयों में परमेश्वर का कोई स्थान नहीं है। वे परमेश्वर द्वारा घृणा और श्रापित किए जाते हैं। परमेश्वर एक धार्मिक परमेश्वर है, वह एक ईर्ष्यालु परमेश्वर है। जब लोग आराध्य व्यक्तियों की आराधना करते हैं तो परमेश्वर उससे अधिक किसी से घृणा नहीं करता है। अगुवाओं को परमेश्वर के बराबर मानने से बढ़कर कोई ईशनिंदा नहीं है। वास्तव में, जो परमेश्वर के सम्मुख वापस आ चुके हैं उनके हृदयों में केवल परमेश्वर ही होना चाहिए। किसी अन्य व्यक्ति के लिए उनके हृदय में कोई स्थान नहीं होना चाहिए। क्योंकि उनके विचारों और कल्पनाओं में ऐसी चीजों का आना भी गंदा और भ्रष्ट है। परमेश्वर द्वारा इससे घृणा एवं नापसंद किया जाता है। इस मामले में, अधिकांश लोग मिले-जुले हैं, और कम या अधिक सीमा तक, जिनकी वे आराधना करते हैं उनका उनके हृदयों में स्थान होता है। जब परमेश्वर के स्वभाव की बात आती है, तो यह अस्वीकार्य है कि लोग अपने हृदयों में किसी मनुष्य के लिए जरा सा स्थान भीरखें। यदि उनके हृदय आरंभ से लेकर अंत तक शुद्धता प्राप्त नहीं कर सकते हैं, तो वे निंदित किए जाएँगे।

जो अपने हृदयों में अपने अगुवों की आराधना करते हैं उन सब में विशिष्ट अभिव्यक्तियाँ होती हैं। वे निम्न पहलुओं से पहचाने जा सकते हैं: यदि तुम्हारे अगुवों के प्रति तुम्हारा आज्ञापालन, परमेश्वर के प्रति तुम्हारे आज्ञापालन की अपेक्षा अधिक है, तो तुम आराध्य व्यक्तियों की उपासना करते हो; यदि परमेश्वर के लिए तुम्हारी अभिलाषा और लालसा की अपेक्षा तुम्हारी अभिलाषा और लालसा उन लोगों के लिए अधिक है जिनकी तुम आराधना करते हो, तो तुम आराध्य व्यक्तियों की आराधना करते हो; यदि तुम परमेश्वर की अपेक्षा अपने अगुवे के प्रति अधिक जोशीले हो, तो तुम आराध्य व्यक्तियों की आराधना करते हो; यदि, अपने हृदय में तुम उनके अधिक नजदीक हो जिनकी तुम आराधना करते हो और परमेश्वर से दूर हो, तो तुम आराध्य व्यक्तियों की आराधना करते हो; यदि तुम्हारे हृदय में, तुम जिनकी आराधना करते हो उनका स्थान परमेश्वर के बराबर है, तो यह और भी बड़ा प्रमाण है कि तुम उन लोगों को परमेश्वर के समान मानते हो जिनकी तुम आराधना करते हो; और, तुम्हारे साथ चाहे जो हो जाए, यदि तुम अपने अगुवे की सुनने के लिए तैयार हो, और सत्य की खोज करने के लिए परमेश्वर के सामने आने के लिये तैयार नहीं हो, तब इस बात को साबित करने के लिए यह पर्याप्त है कि तुम परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते हो, बल्कि लोगों पर विश्वास करते हो। कुछ लोग, संभवतः, यह कहते हुए अपना बचाव करने का प्रयास करेंगे कि: "मैं अमुक-अमुक की वास्तव में प्रशंसा करता हूँ, मेरे हृदय में उसके लिए वास्तव में एक स्थान है। अनजाने में, मैंने परमेश्वर के साथ अपने संबंधों में उससे थोड़ी दूरी बढ़ा ली है।" ये वचन मामले की सच्चाई को प्रदर्शित करते हैं; जैसे ही कोई किसी के हृदय में स्थान पाता है, वह व्यक्ति परमेश्वर से दूर हो जाता है। यह खतरनाक है, फिर भी कुछ लोग इसे हल्के में लेते हैं, उन्हें थोड़ी सी भी चिंता नहीं होती है, जो दर्शाता है कि वे परमेश्वर के स्वभाव को नहीं जानते हैं। ...लोगों की आराधना करना बहुत अज्ञानी और विवेकशून्य होना है, यह बहुत भ्रष्ट और दुष्ट होना है। लोगों की आराधना करना शैतान और दुष्टात्माओं की आराधना करना है, यह मसीह-विरोधियों की आराधना करना है, और जो लोगों की उपासना करते हैं, उनमें थोड़ा सा भी सत्य नहीं होता है। इस तरह के लोग निश्चित रूप से परमेश्वर के थोडे से ज्ञान से भी वंचित होते हैं; वे पतित लोग हैं जो परमेश्वर द्वारा श्रापित हैं।

— ऊपर से संगति से उद्धृत

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