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21. परमेश्वर का अनुसरण करना किसे कहते हैं?

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

परमेश्वर का अनुसरण करने में प्रमुख महत्व इस बात का है कि हर चीज परमेश्वर के वास्तविक वचनों के अनुसार होनी चाहिए: चाहे तुम जीवन में प्रवेश कर रहे हो या परमेश्वर की इच्छा की पूर्ति, सब कुछ परमेश्वर के वास्तविक वचनों के आस-पास ही केंद्रित होना चाहिए। यदि तुम्हारा समागम और अनुसरण परमेश्वर के वास्तविक शब्दों के आसपास केंद्रित नहीं होते हैं, तो तुम परमेश्वर के शब्दों के लिए एक अजनबी हो, और पवित्र आत्मा के कार्य से पूरी तरह से वंचित हो।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर के सबसे नए कार्य को जानो और परमेश्वर के चरण-चिन्हों का अनुसरण करो" से

पवित्र आत्मा का कार्य दिन ब दिन बदलता जाता है, हर एक कदम के साथ ऊँचा उठता जाता है; आने वाले कल का प्रकाशन आज से भी कहीं ज़्यादा ऊँचा होता है, कदम दर कदम और ऊपर चढ़ता जाता है। जिस कार्य के द्वारा परमेश्वर मनुष्य मनुष्य को सिद्ध करता है वह ऐसा ही है। यदि मनुष्य उस गति से चल न पाए, तो उसे किसी भी समय पीछे छोड़ा सकता है। यदि मनुष्य के पास आज्ञाकारी हृदय न हो, तो वह अंत तक अनुसरण नहीं कर सकता है। पूर्व का युग गुज़र गया है; यह एक नया युग है। और नए युग में, नया कार्य करना होगा। विशेषकर अंतिम युग में जिसमें मनुष्य को सिद्ध किया जाएगा, परमेश्वर पहले से ज़्यादा तेजी से नया कार्य करेगा। इसलिए, अपने हृदय में आज्ञाकारिता को धारण किए बिना, मनुष्य के लिए परमेश्वर के पदचिह्नों का अनुसरण करना कठिन होगा। परमेश्वर किसी भी नियम का पालन नहीं करता है, न ही वह अपने कार्य के किसी स्तर को अपरिवर्तनीय मानता है। बल्कि, वह जिस कार्य को करता है वह हमेशा नया और हमेशा ऊँचा होता है। उसका कार्य हर एक कदम के साथ और भी अधिक व्यावहारिक होता जाता है, और मनुष्य की वास्तविक ज़रूरतों के और भी अधिक अनुरूप होता जाता है। जब मनुष्य इस प्रकार के कार्य का अनुभव करता है केवल तभी वह अपने स्वभाव के अंतिम रूपान्तरण को हासिल कर पाता है। … वे सभी जो अवज्ञाकारी प्रकृति के हैं जो जानबूझ कर विरोध करते हैं उन्हें परमेश्वर के इस द्रुतगामी और प्रचंडता से आगे बढ़ते हुए कार्य के इस चरण द्वारा पीछे छोड़ दिया जाएगा; केवल जो स्वेच्छा से आज्ञापालन करते हैं और जो अपने आप को प्रसन्नतापूर्वक दीन बनाते हैं वे ही मार्ग के अंत तक प्रगति कर सकते हैं। इस प्रकार के कार्य में, तुम सभी लोगों को सीखना चाहिए कि समर्पण कैसे करें और अपनी अवधारणाओं को कैसे अलग रखें। तुम लोगों को उस हर कदम पर सतर्क रहना चाहिए जो तुम उठाते हो। यदि तुम लोग लापरवाह हो, तो तुम लोग निश्चित रूप से उनमें से एक बन जाओगे जिसे पवित्र आत्मा द्वारा ठुकराया जाता है, और एक ऐसे व्यक्ति बन जाओगे जो परमेश्वर के कार्य में उसे बाधित करता है। कार्य के इस स्तर से गुज़रने से पहले, मनुष्य के पुराने समय के नियम और विधियाँ संख्या में इतनी अधिक थी कि वह दूर चला गया, और परिणामस्वरूप, वह अहंकारी हो गया और स्वयं को भूल गया। ये सभी बाधाएँ हैं जो परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार करने से मनुष्य को रोकती हैं; ये मनुष्य को परमेश्वर का पता चल जाने की विरोधी हैं। यदि किसी मनुष्य के हृदय में न तो आज्ञाकारिता है और न ही सत्य के लिए लालसा है तो वह खतरे में होगा। यदि तुम केवल उसी कार्य और वचनों के प्रति समर्पण करते हो जो सरल हैं, और किसी गहरे प्रबलता वाले कार्य या वचन को स्वीकार करने में अक्षम हो, तो तुम उसके समान हो जो पुराने मार्गों को थामे हुए है और पवित्र आत्मा के कार्य के साथ समान गति से नहीं चल सकता है। परमेश्वर के द्वारा किया गया कार्य अलग-अलग अवधियों में भिन्न होता है। यदि तुम एक चरण में बड़ी आज्ञाकारिता दिखाते है, मगर अगले चरण में कम दिखाते हो या कुछ भी नहीं दिखाते हो, तो परमेश्वर तुम्हें त्याग देगा। जब परमेश्वर यह कदम उठाता है तब यदि तुम परमेश्वर के साथ समान गति से चलते हो, तो जब वह अगला कदम उठाता है तब तुम्हें समान गति से अवश्य चलते रहना चाहिए। केवल तभी तुम ऐसे एक हो जो पवित्र आत्मा के प्रति आज्ञाकारी है। चूँकि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो, इसलिए तुम्हें अपनी आज्ञाकारिता में अचल अवश्य बने रहना चाहिए। तुम यूँ ही जब अच्छा लगे तभी आज्ञा नहीं मान सकते हो और जब अच्छा न लगे तब अवज्ञा नहीं कर सकते हो। इस प्रकार की अवज्ञा को परमेश्वर का अनुमोदन नहीं मिलता है। यदि तुम उस नए कार्य के साथ तालमेल नहीं बनाए रख सकते हो, जिसके बारे में मैं संगति करता हूँ, और पूर्व की बातों को लगातार धारण नहीं कर सकते हो, तो तुम्हारे जीवन में प्रगति कैसे हो सकती है? परमेश्वर का कार्य, अपने वचनों के माध्यम से तुम्हारा भरण-पषण करना है। जब तुम उसके वचनों का पालन करते हो और उन्हें स्वीकार करते हो, तब पवित्र आत्मा निश्चित रूप से तुम में कार्य करेगा। पवित्र आत्मा बिलकुल उसी तरह कार्य करता है जिस तरह से मैं कहता हूँ। जैसा मैंने कहा है वैसा ही करो, और पवित्र आत्मा शीघ्रता से तुम में कार्य करेगा। मैं तुम लोगों के देखने के लिए और तुम लोगों को वर्तमान समय के प्रकाश में लाने के लिए एक नया प्रकाश छोड़ता हूँ। जब तुम इस प्रकाश में चलोगे, तो पवित्र आत्मा तुरन्त ही तुम में कार्य करेगा। कुछ लोग हैं जो अड़ियल हो सकते हैं और कहेंगे, "जैसा तुम कहते हो मैं मात्र वैसा नहीं करूँगा।" तब मैं तुम्हें बताता हूँ कि तुम अब सड़क के अंत तक आ गए हो। तुम पूरी तरह से सूख गए हो, और तुममें और जीवन नहीं बचा है। इसलिए, अपने स्वभाव के रूपान्तरण का अनुभव करने में, वर्तमान प्रकाश के साथ तालमेल बिठाए रखना बहुत ही ज़्यादा निर्णायक है।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "जो सच्चे हृदय से परमेश्वर के आज्ञाकारी हैं वे निश्चित रूप से परमेश्वर के द्वारा ग्रहण किए जाएँगे" से

क्या तुम जानते हो कि परेमश्वर के पीछे चलना क्या होता है? दर्शनों के बिना, तुम किस मार्ग पर चलोगे? आज के कार्य में, यदि तुम्हारे पास दर्शन नहीं हैं तो तुम पूरे नहीं हो पाओगे। तुम किस पर विश्वास करते हो? तुम उसमें आस्था क्यों रखते हो? तुम उसके पीछे क्यों चलते हो? क्या तुम्हें यह कोई खेल लगता है? क्या तुम अपने जीवन को खेल की तरह संभाल रहे हो? आज का परमेश्वर सबसे महान दर्शन है। उसके बारे में तुम्हें कितना पता है? तुमने उसे कितना देखा है? आज के परमेश्वर को देखने के बाद क्या परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास की नींव सुरक्षित है? क्या तुम्हें लगता है कि जब तक तुम इस उलझन में चलते रहोगे, तुम्हें मुक्ति प्राप्त होगी? क्या तुम्हें लगता है कि तुम कीचड़ से भरे पानी में मछली पकड़ सकते हो? क्या यह इतना सरल है? आज का परमेश्वर क्या कह रहा है, इसके बारे में तुमने कितनी धारणाएं तय की हैं? क्या तुम्हारे पास आज के परमेश्वर का कोई दर्शन है? आज के परमेश्वर के बारे में तुम्हारी समझ क्या है? तुम हमेशा मानते हो कि साथ चलकर तुम उसे प्राप्त कर सकते हो, कि उसे देखकर तुम उसे प्राप्त कर सकते हो,[क] और कोई भी तुम्हारे कदमों को डगमगा नहीं सकता। ऐसा नहीं सोचो कि परमेश्वर के पीछे चलना इतना आसान है। मुख्य बात यह है कि तुम्हें उसे जानना चाहिए, तुम्हें उसका कार्य पता होना चाहिए, और तुम में उसके लिए कठिनाई का सामना करने की इच्छा होनी चाहिए, उसके लिए अपने जीवन का त्याग करने की इच्छा होनी चाहिए, और उसके द्वारा सिद्ध किए जाने की इच्छा होनी चाहिए। तुम्हारा यही दर्शन होना चाहिए। अगर तुम हमेशा अनुग्रह का आनंद लेने की सोच रहे हो, तो ऐसा नहीं होगा! यह मानकर न चलो कि परमेश्वर केवल लोगों के आनंद और उन पर अनुग्रह अर्पित करने के लिए है। तुमने गलत सोचा! अगर कोई अनुसरण करने के लिए अपने जीवन को जोखिम में नहीं डाल सकता, संसार की प्रत्येक संपत्ति को त्याग नहीं कर सकता, तो वह अनुसरण करते हुए अंत तक कदापि नहीं पहुँच पाएगा!

"वचन देह में प्रकट होता है" से "तुम लोगों को कार्य समझना होगा; उलझकर इसके पीछे नहीं चलो!" से

पतरस ने कुछ वर्षों तक यीशु का अनुगमन किया और उसने यीशु में अनेक बातों को देखा जो लोगों के पास नहीं थीं। एक वर्ष तक उसका अनुगमन करने के पश्चात, यीशु के द्वारा उसे बारह शिष्यों के मुखिया के रूप में चुना गया था। (निस्संदेह यह यीशु के हृदय की बात थी, और लोग इसे देख पाने में पूरी तरह से अयोग्य थे।) उसके जीवन में यीशु के प्रत्येक कार्य ने उसके लिए एक उदाहरण के रूप में कार्य किया, और विशेषत: यीशु के उपदेश उसके हृदय में बस गये थे। वह यीशु के प्रति अत्यधिक विचारशील और समर्पित था, और उसने यीशु के बारे में कभी शिकायत नहीं की थी। इसीलिए जहाँ कहीं यीशु गया वह यीशु का विश्वासयोग्य सहयोगी बन गया। पतरस ने यीशु की शिक्षाओं, उसके नम्र शब्दों, वह क्या खाता था, क्या पहनता था, उसकी दिनचर्या और उसकी यात्राओं पर ध्यान दिया। उसने प्रत्येक रीति से यीशु के उदाहरणों का अनुगमन किया। वह पाखण्डी नहीं था, परन्तु उसने अपनी सभी पुरानी बातें उतारकर फ़ेंक दी थी और कथनी और करनी में यीशु के उदाहरण का अनुगमन किया था। तभी उसे अनुभव हुआ कि आकाशमण्डल और पृथ्वी और सभी वस्तुएँ सर्वशक्तिमान के हाथों में थीं, और इसी कारण उसकी अपनी कोई पसन्द नहीं थी, परन्तु अपने उदाहरण के रूप में प्रत्येक कार्य वैसे ही किया जैसे यीशु करता था। वह उसके जीवन से देख सका कि, जो यीशु ने किया, उसमें वह पाखण्डी नहीं था, और न ही उसने अपने विषय में डींगें मारी थीं, परन्तु इसके स्थान पर, उसने प्रेम के साथ लोगों को प्रभावित किया था। विभिन्न परिस्थितियों में पतरस देख सका कि यीशु क्या था। इसीलिए यीशु में प्रत्येक बात वह बात बन गयी जिसे बाद में पतरस ने अपने लिए आदर्श बनाया।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "पतरस के जीवन पर" से

पाद टिप्पणी:

क. मूल पाठ कहता है, "तुम हमेशा मानते हो कि अनुसरण करते हुए तुम प्राप्त कर सकते हो, कि देखकर तुम प्राप्त कर सकते हो।"

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प्रश्न 16: तुम यह प्रमाण देते हो कि परमेश्वर ने सच्चाई को व्यक्त करने के लिए और आखिरी दिनों में मनुष्य के न्याय और शुद्धि के कार्य को करने के लिए वापस देह-धारण किया है, लेकिन धार्मिक पादरियों और प्राचीन लोगों का विश्वास है कि परमेश्वर बादलों के साथ वापस लौटेगा, और जो लोग प्रभु में विश्वास करते हैं, वे एक पल में रूपांतरित हो जाएँगे और बादलों में परमेश्वर के साथ मिलने के लिए स्वर्गारोहित होंगे, जैसा कि पौलुस ने कहा था: "पर हमारा स्वदेश स्वर्ग पर है; और हम एक उद्धारकर्ता प्रभु यीशु मसीह के वहाँ से आने की बाट जोह रहे हैं। वह अपनी शक्‍ति के उस प्रभाव के अनुसार जिसके द्वारा वह सब वस्तुओं को अपने वश में कर सकता है, हमारी दीन-हीन देह का रूप बदलकर, अपनी महिमा की देह के अनुकूल बना देगा" (फिली 3:20-21)। परमेश्वर सर्वशक्तिमान है और ऐसा कुछ भी नहीं है जो वह नहीं कर सकता है। परमेश्वर हमें बदल देगा और हमें पवित्र बना देगा, वह सिर्फ एक ही वचन के साथ इसे प्राप्त कर लेगा। तो फिर उसे सच्चाई व्यक्त करने और मनुष्य के न्याय और शुद्धि के कार्य के एक चरण को पूरा करने के लिए अब भी देह बनने की आवश्यकता क्यों है? विभिन्न युगों में परमेश्वर को अलग-अलग नामों से क्यों बुलाया जाता है? परमेश्वर के नामों के महत्व क्या हैं? बाइबल केवल व्यवस्था के युग और अनुग्रह के युग में परमेश्वर के कार्य के दो चरणों का एक आलेख (रिकॉर्ड) है; यह परमेश्वर के कार्य की संपूर्णता का आलेख नहीं है। सच्चाई को समझने और सिद्धांत को समझने में क्या अंतर है?