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14. धार्मिक समारोह में शामिल होना क्या है?

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन, प्रार्थना, गीत, कलीसिया का जीवन, परमेश्वर के वचनों का खान-पान और दूसरे ऐसे ही अभ्यासों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका मतलब है, एक निर्मल और जीवंत आध्यात्मिक जीवन जीना। यह तरीके के बारे में नहीं, बल्कि नतीजे से सम्बन्धित है। ज्यादातर लोग सोचते हैं कि एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन पाने के लिए उन्हें प्रार्थना, गाना, परमेश्वर के वचनों को खाना-पीना, या परमेश्वर के शब्दों को समझने की कोशिश करनी चाहिए। कोई परिणाम मिले या ना मिले, या चाहे सही समझ हो या ना हो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, ये लोग बस बाहर की गतिविधियों से होकर गुज़रने पर ध्यान लगाते हैं, और नतीजे पर उनका ध्यान नहीं होता-वे धर्म के अनुष्ठानों में रहने वाले लोग हैं, कलीसिया के भीतर रहने वाले लोग नहीं, और उनका राज्य की प्रजा होने का संयोग तो और भी कम है। इस तरह के व्यक्ति की प्रार्थनाएं, गीत, और परमेश्वर के वचनों का खान-पान, सब नियमों के अनुसार होता है, वे उन्हें करने के लिए मजबूर हैं, और वे सब प्रचलन का निर्वहन करने के लिए किये जाते हैं; स्वेच्छा से या दिल से नहीं किये जाते हैं। इससे कोई फर्क नही पड़ता की ये लोग कितनी प्रार्थना करते हैं या कितने गीत गाते हैं, इसका कोई भी नतीजा नहीं निकलेगा, क्योंकि वे केवल धार्मिक नियमों और प्रथाओं का अभ्यास कर रहे हैं, और वे परमेश्वर के वचन का अभ्यास नहीं कर रहे। केवल तरीके पर ध्यान लगाने से और परमेश्वर के वचनों को पालन करने वाला नियम मान लेने से, इस तरह का व्यक्ति ईश्वर के वचन का अभ्यास नहीं कर रहा, बल्कि शरीर को संतुष्ट कर रहा है, और दूसरों को दिखाने के लिए कर रहा है। इस तरह की धार्मिक प्रथा और नियम मानवों की ओर से आये हैं, परमेश्वर की ओर से नहीं। परमेश्वर नियम के अनुसार नहीं रहता, किसी भी कानून का पालन नहीं करता; वह हर दिन नई चीजें करता है और वह व्यावहारिक काम करता है। थ्री-सेल्फ कलीसिया के लोगों की तरह नहीं, जो सुबह की दैनिक निगरानी, शाम की प्रार्थना, भोजन से पहले धन्यवाद देने में, सब कुछ में धन्यवाद व्यक्त करने में और अन्य ऐसी प्रथाओं तक सीमित हैं। चाहे लोग कितना कुछ भी क्यों ना करें, या कितनी ही देर तक अभ्यास क्यों न करते रहें, उन्हें पवित्र आत्मा का काम नहीं प्राप्त होगा। यदि लोग अभ्यास में दिल लगाये हुए, नियमों के अंतर्गत रहते हैं, तो पवित्र आत्मा किसी भी तरह काम नहीं कर सकता, क्योंकि लोगों का दिल नियमों में लगा हुआ है, मानवीय धारणाओं में लगा हुआ है; इसलिए परमेश्वर के पास काम करने का कोई रास्ता नहीं है; लोग बस हमेशा कानून के नियंत्रण में जीते रहेंगे, और इस प्रकार का व्यक्ति कभी भी परमेश्वर की प्रशंसा प्राप्त कर पाने में सफल नहीं होगा।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन के सम्बन्ध में" से

कुछ ऐसे भी होते हैं जो परमेश्वर के प्रति अपनी कृतज्ञता के लिए दिखावटी प्रेम करते हैं। वे कई दिनों तक चिंता में अपनी भौंहें चढ़ा कर अपने दिन बिताते हैं, एक बनावटी अच्छा होने का नाटक करते हैं, और एक दयनीय मुखाकृति का दिखावा करते हैं। कितना तिरस्करणीय है! और यदि तुम उससे कहते कि, ''तुम परमेश्वर के प्रति किस प्रकार से आभारी हो? कृपया मुझे बताओ!" तो वह निरुत्तर होता। यदि तुम परमेश्वर के प्रति निष्ठावान हो, तो इस बारे में सार्वजनिक रूप से चर्चा मत करो, बल्कि परमेश्वर के लिए अपना प्यार दर्शाने हेतु अपने वास्तविक अभ्यास का उपयोग करो, और एक सच्चे हृदय से उससे प्रार्थना करो। जो परमेश्वर के साथ व्यवहार करने के लिए केवल वचनों का उपयोग करते हैं वे सभी पाखंडी हैं। कुछ लोग प्रत्येक प्रार्थना के साथ परमेश्वर के प्रति आभार के बारे में बोलते हैं, और जब कभी भी वे प्रार्थना करते हैं, तो पवित्र आत्मा के द्रवित हुए बिना ही रोना आरंभ कर देते हैं। इस तरह के मनुष्य धार्मिक रिवाजों और अवधारणाओं से सम्पन्न होते हैं; वे, सदैव यह विश्वास करते हुए ऐसे रीति-रिवाजों और अवधारणाओं के साथ जीते हैं कि ऐसी क्रियाएँ परमेश्वर को प्रसन्न करती हैं, और यह कि सतही धार्मिकता या दुःखभरे आँसुओं का परमेश्वर समर्थन करता है। ऐसे बेतुके लोगों से कौन सी भलाई आ सकती है? अपनी विनम्रता का प्रदर्शन करने के लिए, कुछ लोग दूसरों की उपस्थिति में अनुग्रह का दिखावा करते हैं। कुछ दूसरों के सामने जानबूझकर किसी नितान्त शक्तिहीन मेमने की तरह चापलूस होते हैं। क्या यह राज्य के लोगों का चाल-चलन है? राज्य के व्यक्ति को जीवंत और स्वतंत्र, भोला-भाला और स्पष्ट, ईमानदार और प्यारा होना चाहिए; एक ऐसा जो स्वतंत्रता की स्थिति में हो। उसमें चरित्र और प्रतिष्ठा हो, और जहाँ कहीं जाए वह गवाही दे सकता हो; वह परमेश्वर और मनुष्य दोनों का प्यारा हो। वे जो विश्वास में नौसिखिये होते हैं उनके पास बहुत से बाहरी अभ्यास होते हैं; उन्हें सबसे पहले निपटने और टूटने की एक अवधि से अवश्य गुज़रना चाहिए। जिनके हृदय में परमेश्वर का विश्वास है वे बाहरी रूप से दूसरों को अलग नहीं दिखते हैं, किन्तु उनकी क्रियाएँ और कर्म दूसरों के लिए प्रशंसनीय हैं। केवल ऐसे ही व्यक्ति परमेश्वर के वचनों पर जीवन बिताने वाले समझे जा सकते हैं। यदि तुम इस व्यक्ति को प्रतिदिन सुसमाचार का उपदेश देते हो, और कि, उन्हें उद्धार में ला रहे हो, तब भी अंत में, तुम नियमों और सिद्धांतों में जी रहे हो, तब तुम परमेश्वर के लिए महिमा नहीं ला सकते हो। इस प्रकार के चाल-चलन के लोग धार्मिक लोग हैं, और पाखंडी भी हैं।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "परमेश्वर पर विश्वास करना वास्तविकता पर केंद्रित होना चाहिए, न कि धार्मिक रीति-रिवाजों पर" से

यहाँ तक कि रविवार भी (सब्त, जैसा कि यहूदियों द्वारा मनाया जाता है) उसके लिए घृणास्पद है; और मनुष्य के बीच सामाजिक सम्बन्ध और सांसारिक बातचीत परमेश्वर द्वारा तुच्छ समझे जाते और अस्वीकार किए जाते हैं। यहाँ तक की वसंत का त्यौहार और क्रिसमस, जिनके बारे में सब जानते हैं, परमेश्वर की आज्ञास्वरूप नहीं हैं, तो इन त्यौहारों की छुट्टियों के लिए खिलौने और सजावट (गीत, नव वर्ष का केक, पटाखे, रौशनी की मालाएँ, क्रिसमस के उपहार, क्रिसमस के उत्सव, और प्रभु भोज) की तो बात ही छोड़ो - क्या वे मनुष्यों के मनों की मूर्तियाँ नहीं हैं? सब्त के दिन रोटी का तोड़ना, दाखरस, और उत्तम वस्त्र और भी अधिक प्रभावी मूर्तियाँ हैं। चीन में लोकप्रिय सारे पारम्परिक त्यौहार, जैसे ड्रैगन हैड्स-रेजिंग दिवस, ड्रैगन बोट महोत्सव, मध्य-शरद ऋतु महोत्सव, लाबा महोत्सव, और नव वर्ष उत्सव, और धार्मिक जगत के त्यौहार जैसे ईस्टर, बपतिस्मा दिवस, और क्रिसमस, आज इन सभी अनुचित त्यौहारों को प्राचीन काल से बहुत से लोगों द्वारा मनाया गया और हमें प्रदान कर दिया गया, और जिस मनुष्यजाति की परमेश्वर ने सृष्टि की उसके साथ यह पूर्णतः असंगत है। यह मनुष्यजाति की समृद्ध कल्पना और प्रवीण धारणा ही है जिसने उन्हें तब से लेकर आज तक आगे बढ़ाया है। ऐसा प्रतीत होता है कि उनमें कोई दोष नहीं हैं, परंतु यह मनुष्यजाति के साथ शैतान द्वारा खेली गयी चालें हैं। जिस स्थान पर शैतानों की जितनी ज्यादा भीड़ होती है, उतना ही पुराने ढंग का और पिछड़ा हुआ वह स्थान होता है, उतनी ही गहराई से सामंती प्रथा दृढ़ होती है। यह वस्तुएं लोगों को इतनी कस कर बाँध देती हैं कि हिलने-डुलने के लिए कुछ भी स्थान नहीं रह जाता है। धार्मिक जगत के बहुत सारे त्यौहार मौलिकता का प्रदर्शन करते और परमेश्वर के कार्य के लिए एक सेतु का निर्माण करते प्रतीत होते हैं; किन्तु वास्तव में वे शैतान के अदृश्य बंधन हैं जिनसे शैतान लोगों को बाँध देता है ताकि वे परमेश्वर को न जान पाएं - वे सब शैतान की धूर्त रणनीतियाँ हैं। वास्तव में, जब परमेश्वर के कार्य का एक चरण समाप्त हो जाता है, तो वह पहले ही बिना कोई चिह्न छोड़े, उस समय के उपकरण और शैली को नष्ट कर चुका होता है। परंतु, "सच्चे विश्वासी" ठोस पदार्थ की वस्तुओं की आराधना करना जारी रखते हैं; इस दौरान वे आगे का अध्ययन न करते हुए, उन वस्तुओं को बिल्कुल भुला देते हैं जो परमेश्वर के पास हैं, प्रकटत: ऐसा लगता है कि उनके मन में परमेश्वर के प्रति अगाध प्रेम है जबकि वास्तव में वे उसे बहुत पहले ही घर के बाहर धकेल चुके हैं और शैतान को आराधना-स्थल पर स्थापित कर चुके हैं। यीशु, क्रूस, मरियम, यीशु का बपतिस्मा, अंतिम भोज के चित्रों को लोग पूरे समय बार-बार "पिता परमेश्वर" पुकारते हुए, उन्हें स्वर्ग के प्रभु के रूप में आदर देते हैं। क्या यह सब मज़ाक नहीं है? …

मनुष्य के स्वभाव में परिवर्तन करने के लिए सबसे अच्छा तरीका लोगों के अंतर्मन के उन भागों को बदलना है जिन्हें गहन रूप से विषैला कर दिया गया है, ताकि लोग अपनी विचारधारा और नैतिकता को बदल सकें। सबसे पहले तो लोगों को स्पष्ट रूप से देखने की जरूरत है कि परमेश्वर के लिए धार्मिक संस्कार, धार्मिक गतिविधियाँ, वर्ष और महीने, और त्यौहार घृणास्पद हैं। उन्हें सामंती विचारधारा के बंधनों से मुक्त होना चाहिए और अंधविश्वास की गहरी प्रवृति के हर प्रभाव को जड़ से उखाड़ देना चाहिए। यह सब मनुष्यजाति के प्रवेश में सम्मिलित हैं।

"वचन देह में प्रकट होता है" से "कार्य और प्रवेश (3)" से

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परमेश्वर में सच्चा विश्वास वास्तव में क्या है? किसी को परमेश्वर में कैसे विश्वास करना चाहिए कि वह परमेश्वर से प्रशंसा प्राप्त कर सके? परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों में से प्रत्येक के उद्देश्य और महत्व को जानना। प्रश्न 22: प्रभु यीशु ने कहा: "परन्तु जो कोई उस जल में से पीएगा जो मैं उसे दूँगा, वह फिर अनन्तकाल तक प्यासा न होगा; वरन् जो जल मैं उसे दूँगा, वह उसमें एक सोता बन जाएगा जो अनन्त जीवन के लिये उमड़ता रहेगा।" (यूहन्ना 4:14)। अधिकांश लोग सोचते हैं कि प्रभु यीशु ने हमें पहले से ही अनन्त जीवन का मार्ग प्रदान किया है, लेकिन मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के इन वचनों को पढ़ा है: "केवल अंतिम दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनन्त जीवन का मार्ग दे सकता है।" यह सब क्या है? यह क्यों कहता है कि आखिरी दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनन्त जीवन का मार्ग दे सकता है? अपने कर्तव्य को करने और सेवा करने में क्या अंतर है?