37. स्वभाव का परिवर्तन क्या है?

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

स्वभाव में परिवर्तन किस बात का उल्लेख करता है? यह तब होता है जब एक सत्य का प्रेमी, परमेश्वर के कार्य का अनुभव करते हुए, परमेश्वर के वचन के न्याय और उसकी ताड़ना को स्वीकार करता है, और सभी तरह की पीड़ाओं और परिशोधन का अनुभव करता है। इस तरह का व्यक्ति भीतर उपस्थित शैतानी विष से शुद्ध हो जाता है और पूरी तरह अपने भ्रष्ट स्वभावों के चंगुल से बच निकलता है, ताकि वो परमेश्वर के वचनों, उसके सारे आयोजनों और व्यवस्थाओं का पालन कर सके और कभी परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह या प्रतिरोध न करे। यह स्वभाव में परिवर्तन है। ... परमेश्वर के घर में जिस स्वभाव के परिवर्तन के बारे में बात की जाती है, उसका मतलब है कि एक व्यक्ति, क्योंकि वह सत्य को प्यार करता है और उसे स्वीकार कर सकता है, अंततः अपनी अवज्ञाकारी और परमेश्वर-विरोधी प्रकृति को जान जाता है; वह समझता है कि मनुष्य का दूषण बहुत गहरा है और मनुष्य के बेतुकेपन और धोखाधड़ी को समझता है। वह मनुष्य की कमजोरियों और दयनीयता को जानता है, और अंत में मनुष्य की प्रकृति और सार को समझ पाता है। यह सब जानते हुए, वह स्वयं को पूरी तरह अस्वीकार और त्याग सकता है, परमेश्वर के वचन के अनुसार जीवन व्यतीत कर सकता है, और प्रत्येक चीज़ में सत्य पर चल सकता है। ऐसा व्यक्ति परमेश्वर को जानता है और उसका स्वभाव बदल चुका है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'मनुष्य का स्वभाव कैसे जानें' से उद्धृत

स्वभाव में परिवर्तन मुख्य रूप से लोगों की प्रकृति में परिवर्तन से सम्बंधित है। किसी व्यक्ति की प्रकृति कुछ ऐसी चीज़ नहीं है जिसे बाहर के व्यवहारों से देखा जा सके; उसका सीधा संबंध लोगों के अस्तित्व का मूल्य और महत्व से है। जिसका मतलब यह है कि इसमें जीवन के बारे में व्यक्ति का दृष्टिकोण और उसके मूल्य, उसकी आत्मा के भीतर गहराई में रही चीज़ें, और उनका सार शामिल है। वह व्यक्ति जो सत्य को स्वीकार नहीं कर पाता, उसके इन पहलुओं में कोई परिवर्तन नहीं होगा। केवल यदि लोगों ने परमेश्वर के कार्य का अनुभव किया है और पूरी तरह से सत्य में प्रवेश किया है, यदि उन्होंने अस्तित्व और जीवन पर अपने मूल्यों और दृष्टिकोणों को बदला है, यदि चीजों को वैसे ही देखा है जैसे परमेश्वर देखता है, और यदि वे पूरी तरह से अपने को परमेश्वर के सामने प्रस्तुत और समर्पित करने में सक्षम हो गए हैं, तभी कहा जा सकता है कि उनके स्वभाव बदल गए हैं।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'अपने स्वभाव को बदलने के बारे मेंतुम्हें क्या पता होना चाहिए' से उद्धृत

स्वभाव में परिवर्तन का अर्थ परिपक्व और कुशल मानवता से युक्त होना नहीं है। यह मुख्य रूप से उसे संदर्भित करता है जिसमें लोगों की प्रकृति के भीतर के कुछ शैतानी विष परमेश्वर का ज्ञान पाने और सत्य समझने के परिणामस्वरूप बदल जाते हैं। कहने का अर्थ यह है कि उन शैतानी विषों को शुद्ध कर दिया जाता है, और परमेश्वर द्वारा व्यक्त किया गया सत्य लोगों के भीतर जड़ जमा लेता है, उसका जीवन बन जाता है, और उसके अस्तित्व की नींव बन जाता है। तभी वे नए लोग बन जाते हैं, और इस तरह उनका स्वभाव बदल जाता है। स्वभाव में परिवर्तन का मतलब यह नहीं है कि उनके बाहरी स्वभाव पहले की तुलना में विनम्र हैं, कि वे अभिमानी हुआ करते थे लेकिन अब तर्कसंगत ढंग से बोलते हैं, या कि वे पहले किसी की भी नहीं सुनते थे, लेकिन अब वे दूसरों की बात सुन सकते हैं; ऐसे बाहरी परिवर्तन स्वभाव के रूपान्तरण नहीं कहे जा सकते। बेशक स्वभाव के परिवर्तन में ये अवस्थाएँ शामिल हैं, लेकिन सर्वाधिक महत्व की बात यह है कि उनका आंतरिक जीवन बदल गया है। परमेश्वर द्वारा व्यक्त किया गया सत्य ही उनका जीवन बन जाता है, उनके भीतर के कुछ शैतानी विष हटा दिए जाते हैं, उनके दृष्टिकोण पूरी तरह से बदल गये हैं, और इनमें से कुछ भी सांसारिक चीज़ों के जैसा नहीं है। वह स्पष्ट रूप से बड़े लाल अजगर की योजनाओं और विषों को देखता है; उसने जीवन का सच्चा सार समझ लिया है। इससे उसके जीवन के मूल्य बदल गए हैं—यह सबसे मौलिक परिवर्तन है और यही स्वभाव में परिवर्तन का सार है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'बाहरी परिवर्तन औरस्वभाव में परिवर्तन के बीच अंतर' से उद्धृत

प्रकृति क्या है? यह मनुष्य का सार है। किसी का स्वभाव वह चीजें हैं जो किसी की प्रकृति में प्रकट होती हैं, और एक परिवर्तित स्वभाव का अर्थ है कि जो भ्रष्ट चीजें मूल रूप से तेरे भीतर थीं, वे फिर कभी प्रकट नहीं होंगी, और उन्हें सत्य से बदल दिया गया है। किसी के स्वभाव के मूल में जो चीज़ें होती हैं वे नहीं बदली हैं, बल्कि वे भ्रष्ट चीज़ें बदली हैं जो प्रकट की गई हैं, और स्वभाव से संबंधित वे चीज़ें बदल गई हैं जो किसी व्यक्ति की प्रकृति में प्रकट होती हैं। शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करता है, और मनुष्य शैतान का मूर्तरूप बन गया है, कोई ऐसी चीज़ बन गया है जो परमेश्वर का विरोध करती है, और मनुष्य परमेश्वर के साथ विश्वासघात करने में पूरी तरह से सक्षम है। लोगों के लिए यह क्यों आवश्यक है कि उनके स्वभाव बदल जाएँ? ऐसा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर उन्हें पूर्ण बनाना और प्राप्त करना चाहता है। जिन लोगों को अंतत: पूर्ण बनाया जाता है, उनमें परमेश्वर को जानने की वास्तविकता मिली होती है। वे सत्य के सभी पहलुओं की वास्तविकता को धारण करते हैं, और ऐसे लोग पूर्णतः परमेश्वर की इच्छा के समान हैं। अतीत में, जब लोगों का भ्रष्ट स्वभाव था, तो वे जो कुछ भी करते थे वह ग़लत होता था, और वे जो कुछ भी करते थे उससे परमेश्वर का विरोध होता था। अब उनके पास सत्य है, वे ऐसा बहुत कुछ करने में सक्षम हैं जो परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है। लेकिन कहने का तात्पर्य यह नहीं है कि वे परमेश्वर के साथ विश्वासघात नहीं करते हैं; वे अभी भी परमेश्वर के साथ विश्वासघात करने में सक्षम हैं। लोगों की प्रकृति से जो प्रकट होता है उसके एक हिस्से को बदलना संभव है, और जो हिस्सा बदला जाता है वह तेरा ऐसा हिस्सा है जो सत्य के अनुसार अभ्यास करने में सक्षम है। लेकिन आज सत्य को अभ्यास में लाने में सक्षम होने का मतलब यह नहीं है कि तेरी प्रकृति बदल गयी है। ... तो जिस हिस्से को बदला जा सकता है वह किस तरफ इशारा करता है? इसका अर्थ है कि जब तू परमेश्वर की इच्छा को समझेगा, तो तू पालन कर पाएगा। यदि तू परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझेगा, तो तू अभी भी अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करेगा और तू अभी भी विश्वास करेगा कि तेरे कार्य परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप हैं; यह विश्वासघात है, और यह कुछ ऐसा है जो तेरी प्रकृति के भीतर है। निस्संदेह, स्वभाव में बदलाव की कोई सीमा नहीं है। जितना अधिक सत्य तू प्राप्त करता है—अर्थात, परमेश्वर के बारे में तेरा ज्ञान जितना अधिक गहरा होगा—परमेश्वर के प्रति तेरा विरोध और विश्वासघात उतना ही कम होगा। स्वभाव में परिवर्तन के अनुसरण का समाधान मुख्य रूप से सत्य के अनुसरण से होता है। लोगों की प्रकृति के सार का ज्ञान भी सत्य को समझने से प्राप्त होता है। जब लोग वास्तव में सत्य को प्राप्त कर लेते हैं, तो सभी समस्याओं का समाधान हो जाता है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'लोग परमेश्वर से बहुत अधिक माँगें करते हैं' से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण:

जीवन-स्वभाव में परिवर्तन को, परमेश्वर का विरोध करने और परमेश्वर से विश्वासघात करने से लेकर अंततः परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारी होने, परमेश्वर के प्रति वफादार होने, और परमेश्वर की आराधना करने तक की एक प्रक्रिया के रूप में सारांशित किया जा सकता है। जब लोग परमेश्वर का आज्ञापालन करने और परमेश्वर की आराधना करने में सक्षम हो जाते हैं, तब उनके पास सत्य और मानवता दोनों होती है। इस तरह का व्यक्ति वह होता है जिसका जीवन-स्वभाव बदल गया है। इसलिए, जीवन-स्वभाव के परिवर्तन की प्रक्रिया वास्तव में सत्य में प्रवेश करने और सत्य को प्राप्त करने की प्रक्रिया है, यह सत्य को जीवन के रूप में स्वीकार करने की प्रक्रिया है, और यह मनुष्य की परमेश्वर को जानने की प्रक्रिया भी है। वह व्यक्ति जिसे परमेश्वर का सच्चा ज्ञान है, वह व्यक्ति जिसका हृदय पूरी तरह से परमेश्वर के वचन द्वारा थाम लिया गया है, जो परमेश्वर से प्रेम कर सकता है, जो परमेश्वर के प्रति वफादार हो सकता है, जो सब कुछ परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए करता है, जो पूरे हृदय और मन से परमेश्वर के साथ एक हो सकता है; इस प्रकार का व्यक्ति परमेश्वर द्वारा पा लिया गया व्यक्ति होता है। अगर कोई व्यक्ति अपने से हृदय परमेश्वर से प्रेम नहीं कर सकता है, परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारी नहीं हो सकता है, तो इससे पता चलता है कि उसका हृदय अभी भी शैतान के कब्ज़े में है, और यह भी कि उसका हृदय अभी भी शैतान के विष और शैतान के फ़लसफ़े द्वारा नियंत्रित होता है। जब मनुष्य उन सारे सत्य को प्राप्त कर लेता है जो उसके पास होने चाहिए, जब वह इसे पूरी तरह अपने से हृदय में स्वीकार कर लेता है, तो वह एक नया जीवन प्राप्त करेगा। जब मनुष्य नया जीवन प्राप्त कर लेगा, तो परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता, परमेश्वर के लिए प्रेम, और परमेश्वर की आराधना उसके पीछे-पीछे चलेंगे; उस समय व्यक्ति का जीवन-स्वभाव पूरी तरह से बदल चुका होगा। किसी व्यक्ति का जीवन-स्वभाव बदलने की प्रक्रिया उसके जीवन-स्वभाव के नवीनीकरण की प्रक्रिया भी है। उस व्यक्ति का हृदय मूलतः शैतान द्वारा नियंत्रित होता था, शैतान के जीवन और विष उसकी प्रकृति बन गये थे। अब, ये चीजें उन सभी सत्यों से चूर-चूर हो गई हैं जिन्हें मनुष्य ने स्वीकार कर लिया है। मनुष्य का हृदय सत्य के अधिकार में है, सत्य उसके हृदय का मालिक बन गया है, इसलिए उसका जीवन-स्वभाव भी बदल गया है; जीवन स्वभाव में परिवर्तन का यही अर्थ है। मूल रूप से जब शैतान ने तुम्हारे भीतर सत्ता सँभाली थी, तब तुम शैतान के आज्ञाकारी थे, तुम सभी चीज़ों में शैतान को संतुष्ट किया करते थे, और सब कुछ शैतान के अनुसार किया जाता था। आज सत्य तुम्हारे भीतर अधिकार रखता है; तुम केवल सत्य का पालन करते हो, और परमेश्वर को संतुष्ट करते हो। परमेश्वर के द्वारा मनुष्य को प्राप्त करने की प्रक्रिया यही है: पहले, तुम्हारे लिए शैतान को प्यार करना बहुत आसान था, और परमेश्वर से प्रेम करना कठिन था; अब सत्य तुम्हारे अंदर है, अब तुम सत्य से प्रेम करते हो, और अब परमेश्वर से प्रेम करना आसान है। जब शैतान को प्यार करने के लिए कहा जाएगा, चाहे तुम्हें बहकाने के लिए कुछ भी कहा जाएगा, तुम ऐसा नहीं करोगे। इस प्रकार, जब मनुष्य में सत्य अपना अधिकार कर लेता है, तो मनुष्य पूरी तरह से बदल जाता है, और एक नया व्यक्ति बन जाता है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि व्यक्ति के जीवन-स्वभाव में परिवर्तन मुख्यतः सत्य का अनुसरण करने और सत्य को प्राप्त करने से होता है।

— 'जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति' से उद्धृत

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