1. मसीह-विरोधी कौन होते हैं और वे कैसे पहचाने जा सकते हैं

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :

मसीह के शत्रुओं के बारे में परमेश्वर की परिभाषा क्या है? वह जो परमेश्वर से शत्रुता रखता है। वह परमेश्वर का शत्रु है! जो परमेश्वर से शत्रुता करता है, सत्य से शत्रुता करता है, सत्य से घृणा करता है, परमेश्वर से घृणा करता है, और जो कुछ भी सकारात्मक है, उससे पूरी तरह से घृणा करता है। वह कोई आम व्यक्ति नहीं है जो अपने विचारों और अवलोकनों में कुछ क्षणों के लिए कमज़ोर, मूर्ख और थोड़ा गलत हो जाता है, न ही वह ऐसा व्यक्ति है जिसकी समझ थोड़ी-सी बेतुकी और सत्य के अनुरूप नहीं है। वह इस तरह का व्यक्ति नहीं है। वह मसीह-विरोधी है, परमेश्वर का शत्रु! उसकी भूमिका किसी ऐसे व्यक्ति की है जो हर सकारात्मक चीज़ से पूरी तरह से नफ़रत करता है, हर सत्य से नफ़रत करता है, और परमेश्वर के सारे स्वभाव और सार से नफ़रत करता है। ऐसी भूमिका वाले व्यक्तियों से परमेश्वर किस तरह का व्यवहार करता है? परमेश्वर उन्हें नहीं बचाएगा! प्रकृति से ऐसे लोग सत्य से घृणा और नफ़रत करते हैं। यहाँ जो सामने आया है वह बुराई, उग्रता और सत्य से घृणा है—ये भ्रष्ट स्वभावों में सबसे गंभीर अभिव्यक्तियां और स्वभाव हैं, और शैतान के लिए ये सबसे विशिष्ट और आवश्यक चीज़ें हैं। यह आम, भ्रष्ट लोगों में पाए जाने वाले भ्रष्ट स्वभाव का मामूली प्रकटन नहीं है, बल्कि परमेश्वर से शत्रुता रखने वाला बल है। वे एक कलीसिया को अस्त-व्यस्त और नियंत्रित कर सकते हैं, और वे परमेश्वर के प्रबंधन कार्य को नष्ट और बाधित कर सकते हैं। क्या आम, भ्रष्ट लोग ऐसा कुछ करते हैं? बिल्कुल नहीं, और इसलिए तुम्हें इसे कम नहीं समझना चाहिए। सामान्य लोगों का भी दुष्ट स्वभाव हो सकता है; उनमें से भी कुछ स्वार्थपूर्ण और घृणित व्यवहार करते हैं, और दुष्टतापूर्ण व्यवहार करने वालों में से कुछ दूसरों को अपने साथ दबंगई नहीं करने देते, और अपने मन में सोचते हैं, "अगर लोग मुझे तंग नहीं करेंगे, तो मैं उन्हें तंग नहीं करूँगा।" लेकिन मसीह-विरोधी इससे अलग कैसे हैं? उनका मुख्य स्वभाव अहंकार नहीं, बल्कि प्रचंड बुराई है। और यह बुराई मुख्य रूप से कैसे प्रकट होती है? यह उनके विचित्र तरीके से काम करने में देखी जा सकती है, जिसे आम लोग, जिनके पास थोड़ी-सी संस्कृति और कुछ सामाजिक अनुभव हैं, अपनी आँखों और कानों से पता नहीं लगा पाते। अब यह धोखे से बढ़कर बुराई बन गई है। वे घिनौने खेल खेल सकते हैं, गहरी चालें चल सकते हैं, और ये काम वे ज़्यादातर लोगों से "बेहतर" कर सकते हैं; अधिकांश सामान्य लोग उनका मुकाबला नहीं कर सकते और उनसे निपट नहीं सकते। यह मसीह का विरोध है। ऐसा क्यों कहा जाता है कि आम लोग उनसे नहीं निपट सकते? यह इसलिए है क्योंकि उनकी बुराई इतनी चरम पर होती है कि लोगों को धोखा देने के लिए उनमें एक ज़बरदस्त शक्ति होती है। हम मसीह के शत्रुओं की अभिव्यक्तियों के बारे में सहभागिता क्यों कर रहे हैं? क्योंकि मसीह के शत्रु लोगों को धोखा देने में बहुत ही सक्षम हैं। वे एक ही झटके में लोगों के बड़े समूह को धोखा दे देते हैं, किसी घातक महामारी की तरह जो अपने संक्रमण से, एक ही प्रकोप में बहुतों को नुकसान पहुंचा सकती है और मार सकती है। यह अत्यधिक संक्रामक है और इसकी पहुंच व्यापक है, इसकी संक्रामकता और मृत्यु दर आम बीमारियों से कहीं अधिक है। क्या ये गंभीर परिणाम नहीं हैं?

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे नजर बचाकर कार्य करते हैं, व्यक्तिवादी और तानाशाही तरीके से व्यवहार करते हैं, लोगों के साथ कभी सहभागिता नहीं करते और लोगों को आज्ञा मानने के लिए मजबूर करते हैं' से उद्धृत

जिस दौरान, परमेश्वर ने देहधारण नहीं किया था, तब कोई इंसान परमेश्वर विरोधी है या नहीं, यह इस बात से तय होता था कि क्या इंसान स्वर्ग के अदृश्य परमेश्वर की आराधना और उसका आदर करता था या नहीं। उस समय परमेश्वर के प्रति विरोध को जिस ढंग से परिभाषित किया गया, वह उतना भी व्यवाहारिक नहीं था क्योंकि तब इंसान परमेश्वर को देख नहीं पाता था, न ही उसे यह पता था कि परमेश्वर की छवि कैसी है, वह कैसे कार्य करता है और कैसे बोलता है। परमेश्वर के बारे में इंसान की कोई धारणा नहीं थी, परमेश्वर के बारे में उसकी एक अस्पष्ट आस्था थी, क्योंकि परमेश्वर अभी तक इंसानों के सामने प्रकट नहीं हुआ था। इसलिए, इंसान ने अपनी कल्पनाओं में कैसे भी परमेश्वर में विश्वास क्यों न किया हो, परमेश्वर ने न तो इंसान की निंदा की, न ही इंसान से अधिक अपेक्षा की, क्योंकि इंसान परमेश्वर को देख नहीं पाता था। परमेश्वर जब देहधारण कर इंसानों के बीच काम करने आता है, तो सभी उसे देखते और उसके वचनों को सुनते हैं, और सभी लोग उन कर्मों को देखते हैं जो परमेश्वर देह रूप में करता है। उस क्षण, इंसान की तमाम धारणाएँ साबुन के झाग बन जाती हैं। जहाँ तक उन लोगों की बात है जिन्होंने परमेश्वर को देहधारण करते हुए देखा है, यदि वे अपनी इच्छा से उसका आज्ञापालन करेंगे, तो उनका तिरस्कार नहीं किया जाएगा, जबकि जो लोग जानबूझकर परमेश्वर के विरुद्ध खड़े होते हैं, वे परमेश्वर का विरोध करने वाले माने जाएँगे। ऐसे लोग मसीह-विरोधी और शत्रु हैं जो जानबूझकर परमेश्वर के विरोध में खड़े होते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर को न जानने वाले सभी लोग परमेश्वर का विरोध करते हैं' से उद्धृत

जो लोग परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य को नहीं समझते, वे परमेश्वर के विरुद्ध खड़े होते हैं, और जो लोग परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य से अवगत होते हैं फिर भी परमेश्वर को संतुष्ट करने का प्रयास नहीं करते, वे तो परमेश्वर के और भी बड़े विरोधी होते हैं। ऐसे भी लोग हैं जो बड़ी-बड़ी कलीसियाओं में दिन-भर बाइबल पढ़ते रहते हैं, फिर भी उनमें से एक भी ऐसा नहीं होता जो परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य को समझता हो। उनमें से एक भी ऐसा नहीं होता जो परमेश्वर को जान पाता हो; उनमें से परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप तो एक भी नहीं होता। वे सबके सब निकम्मे और अधम लोग हैं, जिनमें से प्रत्येक परमेश्वर को सिखाने के लिए ऊँचे पायदान पर खड़ा रहता है। वे लोग परमेश्वर के नाम का झंडा उठाकर, जानबूझकर उसका विरोध करते हैं। वे परमेश्वर में विश्वास रखने का दावा करते हैं, फिर भी मनुष्यों का माँस खाते और रक्त पीते हैं। ऐसे सभी मनुष्य शैतान हैं जो मनुष्यों की आत्माओं को निगल जाते हैं, ऐसे मुख्य राक्षस हैं जो जानबूझकर उन्हें विचलित करते हैं जो सही मार्ग पर कदम बढ़ाने का प्रयास करते हैं और ऐसी बाधाएँ हैं जो परमेश्वर को खोजने वालों के मार्ग में रुकावट पैदा करते हैं। वे "मज़बूत देह" वाले दिख सकते हैं, किंतु उसके अनुयायियों को कैसे पता चलेगा कि वे मसीह-विरोधी हैं जो लोगों से परमेश्वर का विरोध करवाते हैं? अनुयायी कैसे जानेंगे कि वे जीवित शैतान हैं जो इंसानी आत्माओं को निगलने को तैयार बैठे हैं?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर को न जानने वाले सभी लोग परमेश्वर का विरोध करते हैं' से उद्धृत

चूँकि तुम परमेश्वर में विश्वास रखते हो, इसलिए तुम्हें परमेश्वर के सभी वचनों और कार्यों में विश्वास रखना चाहिए। अर्थात्, चूँकि तुम परमेश्वर में विश्वास रखते हो, इसलिए तुम्हें उसका आज्ञापालन करना चाहिए। यदि तुम ऐसा नहीं कर पाते हो, तो यह मायने नहीं रखता कि तुम परमेश्वर में विश्वास रखते हो या नहीं। यदि तुमने वर्षों परमेश्वर में विश्वास रखा है, फिर भी न तो कभी उसका आज्ञापालन किया है, न ही उसके वचनों की समग्रता को स्वीकार किया है, बल्कि तुमने परमेश्वर को अपने आगे समर्पण करने और तुम्हारी धारणाओं के अनुसार कार्य करने को कहा है, तो तुम सबसे अधिक विद्रोही व्यक्ति हो, और गैर-विश्वासी हो। एक ऐसा व्यक्ति परमेश्वर के कार्य और वचनों का पालन कैसे कर सकता है जो मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप नहीं है? सबसे अधिक विद्रोही वे लोग होते हैं जो जानबूझकर परमेश्वर की अवहेलना और उसका विरोध करते हैं। ऐसे लोग परमेश्वर के शत्रु और मसीह विरोधी हैं। ऐसे लोग परमेश्वर के नए कार्य के प्रति निरंतर शत्रुतापूर्ण रवैया रखते हैं, ऐसे व्यक्ति में कभी भी समर्पण का कोई भाव नहीं होता, न ही उसने कभी खुशी से समर्पण किया होता है या दीनता का भाव दिखाया है। ऐसे लोग दूसरों के सामने अपने आपको ऊँचा उठाते हैं और कभी किसी के आगे नहीं झुकते। परमेश्वर के सामने, ये लोग वचनों का उपदेश देने में स्वयं को सबसे ज़्यादा निपुण समझते हैं और दूसरों पर कार्य करने में अपने आपको सबसे अधिक कुशल समझते हैं। इनके कब्ज़े में जो "खज़ाना" होता है, ये लोग उसे कभी नहीं छोड़ते, दूसरों को इसके बारे में उपदेश देने के लिए, अपने परिवार की पूजे जाने योग्य विरासत समझते हैं, और उन मूर्खों को उपदेश देने के लिए इनका उपयोग करते हैं जो उनकी पूजा करते हैं। कलीसिया में वास्तव में इस तरह के कुछ ऐसे लोग हैं। ये कहा जा सकता है कि वे "अदम्य नायक" हैं, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी परमेश्वर के घर में डेरा डाले हुए हैं। वे वचन (सिद्धांत) का उपदेश देना अपना सर्वोत्तम कर्तव्य समझते हैं। साल-दर-साल और पीढ़ी-दर-पीढ़ी वे अपने "पवित्र और अलंघनीय" कर्तव्य को पूरी प्रबलता से लागू करते रहते हैं। कोई उन्हें छूने का साहस नहीं करता; एक भी व्यक्ति खुलकर उनकी निंदा करने की हिम्मत नहीं दिखाता। वे परमेश्वर के घर में "राजा" बनकर युगों-युगों तक बेकाबू होकर दूसरों पर अत्याचार करते चले आ रहे हैं। दुष्टात्माओं का यह झुंड संगठित होकर काम करने और मेरे कार्य का विध्वंस करने की कोशिश करता है; मैं इन जीती-जागती दुष्ट आत्माओं को अपनी आँखों के सामने कैसे अस्तित्व में बने रहने दे सकता हूँ? यहाँ तक कि आधा-अधूरा आज्ञापालन करने वाले लोग भी अंत तक नहीं चल सकते, फिर इन आततायियों की तो बात ही क्या है जिनके हृदय में थोड़ी-सी भी आज्ञाकारिता नहीं है! इंसान परमेश्वर के कार्य को आसानी से ग्रहण नहीं कर सकता। इंसान अपनी सारी ताक़त लगाकर भी थोड़ा-बहुत ही पा सकता है जिससे वो आखिरकार पूर्ण बनाया जा सके। फिर प्रधानदूत की संतानों का क्या, जो परमेश्वर के कार्य को नष्ट करने की कोशिश में लगी रहती हैं? क्या परमेश्वर द्वारा उन्हें ग्रहण करने की आशा और भी कम नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो सच्चे हृदय से परमेश्वर की आज्ञा का पालन करते हैं वे निश्चित रूप से परमेश्वर द्वारा हासिल किए जाएँगे' से उद्धृत

हर पंथ और संप्रदाय के अगुवाओं को देखो। वे सभी अभिमानी और आत्म-तुष्ट हैं, और वे बाइबल की व्याख्या संदर्भ के बाहर और उनकी अपनी कल्पना के अनुसार करते हैं। वे सभी अपना काम करने के लिए प्रतिभा और पांडित्य पर भरोसा करते हैं। यदि वे कुछ भी उपदेश करने में असमर्थ होते, तो क्या वे लोग उनका अनुसरण करते? कुछ भी हो, उनके पास कुछ ज्ञान तो है ही, और वे सिद्धांत के बारे में थोड़ा-बहुत बोल सकते हैं, या वे जानते हैं कि दूसरों को कैसे जीता जाए, और कुछ चालाकियों का उपयोग कैसे करें, जिनके माध्यम से वे लोगों को अपने सामने ले आए हैं और उन्हें धोखा दे चुके हैं। नाम मात्र के लिए, वे लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, लेकिन वास्तव में वे अपने अगुवाओं का अनुसरण करते हैं। अगर वे उन लोगों का सामना करते हैं जो सच्चे मार्ग का प्रचार करते हैं, तो उनमें से कुछ कहेंगे, "हमें परमेश्वर में अपने विश्वास के बारे में हमारे अगुवा से परामर्श करना है।" देखिये, परमेश्वर में विश्वास करने के लिए कैसे उन्हें किसी की सहमति की आवश्यकता है; क्या यह एक समस्या नहीं है? तो फिर, वे सब अगुवा क्या बन गए हैं? क्या वे फरीसी, झूठे चरवाहे, मसीह-विरोधी, और लोगों के सही मार्ग को स्वीकार करने में अवरोध नहीं बन चुके हैं?

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'सत्य का अनुसरण करना ही परमेश्वर में सच्चे अर्थ में विश्वास करना है' से उद्धृत

कुछ ऐसे लोग हैं जो सर्वोच्च सत्ता की कार्य व्यवस्थाओं के प्रति अपने दृष्टिकोण में पूरी तरह से लापरवाह हैं। वे सोचते हैं, "सर्वोच्च सत्ता कार्य व्यवस्थाएं करती है और हम यहां नीचे पृथ्वी पर, अपना काम कर रहे हैं। जो कुछ कहा गया है और कुछ कार्य लचीले ढंग से कार्यान्वित किए जा सकते हैं—जब वे नीचे हमारे पास आते हैं, तो उनमें बदलाव किया जा सकता है। आखिरकार, सर्वोच्च सत्ता सिर्फ बात करती है, हम वे हैं जो वास्तव में कार्य कर रहे हैं। हम कलीसिया में स्थिति को समझते हैं पर सर्वोच्च सत्ता नहीं, इसलिए कलीसिया के लोग और काम जो हमें दिए गए हैं, वो जैसे हम उपयुक्त समझें, वैसे करने के लिए हैं। हम जैसे चाहे उसे कर सकते हैं और किसी को हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है।" ऐसे लोगों के लिए, परमेश्वर की सेवा करने का सिद्धांत यह हैः "अगर मुझे लगता है कि कोई चीज़ ठीक है, तो मैं उस पर ध्यान दूँगा; अगर मुझे लगता है कि कोई चीज़ व्यावहारिक नहीं है, मैं उसे नज़रअंदाज़ कर दूँगा। अगर मैं चाहूँ तो तुम्हारा प्रतिरोध कर सकता हूँ या तुम्हारे विरुद्ध जा सकता हूँ, कोई भी ऐसी चीज़ जो मैं नहीं चाहता, उसे मुझे कार्यान्वित करना या अंजाम नहीं देना है। अगर तुम कुछ कहते हो, वह मुझे अनुपयुक्त लगे, मैं उसे तुम्हारे लिए संपादित कर दूँगा और उसे साफ करने के बाद तुम्हें सौंप दूँगा। जो कुछ भी मैंने अनुमोदित नहीं किया है, वह छपने के लिए नहीं जा सकता।" हर जगह, सर्वोच्च सत्ता की व्यवस्थाओं को वे उनके मूल रूप में प्रचारित करते हैं, लेकिन यह व्यक्ति उन कार्य व्यवस्थाओं के संपादित संस्करण को उन लोगों को भेजता है, जिसकी वे अगुआई करते हैं। ऐसा व्यक्ति हमेशा परमेश्वर को दूर रखना चाहता है और चाहता है कि हर कोई उनका अनुसरण और उन पर विश्वास करे। जिस तरह से वे देखते हैं, कुछ स्थानों में परमेश्वर उनके बराबर नहीं है—उन्हें भी परमेश्वर होना चाहिए और हर किसी को उन पर विश्वास करना चाहिए। वे जो करते हैं, उसका यही स्वरूप है। अगर तुम लोग इस बात को समझ गए हो, तो क्या तुम फिर भी रोओगे जब ऐसे व्यक्ति को हटाया जाएगा और उसके स्थान पर किसी और को लाया जाएगा? क्या तुम्हें फिर भी उनके प्रति सहानुभूति होगी? तुम क्या फिर भी सोचोगे, "सर्वोच्च सत्ता जो करता है वह अनावश्यक और अन्यायपूर्ण है—कैसे सर्वोच्च सत्ता किसी को निकाल सकता है जिसने इतनी यातना भोगी हो?" किसकी खातिर उन्होंने यातना भोगी? उन्होंने अपनी प्रतिष्ठा की खातिर यातना भोगी है। क्या वे परमेश्वर की सेवा कर रहे हैं? क्या वे अपने कर्तव्य निभा रहे हैं? क्या वे परमेश्वर के प्रति निष्ठावान और समर्पित हैं? वे कुछ नहीं, वरन शैतान के नौकर हैं और उनका कार्य शैतान का प्रभुत्व है; यह परमेश्वर की प्रबंधन योजना को नष्ट करता है और उसके कार्य को बाधित करता है। यह किस प्रकार का विश्वास है? वे शैतान और मसीह-विरोधी के सिवाय और कुछ नहीं हैं!

— "अंत के दिनों के मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'परमेश्‍वर को नाराज़ करना क्‍या है?' से उद्धृत

मसीह-विरोधी खुले तौर पर सत्य और परमेश्वर के प्रति शत्रुता रखते हैं। वे चुने हुए लोगों के लिए परमेश्वर के साथ होड़ करते हैं, वे उसके साथ हैसियत और लोगों के दिलों के लिए होड़ करते हैं, यहाँ तक कि वे लोगों के दिल जीतने, उन्हें बहकाने और सुन्न कर देने के लिए सभी तरह की चीजें आजमाते हैं। संक्षेप में, वे जो कुछ भी करते हैं—चाहे खुले तौर पर करें या गुप्त रूप से—उसकी प्रकृति ही परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण होती है। मैं क्यों कहता हूँ कि वह परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण है? क्योंकि, यह स्पष्ट रूप से जानते हुए भी कि यह सत्य है, और यह भी स्पष्ट रूप से जानते हुए कि यह परमेश्वर है, वे प्रतिरोध में खड़े होते हैं। एक उदाहरण : कुछ कलीसियाओं में, जब मसीह-विरोधियों ने लोगों को ललचाकर अपनी ओर कर लिया, उन्हें फुसला लिया, और उन्हें अपनी इच्छा के आगे झुका लिया, तो फिर वे अलग कलीसिया स्थापित करने के लिए परमेश्वर के घर से सभी प्रकार की पुस्तकें और अन्य सामग्री हथिया लेंगे। इन्हीं लोगों द्वारा मसीह-विरोधियों की आराधना और अनुसरण किया जाता है, मसीह-विरोधी इन्हें दृढ़ता से अपने नियंत्रण में रखते हैं। इस तरह से व्यवहार करके, वे स्पष्ट रूप से चुने हुए लोगों के लिए परमेश्वर के साथ होड़ कर रहे हैं। यह मसीह-विरोधी के लक्षणों में से एक है या नहीं? इस तरह के स्पष्ट लक्षण के आधार पर उन्हें मसीह-विरोधियों के रूप में वर्गीकृत करना, उनके साथ अन्याय करना बिलकुल नहीं है, बल्कि बहुत सटीक है! फिर कुछ ऐसे मसीह-विरोधी भी हैं, जो एक स्वतंत्र बल गठित करने और लोगों को अपनी इच्छा के आगे झुकाने के लिए, अपनी शक्ति और प्रभाव का विकास करते हुए, ऐसे प्रत्येक व्यक्ति को बाहर निकाल देते हैं जो उनके अनुरूप नहीं होता, बस उन्हें साथ रखते हुए जो उनका अनुसरण और आज्ञापालन करते हैं, वे कलीसिया के भीतर ही अपना राज्य बना लेते हैं। ऊपरवाले से जो भी कार्य-व्यवस्थाएँ या अपेक्षाएँ आएँ, ये मसीह-विरोधी एक स्वतंत्र ढंग से कार्य करते हैं, जिससे उनके अधीनस्थ लोग ऊपर से आने वाली कार्य-व्यवस्थाओं को खुले तौर पर चुनौती देने लगते हैं। उदाहरण के लिए, ऊपरवाले की अपेक्षाएँ ये हैं कि जो अगुआ और कार्यकर्ता अनुपयुक्त हैं, उन्हें किसी भी समय बदला जा सकता है, किंतु मसीह-विरोधियों के दृष्टिकोण से, भले ही ये अगुआ और कार्यकर्ता अनुपयुक्त हों, लेकिन चूँकि वे मसीह-विरोधियों द्वारा विकसित किए गए हैं, इसलिए उन्हें ऊपरवाले के निर्देश से किसी भी परिस्थिति में बदला नहीं जा सकता, जब तक कि पहले स्वयं मसीह-विरोधियों को न हटा दिया जाए। उन्होंने इस कलीसिया का नियंत्रण हथिया लिया है या नहीं? उनके हाथ में जाते ही परमेश्वर के घर की कार्य-व्यवस्थाएँ संभव नहीं रह पातीं, और उन्हें कार्यान्वित नहीं किया जा सकता। कार्य-व्यवस्थाएँ बहुत पहले जारी की जा चुकी हैं, और प्रत्येक कलीसिया उनके कार्यान्वयन की स्थिति की सूचना भेज चुकी है—उदाहरण के लिए, कुछ परिस्थितियों के कारण किनके कर्तव्य बदल दिए गए हैं या उनसे ले लिए गए हैं—लेकिन उन क्षेत्रों में, जिनके लिए मसीह-विरोधी जिम्मेदार हैं, ऐसे कोई लोग नहीं हैं, किसी के भी कर्तव्यों में कोई बदलाव नहीं हुआ है। क्या ऐसा हो सकता है कि उस क्षेत्र में एक भी अनुपयुक्त व्यक्ति न हो? ऐसा भी होता है कि कुछ कर्मचारी अनुपयुक्त हैं और उन्हें बदलने के लिए मसीह-विरोधी को सीधे ऊपरवाले द्वारा आदेश दिया गया है, किंतु लंबे समय के बाद भी कोई जवाब नहीं आया है। यहाँ कोई समस्या है या नहीं? यह एक ऐसी स्थिति है, जिसमें कलीसिया मसीह-विरोधी के हाथों में पड़ गई है। ऊपरवाले से कार्य-व्यवस्थाएँ पूरी करने के आदेश नीचे आते हैं, लेकिन जब वे मसीह-विरोधी के पास पहुँचते हैं, तो उन्हें रोक दिया जाता है, और नीचे के लोगों तक कोई बात नहीं पहुँचती, जिससे वे ऊपरवाले के साथ समस्त संपर्क खो देते हैं, और सब-कुछ मसीह-विरोधियों द्वारा नियंत्रित किया जाता है। जब वे ऐसी चीजें करते हैं, तो उनकी प्रकृति कैसी होती है? यह मसीह-विरोधियों द्वारा खुद को दिखाने का मामला है।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे दुष्ट, धूर्त और कपटी हैं (I)' से उद्धृत

किस प्रकार का व्यक्ति ख़ुद अपना राज्य स्थापित करता है? (मसीह-विरोधी।) और इस प्रकार के व्यक्ति को "मसीह-विरोधी" क्यों कहा जाता है? सबसे पहले, "विरोधी" का मतलब है प्रतिरोधी और प्रतिपक्षी होना, और इसमें शामिल है मसीह के प्रति, परमेश्वर के प्रति, और सत्य के प्रति प्रतिरोधी और प्रतिपक्षी होना। "प्रतिरोधी और प्रतिपक्षी" होने का क्या मतलब है? (प्रत्यक्ष विरोध में खड़ा होना।) (घृणा करना।) क्या परमेश्वर से घृणा करने वाले और उसके प्रत्यक्ष विरोध में रहने वाले लोग सत्य को स्वीकार कर सकते हैं? क्या वे सत्य से प्यार कर सकते हैं? वे ऐसा बिल्कुल भी नहीं कर सकते। स्वयं को व्यक्त करने का उनका सबसे पहला ही तरीक़ा सत्य से प्यार नहीं करने वाला होता है। जब भी कोई सत्य बोलता है, तो वे उस व्यक्ति के चेहरे पर कुछ भी व्यक्त नहीं करते, लेकिन अपने हृदय में वे सत्य को स्वीकार नहीं करते, और काफ़ी गहराई में वे इसका विरोध करते हैं। सभी सकारात्मक चीजों का विरोध करते हुए—उन सभी सत्यों जैसे परमेश्वर के सामने समर्पण करना, निष्ठापूर्वक अपने कर्तव्यों का पालन करना, ईमानदार व्यक्ति होना, सभी चीज़ों में सत्य की तलाश आदि—क्या उनके पास थोड़ी भी व्यक्तिपरक ललक या प्रेम है? नहीं, नाममात्र भी नहीं। इसलिए, उनके अंदर मौजूद इस प्रकार की प्रवृत्ति और भाव को ध्यान में रखा जाए तो वे पहले से ही परमेश्वर और सत्य के प्रत्यक्ष विरोध में खड़े हैं। तो, अपरिहार्य रूप से, ऐसे लोग सत्य या किसी सकारात्मक चीज़ से गहराई के साथ प्यार नहीं करते। उदाहरण के लिए, अगुवाई के पदों पर बैठे लोगों को अपने भाइयों और बहनों के विभिन्न विचारों को स्वीकार करने में सक्षम होना चाहिए, उन्हें भाइयों और बहनों के सामने अपने आपको व्यक्त करने और भाइयों और बहनों की निंदा को स्वीकार करने में सक्षम होना चाहिए, और उन्हें पद की परवाह नहीं करनी चाहिए। मसीह-विरोधी अभ्यास के इन सही तरीकों के बारे में क्या सोचेगा? शायद वह कहेगा, "यदि मैं भाइयों और बहनों के विचारों को सुनता, तो क्या तब भी मैं एक अगुआ होता? क्या तब भी मेरे पास पद और प्रतिष्ठा होती? क्या तब भी मैं लोगों को खुद से डराने में सक्षम होता? यदि मैं लोगों को खुद से डरा नहीं सकता, और यदि मेरी कोई प्रतिष्ठा नहीं है, तो मैं क्या काम कर सकता हूँ?" यह ठीक उसी प्रकार का स्वभाव है, जो मसीह-विरोधी में होता है; वह सत्य को नाममात्र भी स्वीकार नहीं करता, और अभ्यास का तरीका जितना ज़्यादा उचित होता है, उतना ही वह उसका विरोध करता है। वह इस बात को स्वीकार नहीं करता कि अभ्यास के ये सही तरीके सत्य का अभ्यास करने के तरीके हैं। उसकी मान्यता के अनुसार सत्य क्या है? वह यह है कि किसी के साथ व्यवहार करते समय व्यक्ति को हमेशा सख्ती बरतनी चाहिए, बुरे कामों, क्रूर तरीकों, और धोखेबाज़ी का इस्तेमाल करना चाहिए; व्यक्ति को कभी भी सत्य, प्रेम, और परमेश्वर के वचनों का उपयोग नहीं करना चाहिए। उसका रास्ता बुराई का रास्ता है। यह उन लोगों का स्वभाव और सार है जो मसीह-विरोधी किस्म के हैं, और इसी प्रकार से वे काम करते हैं और उनके कार्यों के पीछे की प्रेरणा भी यही है, वह स्रोत जहाँ से वे उत्पन्न होते हैं। उनकी प्रेरणा और उनके इरादे ऐसे ही हैं। उनकी प्रेरणा और उनके इरादों का सार, जिसे वे अक्सर प्रकट करते हैं, वस्तुतः एक मसीह-विरोधी का सार है—यानी सत्य के प्रति द्वेष और घृणा। यही उनका सार है। तो क्या, इसका मतलब सत्य और परमेश्वर के विरुद्ध खड़ा होना है? इसका मतलब है सत्य और सकारात्मक चीज़ों से घृणा करना। उदाहरण के लिए, सृष्टि के एक पदार्थ के तौर पर, व्यक्ति को एक सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य निभाना चाहिए; चाहे परमेश्वर जो भी कहे, मनुष्यों को समर्पण करना चाहिए, क्योंकि मनुष्य सृष्टि के पदार्थ हैं। लेकिन मसीह-विरोधी कैसे सोचता है? "यह असत्य नहीं है कि मैं सृष्टि का एक पदार्थ हूं, लेकिन जहाँ तक समर्पण की बात है, तो यह परिस्थिति पर निर्भर है। सर्वप्रथम और सबसे महत्त्वपूर्ण, इसमें मेरा कुछ लाभ होना चाहिए; मुझे किसी नुकसान में नहीं डाला जाना चाहिए, और मुझे अपने हितों को सबसे आगे रखना चाहिए। यदि पुरस्कार और बड़े आशीर्वाद प्राप्त किए जा सकते हैं और तुम चाहते हो कि मैं समर्पण कर दूं, तो ठीक है, लेकिन पुरस्कारों और किसी गंतव्य के बिना मैं समर्पण नहीं कर सकता।" मसीह-विरोधी इसी तरह से देखता है। एक अन्य उदाहरण के रूप में, परमेश्वर चाहता है कि लोग ईमानदार हों, लेकिन मसीह-विरोधी इसके बारे में क्या सोचता है? "केवल मूर्ख ही ईमानदार होते हैं; चतुर लोग ईमानदार नहीं होते।" क्या इन्हीं विचारों से सत्य को स्वीकार न करने की प्रवृत्ति बनती है? इस प्रकार की प्रवृत्ति का सार क्या है? इसका सार सत्य से घृणा है। यही ऐसे मसीह-विरोधियों का सार है, और उनका सार यह निर्धारित करता है कि वे कैसे मार्ग पर चलते हैं और, बदले में, जिस मार्ग पर वे चलते हैं वह निर्धारित करता है कि इस तरह का कर्तव्य निभाते समय वे क्या चीज़ें करेंगे।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे लोगों का दिल जीतना चाहते हैं' से उद्धृत

कुछ लोगों के पास एक मसीह-विरोधी के कुछ लक्षण होते हैं, और एक मसीह-विरोधी के स्वभाव के कुछ उद्गार, लेकिन वे सत्य को भी स्वीकार करते और मानते हैं, और सत्य से प्रेम करते हैं। वे उद्धार पाने के संभावित पात्र हैं। कुछ लोग, उनका स्वरूप चाहे जो भी हो, ऐसे हैं जो अपने प्रकृति-सार से ही सत्य के प्रति शत्रुतापूर्ण और घृणापूर्ण होते हैं। जैसे ही तुम सत्य की बात करते हो या उन्हें उपदेश देते हो, वे नाराज़ और विपक्षी हो जाते हैं: वे ऊँघना शुरू कर देते हैं, वे सो जाते हैं, वे ऊब जाते हैं, और जब वे समझते हैं तब भी उन्हें कोई रुचि नहीं होती है; या वे बाहर से सावधान लग सकते हैं, लेकिन वे सत्य को एक अलग दृष्टिकोण से, या ज्ञान और सिद्धांत के किसी ढाँचे से, मापते हैं। यदि मामला यह हो, तो चाहे वे परमेश्वर के कितने भी वचनों को पढ़ चुके हों या उन्होंने कितने भी उपदेश सुने हों, अंततः ओहदे और सांसारिक चीज़ों की तलाश, परमेश्वर से शत्रुता और सत्य के प्रति विद्वेष के उनके नज़रिए में कभी लेशमात्र भी परिवर्तन नहीं होगा। यह मसीह-विरोधी की ख़ासियत होती है। इसलिए, जब तुम कहते हो कि उनके काम का उद्देश्य लोगों को उनके पक्ष में जीतना है, और वे परमेश्वर के क़द के लिए स्पर्धा करने और लोगों को धोखा देने के लिए खुद की प्रशंसा करते और गवाही देते हैं, और यह कि उनके काम शैतान और मसीह-विरोधियों वाले हैं, तो क्या वे इस तरह की निंदा को स्वीकार करते हैं? वे नहीं करते। वे सोचते हैं: "मेरे लिए इस तरह से काम करना सही और उचित है। मैं इसी तरह से चीज़ों को किया करता हूँ। तुम चाहे मेरी जितनी भी निंदा और आलोचना कर सकते हो—मैं इस तलाश, इस इच्छा, या चीज़ों को करने के इस तरीके को छोड़ना नहीं चाहूँगा।" यह तय है: वे मसीह-विरोधी हैं। तुम्हारा कहा हुआ कुछ भी उनके दृष्टिकोण को बदल नहीं सकता है, न ही यह उनकी अभिप्रेरणाओं और इरादों को बदल सकता है, न ही उनकी महत्वाकांक्षाओं और इच्छाओं को। यह एक पक्के मसीह-विरोधी का प्रकृति-सार है। चाहे उनकी परिस्थितियाँ कितनी भी बदल जाएँ, या उनके आसपास के लोग, मामले और चीज़ें कैसे भी बदलें, या समय कितना भी बदले, और परमेश्वर जिन संकेतों और चमत्कारों को करता है और उन्हें जितना अनुग्रह देता है—भले ही वह उन्हें दंडित करता हो—इन सब की परवाह किए बिना, उनके इरादे कभी नहीं बदलेंगे। एक इंसान होने का उनका तरीका और चीज़ों को करने का तरीका कभी नहीं बदलेगा, और न ही सत्य के प्रति उनकी दुश्मनी का नज़रिया बदलेगा। जब अन्य लोग बताते हैं कि वे जो कर रहे हैं वह अपनी ही प्रशंसा करना और गवाही देना है और लोगों को धोखा देने की कोशिश करना है, तो वे अपने बोलने के तरीके को बदल कर ऐसा बना देते हैं, कि इसके बारे में कोई भी आपत्ति न उठा सके और इसे कोई भांप न सके। वे अपने प्रबंधन को पूरा करने और अपने गुप्त उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए और भी अधिक कुटिल साधनों का उपयोग करते हैं। यह वही है जो एक मसीह-विरोधी में प्रकट होता है, और यह एक मसीह-विरोधी के सार से उत्पन्न होता है। यहाँ तक कि अगर परमेश्वर उन्हें बताए कि उन्हें दंडित किया जाएगा, कि उनका अंत आ गया है, कि वे शापित और निंदित थे, क्या इससे उनका सार बदल सकता है? क्या यह सत्य के प्रति उनके दृष्टिकोण को बदल सकता है? क्या यह पद, भाग्य और प्रतिष्ठा के प्रति उनके लगाव को बदल सकता है? नहीं बदल सकता। जिन लोगों को शैतान ने भ्रष्ट किया है उनको सामान्य मानवता वाले ऐसे लोगों में बदल देना जो परमेश्वर की आराधना करते हों, परमेश्वर का कार्य है; इसे हासिल किया जा सकता है। लेकिन क्या राक्षसों को सामान्य लोगों में बदलना संभव है, उन लोगों को जो मानवीय त्वचा ओढ़े हुए हैं लेकिन जिनका सार शैतानी है, जो शैतान के शिविर में शैतान की पूजा करते हैं और परमेश्वर से शत्रुता रखते हैं? यह असंभव होगा। परमेश्वर इस तरह का कार्य नहीं करता है; जिन लोगों को परमेश्वर बचाता है उनमें ऐसे लोग शामिल नहीं हैं। तो फिर, परमेश्वर ऐसे लोगों को कैसे परिभाषित करता है? वे शैतान के हैं। वे परमेश्वर के चयन या उद्धार के विषय नहीं हैं; परमेश्वर ऐसे लोगों को नहीं चाहता है। चाहे वे परमेश्वर के घर में कितने समय तक रहे हों, उन्होंने जितना भी कष्ट उठाया हो या उनकी जो भी उपलब्धियाँ रही हों, उनके इरादे नहीं बदलते हैं। वे अपनी महत्वाकांक्षाओं या इच्छाओं को दरकिनार नहीं करेंगे, अपनी प्रतिष्ठा तथा लोगों को हासिल करने के लिए परमेश्वर के साथ होड़ लगाने की अपनी अभिप्रेरणा और लालसा को तो, वे और भी नहीं त्याग पाएँगे। ऐसे लोग जीते-जागते मसीह-विरोधी हैं।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे केवल अपने उन्नयन और गवाही के लिए काम करते हैं' से उद्धृत

सभी मसीह-विरोधी मर जाएंगे पर पश्चाताप नहीं करेंगे। वो अंतिम सांस तक परमेश्वर का विरोध करने की कसम खाते हैं और अंत तक लड़ते हैं। भले ही अंतर्मन में वे स्वीकार करते हैं कि परमेश्वर है, उसने मनुष्य की रचना की और कि वह मानव जाति को बचा सकता है, पर उनकी प्रकृति उन्हें उनके चुने हुए मार्ग को और परमेश्वर से उनके बैर के तथ्य को बदलने में असमर्थ बनाती है। इस प्रकार, मसीह-विरोधियों के व्यवहार का सार यह है कि वे लगातार ऐसे बहुत-से साधनों और तरीकों का इस्तेमाल करते रहते हैं, जिनसे वे रुतबा हासिल करने और लोगों को जीतने के अपने लक्ष्य को पूरा कर सकें, ताकि लोग उनका अनुसरण करें और उनका स्तुतिगान करें। संभव है कि अपने दिल की गहराइयों में वे जानबूझकर मानवता को लेकर परमेश्वर से होड़ न कर रहे हों, पर एक बात तो पक्की है, अगर मनुष्यों को लेकर वे परमेश्वर के साथ होड़ न भी कर रहे हों तो भी वे मनुष्यों के बीच रुतबा और शक्ति पाना चाहते हैं। अगर वह दिन आ भी जाए जब उन्हें यह अहसास होने लगे कि वे परमेश्वर के साथ होड़ कर रहे हैं, और वे अपने-आप पर लगाम लगा लें, तो भी वे दूसरे तरीकों का इस्तेमाल करके लोगों के बीच रुतबा और मान्यता पाने की कोशिश करते रहते हैं। संक्षेप में, भले ही मसीह-विरोधी जो कुछ भी करते हैं उससे वे अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करते प्रतीत होते हैं, और परमेश्वर के सच्चे अनुयायी लगते हैं, पर लोगों को नियंत्रित करने और उनके बीच रुतबा और शक्ति हासिल करने की उनकी महत्वाकांक्षा कभी नहीं बदलेगी। चाहे परमेश्वर कुछ भी कहे या करे, चाहे वह लोगों से कुछ भी चाहता हो, वे वह नहीं करते जो उन्हें करना चाहिए, या अपने कर्तव्य उस तरह से नहीं निभाते कि वे परमेश्वर के वचनों और जरूरतों के अनुरूप हों, न ही वे उसके कथनों और सत्य को समझते हुए शक्ति और रुतबे का मोह ही त्यागते हैं। पूरे समय उनकी महत्वाकांक्षा उन पर सवार रहती है, उनके व्यवहार और विचारों को नियंत्रित और निर्देशित करती है, और उस रास्ते को तय करती है जिस पर वे चलते हैं। यह एक मसीह-विरोधी का सार-संक्षेप है। यहाँ क्या बात रेखांकित होती है? कुछ लोग पूछते हैं, "क्या मसीह-विरोधी वे लोग नहीं हैं जो लोगों को जीतने के लिए परमेश्वर से होड़ करते हैं, और जो उसे नहीं मानते?" वे परमेश्वर को मानने वाले भी हो सकते हैं, वे सही तौर पर उसे मानने वाले और उसके अस्तित्व में विश्वास रखने वाले हो सकते हैं, वे उसका अनुसरण करने और सत्य की खोज के इच्छुक भी हो सकते हैं, पर एक चीज कभी नहीं बदलेगी : वे शक्ति और रुतबे की अपनी महत्वाकांक्षा का त्याग कभी नहीं करेंगे, न ही वे अपने वातावरण के कारण या अपने प्रति परमेश्वर के रवैये के कारण इन चीजों का पीछा करना छोड़ेंगे। ये एक मसीह-विरोधी की विशिष्टताएँ हैं। किसी व्यक्ति ने कितना ही कष्ट क्यों न उठाया हो, उसने सत्य को कितना ही क्यों न समझ लिया हो, उसने कितनी ही सत्य-वास्तविकताओं में प्रवेश क्यों न कर लिया हो, उसे परमेश्वर का कितना ही ज्ञान क्यों न हो, इन बाहरी प्रतिभासों और अभिव्यक्तियों से परे, वह व्यक्ति कभी भी रुतबे और शक्ति के लिए अपनी महत्वाकांक्षा और प्रयासों पर न तो लगाम लगाएगा और न ही इनका परित्याग करेगा, और इससे उसका प्रकृति सार स्पष्ट रूप से निर्धारित हो जाता है। ऐसे लोगों को मसीह-विरोधियों के रूप में परिभाषित करने में परमेश्वर ने जरा-सी भी गलती नहीं की है, इसे उनके प्रकृति सार ने ही निर्धारित कर दिया है। शायद कुछ लोग मानते थे कि मानवता के लिए परमेश्वर के साथ प्रतिस्पर्धा की कोशिश करने वाला व्यक्ति मसीह-विरोधी है। हालांकि, कई बार यह ज़रूरी नहीं होता कि मसीह-विरोधी परमेश्वर के साथ प्रतिस्पर्धा ही करें; इतना ही काफ़ी होता है कि उनका ज्ञान, समझ और प्रतिष्ठा व सामर्थ्य की आवश्यकता सामान्य लोगों के विपरीत हो। सामान्य लोग दंभी हो सकते हैं; वे दूसरों की प्रशंसा जीतने की और उन पर धाक जमाने का प्रयास कर सकते हैं, एक अच्छी श्रेणी पाने की होड़ लगाने का प्रयास कर सकते हैं। यह सामान्य लोगों की महत्वाकांक्षा है। जब उन्हें नेताओं के रूप में प्रतिस्थापित किया जाता है, उनके पद उनसे छिन जाते हैं, वे उससे उबर जाते हैं; वातावरण में परिवर्तन से, थोड़े आध्यात्मिक कद के विकास से, सत्य की थोड़ी-बहुत प्राप्ति या सत्य की गहरी समझ आने पर उनकी महत्वाकांक्षा धीरे-धीरे शांत हो जाती है। उनका मार्ग व दिशा बदल जाते हैं और प्रतिष्ठा व सामर्थ्य की उनकी खोज धूमिल होने लगती है। उनकी इच्छाएँ भी धीरे-धीरे कम होती जाती हैं। हालाँकि मसीह-विरोधी अलग होते हैं : वे प्रतिष्ठा व सामर्थ्य की अपनी खोज कभी नहीं छोड़ सकते। किसी भी समय, किसी भी वातावरण में, चाहे उनके आसपास कैसे भी लोग हों और वे कितने ही बूढ़े हो जाएँ, उनकी महत्वाकांक्षा कभी नहीं बदलेगी। किस बात से यह संकेत मिलता है कि उनकी महत्वाकांक्षा कभी नहीं बदलेगी? मान लें कि वे कलीसिया के नेता हैं : वे कलीसिया में सभी को नियंत्रित करना चाहेंगे। फिर शायद वे किसी दूसरे कलीसिया में जाएँ, जहां वे नेता नहीं हैं, फिर भी वे वह प्रतिष्ठा पाने के लिए तरसते हैं। ऐसे लोग जहाँ भी जाते हैं, सामर्थ्य इस्तेमाल करना चाहते हैं। क्या महत्वाकांक्षा उनके हृदयों में कूट-कूटकर नहीं भरी हुई है? वे जो ज़ाहिर करते हैं वह सामान्य मानवता के दायरे से परे है। क्या यह असामान्य नहीं है? इसमें असामान्य क्या है? वे जो ज़ाहिर करते हैं वह सामान्य मानवता द्वारा ज़ाहिर किए जाने योग्य नहीं है। वे क्या ज़ाहिर करते हैं? वह क्या है जिसकी वजह से यह ज़ाहिर होता है? इसका कारण उनकी प्रकृति है। वे बुरे आत्मा हैं। यह साधारण भ्रष्टता नहीं है; यह उससे अलग है। मसीह-विरोधी प्रतिष्ठा व सामर्थ्य की खोज में अनथक प्रयत्न करते रहते हैं; वह पूरी तरह से इनके दिलो-दिमाग पर छाई रहती है। यह उनका प्रकृति-सार है; यह उनका मूल रूप है और उनका असली चेहरा है। प्रतिष्ठा के लिए वे केवल परमेश्वर के साथ प्रतिस्पर्धा नहीं करते बल्कि लोगों के साथ भी प्रतिस्पर्धा करते हैं। दूसरे लोग चाहे इच्छुक हों या न हों, राज़ी हों या न हों, मसीह-विरोधी उनकी इच्छाओं की परवाह किए बगैर सक्रिय रूप से उन्हें नियंत्रित करने और उनके नेता बनने की कोशिश करते हैं। मसीह-विरोधी जहाँ भी जाते हैं, प्रभारी बनना चाहते हैं और अपनी बात मनवाना चाहते हैं। क्या यह उनकी प्रकृति है? क्या लोग तुम्हारी बातें सुनना चाहते हैं? क्या उन्होंने तुम्हें चुना है? क्या लोगों ने तुम्हारा चयन किया है? क्या वे सहमत हैं कि अंतिम निर्णय तुम्हारा हो? कोई नहीं चाहता कि अंतिम निर्णय इन लोगों का हो और कोई भी उनकी बात नहीं सुनता, फिर भी वे अपनी कोशिशों से बाज नहीं आते। क्या यह कोई समस्या है? वे निहायत ही बेशर्म और निर्लज्ज होते हैं। जब ऐसे लोग नेता होते हैं, तब वे मसीह-विरोधी होते हैं; जब वे नेता नहीं होते, तब भी वे मसीह-विरोधी होते हैं।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे लोगों को भ्रमित करने, फुसलाने, धमकाने और नियंत्रित करने का काम करते हैं' से उद्धृत

अपनी हैसियत और प्रतिष्ठा के प्रति मसीह-विरोधियों का चाव सामान्य लोगों से कहीं ज्यादा होता है, और यह एक ऐसी चीज है जो उनके स्वभाव और सार के भीतर होती है; यह कोई अस्थायी रुचि या उनके परिवेश का क्षणिक प्रभाव नहीं होता—यह उनके जीवन, उनकी हड्डियों में समायी हुई चीज है, और इसलिए यह उनका सार है। कहने का तात्पर्य यह है कि मसीह-विरोधी जो कुछ भी करता है, उसमें उनका पहला विचार अपनी हैसियत और प्रतिष्ठा का होता है, और कुछ नहीं। मसीह-विरोधी के लिए हैसियत और प्रतिष्ठा उनका जीवन और उनके जीवन भर का लक्ष्य होती हैं। वे जो कुछ भी करते हैं, उसमें उनका पहला विचार यही होता है : "मेरी हैसियत का क्या होगा? और मेरी प्रतिष्ठा का क्या होगा? क्या ऐसा करने से मुझे प्रतिष्ठा मिलेगी? क्या इससे लोगों के मन में मेरी हैसियत बढ़ेगी?" यही वह पहली चीज है जिसके बारे में वे सोचते हैं, जो इस बात का पर्याप्त प्रमाण है कि उनमें मसीह-विरोधियों का स्वभाव और सार है; अन्यथा वे इस प्रकार प्रयास नहीं करते। यह कहा जा सकता है कि मसीह-विरोधी के लिए हैसियत और प्रतिष्ठा कोई अतिरिक्त आवश्यकता नहीं है, कोई बाहरी चीज तो बिलकुल भी नहीं है जिसके बिना उनका काम चल सकता हो। ये मसीह-विरोधियों की प्रकृति का हिस्सा हैं, ये उनकी हड्डियों में हैं, उनके खून में हैं, ये उनमें जन्मजात हैं। मसीह-विरोधी इस बात के प्रति उदासीन नहीं होते कि उनके पास हैसियत और प्रतिष्ठा है या नहीं; यह उनका रवैया नहीं होता। फिर उनका रवैया क्या होता है? हैसियत और प्रतिष्ठा उनके दैनिक जीवन से, उनकी दैनिक स्थिति से, जिस चीज के लिए वे दैनिक आधार पर प्रयास करते हैं उससे, घनिष्ठ रूप से जुड़ी होती हैं। और इसलिए मसीह-विरोधियों के लिए हैसियत और प्रतिष्ठा उनका जीवन हैं। चाहे वे कैसे भी जीते हों, चाहे वे किसी भी वातावरण में रहते हों, चाहे वे कोई भी काम करते हों, चाहे वे किसी भी चीज के लिए प्रयास करते हों, उनके कोई भी लक्ष्य हों, उनके जीवन की कोई भी दिशा हो, हैसियत और प्रतिष्ठा ही उनका वह प्रयोजन, वह लक्ष्य होता है जिसका वे अनुसरण करते हैं, जिसे वे अपने दिलों से जाने नहीं दे सकते। यह मसीह-विरोधियों का असली चेहरा और उनका सार है। तुम उन्हें पहाड़ों की गहराई में किसी प्राचीन जंगल में छोड़ दो, फिर भी वे हैसियत और प्रतिष्ठा को नहीं छोड़ेंगे; तुम उन्हें सामान्य लोगों के समूह में रख दो, फिर भी वे हैसियत और प्रतिष्ठा के बारे में ही सोचेंगे। और इसलिए, जब वे विश्वास प्राप्त कर लेते हैं, तो वे अपनी हैसियत और प्रतिष्ठा को परमेश्वर में विश्वास के अनुसरण के समान मानते हैं; कहने का तात्पर्य यह है कि जब वे परमेश्वर में विश्वास के मार्ग पर चलते हैं, तो वे अपनी हैसियत और प्रतिष्ठा का अनुसरण भी करते हैं। यह कहा जा सकता है कि अपने दिलों में वे मानते हैं कि परमेश्वर में विश्वास और सत्य की खोज हैसियत और प्रतिष्ठा की खोज है; हैसियत और प्रतिष्ठा की खोज सत्य की खोज भी है, और हैसियत और प्रतिष्ठा प्राप्त करना सत्य और जीवन प्राप्त करना है। परमेश्वर में विश्वास के मार्ग पर अगर उन्हें लगता है कि उन्होंने पर्याप्त हैसियत प्राप्त नहीं की है—अगर कोई उनका सम्मान या उनकी सराहना नहीं करता, अगर वे दूसरों के बीच महिमामंडित नहीं होते और उनके पास कोई वास्तविक शक्ति नहीं है—तो वे बहुत हतोत्साहित होते हैं, और मानते हैं कि परमेश्वर में विश्वास करने का कोई महत्व या मूल्य नहीं है। "क्या विश्वास का मेरा तरीका परमेश्वर द्वारा अस्वीकृत है? क्या मुझे जीवन नहीं मिला?" अपने मन में अकसर वे इन्हीं बातों का हिसाब-किताब लगाया करते हैं; वे योजना बनाते हैं कि कैसे वे परमेश्वर के घर या उस वातावरण में, जिसमें वे हैं, कोई पद प्राप्त कर सकते हैं, कैसे वे उच्च प्रतिष्ठा और एक निश्चित स्तर का अधिकार प्राप्त कर सकते हैं, जब वे बोलते हैं तो कैसे वे लोगों को अपनी बात सुनने और अपनी चापलूसी करने पर बाध्य कर सकते हैं, कैसे वे उनसे अपनी बात मनवा सकते हैं, कैसे वे किसी समूह में चीजों पर एकतरफा मत रख सकते हैं और अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकते हैं। अपने मन में अकसर वे यही बात सोचा करते हैं। ऐसे लोग इसी के लिए प्रयास किया करते हैं। वे हमेशा ऐसी बातों के बारे में ही क्यों सोचते रहते हैं? सत्य सुनने के बाद, प्रवचन सुनने के बाद, परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद क्या वे वाकई यह सब नहीं समझते? क्या परमेश्वर के वचन और सत्य वास्तव में उनकी धारणाएँ, विचार और मत बदलने में सक्षम नहीं हैं? यह लोगों के स्वभाव और सार की समस्या है।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे अपना कर्तव्य केवल खुद को अलग दिखाने और अपने हितों और महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए निभाते हैं; वे कभी परमेश्वर के घर के हितों की नहीं सोचते, और अपनी व्यक्तिगत महिमा के बदले उन हितों को बेच तक देते हैं (III)' से उद्धृत

चाहे वे किसी भी समूह में क्यों न हों, मसीह-विरोधियों का आदर्श वाक्य क्या होता है? "मुझे प्रतिस्पर्धा करनी चाहिए! प्रतिस्पर्धा! प्रतिस्पर्धा! मुझे सर्वोच्च और सबसे शक्तिशाली बनने के लिए प्रतिस्पर्धा करनी चाहिए!" यह मसीह-विरोधियों का स्वभाव है; वे जहाँ भी जाते हैं, प्रतिस्पर्धा करते हैं और अपने लक्ष्य हासिल करने का प्रयास करते हैं। वे शैतान के अनुचर हैं, और वे परमेश्वर के घर के काम में बाधा डालते हैं। मसीह-विरोधियों का स्वभाव ऐसा है : जो कोई भी अपने पेशेवर काम में उत्कृष्टता दिखाता है, जिसने भी लंबे समय से परमेश्वर में विश्वास किया होता है, जिसके पास भी कुछ विशेष कौशल होता है, जो कोई भी भाई-बहनों के लिए उनके जीवन-प्रवेश में लाभकारी रहा है, जो कोई भी अच्छा माना जाता है, जिस किसी का भी भाई-बहनों में आदर से उल्लेख किया जाता है, जिसके पास भी अधिक सकारात्मक चीजें होती हैं, उसी के खिलाफ वे प्रतिस्पर्धा करते हैं। संक्षेप में, हर बार जब मसीह-विरोधी लोगों के समूह में होते हैं, तो वे हमेशा यही करते हैं। वे हैसियत के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं, उच्च प्रतिष्ठा के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं, मामलों पर अपना कहा मनवाने के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं और समूह में निर्णय लेने की परम शक्ति के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं, जिनकी प्राप्ति उन्हें खुश कर देती है। लेकिन क्या वे इन चीजों को हासिल करने के बाद कोई वास्तविक कार्य करते हैं? (नहीं।) इन चीजों के लिए प्रतिस्पर्धा वे वास्तविक कार्य करने के लिए नहीं करते। उनका उद्देश्य हर किसी को नीचे धकेलना होता है : "कौन परवाह करता है कि तुम आश्वस्त हो या नहीं? पूँजी की दृष्टि से मेरे पास सबसे अधिक है; भाषण की दृष्टि से मैं सबसे वाक्पटु हूँ; हाथ में लिए हुए पेशेवर काम में कौशल के मामले में मैं किसी से कम नहीं हूँ।" वे हर चीज में प्रतिस्पर्धा करते हैं। जब भाई-बहन उन्हें निरीक्षक चुनते हैं, तो वे निर्णय लेने के अधिकार के लिए, अंतिम निर्णय के लिए अपने सहयोगियों के साथ प्रतिस्पर्धा करते हैं; अगर कलीसिया उन्हें किसी कार्य का प्रभारी बनाती है, तो वे चाहते हैं कि उसे कैसे करना है, इसमें उनका कहा अंतिम होना चाहिए, और वे अपनी बातों, अपने विचारों और अपने निर्णयों के अपनाए और वास्तविकता में बदले जाने के लिए लड़ते हैं। अगर भाई-बहन किसी और के सुझाव को अपना लेते हैं, तो वह उनसे सहन नहीं होता। अगर तुम, जैसा वे कहते हैं वैसा नहीं करते, तो वे तुम्हें दिखा देंगे कि बॉस कौन है, ताकि तुम्हें लगे कि उनके बिना तुम्हारा काम नहीं चल सकता, और अगर तुम वैसा नहीं करते जैसा वे कहते हैं, तो तुम परिणाम भुगतने के एहसास से भर जाओ। मसीह-विरोधियों का इतना घमंडी, घिनौना और अविवेकी स्वभाव होता है। उनमें मानवता का, और उससे भी बढ़कर समझ का, पूर्ण अभाव प्रकट होता है। उनके व्यवहार में सब-कुछ उनके कार्यों में औचित्य की पूरी कमी दर्शाता है। वे तुम्हारा कहा स्वीकार नहीं करेंगे; तुम्हारे शब्द कितने भी सही क्यों न हों, वे उन पर ध्यान नहीं देंगे, और तुम एक बंद गली में पहुँच जाओगे। जो एकमात्र सिद्धांत वे स्वीकार कर सकते हैं, वह यह है कि चाहे वे किसी भी समूह में हों, अगर वे वह हैसियत और प्रतिष्ठा प्राप्त कर सकते हैं जो उनका हक है, तो उनके दिल को चैन मिलता है : वे मानते हैं कि यह उनके अस्तित्व का मूल्य है। चाहे वे किसी भी समूह के लोगों के बीच हों, उन्हें लोगों को वह "प्रकाश" और "गर्मी" दिखानी होती है जो वे प्रदान करते हैं, अपनी विशेष प्रतिभा, अपनी अद्वितीयता दिखानी होती है। चूँकि वे मानते हैं कि वे विशेष हैं, इसलिए वे स्वाभाविक रूप से सोचते हैं कि उनके साथ दूसरों से बेहतर व्यवहार किया जाना चाहिए, कि उन्हें लोगों का समर्थन और प्रशंसा मिलनी चाहिए, कि लोगों को उन्हें सम्मान देना चाहिए, उनकी पूजा करनी चाहिए—उन्हें लगता है कि यह सब उनका हक है। क्या ऐसे लोग बड़ी परेशानी नहीं होते? सामान्य ज्ञान कहता है कि जब कुछ होता है, तो लोगों को उसे सुनना चाहिए जो सही हो, कि जिसके भी शब्द परमेश्वर के घर के लिए फायदेमंद हों, उसे मानना चाहिए, कि जिसके भी विचार सत्य-सिद्धांतों के अनुरूप हों, लोगों को उसे अपनाना चाहिए—लेकिन अगर सामान्य ज्ञान प्रबल होगा, तो हो सकता है, लोग उनके विचारों को न अपनाएँ, तो वे क्या करते हैं? वे घबरा जाते हैं, और अपने विचारों और सुझावों का बचाव करने और उन्हें सही ठहराने की कोशिश करते रहते हैं, दूसरों को समझाने के लिए जो कुछ कर सकते हैं वह करते हैं, भाई-बहनों को अपनी बात सुनने और अपने सुझाव अपनाने के लिए मजबूर करते हैं। वे इस बात पर विचार नहीं करते कि अगर उनका सुझाव अपना लिया गया, तो उसका परमेश्वर के घर के कार्य पर क्या प्रभाव पड़ेगा; यह उनके विचार के दायरे में नहीं होता। वे केवल यह सोचते हैं, "अगर इस बार मेरे सुझाव नहीं माने गए, तो मैं अपना मुँह कैसे दिखा पाऊँगा? इसलिए मुझे प्रतिस्पर्धा करनी होगी—अपने सुझाव मनवाने के लिए प्रतिस्पर्धा करनी होगी।" हर बार वे यही सोचते और करते हैं—और ठीक यही मसीह-विरोधी का स्वभाव होता है।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे अपना कर्तव्य केवल खुद को अलग दिखाने और अपने हितों और महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए निभाते हैं; वे कभी परमेश्वर के घर के हितों की नहीं सोचते, और अपनी व्यक्तिगत महिमा के बदले उन हितों को बेच तक देते हैं (III)' से उद्धृत

एक मसीह-विरोधी के सार की सबसे स्पष्ट विशेषताओं में से एक यह होती है कि वे अपनी तानाशाही चलाने वाले किसी तानाशाह की तरह होते हैं : वे किसी की नहीं सुनते, वे हर किसी को तुच्छ समझते हैं, और अन्य कोई भी जो कुछ कहता है, करता है, उनके पास जो अंतर्दृष्टियाँ होती हैं, उनकी ताकतें—उनकी नजरों में वे सब उनसे तुच्छ होते हैं। उन्हें लगता है कि कोई भी उसमें भाग लेने के योग्य नहीं हैं जो वे करना चाहते हैं, न ही वे परामर्श लिए जाने या सुझाव देने के योग्य हैं—यह एक मसीह-विरोधी की तरह का स्वभाव है। कुछ लोग कहते हैं कि यह खराब मानवता वाला होना है—यह सिर्फ सामान्य खराब मानवता कैसे हो सकती है? यह पूर्णत: एक शैतानी स्वभाव है; इस तरह का स्वभाव अत्यंत उग्र होता है। मैं क्यों कहता हूँ कि उनका स्वभाव अत्यंत उग्र होता है? मसीह-विरोधी कलीसिया के हितों सहित परमेश्वर के घर के काम को पूरी तरह से अपना मानते हैं, अपनी व्यक्तिगत संपत्ति की तरह, जिसका प्रबंधन पूरी तरह से उन्हीं के द्वारा किया जाना चाहिए, उसमें किसी और का हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए। और इसलिए परमेश्वर के घर का काम करते समय वे केवल अपने ही हितों, अपनी ही हैसियत और प्रतिष्ठा के बारे में सोचते हैं। वे हर उस व्यक्ति को अस्वीकार कर देते हैं, जो उनकी नजरों में उनकी हैसियत और प्रतिष्ठा के लिए खतरा हो। वे उनका दमन और बहिष्कार करते हैं। वे उन लोगों का भी निष्कासन और दमन करते हैं, जो कुछ विशेष कर्तव्य निभाने के लिए उपयोगी और उपयुक्त होते हैं। वे न तो परमेश्वर के घर के काम को जरा भी तवज्जो देते हैं, न ही परमेश्वर के घर के हितों को। यदि कोई उनकी हैसियत के लिए खतरा हो सकता है, उन्हें समर्पित नहीं होता, उन पर ध्यान नहीं देता, तो वे उसे निष्कासित कर देते हैं और उसे दूर रखते हैं। वे उसे अपने साथ सहयोग नहीं करने देते, और विशेष रूप से उसे अपनी शक्ति के दायरे में कोई महत्वपूर्ण भूमिका नहीं निभाने देते या किसी भी महत्वपूर्ण उपयोग का नहीं होने देते। चाहे उन लोगों के कर्म कितने भी श्रेष्ठ हों या चाहे उन्होंने परमेश्वर के घर के लिए कितना भी अच्छा काम किया हो, मसीह-विरोधी उसे छिपा देते हैं, उसकी बेकद्री करते हैं, उसे भाइयों और बहनों को नहीं दिखाते, और उन्हें अँधेरे में रखते हैं। इसके अलावा, मसीह-विरोधी अकसर इन लोगों की असफलताओं और भ्रष्टताओं को भाइयों और बहनों के बीच ले आते हैं, वे कहते हैं कि ये लोग अभिमानी हैं, कि ये लोगों और मुद्दों को लेकर बात का बतंगड़ बनाते हैं, कि ये परमेश्वर के घर के हितों से विश्वासघात करने के लिए तत्पर रहते हैं, कि ये परमेश्वर के घर के बजाय बाहरी लोगों की मदद करते हैं, कि ये अज्ञानी हैं, इत्यादि। इन लोगों का निष्कासन और दमन करने के लिए वे हर तरह का बहाना ढूँढ़ लेते हैं। वास्तव में, इनमें से कुछ लोगों में कोई विशेष कौशल होता है, और कुछ में बस थोड़ा-सा दोष होता है। कुल मिलाकर वे कर्तव्य निभाने के लिए उपयुक्त होते हैं, वे कर्तव्य निभाने वाले व्यक्ति के सिद्धांतों के साथ मेल खाते हैं। लेकिन मसीह-विरोधियों की नजरों में, वे सोचते हैं : "मेरा इसे सहना संभव नहीं है। तुम मेरे साथ प्रतिस्पर्धा करने के लिए मेरे क्षेत्र के भीतर एक भूमिका चाहते हो। यह असंभव है, इसके बारे में सोचना भी मत। तुम मुझसे अधिक सक्षम हो, मुझसे अधिक मुखर हो, मुझसे अधिक शिक्षित हो और मुझसे अधिक लोकप्रिय हो। यदि तुमने मेरी सफलता चुरा ली, तो मैं क्या करूँगा? तुम चाहते हो कि मैं तुम्हारे साथ काम करूँ? इसके बारे में सोचना भी मत!" क्या वे परमेश्वर के घर के हितों पर विचार कर रहे हैं? नहीं। वे बस इस बारे में सोच रहे हैं कि अपनी हैसियत कैसे सुरक्षित करें, इसलिए वे इन लोगों का उपयोग करने के बजाय परमेश्वर के घर के हितों को नुकसान पहुँचा देंगे। यह बहिष्कार है। इसके अलावा, वे कोई योग्यता न रखने वाले मूर्खों को पनपाते हैं, ऐसे लोगों को, जो अक्षम होते हैं, जिन्हें आसानी से आदेश दिया जा सकता है, जो दब्बू और अज्ञानी होते हैं, जिनमें अंतर्दृष्टि की कमी होती है, जो अपने लिए नहीं सोचते, जो सत्य को नहीं समझते—केवल ऐसे ही लोगों को वे पालते हैं। अविश्वासियों में एक कहावत है : "मैं किसी कामचोर का पूर्वज बनने के बजाय किसी सच्चे आदमी के घोड़े की रकाब थामकर उसे चला लूँगा।" लेकिन मसीह-विरोधी इसके ठीक विपरीत होते हैं : वे इन निकम्मों के पूर्वज हो जाएँगे। क्या यह अयोग्यता की अभिव्यक्ति नहीं है? उदाहरण के लिए, वे किसी ऐसे व्यक्ति का उल्लेख करते हैं, जो अभिमानी नहीं है और योगदान करने में सक्षम है। जब तुम उनसे पूछते हो कि यह व्यक्ति सत्य को समझने में कैसा है, तो वे कहते हैं, "वह इसे ठीक-ठाक समझता है, उसमें थोड़ी योग्यता है।" वास्तव में, यह व्यक्ति, जिसका उन लोगों ने उल्लेख किया, एक छोटी-सी समस्या सामने आते ही छिप जाता है, उसमें कोई विश्वास नहीं होता। ऐसे लोगों में वे भी हैं, जो सत्य को नहीं समझते, जो आध्यात्मिक मामलों को नहीं समझते, जो हमेशा अकेले में शिकायत किया करते हैं, और जो हमेशा गलतियाँ करते हैं। वे मूर्खों का झुंड होते हैं, मसीह-विरोधी उनके पूर्वज होते हैं, और वे वही हैं जिन्हें ये मसीह-विरोधी पालते हैं। परमेश्वर के घर में "अगुआ" बनने पर मसीह-विरोधी ऐसे ही लोगों को पालने के लिए उत्सुक होते हैं, और क्या इसके परिणामस्वरूप परमेश्वर के घर के काम में देरी नहीं होती? उन्हें ऐसे व्यक्तियों की कोई कद्र नहीं होती, जिनमें थोड़ी योग्यता होती है, जो सत्य को समझने में थोड़े सक्षम होते हैं, जो सत्य का अनुसरण करते हैं, जो सत्य का कुछ अभ्यास करते हैं, और जो परमेश्वर के घर का काम कर सकते हैं। ऐसा क्यों है? ऐसे लोग कभी भी उनके गुलाम और अनुयायी नहीं बनेंगे, वे कभी भी उनका हुक्म बजा लाने के लिए तत्पर नहीं रहेंगे, इसलिए वे ऐसे लोगों का झुंड बनाते हैं, जो मूर्ख, डरपोक, अज्ञानी, बेवकूफ, धीमे होते हैं, और जिनके पास अपना दिमाग नहीं होता—इसी तरह के कचरे को वे विकसित करते हैं। क्या काम करने का यह तरीका परमेश्वर के घर के काम के लिए लाभदायक है? नहीं। और क्या वे इस पर कोई विचार करते हैं? वे किस बारे में सोच रहे हैं? "मैं किसी ऐसे व्यक्ति की तलाश कर रहा हूँ, जिसके साथ काम करके मैं फल-फूल सकूँ, जो मुझे महत्वपूर्ण होने का एहसास कराए और मेरा मूल्य उजागर कर सके।" उनका दल उन मूर्खों का समूह होता है, जो आध्यात्मिक मामलों को नहीं समझते। कोई समस्या सामने आने पर उनमें से कोई भी सत्य की तलाश नहीं करता, उनमें से कोई भी सत्य को नहीं समझता, उनमें से कोई भी सत्य-सिद्धांतों के अनुसार चीजों को नहीं सँभालता। लेकिन उनमें एक बात होती है, जिसे मसीह-विरोधी पसंद करते हैं : जब ऐसे लोगों के सामने कोई समस्या आती है, तो वे मसीह-विरोधियों की तलाश करते हैं और जो वे कहते हैं, वही करते हैं। यही वह सिद्धांत है, जिसके द्वारा मसीह-विरोधी साथ काम करने के लिए लोगों की तलाश करते हैं। वे साथ काम करने और अपना चरण-चुंबन करवाने के लिए मूर्खों का एक झुंड, कचरे का एक ढेर ढूँढ़ते हैं—और अंततः, परमेश्वर के घर का कुछ काम रुक जाता है। कलीसिया के हित और काम की गति प्रभावित हो जाती है, लेकिन इन लोगों को इसकी कोई समझ नहीं होती, वे यहाँ तक कहते हैं, "यह केवल मेरी जिम्मेदारी नहीं है।" अगर हर कोई कहे कि यह उसकी जिम्मेदारी नहीं है, तो आखिर किसकी है? यदि कोई समस्या उत्पन्न होने पर कोई भी उसकी जिम्मेदारी न ले, तो इन सभी वर्षों में उनके द्वारा उपदेश सुनने का क्या मतलब था? तथ्य उनकी आँखों के सामने होते हैं, फिर भी वे उन्हें पहचान नहीं पाते। ये किस तरह के लोग हैं? यह तथ्य साबित करता है कि वे लोग, जिन्हें मसीह-विरोधी चुनते हैं, अच्छे नहीं होते; वे सत्य को स्वीकार नहीं करते। मसीह-विरोधी जान-बूझकर ऐसे मूर्खों, घिनौने कमबख्तों और निकम्मों के साथ टोली बनाते हैं, जो सत्य को स्वीकार नहीं करते या सत्य से प्रेम नहीं करते। वे उन्हें फँसाते हैं, उनके दिलों में जगह बनाते हैं, जब तक कि वे अनुकूल और अंतरंग नहीं हो जाते, और आपस में अच्छी तरह से निभाते हैं। यह क्या है? क्या यह एक मसीह-विरोधी गिरोह नहीं है? जब तुम उनके "पूर्वजों" के स्थान पर किसी और को रखते हो, तो वे, उनके वफादार वंशज, निर्णय पारित करते हुए कहते हैं कि ऊपरवाला अन्यायी है, और उनका बचाव करने के लिए वे आपस में मिल जाते हैं। क्या मसीह-विरोधी सिर्फ कुछ बुरे लोग होते हैं? कुछ मसीह-विरोधी बिना किसी महत्वपूर्ण प्रतिभा के उड़ाऊ व्यक्ति होते हैं, लेकिन उनकी एक विशेषता होती है : हैसियत के प्रति उनका विशेष झुकाव। यह मत सोचो कि प्रतिभाहीन और अशिक्षित होने के कारण उन्हें हैसियत से कोई प्यार नहीं होता; यह गलत है, और यह दर्शाता है कि तुमने मसीह-विरोधियों के सार को अच्छी तरह से नहीं समझा है। जो मसीह-विरोधी है, उसे हैसियत पसंद है। जब मसीह-विरोधी किसी के साथ भी काम करने में असमर्थ होते हैं, तो फिर वे सड़े अंडों और चरण चूमने वालों का समूह पालने में कैसे सक्षम होते हैं? क्या वे ऐसे लोगों के साथ काम करना चाहते हैं? यदि वे वास्तव में इन लोगों के साथ काम करने में सक्षम होते, तो वे शब्द सच न होते। वे किसी के भी साथ काम करने में असमर्थ होते हैं—और "किसी" में वे लोग भी शामिल हैं, जिन्हें वे विकसित करते हैं। तो उन्हें विकसित करके वे क्या कर रहे हैं? वे एक ऐसा समूह तैयार करते हैं, जिसे आदेश देना और नियंत्रित करना आसान हो, जो अपने लिए नहीं सोच सकते, जो वही करें जो उनसे कहा जाए, जो उनकी हैसियत की रक्षा करने के लिए उनके साथ काम करें। बिना सहायता के अपनी हैसियत की रक्षा करना उनके लिए थोड़ा कठिन, थोड़ा दुष्कर होगा, इसलिए वे ऐसे लोगों का समूह तैयार करते हैं—एक ऐसा समूह, जो उनकी नजरों में कदाचित् "आध्यात्मिक" है—जो खुशी से कठिनाई सहन करता है और "परमेश्वर के घर के हितों की" रक्षा करने में सक्षम है। उनमें से प्रत्येक कई विभिन्न कार्य करता है, और वे हर बार सवाल पूछने या कोई समस्या सामने आने पर मसीह-विरोधियों के पास जाते हैं। उन्हें लगता है कि लोगों के साथ काम करने का यही मतलब है। पर क्या ऐसा ही है? वे आदेश देने के लिए, अपना काम करवाने के लिए, अपनी हैसियत मजबूत करने के लिए लोगों का एक समूह ढूँढ़ते हैं। यह सहयोग करना नहीं है—यह तो अपना निजी क्रियाकलाप चलाना है।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे दूसरों से केवल अपना आज्ञापालन करवाएँगे, सत्य या परमेश्वर का नहीं (I)' से उद्धृत

मसीह-विरोधी व्यक्तिवादी और तानाशाही तरीके से व्यवहार करते हैं, दूसरों के साथ कभी सहभागिता नहीं करते, और लोगों को अपनी आज्ञा मानने के लिए मजबूर करते हैं। ये एक निश्चित प्रकार के व्यवहार हैं, समान प्रकृति साझा करने वाले व्यवहारों का एक समुच्चय है। यह कहा जा सकता है कि मसीह-विरोधी चाहे कुछ भी करें, चाहे वे कोई भी निर्णय या व्यवस्थाएँ करें, वे उनके बारे में दूसरों के साथ कभी सहभागिता नहीं करते, दूसरों के साथ मिलकर आम राय नहीं बनाते, और कार्य और अभ्यास के लिए सिद्धांतों की तलाश नहीं करते। इतना ही नहीं, वे लोगों को यह नहीं बताते कि वे इस तरह से कार्य क्यों करते हैं; लोग भ्रम में फँस जाते हैं, लेकिन उन्हें वैसा ही करना पड़ता है, जैसा मसीह-विरोधी कहते हैं। अगर कोई प्रश्न पूछता है, तो मसीह-विरोधी सहभागिता नहीं करना चाहते, न ही स्पष्टीकरण देना चाहते हैं, बल्कि इन मामलों को पूरी तरह से एक निश्चित स्थिति के भीतर नियंत्रित रखते हैं—और वह स्थिति क्या है? उस स्थिति में किसी को भी ज्ञान का अधिकार नहीं होता; मसीह-विरोधी जो चाहते हैं वही करते हैं, और जिसे वे सही मानते हैं, उसे पूरी तरह से किया जाना चाहिए, किसी अन्य को प्रश्न पूछने या जानने का अधिकार नहीं होता, उनके साथ साझेदारी में काम करने का तो बिलकुल भी नहीं। लोग केवल वही कर सकते हैं, जो उनसे कहा जाता है। इस पर मसीह-विरोधी का क्या दृष्टिकोण होता है? "चूँकि तुमने मुझे अगुआ चुना है, इसलिए मैं तुम लोगों का प्रभारी हूँ, और जैसा मैं कहता हूँ, तुम्हें वैसा ही करना चाहिए। अगर तुम लोग जैसा मैं कहता हूँ, वैसा करने के लिए तैयार नहीं हो, तो मुझे मत चुनो—अगर तुम मुझे चुनते हो, तो जैसा मैं कहता हूँ, तुम्हें वैसा ही करना होगा! हम जो करते हैं, उसके बारे में केवल मेरा कहा अंतिम होता है।" तो उनकी नजर में, उनके और उनके अधीन स्थित अनुयायियों के बीच क्या संबंध है? वे आदेश देते हैं और उनके अधीन स्थित लोग यह विश्लेषण नहीं कर सकते कि वे सही हैं या गलत, न ही वे उनकी निंदा या तुलना कर सकते हैं, न उनसे प्रश्न या उन पर संदेह कर सकते हैं, और न ही किसी चीज के बारे में पूछताछ कर सकते हैं—इनमें से किसी भी चीज की अनुमति नहीं होती। जब भी कोई मसीह-विरोधी कोई नई योजना, वक्तव्य, या कार्य करने का तरीका सामने रखता है, तो सभी को समर्थन में ताली बजानी चाहिए; कोई प्रश्न नहीं किया सकता। क्या इसमें जबरदस्ती नहीं है? यह कौन-सा तरीका है? व्यक्तिवादी और तानाशाही तरीके से व्यवहार करना। यह किस तरह का स्वभाव है? (क्रूरता।) "व्यक्तिवादी और तानाशाही तरीके से व्यवहार करना" वाक्यांश के सतही अर्थ के परिप्रेक्ष्य से, "व्यक्तिवादी तरीके से व्यवहार करने" का अर्थ है कि उनका कहा माना जाएगा, और "तानाशाही तरीके से" का अर्थ है कि उनके अकेले आकलन और निर्णय कर लेने के बाद सभी को उन्हें कार्यान्वित करना होगा, और किसी अन्य को अलग राय या विचार रखने, या प्रश्न तक पूछने की अनुमति नहीं होगी। उनके द्वारा व्यक्तिवादी और तानाशाही तरीके से व्यवहार करने का मतलब है कि जब उनके सामने कोई समस्या आती है, तो वे खुद उस पर थोड़ा विचार करते हैं और तय करते हैं कि क्या करना है; वे किसी और की परवाह किए बिना निजी तौर पर अकेले ऐसे निर्णय लेते हैं। किसी और की, यहाँ तक कि जो काम किया जाना है उसमें उनके साझेदारों या उनसे ऊपर के अगुआओं को भी कुछ कहने का हक नहीं है। यही "व्यक्तिवादी और तानाशाही तरीके से व्यवहार करने" का अर्थ है। और ऐसे लोगों के काम करने का शाश्वत सिद्धांत और तरीका क्या है? जब उनके सामने कोई समस्या आती है, तो वे अपने दिमाग में उस पर विचार करना शुरू करते हैं, वे अपने दिमाग में उस पर कई तरह से विचार करते हैं—लेकिन वे क्या सोच रहे होते हैं, यह कोई नहीं जानता। और कोई क्यों नहीं जानता? क्योंकि वे कुछ नहीं कहते। कुछ लोग दावा करते हैं कि ऐसा इसलिए है, क्योंकि उन्हें बात करना पसंद नहीं। क्या यही बात है? यह चरित्र की समस्या नहीं है; वे इसलिए कुछ नहीं कहते, क्योंकि वे जानबूझकर तुम्हें नहीं बता रहे। वे अकेले काम करना चाहते हैं; वे अपने आप हिसाब लगाते हैं कि उन्हें क्या करना चाहिए। वे क्या हिसाब लगाते हैं? इसमें उनके हित, हैसियत, प्रतिष्ठा और ख्याति शामिल हैं; वे इन सब चीजों का हिसाब लगाते हैं, और मन ही मन कहते हैं, "मैं अपनी हैसियत सुरक्षित रखने का, जो मेरे अधीन हैं उन्हें अपनी असलियत देखने से रोकने का, और सबसे बढ़कर, इसे ऊपरवाले से छिपाने का तरीका कैसे खोज सकता हूँ? यह कोई आसान काम नहीं। अगर मेरे सामने कोई समस्या आए और मैं फौरन अपने नीचे के भाई-बहनों के साथ सहभागिता कर लूँ, तो हर कोई मेरी असलियत देख लेगा, और उसके बाद कोई भी ऊपर वाले के सामने मेरा भेद खोल सकता है और उससे मेरी शिकायत कर सकता है, जो मुझे बरखास्त कर सकता है, और उस हालत में मैं अपनी हैसियत बरकरार नहीं रख पाऊँगा। इसके अतिरिक्त, अगर मैं लगातार दूसरों के साथ सहभागिता किया करूँ, तो क्या मेरी यह मामूली प्रतिभा हर किसी के सामने उजागर नहीं हो जाएगी? तब क्या लोग मेरा तिरस्कार नहीं करेंगे?" अगर लोग वाकई उनकी असलियत देख लें, तो तुम लोग इसे अच्छा कहोगे या बुरा? वास्तव में, जो लोग सत्य का अनुसरण करते हैं, जो ईमानदार हैं, उनके लिए सम्मान या प्रतिष्ठा का थोड़ा-सा नुकसान होना, लोगों द्वारा उनकी असलियत देख लेना कोई मायने नहीं रखता; वे इन चीजों को महसूस करते या उनके बारे में कोई खास जागरूकता रखते प्रतीत नहीं होते; वे उन्हें विशेष रूप से महत्वपूर्ण नहीं मानते। जबकि, मसीह-विरोधी इसके ठीक विपरीत होते हैं : वे सत्य का अनुसरण नहीं करते, और वे अपनी हैसियत, और अपने प्रति अन्य लोगों के विचारों और रवैये को अपने जीवन से भी अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं। अगर उन्हें सोने की पेशकश की जाए, और बदले में उन्हें सच बोलना पड़े, वास्तविक स्थिति के बारे में बताना पड़े, अंदरूनी बात बतानी पड़े, तो क्या वे इस प्रस्ताव को स्वीकार करेंगे? अगर केवल थोड़ी मात्रा में सोने की पेशकश की जाए, तो वे उसे इस लायक नहीं समझेंगे; वे सौदा नहीं करेंगे, बल्कि यह कहते हुए खुद को ढोंग के आवरण में छिपाना जारी रखेंगे, "हम परमेश्वर के विश्वासी पैसे से प्रेम नहीं करते, हम सत्य से प्रेम करते हैं।" अगर बड़ी मात्रा में सोने की पेशकश की जाए, तो वे धोखाधड़ी से धन प्राप्त करने के लिए कुछ ऊपर-ऊपर की वास्तविक बातें बता सकते हैं, फिर बिना किसी बदलाव के, जैसे चल रहा था वैसे ही काम करने लग जाएँगे। "कुत्ते की पूँछ कभी सीधी नहीं हो सकती" कहावत का यही मतलब है।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे नजर बचाकर कार्य करते हैं, व्यक्तिवादी और तानाशाही तरीके से व्यवहार करते हैं, लोगों के साथ कभी सहभागिता नहीं करते और लोगों को आज्ञा मानने के लिए मजबूर करते हैं' से उद्धृत

मसीह-विरोधियों का स्वभाव प्रधान दूत के स्वभाव के समान ही होता है। प्रधान दूत ने कहा, "आकाश और पृथ्वी और सभी चीजें मेरे द्वारा बनाई गई हैं, और मानव-जाति मेरे नियंत्रण में है," और इसलिए उसने मानव-जाति को अपनी इच्छानुसार नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। जैसे ही मसीह-विरोधी सत्ता में आते हैं, वे कहते हैं, "तुम सभी लोगों को मुझमें विश्वास और मेरा अनुसरण करना चाहिए। मेरे पास शक्ति है, मेरा कहा अंतिम है, इसलिए जब कुछ भी हो, मेरे पास आओ और कलीसिया का पैसा मेरे पास लाओ।" दूसरे कहते हैं, "हम तुम्हें वह क्यों दें?" "क्योंकि मैं अगुआ हूँ—मेरे पास इन मामलों को सँभालने की शक्ति है, और यह मेरी जिम्मेदारी है कि मैं हर चीज का ध्यान रखूँ!" इसलिए वे हर चीज का ध्यान रखते हैं। उन्हें इसकी परवाह नहीं कि भाइयों और बहनों के पास खाने-पीने के लिए परमेश्वर के वचन नहीं हैं, या उनके पास उपदेशों या पुस्तकों की कमी तो नहीं है। लेकिन उन्हें इसकी परवाह जरूर होती है कि पैसा किसके पास है, कितना है और उसका उपयोग कैसे किया जाना है। अगर ऊपरवाला कलीसिया की वित्तीय स्थिति पर सवाल उठाए, तो न केवल वे कलीसिया का पैसा नहीं सौंपते, बल्कि वे ऊपरवाले को सच्चाई का पता भी नहीं चलने देते। वे सत्य को ऊपरवाले से छिपाकर क्यों रखते हैं? वे गबन करना चाहते हैं, हावी होना चाहते हैं—क्या यही कारण है? मसीह-विरोधी भौतिक संपत्ति, धन और हैसियत में अत्यधिक रुचि रखते हैं, और वे निश्चित रूप से वैसे नहीं होते, जैसे वे तब प्रतीत होते हैं जब वे कहते हैं, "मैं अब परमेश्वर में विश्वास करता हूँ, और मैंने सांसारिक चीजों के पीछे भागना और पैसे की लालसा करना बंद कर दिया है।" वे निश्चित रूप से उतने सरल नहीं होते, जितने वे लगते हैं। हैसियत के पीछे भागने और उसे बनाए रखने के लिए वे सब-कुछ क्यों करते हैं? क्योंकि वे हर उस चीज को पाना चाहते हैं या उस पर नियंत्रण और प्रभुत्व रखना चाहते हैं, जो हैसियत लाती है। वे प्रधान दूत के प्रामाणिक वंशज हैं, और प्रधान दूत की प्रकृति और सार से जैसा अपेक्षित है, वे वैसे ही जीते हैं। जो कोई भी हैसियत के पीछे भागता है और धन-संपत्ति पर ध्यान केंद्रित करता है, उसके स्वभाव में निश्चित रूप से समस्या होती है। यह केवल एक मसीह-विरोधी स्वभाव होने का मामला नहीं है, तो फिर यह क्या है? सबसे पहले, अगर उन्हें किसी कार्य की जिम्मेदारी लेने दी जाए, तो वे दूसरों को हस्तक्षेप नहीं करने देंगे; इसके अतिरिक्त, किसी भी कार्य का निरीक्षक बनने पर, वे अपना प्रदर्शन करने, अपना बचाव करने और अपने को ऊपर उठाने, हैसियत बनाए रखने और उसके लिए लड़ते हुए खुद को भीड़ से अलग दिखाने और सर्वोच्च बनने के तरीकों की तलाश करेंगे; इतना ही नहीं, संपत्ति दिखते ही उनकी दृष्टि लोलुप हो जाती है और पैसे के लिए सोचते और प्रयास करते हुए उनके दिमाग के घोड़े दौड़ते ही रहते हैं। ये सभी एक मसीह-विरोधी के चिह्न हैं। वे सत्य को संप्रेषित करने के किसी उल्लेख में या भाई-बहनों की स्थितियों के बारे में पूछने में रुचि नहीं रखते, न ही इसमें कि उनमें से कितने कमजोर या नकारात्मक महसूस कर रहे हैं या हर कोई अपने कर्तव्यों का पालन कितनी अच्छी से तरह कर रहा है; लेकिन जब पैसे की बात आती है, या इसकी कि कौन दान कर सकता है, कितनी राशि है, उसे कहाँ रखा जाता है, तो ये ऐसी चीजें हैं जिनकी उन्हें सबसे ज्यादा परवाह होती है। यह एक मसीह-विरोधी का लक्षण और चिह्न है।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे दूसरों से केवल अपना आज्ञापालन करवाएँगे, सत्य या परमेश्वर का नहीं (II)' से उद्धृत

मसीह-विरोधियों की बुराई की एक प्रमुख विशेषता है—मैं तुम लोगों के साथ उसे पहचानने का रहस्य साझा करूँगा। रहस्य यह है—पहला, अपनी वाणी या कार्यों में, वे तुम्हारे लिए अथाह होते हैं; तुम उन्हें पढ़ नहीं सकते। जब वे तुमसे बात कर रहे होते हैं, तो उनकी आँखें हमेशा इधर-उधर घूमती रहती हैं, और तुम यह नहीं बता सकते कि वे किस तरह की योजना बना रहे हैं। यहाँ तक कि जब वे बहुत "सच्चे" और "ईमानदार" दिखाई देते हैं, तब भी तुम उनको समझ नहीं सकते। तुम्हारे दिल में एक विशेष भावना रहती है, यह भावना कि उनके विचारों में एक गहरी सूक्ष्मता है, एक अथाह गहराई है। वे रहस्यमय और अजीब लगते हैं। यह पहली विशेषता है, और यह अकेले ही बुराई की विशेषता है। मसीह-विरोधियों की बुराई की दूसरी विशेषता यह है कि वे बहुत ही भ्रामक तरीके से बोलते और व्यवहार करते हैं। यह भ्रामकता कहाँ देखी जा सकती है? यह इस तथ्य में देखी जा सकती है कि वे दूसरों के मनोवृति को समझने में विशेष रूप से कुशल होते हैं, उनके शब्द सुखद और सही लगते हैं; वे गहन सिद्धांतों की व्याख्या करते हैं और सही बातें कहते हैं, ऐसी बातें जो दूसरों को भावनाओं, विवेक, तर्क और विचारधारा के दृष्टिकोण से स्वीकार्य लगती हैं। लेकिन एक बात है जो तुमको समझनी चाहिए : अपनी कही सभी सुखद लगने वाली बातों का वे व्यक्तिगत रूप से कभी सम्मान नहीं करते। उदाहरण के लिए, मान लो, वे तुम्हें बताते हैं कि एक ईमानदार व्यक्ति कैसे बनें, कोई समस्या सामने आने पर प्रार्थना कैसे करें, या परमेश्वर को अपने जीवन का प्रभार कैसे लेने दें—बस देखो कि जब समस्याएँ उनके सामने आती हैं तो वे क्या करते हैं। वे अपने विचारों, अपनी सोच पर भरोसा करते हैं, और अपने दिमाग पर जोर डालते हुए तथा विभिन्न चीजें करते हुए वे अपनी क्षमताओं पर भरोसा करते हैं। दूसरों से अपनी सेवा करवाने और अपने मामलों का ध्यान रखवाने के लिए वे हर संभव प्रयास करते हैं। जो वे नहीं करते, वह है परमेश्वर से प्रार्थना करना। साथ ही, दिखावटी तौर पर वे बताते हैं कि लोगों को कैसे परमेश्वर के आयोजन और व्यवस्थाएँ स्वीकार करनी चाहिए और उनके प्रति समर्पित होना चाहिए, लेकिन अपनी समस्याएँ सामने आने पर जो पहला काम वे करते हैं, वह है कोई बचने का रास्ता तलाशना। वे परमेश्वर के आयोजन और व्यवस्थाएँ स्वीकार नहीं करते—लोग जो देखते हैं वह यह है कि वे अपने कार्यों में समर्पण नहीं करते, बल्कि बस अपने लिए कोई बचने का रास्ता तलाशने की कोशिश करते हैं। यह मसीह-विरोधियों का बुरा पक्ष है, जो उनके भ्रामक पहलू के पीछे रहता है। अपने काम में कभी-कभी वे देर रात तक श्रम करते हैं या खाना-पीना तक छोड़ देते हैं, किंतु जब उनका सामना परमेश्वर के घर द्वारा की गई व्यवस्था से होता है, तो वे उसे लागू नहीं करते या अभ्यास में नहीं लाते, और वे सत्य को स्वीकार नहीं करते। एक और व्यवहार जो वे प्रकट करते हैं, वह यह है कि जब भाई-बहन कोई ऐसी राय व्यक्त करते हैं जिससे वे सहमत नहीं होते, तो वे उसे घुमा फिराकर बातें करते हुए, गोलमोल तरीके से अस्वीकार कर देते हैं। इससे तुम्हें लगता है कि वे तुम्हारे विचार को बहुत गंभीरता से ले रहे हैं; वे उसके बारे में सभी के साथ सहभागिता और चर्चा करते हैं, लेकिन सब-कुछ कह-सुन लिए जाने के बाद भी तुम्हें वही करना पड़ता है, जो वे कहते हैं। वे दूसरे लोगों के विचारों को नकारने, दूसरों को अपने साथ चलने और उनसे जैसा वे कहें वैसा करवाने के लिए जो कुछ भी करना हो, करेंगे। क्या यह सत्य-सिद्धांतों की तलाश करना है? वे किस सिद्धांत को अभ्यास में ला रहे हैं? यह हर किसी को उनकी बात सुनने और उनके प्रति समर्पित होने के लिए मजबूर करना है, और यह कि दूसरे लोगों को सुनना कभी भी उन्हें सुनने जैसा अच्छा नहीं हो सकता, कि उनके विचार सबसे अच्छे, सबसे ऊँचे हैं, और वे स्वयं सत्य हैं और वे जो कहते हैं, वह बिलकुल सही है। क्या यह बुराई नहीं है? मसीह-विरोधियों की बुराई की तीसरी विशेषता यह है कि जब भी वे अपनी गवाही देते हैं—अपनी योग्यता, अपने द्वारा चुकाई गई कीमत और कुछ ऐसी चीजों की गवाही, जो उन्होंने ऊपर से अच्छी तरह की होती हैं और जिन्हें हर कोई देख सकता है, या कुछ ऐसी चीजों की, जिनसे उनके साथ-साथ दूसरों को भी कुछ लाभ होता हो—हर बार जब भी वे इन सभी बातों का उल्लेख समाप्त करते हैं, तो वे कुछ विशेष रूप से आध्यात्मिक बात कहकर समाप्त करते हैं, जैसे "परमेश्वर का धन्यवाद; यह सब उसी ने किया था," जिससे तुम्हें यह दिखे कि वे इतने सक्षम हैं, और तो और वे परमेश्वर की गवाही देने में सक्षम हैं, जबकि वास्तव में वे केवल अपनी गवाही दे रहे होते हैं और परमेश्वर को एक पादटीका बना रहे होते हैं। उन्होंने परमेश्वर की गवाही कदापि नहीं दी है, बल्कि वे केवल अपनी गवाही देने के अवसर के रूप में इसका उपयोग कर रहे हैं। क्या यह मसीह-विरोधियों की शातिर चाल नहीं है? क्या यह बुराई नहीं है? इन तीन बातों के आधार पर मसीह-विरोधियों को आसानी से पहचाना जा सकता है।

मसीह-विरोधियों की एक और प्रमुख विशेषता है, जो उनके दुष्ट स्वभाव और सार की प्राथमिक अभिव्यक्तियों में से भी एक है। चाहे वे उपदेश और सहभागिता सुन रहे हों या किसी सभा में भाग ले रहे हों—अन्य भाई-बहनें आत्मज्ञान पर, अपना न्याय किए जाने, खुद को ताड़ना दिए जाने, खुद से निपटे जाने और अपनी काट-छाँट किए जाने को स्वीकारने पर, कर्तव्यों का ठीक से पालन करने पर, एक सृजित प्राणी के लिए उपयुक्त स्थिति में खड़े होने पर, और आशीषों के लिए अपनी लालसा छोड़ देने पर चाहे कैसे भी सहभागिता करें, इस बारे में मसीह-विरोधियों का क्या दृष्टिकोण रहता है? अन्य लोग चाहे कैसे भी सहभागिता करें या कितने भी लोग अपनी सहभागिता साझा करें, मसीह-विरोधी कभी भी हैसियत और आशीषों के पीछे भागने का अपना इरादा नहीं बदलते। यही कारण है कि हर बार एक निश्चित अवधि के लिए काम करने के बाद, वे इस बात की गणना करते हैं कि उन्होंने कितने काम किए हैं, उन्होंने परमेश्वर के घर में क्या योगदान दिया है, और भाई-बहनों के लिए उन्होंने कौन-से मामले सँभाले हैं। वे हमेशा चोरी-छिपे हिसाब-किताब करते रहते हैं, अपने मन में चीजों की गणना और परमेश्वर के साथ मोलभाव करते हैं। वे इन चीजों पर मोलभाव क्यों करेंगे? ऐसा इसलिए है, क्योंकि अपने दिल की गहराई में, अपनी खोज और विश्वास में शुरू से ही उनका लक्ष्य हमेशा आशीष पाना रहा है। चाहे वे कितने ही वर्षों तक प्रवचन सुनें या परमेश्वर के कितने ही वचन खाएँ-पीएँ, वे आशीष पाने की अपनी इच्छा और उद्देश्य कभी नहीं छोड़ेंगे। अगर तुम उनसे एक कर्तव्यपरायण सृजित प्राणी बनने और परमेश्वर के नियम और व्यवस्थाएँ स्वीकार करने के लिए कहो, तो वे कहते हैं, "यह सही रास्ता नहीं है, यह वह नहीं है जिसका मुझे अनुसरण करना चाहिए। मैं जो जानना चाहता हूँ, वह यह है कि मेरे लड़ाई लड़ लेने, अपेक्षित प्रयास कर लेने और अपेक्षित कठिनाई झेल लेने के बाद, और सब-कुछ परमेश्वर के मानकों के अनुसार कर लेने के बाद, परमेश्वर मुझे किस तरह का इनाम देगा, मैं सुरक्षित रखे गए लोगों में से एक रहूँगा या नहीं, परमेश्वर के राज्य में मेरा किस प्रकार का पद होगा, और मेरी अंतिम मंजिल क्या होगी।" तुम चाहे कैसे भी सहभागिता करो, तुम उनके मन में पल रहे इस उद्देश्य और लालसा को दूर नहीं कर सकते। वे पौलुस के ही समान हैं। क्या इस तरह की बुराई में एक खास तरह का क्रूर स्वभाव नहीं होता?

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे दुष्ट, धूर्त और कपटी हैं (II)' से उद्धृत

व्यवहार और काट-छाँट के प्रति मसीह-विरोधियों का ठेठ रवैया उन्हें स्वीकार करने या मानने से सख्ती से इनकार करने का होता है; उन्होंने भाई-बहनों और परमेश्वर के घर को चाहे कितना भी नुकसान पहुँचाया हो, उन्हें इसका जरा भी पछतावा नहीं होता और न ही वे कोई एहसान मानते हैं। इस दृष्टिकोण से, क्या मसीह-विरोधियों में मानवता होती है? (नहीं।) उन्होंने भाई-बहनों के जीवन और परमेश्वर के घर के हितों के सभी पहलुओं को इतना नुकसान पहुँचाया है—कोई भी इसे देख सकता है और जो भी इसे देखता है, वह यही कहेगा कि यही मामला है—और फिर भी मसीह-विरोधी इस तथ्य को मानते या स्वीकार नहीं करते, वे हठपूर्वक अपनी बात पर अड़े रहते हैं और यह स्वीकार नहीं करते कि इस मामले में वे गलत हैं, कि इसके लिए वे जिम्मेदार हैं। क्या यह इस बात का संकेत नहीं है कि वे सत्य से घृणा करते हैं? मसीह-विरोधियों को सत्य से ऐसी ही घृणा होती है, इन मामलों को वे इस तरह से ही लेते हैं। क्या यह परमेश्वर के घर, कलीसिया और भाई-बहनों के हितों को गंभीरता से न लेना है? अगर वे स्वीकार कर लें कि उन्होंने भाई-बहनों और परमेश्वर के घर के हितों को नुकसान पहुँचाया है, तो उन्हें जिम्मेदारी स्वीकार करनी होगी, और साथ ही, उनकी हैसियत और प्रतिष्ठा को गंभीर नुकसान पहुँचेगा—इसलिए वे इसे स्वीकार करने से दृढ़ता से इनकार कर देते हैं; इसे बिलकुल स्वीकार नहीं किया जा सकता है, और अगर वे इसे अपने दिलों में स्वीकार करते भी हैं, तब भी वे बाहर से ऐसा नहीं करेंगे। चाहे उनका इनकार जानबूझकर किया गया हो या नहीं, संक्षेप में, ऐसी बातें एक ओर स्पष्ट रूप से मसीह-विरोधियों की सत्य से घृणा और उसके प्रति शत्रुता के सार को दर्शाती हैं; और दूसरी ओर, वे दिखाती हैं कि परमेश्वर के घर और कलीसिया के हितों के प्रति अवमानना और जिम्मेदारी से इनकार करने की मनोवृत्ति के साथ मसीह-विरोधी अपने हितों को कितना सँजोते हैं। उनमें मानवता नहीं है। क्या मसीह-विरोधियों का जिम्मेदारी से बचना इन मुद्दों को प्रदर्शित करता है? (हाँ।) एक ओर, जिम्मेदारी से बचना सत्य के प्रति उनके शत्रुतापूर्ण रवैये को दर्शाता है; तो दूसरी ओर, यह उनमें मानवता की कमी दर्शाता है। उनके कारण दूसरों के हितों को कितना भी नुकसान क्यों न हो जाए, उन्हें कोई अपराध-बोध नहीं होता और वे इससे कभी परेशान नहीं हो सकते। यह किस प्रकार का प्राणी है? अगर वे यह कहते हुए थोड़ा-सा भी स्वीकार कर लें, "मेरा इससे कुछ संबंध था, लेकिन यह सारी गलती मेरी नहीं थी," तो इसे फिर भी कुछ मानवता, कुछ विवेक, एक नैतिक आधार-रेखा माना जा सकता है—लेकिन मसीह-विरोधियों में इतनी थोड़ी-सी भी मानवता नहीं होती। तो तुम लोग क्या कहोगे कि वे क्या हैं? (शैतान।) ऐसे लोगों का सार शैतान का होता है। वे स्वयं द्वारा परमेश्वर के घर के हितों को पहुँचाए गए जबरदस्त नुकसान को नहीं देखते, वे अपने दिल में जरा-भी परेशान नहीं होते, और न ही वे खुद को धिक्कारते हैं, एहसानमंद तो वे बिलकुल भी महसूस नहीं करते। क्या वे मनुष्य भी हैं? यह वह बिलकुल नहीं है, जो सामान्य लोगों में दिखना चाहिए। यह शैतान है। भले ही तुम उनसे यह न कहो कि वे अपने किए की जिम्मेदारी स्वीकार करें, बल्कि केवल इतना कहो कि वे अपनी गलती मान लें, फिर भी वे ऐसा नहीं कर सकते, फिर भी वे इसे स्वीकार नहीं कर सकते। वे सोचते हैं, "अगर मैं इसे स्वीकार कर लूँ, तो क्या यह, यह कहने के समान नहीं है कि मैं गलत था? क्या मैं कोई ऐसा व्यक्ति हो सकता हूँ, जो गलती करता हो? मैं हमेशा सही और महान रहूँगा; मुझसे कोई गलती स्वीकार करने के लिए कहना, क्या मेरे चरित्र का अपमान नहीं है? मैं कभी कुछ गलत नहीं कर सकता। भले ही इस मामले का मुझसे कुछ लेना-देना हो, लेकिन यह मेरी वजह से नहीं हुआ, न ही मैं इसके लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार हूँ; तुम जिसे चाहो, उसे जाकर ढूँढ़ो, लेकिन मेरे पास मत आओ। मैं किसी भी हालत में इसकी जिम्मेदारी नहीं ले सकता, मैं इस गलती को स्वीकार नहीं कर सकता।" अगर तुम उनसे केवल मौखिक रूप से अपनी गलती स्वीकार करने के लिए भी कहो, तो भी वे ऐसा नहीं कर सकते; यह उनकी मृत्यु की माँग करने जैसा होगा—मानो, अगर उन्होंने अपनी गलती स्वीकार कर ली, तो उनकी निंदा की जाएगी और वे नरक में जाएँगे, और उन्हें आग और गंधक की झील में डुबो दिया जाएगा। संक्षेप में, चाहे अन्य लोग कुछ भी कहें या सहभागिता करें, भले ही मसीह-विरोधी खुद को चुप रहने के लिए मजबूर करें और बाहर से बहस न करें, मन ही मन वे प्रतिस्पर्धा कर रहे होते हैं, असहमति जाहिर कर रहे होते हैं, विरोध कर रहे होते हैं। वे किस हद तक विरोध करते हैं? कुछ मसीह-विरोधी ऐसे भी हैं, जिनके साथ दस साल पहले निपटा गया था क्योंकि उन्होंने कुछ गलत किया था; जब इसे एक दशक बाद उठाया जाता है, तब भी वे स्वीकार नहीं करते कि यह उनकी गलती थी और न ही वे अपनी जिम्मेदारी वहन करते हैं; बीस साल बाद जब इसे फिर से उठाया जाता है, तब भी वे अपना बचाव करने की कोशिश करते हैं; तीस साल बाद जब इसे एक बार फिर उठाया जाता है, तब भी वे अपने ढर्रे से नहीं हटते : वे खुद को सही और निर्दोष ठहराने, और अपना बचाव करने की कोशिश करते रहते हैं। तीस वर्षों के बाद भी वे इस मामले में प्रार्थना करने, इस तथ्य को स्वीकार करने, अपनी गलती मानने के लिए परमेश्वर के सामने नहीं आते; अभी भी वे उस सत्य की खोज नहीं करते जिसका इस मामले में अभ्यास किया जाना चाहिए, उन सिद्धांतों की तलाश नहीं करते जिनका पालन किया जाना चाहिए; अभी भी उनके मन रोष से भरे रहते हैं : उन्हें लगता है कि भाई-बहनों ने उनके साथ अन्याय किया है और परमेश्वर उन्हें नहीं समझता; वे सोचते हैं कि परमेश्वर के घर को उनके प्रति खेद व्यक्त करना चाहिए, कि इसने उनके लिए मुश्किलें खड़ी कर दी हैं, जानबूझकर उनके लिए समस्याएँ खड़ी की हैं, उन्हें बलि का बकरा बना दिया है। क्या ऐसे लोग बदल सकते हैं? उनके हृदय सकारात्मक बातों के प्रति शत्रुता, प्रतिरोध और घृणा से भरे रहते हैं; उनका मानना है कि दूसरों का उनके साथ निपटना और उनकी काट-छाँट करना उनके चरित्र पर हमला करना है, कि यह उनकी प्रतिष्ठा को शर्मसार करता है, और उनकी हैसियत को अत्यधिक नुकसान पहुँचाता है; इस मामले को लेकर वे कभी प्रार्थना करने और अपनी गलतियों का पता लगाने या उन्हें पहचानने के लिए परमेश्वर के सामने नहीं आते, न ही उनमें कभी पश्चात्ताप और अपनी गलतियाँ स्वीकार करने का रवैया होता है, न ही वे इस तथ्य को स्वीकार करने के लिए परमेश्वर के सामने आते हैं—और अगर उन्हें इस मामले में परमेश्वर से प्रार्थना करने आना ही होता, तो वे अपनी इच्छा के खिलाफ जाकर मन में शिकायतें लिए हुए ऐसा करते, जिन्हें वे परमेश्वर से व्यक्त करते, ताकि वह उनका निवारण कर दे। वे चाहते हैं कि परमेश्वर जो हुआ उस पर प्रकाश डाले, न्याय करे कि कौन सही था और कौन गलत। और तो और, इस मामले के कारण वे परमेश्वर की धार्मिकता पर संदेह करते हैं या उसे नकार भी देते हैं; वे इस तथ्य पर संदेह करते हैं और उसे नकारते हैं कि परमेश्वर के घर और कलीसिया में सत्य और परमेश्वर सर्वोच्च शासन करते हैं। जब मसीह-विरोधियों से निपटा जाता है और उनकी काट-छाँट की जाती है, तब यह अंतिम परिणाम होता है; वे सत्य स्वीकार ही नहीं करते।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे अपना कर्तव्य केवल खुद को अलग दिखाने और अपने हितों और महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए निभाते हैं; वे कभी परमेश्वर के घर के हितों की नहीं सोचते, और अपनी व्यक्तिगत महिमा के बदले उन हितों को बेच तक देते हैं (III)' से उद्धृत

मसीह-विरोधियों की परिस्थितियाँ चाहे कैसी भी हों, वे हमेशा यह महसूस करते हैं कि यह साधारण व्यक्ति, जो परमेश्वर का देहधारी देह है, उनके लिए अनावश्यक है, परमेश्वर को जानने में उनके लिए बाधा है। वे मन में सोचते हैं, "जैसे ही मनुष्य मसीह के संपर्क में आते हैं, वह हमें तुलना में बहुत तुच्छ और भ्रष्ट दिखा देता है। जब तक हम मसीह के संपर्क में नहीं आते, तब तक हम बहुत पवित्र होते हैं, लेकिन जैसे ही हम मसीह के संपर्क में आते हैं, हम अपने में बहुत ही कमी महसूस करते हैं। मसीह से मिलने से पहले, हम बहुत सारी बातें समझते हैं और हमारा आध्यात्मिक कद बड़ा होता है। यह मसीह बहुत बड़ी मुसीबत है।" इस प्रकार वे मानते हैं कि जब उनके पास समय हो, तब सबसे अच्छा यह होगा कि जितना संभव हो, केवल "वचन देह में प्रकट होता है" पढ़ा जाए। चाहे वे कोई भी साधन अपनाएँ, या उनकी स्थिति कैसी भी हो, मसीह-विरोधियों की मुख्य अभिव्यक्ति यह है कि वे परमेश्वर के देहधारण के तथ्य और इस तथ्य को नकारने का प्रयास करते हैं कि मसीह के मुँह से निकले वचन सत्य हैं। ऐसा लगता है मानो देहधारी परमेश्वर के सार और इस तथ्य को नकारने से कि मसीह के मुँह से निकले वचन सत्य हैं, उन्हें उद्धार की आशा मिलती है। अपनी जन्मजात प्रकृति में, मसीह-विरोधी और परमेश्वर का देहधारी देह आग और पानी के समान मूल रूप से बेमेल हैं, जिनका कभी मेल नहीं हो सकता। ये मसीह-विरोधी यह मानते हैं, "जब तक मसीह का अस्तित्व बना रहेगा, तब तक मेरे दिन के आने की कोई आशा नहीं होगी, और मुझे दोषी ठहराए जाने और हटाए जाने, नष्ट और दंडित किए जाने का खतरा रहेगा। लेकिन अगर यह मसीह कथन न कहे या अपना कार्य न करे और लोग उसका सम्मान न करें, यहाँ तक कि उसे भूल जाएँ और इसे अपने मन के पिछले हिस्से में धकेल दें, तो ही मेरे लिए एक मौका होगा।" मसीह-विरोधियों की प्रकृति और सार यह है कि वे मसीह से नफरत किए बिना और उससे घृणा किए बिना नहीं रह सकते; वे अपनी प्रतिभा के आकार और अपने कौशल के स्तर में मसीह के साथ अपनी तुलना करते हैं, और यह देखने के लिए उसके साथ होड़ करते हैं कि किसके शब्द अधिक शक्तिशाली हैं और कौन अधिक सक्षम है। मसीह के समान कार्य करते हुए, वे लोगों को यह दिखाने का प्रयास करते हैं कि एक मनुष्य होते हुए भी मसीह में एक साधारण मनुष्य की प्रतिभा या विद्या तक नहीं है। हर प्रकार से मसीह-विरोधी स्वयं को मसीह के विरुद्ध खड़ा करते हैं और उससे मुकाबला करते हैं। हर तरह से वे इस तथ्य को नकारने का प्रयास करते हैं कि मसीह परमेश्वर है, परमेश्वर के आत्मा का मूर्त रूप है, और सत्य का देहधारण है। हर तरह से, वे मसीह को भाई-बहनों के बीच अपना प्रभुत्व कायम करने से रोकने, उसके वचनों को उनके बीच फलीभूत होने से रोकने, और इसके अलावा, मसीह द्वारा की जाने वाली चीजों, उसके द्वारा बोले जाने वाले वचनों, और उसके द्वारा लोगों से की जाने वाली माँगों और अपेक्षाओं को उनके बीच साकार होने से रोकने के तरीके खोजने में अपना दिमाग लगाते हैं। ऐसा लगता है, मानो मसीह के मौजूद होने से, ये मसीह-विरोधी दरकिनार कर दिए जाएँगे और कलीसिया के भीतर वे लोगों का वह दल बन जाएँगे, जिनकी निंदा की जाती है, जिन्हें त्याग दिया जाता है और एक अँधेरे कोने में रख दिया जाता है। सभी प्रकार की अभिव्यक्तियों से यह देखा जा सकता है कि मसीह-विरोधी अपने सार में मसीह के इतने प्रतिकूल हैं कि उनका मेल नहीं हो सकता। मसीह-विरोधी स्वयं को मसीह से अलग करने और उसके विरुद्ध खड़े होने, मसीह को हराने और उसे मार डालने की इच्छा के साथ पैदा हुए हैं, ताकि मसीह द्वारा किए गए कार्य का अस्तित्व समाप्त, अरक्षणीय और परमेश्वर के चुने हुए लोगों के बीच फलीभूत होने में असमर्थ हो जाए; मसीह चाहे कोई भी कार्य कर रहा हो और कहीं भी कर रहा हो, वे उसे पूरी तरह से नष्ट और विफल होते देखना चाहते हैं। लेकिन जब इसमें से कुछ भी वैसा नहीं होता जैसा वे चाहते हैं, तो उनके दिलों में अँधेरा और अवसाद छा जाता है; उन्हें लगता है कि यह अंधकारमय समय है और उनका दिन कभी नहीं आएगा। उन्हें लगता है कि उन्हें दरकिनार कर दिया गया है। क्या मसीह-विरोधियों की ये अभिव्यक्तियाँ दर्शाती हैं कि परमेश्वर के विरोध और शत्रुता का उनका सार कोई अर्जित की हुई चीज है? (नहीं।) उस हालत में, यह जन्मजात है। इसलिए, जो लोग मसीह-विरोधी हैं, उनके लिए सत्य को स्वीकार करना, मसीह को सहन करना असंभव है। बाहर से देखने पर ऐसा नहीं लगता कि उन्होंने कुछ कहा या किया है, और वे भी अपना योगदान करने और एक व्यावहारिक तरीके से कीमत चुकाने में सक्षम हैं। लेकिन जैसे ही उन्हें मौका मिलता है, जैसे ही काम करने का सही समय आता है, मसीह-विरोधियों की मसीह के साथ मूलभूत असंगति के परिदृश्य प्रकट होने शुरू हो जाएँगे, और मसीह-विरोधियों के परमेश्वर के विरुद्ध युद्ध और परमेश्वर के साथ उनके संबंध-विच्छेद का तथ्य स्पष्ट रूप से दिखाई दे जाएगा। ये सभी चीजें पहले भी उन जगहों पर हुई हैं जहाँ मसीह-विरोधी हैं, और परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य के इन वर्षों के दौरान ये विशेष रूप से असंख्य हो गई हैं। कई लोगों ने इन्हें प्रत्यक्ष रूप से अनुभव किया है।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे सत्य से घृणा, सिद्धांतों का खुले आम उल्लंघन और परमेश्वर के घर की व्यवस्थाओं की अवहेलना करते हैं (IV)' से उद्धृत

मसीह-विरोधी परमेश्वर की अद्वितीयता को मुख्यतः इसलिए नकारते हैं, क्योंकि वे भी परमेश्वर बनना चाहते हैं। पौलुस के शब्द उनके विशेष रूप से पसंदीदा शब्द हैं : "मेरे लिए जीवित रहना मसीह है, मेरे लिए जीवित रहना परमेश्वर है, परमेश्वर के जीवन के साथ मैं परमेश्वर हूँ।" उनका मानना है कि अगर यह दृष्टिकोण सत्य है, तो उनके परमेश्वर बनने, राजा की तरह राज करने, और लोगों पर नियंत्रण रखने की आशा है; अगर यह सत्य नहीं, तो राजा की तरह राज करने और परमेश्वर बनने की उनकी आशा चूर-चूर हो जाएगी। संक्षेप में, शैतान हमेशा परमेश्वर के साथ बराबरी पर रहना चाहता है—और मसीह-विरोधी भी ऐसा ही चाहते हैं : उनमें भी यही सार होता है। उदाहरण के लिए, परमेश्वर का अनुसरण करने वालों में ऐसे लोग हैं, जो लगातार परमेश्वर की बड़ाई करते हैं और उसकी गवाही देते हैं, उसके कार्य की और उसके वचनों के न्याय और ताड़ना के मनुष्य पर पड़ने वाले प्रभाव की गवाही देते हैं। वे उस समस्त कार्य की प्रशंसा करते हैं जो परमेश्वर मनुष्य को बचाने के लिए करता है, और वे परमेश्वर द्वारा चुकाई गई कीमत की भी प्रशंसा करते हैं। क्या मसीह-विरोधी भी इस सबका आनंद लेना चाहते हैं या वे ऐसा नहीं चाहते? वे लोगों के समर्थन, चापलूसी, बड़ाई—यहाँ तक कि प्रशंसा का भी आनंद लेना चाहते हैं। और उनके अन्य कौन-से शर्मनाक विचार होते हैं? वे चाहते हैं कि लोग उन पर विश्वास करें, सभी बातों में उन पर निर्भर रहें; लोगों का परमेश्वर पर भी भरोसा करना ठीक है—लेकिन परमेश्वर पर भरोसा करने के साथ ही अगर उनका मसीह-विरोधियों पर भरोसा और भी अधिक सच्चा, और भी अधिक वास्तविक हो जाता है, तो मसीह-विरोधी अत्यधिक प्रसन्न होंगे। जिस समय तुम परमेश्वर की स्तुति करते हो और परमेश्वर द्वारा दिए गए अनुग्रह गिनते हो, अगर उसी समय तुम मसीह-विरोधियों की सभी सराहनीय उपलब्धियों को भी उसमें जोड़ लेते हो, और उनके हर कृत्य का व्यापक प्रचार करते हुए अपने भाई-बहनों के बीच उनकी स्तुति गाते हो, तो वे अपने दिलों में अत्यधिक प्रसन्न होंगे और संतुष्ट अनुभव करेंगे। इस प्रकार, मसीह-विरोधी की प्रकृति और सार के दृष्टिकोण से बोलते हुए जब तुम कहते हो कि परमेश्वर के पास अधिकार है, कि वह धार्मिक है, और वह लोगों को बचाने में सक्षम है, जब तुम कहते हो कि केवल परमेश्वर के पास ही ऐसा सार है, कि केवल परमेश्वर ही इस प्रकार का कार्य कर सकता है, और इन चीजों को करने में कोई भी उसका स्थान नहीं ले सकता, न उसका प्रतिनिधित्व ही कर सकता है, न ही किसी में यह सार हो सकता है और न ही वह इन चीजों को कर सकता है : जब तुम यह कहते हो, तो मसीह-विरोधी अपने दिलों में इन शब्दों को स्वीकार नहीं करते, और उन्हें मानने से इनकार कर देते हैं। वे उन्हें स्वीकार क्यों नहीं करते? क्योंकि उनमें महत्वाकांक्षाएँ होती हैं—यह मुद्दे का एक पक्ष है। दूसरा पक्ष यह है कि वे देहधारी देह को परमेश्वर नहीं मानते और न ही उसे स्वीकार करते हैं। जब भी कोई कहता है कि परमेश्वर अद्वितीय है, केवल परमेश्वर ही धार्मिक है, तो वे अपने हृदय में इससे असहमत होते हैं और यह कहते हुए आंतरिक रूप से इसका विरोध हैं : "गलत—मैं भी धार्मिक हूँ!" जब तुम कहते हो कि केवल परमेश्वर ही पवित्र है, तो वे कहेंगे : "गलत—मैं भी पवित्र हूँ!" पौलुस इसका एक उदाहरण है : जब लोगों ने प्रभु यीशु मसीह के वचन का प्रसार करते हुए कहा कि प्रभु यीशु मसीह ने मानव जाति के लिए अपना बहुमूल्य रक्त दिया, कि वह पापबलि बना, और उसने समस्त मानव जाति को बचाया, और समस्त मानव जाति को पाप से छुटकारा दिलाया—तो यह सुनकर पौलुस को कैसा लगा? क्या उसने स्वीकार किया कि यह सब परमेश्वर का कार्य था? क्या उसने स्वीकार किया कि वह, जो यह सब करने में सक्षम था, मसीह था, और केवल मसीह ही यह सब कर सकता था? और क्या उसने स्वीकार किया कि केवल वही, जो यह सब करने में सक्षम था, परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकता था? उसने ऐसा नहीं किया। उसने कहा : "अगर यीशु सूली पर चढ़ाया जा सकता है, तो लोग भी सूली पर चढ़ाए जा सकते हैं! अगर वह अपना कीमती लहू दे सकता है, तो लोग भी दे सकते हैं! इसके अतिरिक्त, मार्ग का प्रचार मैं भी कर सकता हूँ, और मैं उससे अधिक ज्ञानी हूँ, और मैं कष्ट सह सकता हूँ! अगर तुम कहते हो कि वह मसीह है, तो क्या मुझे भी मसीह नहीं कहा जाना चाहिए? अगर तुम उसके पवित्र नाम की स्तुति करते हो, तो क्या मुझे भी मेरा हक नहीं मिलना चाहिए? अगर वह मसीह कहलाने के योग्य है, अगर वह परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकता है, और अगर वह परमेश्वर का पुत्र है, तो क्या हम भी नहीं हैं? हम जो कष्ट सहने और कीमत चुकाने में सक्षम हैं, और परमेश्वर के लिए परिश्रम और कार्य कर सकते हैं—क्या हम भी मसीह नहीं बन सकते? क्या हम भी परमेश्वर द्वारा नहीं सराहे जा सकते और मसीह नहीं बुलाए जा सकते? यह मसीह से कैसे भिन्न है?" संक्षेप में, वे परमेश्वर की अद्वितीयता को समझने में विफल रहे हैं, और वे नहीं समझते कि आखिरकार परमेश्वर की अद्वितीयता क्या है। उनका मानना है कि मसीह या परमेश्वर होना कोई ऐसी चीज है, जो व्यक्ति अपनी प्रतिभा और क्षमता के बल पर मेहनत करके बनता है, जैसे कोई व्यक्ति कठोर परिश्रम से अपने लिए अच्छी जगह बनाता है। तुम मसीह का सार होने से मसीह नहीं कहलाते; वह तो व्यक्ति अपने कठोर परिश्रम और अपनी क्षमता से कहलाता है : जो भी अधिक प्रतिभाशाली और अधिक सक्षम होता है, वही एक बड़ा अधिकारी बनता है और उसी का कहा अंतिम होता है। यह उनका तर्क है। मसीह-विरोधी परमेश्वर के वचन को सत्य नहीं मानते। परमेश्वर का सार और स्वभाव, जिनके बारे में परमेश्वर के वचनों में कहा गया है, उनकी समझ से बाहर होते हैं; वे साधारण, अनुभवहीन, अनभिज्ञ होते हैं, इसलिए उनकी बात में पूरी तरह से अनुभवहीनों के शब्द, आध्यात्मिक समझ से रहित शब्द भरे होते हैं। अगर उन्होंने कुछ वर्षों तक काम किया होता है, तो वे सोचते हैं कि वे पहले से ही कष्ट सहने और कीमत चुकाने में सक्षम हैं, कि वे प्रचार करते समय हवा हवाई बातें कर सकते हैं, उन्होंने बगुलाभगत बनना सीख लिया है, और वे दूसरों को धोखा दे सकते हैं, और उन्होंने कुछ लोगों का अनुमोदन प्राप्त कर लिया है—और इसलिए वे स्वाभाविक रूप से विश्वास करते हैं कि वे मसीह बनने में, परमेश्वर बनने में सक्षम हैं।

— "मसीह-विरोधियों को उजागर करना" में 'वे सत्य से घृणा, सिद्धांतों का खुले आम उल्लंघन और परमेश्वर के घर की व्यवस्थाओं की अवहेलना करते हैं (I)' से उद्धृत

पिछला: 5. परमेश्वर उन लोगों को क्यों नहीं बचाता, जिनमें बुरी आत्माओं का कार्य है या जो शैतानों के कब्ज़े में हैं

अगला: 2. झूठा अगुआ या झूठा चरवाहा कौन होता है और वे कैसे पहचाने जा सकते हैं

अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

संबंधित सामग्री

3. अनुग्रह के युग और राज्य के युग में कलीसियाई जीवन के बीच अंतर

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :जब, अनुग्रह के युग में, परमेश्वर तीसरे स्वर्ग में लौटा, तो समस्त मानव-जाति के छुटकारे का परमेश्वर का कार्य...

2. सच्ची प्रार्थना क्या है और इससे क्या हासिल हो सकता है

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :सच्ची प्रार्थना क्या है? प्रार्थना परमेश्वर को यह बताना है कि तुम्हारे हृदय में क्या है, परमेश्वर की इच्छा को...

1. क्या "स्वर्गारोहण" का अर्थ सच में हवा या स्वर्ग में ले जाया जाना है, और स्वर्ग का राज्य पृथ्वी पर है या स्वर्ग में

संदर्भ के लिए बाइबल के पद :"अत: तुम इस रीति से प्रार्थना किया करो : 'हे हमारे पिता, तू जो स्वर्ग में है; तेरा नाम पवित्र माना जाए। तेरा...

1. देहधारण और उसका सार क्या है

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन :"देहधारण" परमेश्वर का देह में प्रकट होना है; परमेश्वर सृष्टि के मनुष्यों के मध्य देह की छवि में कार्य करता है।...

वचन देह में प्रकट होता है न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन परमेश्वर का आगमन हो चुका है, वह राजा है सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का संकलन सत्य का अभ्यास करने के 170 सिद्धांत मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवों की गवाहियाँ विजेताओं की गवाहियाँ मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

सेटिंग्स

  • इबारत
  • कथ्य

ठोस रंग

कथ्य

फ़ॉन्ट

फ़ॉन्ट आकार

लाइन स्पेस

लाइन स्पेस

पृष्ठ की चौड़ाई

विषय-वस्तु

खोज

  • यह पाठ चुनें
  • यह किताब चुनें