17. एक झूठा मसीह क्या होता है? एक मसीह-विरोधी को कैसे पहचाना जा सकता है?

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

जो देहधारी परमेश्वर है, उसके पास परमेश्वर का सार होगा, और जो देहधारी परमेश्वर है, उसके पास परमेश्वर की अभिव्यक्ति होगी। चूँकि परमेश्वर ने देह धारण की है, इसलिए वह उस कार्य को सामने लाएगा, जो वह करना चाहता है, और चूँकि परमेश्वर ने देह धारण की है, इसलिए वह उसे अभिव्यक्त करेगा जो वह है, और वह मनुष्य के लिए सत्य को लाने, उसे जीवन प्रदान करने और उसे मार्ग दिखाने में सक्षम होगा। जिस देह में परमेश्वर का सार नहीं है, वह निश्चित रूप से देहधारी परमेश्वर नहीं है; इस में कोई संदेह नहीं। अगर मनुष्य यह पता करना चाहता है कि क्या यह देहधारी परमेश्वर है, तो इसकी पुष्टि उसे उसके द्वारा अभिव्यक्त स्वभाव और उसके द्वारा बोले गए वचनों से करनी चाहिए। दूसरे शब्दों में, व्यक्ति को इस बात का निश्चय, कि यह देहधारी परमेश्वर का शरीर है या नहीं, उसके सार से करना चाहिए। और इसलिए, यह निर्धारित करने की कुंजी, कि यह देहधारी परमेश्वर का शरीर है या नहीं, उसके बाहरी स्वरूप के बजाय उसके सार (उसका कार्य, उसके कथन, उसका स्वभाव और कई अन्य पहलू) में निहित है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" की 'प्रस्तावना' से उद्धृत

देहधारी परमेश्वर को मसीह कहा जाता है, और इसलिए वह मसीह, जो लोगों को सत्य दे सकता है परमेश्वर कहलाता है। इसमें कुछ भी अतिशयोक्ति नहीं है, क्योंकि वह परमेश्वर के सार को धारण किए है, और अपने कार्य में परमेश्वर के स्वभाव और बुद्धि को धारण करता है, और ये चीजें मनुष्य के लिये अप्राप्य हैं। जो अपने आप को मसीह कहते हैं, फिर भी परमेश्वर का कार्य नहीं कर सकते, वे सभी धोखेबाज़ हैं। मसीह पृथ्वी पर परमेश्वर की अभिव्यक्ति मात्र नहीं है, बल्कि वह विशेष देह भी है जिसे धारण करके परमेश्वर लोगों के बीच रहकर अपना कार्य पूरा करता है। यह वह देह नहीं है जो किसी भी मनुष्य के द्वारा प्रतिस्थापित किया जा सकता है, बल्कि वह देह है, जो परमेश्वर के कार्य को पृथ्वी पर अच्छी तरह से वहन कर सकता है और परमेश्वर के स्वभाव को अभिव्यक्त करता है, और अच्छी प्रकार से परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकता है, और मनुष्य को जीवन प्रदान कर सकता है। देर-सवेर, मसीह का भेष धारण करने वालों का पतन होगा, क्योंकि वे भले ही मसीह होने का दावा करते हैं, किंतु उनमें किंचितमात्र भी मसीह का सार नहीं होता। इसलिए मैं कहता हूँ कि मसीह की प्रामाणिकता मनुष्य के द्वारा परिभाषित नहीं की जा सकती है, परन्तु स्वयं परमेश्वर के द्वारा इसका उत्तर दिया और निर्णय लिया जा सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'केवल अंतिम दिनों का मसीह हीमनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है' से उद्धृत

यद्यपि पृथ्वी पर मसीह परमेश्वर स्वयं के स्थान पर कार्य करने में समर्थ है, किन्तु वह सब लोगों को देह में अपनी छवि दिखाने के आशय से नहीं आता है। वह सब लोगों को स्वयं का दर्शन कराने नहीं आता है; वह मनुष्य को अनुमति देने आता है कि वह उसका हाथ पकड़कर उसकी अगुवाई में चलें, इस प्रकार नवीन युग में प्रवेश करें। मसीह के देह का कार्य स्वयं परमेश्वर के कार्य, अर्थात्, देह में परमेश्वर के कार्य के लिए है, और मनुष्य को समर्थ करने के लिए नहीं है कि वह उसकी देह के सार को पूर्णतः समझे। चाहे वह जैसे भी कार्य करे, वह उससे अधिक नहीं करता है जो देह के लिए प्राप्य से अधिक हो। चाहे वह जैसे भी कार्य करे, वह ऐसा देह में होकर सामान्य मानवता के साथ करता है, तथा वह मनुष्य पर परमेश्वर की वास्तविक मुखाकृति को प्रकट नहीं करता है। इसके अतिरिक्त, देह में उसका कार्य इतना अलौकिक या अपरिमेय नहीं है जैसा कि मनुष्य समझता है। यद्यपि मसीह देह में परमेश्वर स्वयं का प्रतिनिधित्व करता है तथा व्यक्तिगत रूप से वह कार्य करता है जिसे स्वयं परमेश्वर को करना चाहिए, किन्तु वह स्वर्ग में परमेश्वर के अस्तित्व को नहीं नकारता है, ना ही वह उत्तेजनापूर्वक अपने स्वयं के कर्मों की घोषणा करता है। बल्कि, वह विनम्रतापूर्वक अपनी देह के भीतर छिपा रहता है। मसीह के अलावा, जो मसीह होने का झूठा दावा करते हैं उनके पास उसकी विशेषताएँ नहीं होती हैं। अभिमानी तथा आत्म-प्रशंसा करने के स्वभाव वाले झूठे मसीहों से तुलना करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि किस प्रकार की देह में वास्तव में मसीह है। जितने अधिक वे झूठे होते हैं, उतना ही अधिक इस प्रकार के झूठे मसीह स्वयं का दिखावा करते हैं, तथा लोगों को धोखा देने के लिये वे और अधिक संकेतों और चमत्कारों को करने में समर्थ होते हैं। झूठे मसीहों के पास परमेश्वर के गुण नहीं होते हैं; मसीह पर झूठे मसीहों से संबंधित किसी भी तत्व का दाग नहीं लगता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'स्वर्गिक परमपिता की इच्छा के प्रतिआज्ञाकारिता ही मसीह का वास्तविक सार है' से उद्धृत

कुछ ऐसे लोग हैं जो दुष्टात्माओं के द्वारा ग्रसित हैं और लगातार ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाते रहते हैं, "मैं परमेश्‍वर हूँ!" फिर भी अंत में, उन पर से पर्दा हट जाता है, क्योंकि वे गलत चीज़ का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे शैतान का प्रतिनिधित्व करते हैं और पवित्र आत्मा उन पर कोई ध्यान नहीं देता है। तुम अपने आपको कितना भी बड़ा ठहराओ या तुम कितनी भी ताकत से चिल्लाओ, तुम अभी भी एक सृजित प्राणी ही हो और एक ऐसे प्राणी हो जो शैतान से सम्बन्धित है। मैं कभी नहीं चिल्लाता हूँ, "मैं ईश्वर हूँ, मैं परमेश्वर का प्रिय पुत्र हूँ!" परन्तु जो कार्य मैं करता हूँ वह परमेश्वर का कार्य है। क्या मुझे चिल्लाने की आवश्यकता है? ऊँचा उठाये जाने की कोई आवश्यकता नहीं है। परमेश्वर अपना काम स्वयं करता है और उसे मनुष्य से ऐसी कोई अपेक्षा नहीं है कि वह उसे हैसियत या सम्मानसूचक पदवी प्रदान करे: उसकी पहचान और हैसियत को दर्शाने के लिए उसका काम ही पर्याप्त है। अपने बपतिस्मा से पहले, क्या यीशु स्वयं परमेश्वर नहीं था? क्या वह परमेश्वर का देहधारी देह नहीं था? निश्चित रूप से यह नहीं कहा जा सकता है कि केवल उसके लिए गवाही दिए जाने के पश्चात् ही वह परमेश्वर का इकलौता पुत्र बना? क्या उसके द्वारा काम आरम्भ करने से बहुत पहले ही यीशु नाम का कोई व्यक्ति नहीं था? तुम नए मार्ग नहीं ला सकते हो या पवित्रात्मा का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते हो। तुम पवित्र आत्मा के कार्य को या उन वचनों को व्यक्त नहीं कर सकते हो जिन्हें वह कहता है। तुम परमेश्वर स्वयं के या पवित्रात्मा के कार्य को नहीं कर सकते हो। तुम परमेश्वर की बुद्धि, अद्भुतता, और अगाधता को, या उस सम्पूर्ण स्वभाव को व्यक्त नहीं कर सकते हो जिसके द्वारा परमेश्वर मनुष्य को ताड़ना देता है: इन सबको व्यक्त करना तुन्हारी क्षमता के बाहर है। अतः परमेश्वर होने के तुम्हारे दावों से कोई फर्क नहीं पड़ता है; तुम्हारे पास सिर्फ़ नाम होगा और सार में से कुछ भी नहीं होगा। परमेश्वर स्वयं आ गया है, किन्तु कोई भी उसे नहीं पहचाता है, फिर भी वह अपना काम जारी रखता है और पवित्र आत्मा के प्रतिनिधित्व में ऐसा करता है। चाहे तुम उसे मनुष्य कहो या परमेश्वर, प्रभु कहो या मसीह, या उसे बहन कहो, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता है। परन्तु जिस कार्य को वह करता है वह पवित्रात्मा का है और स्वयं परमेश्वर के कार्य का प्रतिनिधित्व करता है। वह उस नाम के बारे में परवाह नहीं करता है जिससे मनुष्य उसे पुकारते है। क्या वह नाम उसके काम का निर्धारण कर सकता है? इचाहे तुम उसे कुछ भी कहकर पुकारो, परमेश्वर के दृष्टिकोण से, वह परमेश्वर के आत्मा का देहधारी देह है; वह पवित्रात्मा का प्रतिनिधित्व करता है और उसके द्वारा अनुमोदित है। यदि तुम एक नए युग के लिए मार्ग नहीं बना सकते हो, और तुम पुराने युग का समापन नहीं कर सकते हो और एक नए युग का सूत्रपात या नया कार्य नहीं कर सकते हो तो, तुम्हें परमेश्वर नहीं कहा जा सकता है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'देहधारण का रहस्य (1)' से उद्धृत

यदि, वर्तमान समय में, कोई व्यक्ति उभर कर आता है जो चिह्नों और चमत्कारों को प्रदर्शित करने, पिशाचों को निकालने, चंगाई करने में और कई चमत्कारों को करने में समर्थ है, और यदि यह व्यक्ति दावा करता है कि वो यीशु की वापसी है, तो यह दुष्टात्माओं की जालसाजी और उसका यीशु की नकल करना होगा। इस बात को स्मरण रखें! परमेश्वर एक ही कार्य को दोहराता नहीं है। यीशु के कार्य का चरण पहले ही पूर्ण हो चुका है, और परमेश्वर फिर से उस चरण के कार्य को पुनः नहीं दोहराएगा। परमेश्वर का कार्य मनुष्य की सभी अवधारणाओं के असंगत है; उदाहरण के लिए, पुराने नियम में मसीहा के आगमन के बारे में पहले से ही बताया गया है, परन्तु यह पाया गया कि यीशु आया, इसलिए एक अन्य मसीहा का फिर से आना गलत होगा। यीशु एक बार आ चुका है, और इस समय यदि यीशु को फिर से आना होता तो यह गलत होता। प्रत्येक युग के लिए एक नाम है और प्रत्येक नाम युग के द्वारा चिन्हित किया जाता है। मनुष्य की अवधारणाओं में, परमेश्वर को अवश्य हमेशा चिह्न और चमत्कार दिखाने चाहिए, हमेशा चंगा करना और पिशाचों को निकालना चाहिए, और हमेशा यीशु के ही समान अवश्य होना चाहिए, फिर भी इस समय परमेश्वर इन सब के समान बिल्कुल भी नहीं है। यदि अंत के दिनों के दौरान, परमेश्वर अभी भी चिह्नों और चमत्कारों को प्रदर्शित करता है और अभी भी दुष्टात्माओं को निकालता और बीमारों को चंगा करता है—यदि वह यीशु के ही समान करता है—तो परमेश्वर एक ही कार्य को दोहरा रहा होगा, और यीशु के कार्य का कोई महत्व या मूल्य नहीं होगा। इस प्रकार, प्रत्येक युग में परमेश्वर कार्य के एक ही चरण को करता है। एक बार जब उसके कार्य का प्रत्येक चरण पूरा हो जाता है, तो शीघ्र ही इसकी दुष्टात्माओं के द्वारा नकल की जाती है, और शैतान द्वारा परमेश्वर का करीब से पीछा करने के बाद, परमेश्वर एक दूसरा तरीका बदल देता है। एक बार परमेश्वर अपने कार्य का एक चरण पूर्ण कर लेता है, तो इसकी दुष्टात्माओं द्वारा नकल कर ली जाती है। तुम लोगों को इस बारे में अवश्य स्पष्ट हो जाना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आज परमेश्वर के कार्य को जानना' से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण:

जो कोई भी लोगों को धोखा देने हेतु बोलने के लिए मसीह का रूप धारण करता है, वह एक झूठा मसीह है। सभी झूठे मसीह बुरी आत्माओं के कब्ज़े में हैं और वे धोखेबाज़ हैं। तुम ऐसे झूठे मसीह को कैसे पहचान सकते हो जो लोगों को धोखा देने के लिए लगातार बोलता रहता है? यदि तुम झूठे मसीह के केवल कुछ वचनों को देखोगे, तो तुम अपने सिर को खुजलाओगे और यह पता नहीं लगा पाओगे कि वास्तव में दुष्ट आत्मा के इरादे क्या है। यदि तुम इस दुष्ट आत्मा पर नज़र रखना जारी रखोगे और जो कुछ भी उसने कहा है, उस पर विचार करोगे, तो यह देखना बहुत आसान है कि यह वास्तव में किस प्रकार की चीज़ है, यह क्या कर रही है, यह वास्तव में क्या कह रही है, यह लोगों के साथ क्या करने की साज़िश रच रही है और लोगों को कौन सी राह बता रही है—तब, समझना आसान हो जाता है। हम देख सकते हैं कि बहुत सी बुरी आत्माओं के वचनों में यही अभिलक्षण आवश्यक रूप से मौज़ूद रहते हैं। वे केवल परमेश्वर के वचनों की नक़ल कर सकते हैं, लेकिन परमेश्वर के वचनों के सार को निश्चित रूप से नहीं पा सकते हैं। परमेश्वर के वचनों का एक संदर्भ और एक उद्देश्य होता है। परमेश्वर के कथनों का अंतिम उद्देश्य और उनके प्रभाव बहुत स्पष्ट होते हैं और तुम देख सकते हो उसके वचनों में अधिकार और सामर्थ्य होती है, कि वे किसी के भी हृदय को छू सकते हैं और उसकी आत्मा को प्रेरित कर सकते हैं। लेकिन दुष्ट आत्माओं और शैतान के वचनों का न तो कोई संदर्भ होता और ना ही कोई प्रभाव—वे एक रुके हुए पानी के एक पोखर की तरह होते हैं और उन्हें पढ़ने के बाद लोगों को दिलों में गंदा महसूस होता है। उन्हें उनसे कुछ भी हासिल नहीं होता है। इसलिए, सभी प्रकार की दुष्ट आत्माओं के पास सत्य का अभाव होता है और वे अन्दर से निश्चित रूप से गंदी और अंधकारमय होती हैं। उनके वचन लोगों के लिए प्रकाश नहीं ला सकते हैं और उन्हें ऐसा मार्ग नहीं दिखा सकते हैं जिसका उन्हें अनुसरण करना चाहिए। दुष्ट आत्माएँ अपने उद्देश्य को स्पष्ट रूप से नहीं कहती हैं ना ही कहती है कि वे क्या कार्यान्वित करने का प्रयास कर रही हैं; वहाँ सत्य के सार और मूल के बारे में कोई उल्लेख नहीं होता है। ज़रा सा भी नहीं। दुष्ट आत्माओं के वचनों में लोगों द्वारा समझने या प्राप्त करने लायक कुछ भी नहीं पाया जा सकता है। इसलिए, दुष्ट आत्माओं के वचन केवल लोगों को भ्रमित कर सकते हैं और उनके अन्दर गंदगी और अंधकार ला सकते हैं। वे लोगों को कोई भी जीवनाधार प्रदान नहीं कर सकते हैं। इससे हम देख सकते हैं कि दुष्ट आत्माओं की अंतर्निहित प्रकृति और सार दुष्टता और अंधकार का होता है। उनमें प्राणशक्ति का अभाव होता है, उसकी जगह वे मौत की दुर्गंध छोड़ती हैं। वे वास्तव में नकारात्मक चीज़ें हैं जिन्हें शापित होना चाहिए। उनके भाषण में कोई सच्चाई नहीं होती है; यह पूरी तरह बकवास होता है और जो मतली, घृणा और उल्टी का कारण बनता है, मानो कि किसी ने अभी-अभी कोई मरी हुई मक्खियों खा ली हो।

— 'कार्य व्यवस्था' से उद्धृत

अगर कोई परमेश्वर के चुने हुए लोगों को समझने में भूल करता है और कहता है कि वह मसीह है, देहधारी परमेश्वर का देह है, तो हमें उसके सार और अभिव्यक्ति, उसके काम और शब्दों, और उसके प्रकट किये गये स्वभाव को देखने की ज़रूरत है, ताकि यह पता चल सके कि वह मसीह है या नहीं। इन प्रमुख पहलुओं से उसका सार देखने द्वारा हम यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि वह देहधारी परमेश्वर है या नहीं। सबसे पहले, काम के पहलू से, हमें यह देखना चाहिए कि यदि उसका काम परमेश्वर का कार्य है, तो वह परमेश्वर के वचन, परमेश्वर के अस्तित्व, और उसके धार्मिक स्वभाव को व्यक्त करने में सक्षम होगा। यदि यह मनुष्य का काम है, तो वह केवल मनुष्य के अस्तित्व, मनुष्य के अनुभव और समझ के बारे में ही बात कर सकता है। वह परमेश्वर के कार्य, परमेश्वर के अस्तित्व, उसकी अपेक्षाओं और उसके स्वभाव के बारे में बात करने में असमर्थ है, परमेश्वर की प्रबंधन योजना और परमेश्वर के रहस्य की बात तो रहने ही दें। दूसरा, वचन के पहलू से, परमेश्वर के वचन और मानव के शब्द के बीच एक बड़ा अंतर है। परमेश्वर का वचन उन सभी का प्रतिनिधित्व करता है जो परमेश्वर का अस्तित्व है और मनुष्य का शब्द उसका प्रतिनिधित्व करता है जो मनुष्य का अस्तित्व है। परमेश्वर का वचन परमेश्वर के स्वभाव का प्रतिनिधित्व करता है। मनुष्य का शब्द मनुष्य की मानवता का प्रतिनिधित्व करता है। परमेश्वर का वचन सत्य है। मनुष्य का शब्द सत्य नहीं है। यह सत्य से संबंधित नहीं है। तीसरा, स्वभाव के पहलू से, परमेश्वर का कार्य परमेश्वर के स्वभाव को व्यक्त कर सकता है। मनुष्य का काम परमेश्वर के स्वभाव को व्यक्त नहीं कर सकता; यह केवल मनुष्य के व्यक्तित्व को व्यक्त कर सकता है। मनुष्य के व्यक्तित्व में क्या है? क्या इसमें कोई धार्मिकता, प्रताप, क्रोध या सत्य है? मनुष्य के व्यक्तित्व में वो नहीं है जो परमेश्वर का अस्तित्व है। इसी तरह, मनुष्य के काम में परमेश्वर के स्वभाव की झलक भी नहीं है। इन पहलुओं से आकलन करना बहुत आसान है कि यह परमेश्वर का वचन है या मनुष्य का शब्द, परमेश्वर का कार्य है या मनुष्य का काम। यदि मनुष्य इन पहलुओं से अंतर नहीं बता सकता है, तो उसके लिए झूठे मसीहियों और मसीह विरोधियों द्वारा भ्रमित होना आसान है। यदि आप इन तीन पहलुओं से अंतर बता सकते हैं, तो आप यह निर्धारित करने में सक्षम होंगे कि देहधारी परमेश्वर कौन है और कौन नहीं। कार्य, वचन और स्वभाव—इन तीन पहलुओं से अंतर बताना सबसे सटीक है, बाहरी प्रकटनों से आकलन करना नहीं।

— 'जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति' से उद्धृत

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