7. एक धोखेबाज व्यक्ति क्या है? धोखेबाज़ लोगों को क्यों नहीं बचाया जा सकता है?

परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:

यदि तुम बहुत धोखेबाज हो, तो तुम्हारे पास एक संरक्षित हृदय होगा और सभी मामलों और सभी लोगों के बारे में संदेह के विचार होंगे। इसी कारण से, मुझ में तुम्हारा विश्वास संदेह कि नींव पर बना है। इस प्रकार के विश्वास को मैं कभी भी स्वीकार नहीं करूँगा। सच्चे विश्वास का अभाव होने पर, तुम सच्चे प्रेम से और भी अधिक दूर होगे। और यदि तुम परमेश्वर पर भी संदेह करने और अपनी इच्छानुसार उसके बारे में अनुमान लगाने में समर्थ हो, तो तुम संदेह से परे, मनुष्यों में सबसे अधिक धोखेबाज हो। तुम अनुमान लगाते हो कि क्या परमेश्वर मनुष्य के सदृश हो सकता हैः अक्षम्य रूप से पापमय, तुच्छ चरित्र का, निष्पक्षता और समझ से विहीन, न्याय की भावना के अभाव वाला, शातिर, कपटी, अक्सर धूर्त युक्तियों को आज़माने वाला, और साथ ही दुष्टता और अंधकार से खुश रहने वाला, इत्यादि। मनुष्य के ऐसे विचारों का होना इसी कारण से नहीं है क्योंकि मनुष्य को परमेश्वर का थोड़ा सा भी ज्ञान नहीं है? इस ढंग का विश्वास पाप से कम नहीं है! इसके अलावा, यहाँ तक कि कुछ ऐसे भी हैं जो यह विश्वास करते हैं कि जो लोग मुझे प्रसन्न करते हैं वे चाटुकारों और चापलूसों के अलावा अन्य कोई नहीं हैं, और जिनमें इन कौशलों का अभाव है उन्हें नापसंद किया जाएगा और वे परमेश्वर के घर में अपना स्थान खो देंगे। क्या यही वह सब ज्ञान है जो तुम लोगों ने इन कई वर्षों में बटोरा है? क्या यही सब तुम लोगों ने प्राप्त किया है? मेरे बारे में तुम लोगों का ज्ञान इन गलतफ़हमियों पर रुकता नहीं है; इसके अलावा, परमेश्वर के आत्मा के विरूद्ध में तुम लोगों की ईशनिंदा और स्वर्ग का तिरस्कार तो और भी अधिक ख़राब है। इसलिए मैं कहता हूँ कि जिस ढंग का विश्वास तुम लोगों का है वह तुम लोगों को केवल मुझ से दूर भटकाने का तथा मेरे विरुद्ध और अधिक विरोधी बनाने का ही कारण बनेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पृथ्वी के परमेश्वर को कैसे जानें' से उद्धृत

जो लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं लेकिन फिर भी सत्य का अनुसरण नहीं करते हैं, वे शैतान के प्रभाव से किसी भी तरह नहीं बच सकते हैं। जो लोग ईमानदारी से अपना जीवन नहीं जीते हैं, जो दूसरों के सामने किसी ऐसे व्यक्ति के जैसा होने का नाटक करते हैं जो वे नहीं हैं, जो नम्रता, धैर्य और प्रेम का दिखावा करते हैं, जबकि मूल रूप में वे कपटी, धूर्त हैं और परमेश्वर के प्रति उनकी कोई निष्ठा नहीं हैं, ऐसे मनुष्य अंधकार के प्रभाव में रहने वाले लोगों के विशिष्ट नमूने हैं, वे सर्पों के सँपोले हैं। जो लोग हमेशा अपने ही लाभ के लिए परमेश्वर पर विश्वास रखते हैं, जो अभिमानी और घमंडी हैं, जो खुद का दिखावा करते हैं, हमेशा अपनी हैसियत की रक्षा करते हैं, ये ऐसे मनुष्य हैं जो शैतान से प्यार करते हैं और सत्य का विरोध करते हैं, वे परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं और पूरी तरह से शैतान के संबंधी हैं। जो लोग परमेश्वर के बोझ के प्रति सतर्क नहीं हैं, स्वच्छ ह्रदय से परमेश्वर की सेवा नहीं कर रहे हैं, हमेशा स्वयं के और अपने परिवार के हितों के लिए चिंतित हैं, परमेश्वर के लिए खर्च करने के लिए हर चीज का परित्याग करने में सक्षम नहीं हैं, परमेश्वर के वचनों के अनुसार अपनी ज़िंदगी कभी नहीं जीते हैं, वे परमेश्वर के वचनों के बाहर जी रहे हैं। ऐसे लोगों को परमेश्वर की प्रशंसा प्राप्त नहीं होगी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अंधकार के प्रभाव से बच निकलो औरतुम परमेश्वर द्वारा जीत लिए जाओगे' से उद्धृत

बाद में, आगे चलकर, तुम्हें चालाकियाँ नहीं करनी चाहिए, न ही तुम्हें धोखाधड़ी और कुटिलता में पड़ना चाहिए, अन्यथा परिणाम अकल्पनीय होंगे! तुम लोग अब भी नहीं जानते कि धोखा और कुटिलता क्या हैं। कोई भी कर्म या व्यवहार जो तुम मुझे नहीं दिखा सकते हो, जिसे तुम खुले में नहीं ला सकते हो, वह धोखाधड़ी और कुटिलता है। अब तुम्हें यह समझ लेना चाहिए! अब यदि तुम भविष्य में धोखाधड़ी और कुटिलता में पड़ते हो, तो न समझने का नाटक मत करना, यह तो जानबूझकर भूल करना, और भी अधिक दोषी बनना, है। यह केवल तुम्हें आग में जल जाने की ओर, या इससे भी बदतर, खुद को बर्बाद कर देने की ओर ही, ले जायेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 45' से उद्धृत

कुछ लोग हमेशा यह दावा करते हैं कि वे जो भी करते है वो कलीसिया के लिए होता है; लेकिन सच्चाई यह है कि वे अपने फायदे के लिए कार्य कर रहें हैं। ऐसे लोगों के इरादे गलत होते हैं। वे कुटिल और धोखेबाज हैं और वे अधिकांश चीज़ें जो करते हैं, वह उनके निजी लाभ के लिए होती हैं। उस तरह का व्यक्ति परमेश्वर के प्रति प्रेम का अनुसरण नहीं करता है; उसका हृदय अब भी शैतान का है और परमेश्वर की ओर नहीं मुड़ सकता है। इस प्रकार, परमेश्वर के पास उस तरह के व्यक्ति को प्राप्त करने का कोई मार्ग नहीं है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के लिए सच्चा प्रेम स्वाभाविक है' से उद्धृत

तुम लोगों को जानना चाहिए कि परमेश्वर एक ईमानदार मनुष्य को पसंद करता है। परमेश्वर के पास निष्ठा का सार है, और इसलिए उसके वचन पर हमेशा भरोसा किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, उसका कार्य दोषरहित और निर्विवाद है। यही कारण है कि परमेश्वर उन लोगों को पसंद करता है जो उसके साथ पूरी तरह से ईमानदार हैं। ... तुम्हें पता होना चाहिए कि तुम्हारे भीतर सच्चा विश्वास और सच्ची वफादारी है कि नहीं, परमेश्वर के लिए कष्ट उठाने का तुम्हारा कोई अभिलेख है कि नहीं, और तुमने परमेश्वर के प्रति पूरी तरह से समर्पण किया है कि नहीं। यदि तुममें इन बातों का अभाव है, तो तुम्हारे भीतर अवज्ञा, धोखा, लालच और शिकायत बची है। चूँकि तुम्हारा हृदय ईमानदार नहीं है, इसलिए तुमने कभी भी परमेश्वर से सकारात्मक स्वीकृति प्राप्त नहीं की है और कभी भी प्रकाश में जीवन नहीं बिताया है। अंत में किसी व्यक्ति का भाग्य कैसे सम्पन्न होता है यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसके पास एक ईमानदार और रक्तिम हृदय है कि नहीं, और उसके पास एक शुद्ध आत्मा है कि नहीं। यदि तुम कोई ऐसे व्यक्ति हो जो अत्यधिक बेईमान है, जिसके पास दुर्भावनापूर्ण हृदय है, और कोई ऐसे व्यक्ति हो जिसकी आत्मा अशुद्ध है, तो तुम अंत में निश्चित रूप से ऐसी जगह पहुँचोगे जहाँ मनुष्य को दण्ड दिया जाता है, जैसा कि तुम्हारे भाग्य के अभिलेख में लिखा है। यदि तुम अत्यधिक ईमानदार होने का दावा करते हो, मगर कभी भी सत्य के अनुसार कार्य करने या सत्य का एक भी वचन बोलने का प्रबंध नहीं करते हो, तो क्या तुम तब भी परमेश्वर से तुम्हें पुरस्कृत किए जाने की प्रतीक्षा करते हो? क्या तुम तब भी परमेश्वर से आशा करते हो कि वह तुम्हें अपनी आँखों के तारे के समान माने? क्या यह सोचने का हास्यास्पद तरीका नहीं है? तुम सभी बातों में परमेश्वर को धोखा देते हो, तो परमेश्वर का घर तुम जैसे किसी को कैसे जगह दे सकता है जिसके हाथ अशुद्ध हैं?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तीन चेतावनियाँ' से उद्धृत

"यदि तुम अपने रहस्यों को—कहने का अर्थ है, अपनी कठिनाइयों को—दूसरों के सामने प्रकट करने के अत्यधिक अनिच्छुक हो ताकि प्रकाश का मार्ग खोजा जा सके, तो मैं कहता हूँ कि तुम ऐसे व्यक्ति हो जिसे आसानी से उद्धार प्राप्त नहीं होगा और जो आसानी से अंधकार से नहीं निकलेगा।" यहाँ परमेश्वर ने मनुष्यों को अभ्यास का एक मार्ग प्रदान किया है, और यदि तू इस तरह से अभ्यास नहीं करता है, और केवल चिल्लाकर नारे और सिद्धांत बोलता है, तो तू ऐसा व्यक्ति है जिसे आसानी से उद्धार प्राप्त नहीं होगा। यह वास्तव में उद्धार से जुड़ा हुआ है। बचाया जाना प्रत्येक व्यक्ति के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। क्या परमेश्वर ने इसका कहीं और उल्लेख किया है? अन्यत्र, वह शायद ही कभी बचाए जाने की कठिनाई का उल्लेख करता है, लेकिन वह ईमानदार होने की बात करते समय इसके बारे में बात करता है: यदि तू इस तरह से कार्य नहीं करता है, तो तू कोई ऐसा व्यक्ति है जिसे बचाया जाना बहुत मुश्किल है। "आसानी से उद्धार प्राप्त न करने" का अर्थ है कि तेरा बचाया जाना मुश्किल है और तू उद्धार के लिए सही मार्ग अपनाने में असमर्थ है, और इसलिए तुझे बचाना असंभव है। लोगों को कुछ गुंजाइश देने के लिए परमेश्वर ऐसा कहता है; कहने का तात्पर्य है कि, तुझे बचाना आसान नहीं है, लेकिन दूसरी ओर, यदि तू परमेश्वर के वचनों को व्यवहार में लाता है, तो तेरे लिए आशा होगी और तुझे बचाया जा सकता है। यदि तू परमेश्वर के वचनों को व्यवहार में नहीं लाता है, और यदि तू अपने रहस्यों या कठिनाइयों का कभी भी विश्लेषण नहीं करता है, या कभी भी उन निजी बातों को किसी को नहीं बताता है या उनके बारे में लोगों के सामने स्पष्ट नहीं होता है, उनके बारे में कभी भी लोगों के साथ संगति नहीं करता है, या अपने आप को स्पष्ट करने के लिए लोगों के साथ उनका विश्लेषण नहीं करता है, तब तेरे बचाए जाने की कोई संभावना नहीं है। और ऐसा क्यों है? यदि तू इस तरह से अपने आप को उजागर नहीं करता है या विश्लेषण नहीं करता है, तो तेरा भ्रष्ट स्वभाव कभी नहीं बदलेगा। और यदि तू बदलने में असमर्थ है, तो भूल जा कि तुझे बचाया जा सकता है। इन वचनों को कहने में परमेश्वर का यही अर्थ है, और यह परमेश्वर की इच्छा है।

परमेश्वर ने हमेशा इस बात पर ज़ोर क्यों दिया है कि लोगों को ईमानदार होना चाहिए? क्योंकि यह बहुत महत्वपूर्ण है, और यह सीधे तौर पर इस बात से संबंधित है कि तुझे बचाया जा सकता है या नहीं। ... परमेश्वर जिन्हें चाहता है वे हैं ईमानदार लोग। यदि तू झूठ और धोखे में सक्षम है, तो तू एक विश्वासघाती, कुटिल और कपटी व्यक्ति है, और एक ईमानदार व्यक्ति नहीं है। और यदि तू एक ईमानदार व्यक्ति नहीं है, तो कोई अवसर नहीं है कि परमेश्वर तुझे बचाएगा, ना ही तू संभवतः बचाया जा सकता है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'एक ईमानदार व्यक्ति होने कासबसे बुनियादी अभ्यास' से उद्धृत

मुझ में सब कुछ धार्मिक है और कोई अधार्मिकता, कोई छल, और कोई कुटिलता बिल्कुल भी नहीं है; जो कोई भी कुटिल और धोखेबाज है वह अवश्य नरक का पुत्र होना चाहिए अधोलोक में पैदा हुआ होना चाहिए। मुझमें सब कुछ प्रत्यक्ष है; जो कुछ भी मैं पूरा करने के लिए कहता हूँ वह पूरा हो जाता है और जो कुछ भी मैं स्थापित करने के लिए कहता हूँ वह स्थापित हो जाता है, और कोई भी इन चीज़ों को बदल नहीं सकता है या इनकी बराबरी नहीं कर सकता है क्योंकि मैं स्वयं ही एकमात्र परमेश्वर हूँ।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'आरंभ में मसीह के कथन' के 'अध्याय 96' से उद्धृत

संदर्भ के लिए धर्मोपदेश और संगति के उद्धरण:

धोखेबाज़ लोग न केवल दूसरे लोगों को धोखा देते हैं, बल्कि वे परमेश्वर के साथ भी धोखेबाज़ी से पेश आते हैं, क्योंकि यह उनकी फ़ितरत है। हम उनकी धोखेबाज फ़ितरत को उस प्रवृत्ति से देख सकते हैं जो धोखेबाज लोग परमेश्वर के वचन के प्रति रखते हैं: वे हमेशा परमेश्वर के वचन के प्रति संदेहपूर्ण होते हैं, और वे इस पर विश्वास नहीं करते हैं। इस बात पर, धोखेबाज़ लोग और ईमानदार लोग पूरी तरह से भिन्न होते हैं। ईमानदार लोग विशेष रूप से निष्कपट होते हैं। परमेश्वर जो भी कहता है वे उस पर विश्वास करते हैं, परमेश्वर जो भी कहता है उसका आज्ञापालन करते हैं, और ठीक वही करते हैं जो परमेश्वर अपेक्षा करता है। इसलिए परमेश्वर ईमानदार लोगों को पसंद करता है, और वह ईमानदार लोगों को आशीष देता है। पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त करना ईमानदार लोगों के लिए सबसे आसान है। एक धोखेबाज़ व्यक्ति पूरी तरह से इसके विपरीत होता है। इस बात की परवाह किए बिना कि परमेश्वर क्या बोलता है, धोखेबाज़ व्यक्ति हमेशा संदेहपूर्ण होता है कि यह कोई चाल है, यह कोई बुद्धि का खेल है, इसलिए वे आसानी से इसे स्वीकार और इसका अभ्यास नहीं कर पाते हैं। धोखेबाज़ लोगों को न केवल परमेश्वर के वचन के बारे में संदेह ही नहीं होता, बल्कि वे परमेश्वर के कार्य का अध्ययन करने में भी माहिर होते हैं। वे हमेशा परमेश्वर के वास्तविक इरादों को भाँपने की कोशिश करते हैं ताकि वे कोई लेन-देन कर सकें। यह स्पष्ट है कि धोखेबाज़ लोग अदला-बदली करने में सबसे अधिक कुशल होते हैं। उनका फ़लसफ़ा अदला-बदली का फ़लसफ़ा होता है; नुकसान उठाने का नहीं। उन्होंने यहाँ तक कि अपने विश्वास के बारे में भी परमेश्वर के साथ लेन-देन करने का प्रयास किया है। वे हमेशा विचारमग्न रहते हैं कि क्या उन्हें उनके विश्वास में उनको आशीष मिलेगा या वे शापित होंगे, और वे इस बारे में भी अधिक चिंतित होते हैं कि क्या वे परमेश्वर की प्रजा हैं, या वे सेवा करने वाले हैं। वे लगातार हिसाब-क़िताब करते रहते हैं और जिस किसी भी दिन वे इस मुद्दे के बारे में स्पष्ट नहीं हो पाते हैं वह ऐसा दिन होता है जब वे जीवन की खोज करने के लिए स्थिर नहीं होंगे। धोखेबाज़ लोग चालाक लोमड़ियाँ होते हैं, और सबसे चालाक लोग होते हैं। इस कारण से, परमेश्वर धोखेबाज़ लोगों से सबसे अधिक नफ़रत करता है, और वह उन पर अधिक प्रयास व्यय नहीं करना चाहता है, या उनसे अब और नहीं बोलना चाहता है। धोखेबाज़ लोग हमेशा परमेश्वर के वचनों के प्रति अपने द़ृष्टिकोण में छिद्रान्वेषी होते हैं, वे उसके वचनों में तर्क दोष और बहस के लिए आधार खोजने के लिए उसके वचनों की छानबीन करते हैं क्योंकि धोखेबाज़ लोग परमेश्वर के वचनों को संदेह, विद्रोह, प्रतिरोध और अविश्वास के दृष्टिकोण से देखते हैं, इसलिए उनमें पवित्र आत्मा के कार्य का पूरी तरह से अभाव होता है। परमेश्वर के वचन को पढ़ने से उन्हें लेशमात्र भी प्रबुद्धता प्राप्त नहीं होती है, वे असाधारण रूप से बेतुके और अनाड़ी दिखाई देते हैं। वास्तव में, परमेश्वर के वचनों में कहीं कोई भी विरोधाभास नहीं हैं, फिर भी वे विरोधाभास के कई स्थानों को खोज लेते हैं और खुद मुश्किल में पड़ जाते हैं। यह विशेष रूप से पवित्र आत्मा की उनकी प्रबुद्धता और आध्यात्मिक समझ के दयनीय अभाव को दर्शाता है। जो रवैया धोखेबाज़ लोग परमेश्वर के वचन के प्रति रखते हैं, उससे हम देख सकते हैं कि उनकी फ़ितरत स्पष्टतः शैतानी फ़ितरत है जो कि परमेश्वर का विरोध करती है। वे सभी लोग, जो संदेह और अविश्वास के दृष्टिकोण के साथ परमेश्वर के वचन के करीब आते हैं, वे दर असल धोखेबाज़ लोग हैं, जो निस्संदेह परमेश्वर के वचनों में सत्य को नहीं पाएँगे; और अंततः वे केवल हटा दिए जाएँगे।

— ऊपर से संगति से उद्धृत

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